वाल्मीकि रामायणम्
सुन्दरकाण्डम्
Sundara Kāṇḍa
६८ सर्गाः · २८५८ श्लोकाः
68 sargas · 2,858 ślokas
१
1
हनुमान्जीके द्वारा समुद्रका लङ्घन, मैनाकके द्वारा उनका स्वागत, सुरसापर उनका विजय तथा सिंहिकाका वध करके उनका समुद्रके उस पार पहुँचकर लंकाकी शोभा देखना
Sarga 1
२
2
लंकापुरीका वर्णन, उसमें प्रवेश करनेके विषयमें हनुमान्जीका विचार, उनका लघुरूपसे पुरीमें प्रवेश तथा चन्द्रोदयका वर्णन
Sarga 2
३
3
लंकापुरीका अवलोकन करके हनुमान्जीका विस्मित होना, उसमें प्रवेश करते समय निशाचरी लंकाका उन्हें रोकना और उनकी मारसे विह्वल होकर उन्हें पुरीमें प्रवेश करनेकी अनुमति देना
Sarga 3
४
4
हनुमान्जीका लंकापुरी एवं रावणके अन्तःपुरमें प्रवेश
Sarga 4
५
5
हनुमान्जीका रावणके अन्तःपुरमें घर-घरमें सीताको ढूँढ़ना और उन्हें न देखकर दुःखी होना
Sarga 5
६
6
हनुमान्जीका रावण तथा अन्यान्य राक्षसोंके घरोंमें सीताजीकी खोज करना
Sarga 6
७
7
रावणके भवन एवं पुष्पक विमानका वर्णन
Sarga 7
८
8
हनुमान्जीके द्वारा पुनः पुष्पक विमानका दर्शन
Sarga 8
९
9
हनुमान्जीका रावणके श्रेष्ठ भवन पुष्पक विमान तथा रावणके रहनेकी सुन्दर हवेलीको देखकर उसके भीतर सोयी हुई सहस्रों सुन्दरी स्त्रियोंका अवलोकन करना
Sarga 9
१०
10
हनुमान्जीका अन्तःपुरमें सोये हुए रावण तथा गाढ़ निद्रामें पड़ी हुई उसकी स्त्रियोंको देखना तथा मन्दोदरीको सीता समझकर प्रसन्न होना
Sarga 10
११
11
वह सीता नहीं है—ऐसा निश्चय होनेपर हनुमान्जीका पुनः अन्तःपुरमें और उसकी पानभूमिमें सीताका पता लगाना, उनके मनमें धर्मलोपकी आशंका और स्वतः उसका निवारण होना
Sarga 11
१२
12
सीताके मरणकी आशंकासे हनुमान्जीका शिथिल होना, फिर उत्साहका आश्रय लेकर अन्य स्थानोंमें उनकी खोज करना और कहीं भी पता न लगनेसे पुनः उनका चिन्तित होना
Sarga 12
१३
13
सीताजीके नाशकी आशंकासे हनुमान्जीकी चिन्ता, श्रीरामको सीताके न मिलनेकी सूचना देनेसे अनर्थकी सम्भावना देख हनुमान्जीका न लौटनेका निश्चय करके पुनः खोजनेका विचार करना और अशोकवाटिकामें ढूँढ़नेके विषयमें तरह-तरहकी बातें सोचना
Sarga 13
१४
14
हनुमान्जीका अशोकवाटिकामें प्रवेश करके उसकी शोभा देखना तथा एक अशोकवृक्षपर छिपे रहकर वहींसे सीताका अनुसन्धान करना
Sarga 14
१५
15
वनकी शोभा देखते हुए हनुमान्जीका एक चैत्यप्रासाद (मन्दिर)-के पास सीताको दयनीय अवस्थामें देखना, पहचानना और प्रसन्न होना
Sarga 15
१६
16
हनुमान्जीका मन-ही-मन सीताजीके शील और सौन्दर्यकी सराहना करते हुए उन्हें कष्टमें पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना
Sarga 16
१७
17
भयंकर राक्षसियोंसे घिरी हुई सीताके दर्शनसे हनुमान्जीका प्रसन्न होना
Sarga 17
१८
18
अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए रावणका अशोकवाटिकामें आगमन और हनुमान्जीका उसे देखना
Sarga 18
१९
19
रावणको देखकर दुःख, भय और चिन्तामें डूबी हुई सीताकी अवस्थाका वर्णन
Sarga 19
२०
20
रावणका सीताजीको प्रलोभन
Sarga 20
२१
21
सीताजीका रावणको समझाना और उसे श्रीरामके सामने नगण्य बताना
Sarga 21
२२
22
रावणका सीताको दो मासकी अवधि देना, सीताका उसे फटकारना, फिर रावणका उन्हें धमकाकर राक्षसियोंके नियन्त्रणमें रखकर स्त्रियोंसहित पुनः महलको लौट जाना
Sarga 22
२३
23
राक्षसियोंका सीताजीको समझाना
Sarga 23
२४
24
सीताजीका राक्षसियोंकी बात माननेसे इनकार कर देना तथा राक्षसियोंका उन्हें मारने-काटनेकी धमकी देना
Sarga 24
२५
25
राक्षसियोंकी बात माननेसे इनकार करके शोक-संतप्त सीताका विलाप करना
Sarga 25
२६
26
सीताका करुण-विलाप तथा अपने प्राणोंको त्याग देनेका निश्चय करना
Sarga 26
२७
27
त्रिजटाका स्वप्न, राक्षसोंके विनाश और श्रीरघुनाथजीकी विजयकी शुभ सूचना
Sarga 27
२८
28
विलाप करती हुई सीताका प्राण-त्यागके लिये उद्यत होना
Sarga 28
२९
29
सीताजीके शुभ शकुन
Sarga 29
३०
30
सीताजीसे वार्तालाप करनेके विषयमें हनुमान्जीका विचार करना
Sarga 30
३१
31
हनुमान्जीका सीताको सुनानेके लिये श्रीराम-कथाका वर्णन करना
Sarga 31
३२
32
सीताजीका तर्क-वितर्क
Sarga 32
३३
33
सीताजीका हनुमान्जीको अपना परिचय देते हुए अपने वनगमन और अपहरणका वृत्तान्त बताना
Sarga 33
३४
34
सीताजीका हनुमान्जीके प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान्जीके द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान
Sarga 34
३५
35
सीताजीके पूछनेपर हनुमान्जीका श्रीरामके शारीरिक चिह्नों और गुणोंका वर्णन करना तथा नर-वानरकी मित्रताका प्रसङ्ग सुनाकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न करना
Sarga 35
३६
36
हनुमान्जीका सीताको मुद्रिका देना, सीताका ‘श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे’ यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमान्जीका श्रीरामके सीताविषयक प्रेमका वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना
Sarga 36
३७
37
सीताका हनुमान्जीसे श्रीरामको शीघ्र बुलानेका आग्रह, हनुमान्जीका सीतासे अपने साथ चलनेका अनुरोध तथा सीताका अस्वीकार करना
Sarga 37
३८
38
सीताजीका हनुमान्जीको पहचानके रूपमें चित्रकूट पर्वतपर घटित हुए एक कौएके प्रसंगको सुनाना, भगवान् श्रीरामको शीघ्र बुला लानेके लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना
Sarga 38
३९
39
चूड़ामणि लेकर जाते हुए हनुमान्जीसे सीताका श्रीराम आदिको उत्साहित करनेके लिये कहना तथा समुद्र-तरणके विषयमें शङ्कित हुई सीताको वानरोंका पराक्रम बताकर हनुमान्जीका आश्वासन देना
Sarga 39
४०
40
सीताका श्रीरामसे कहनेके लिये पुनः संदेश देना तथा हनुमान्जीका उन्हें आश्वासन दे उत्तर-दिशाकी ओर जाना
Sarga 40
४१
41
हनुमान्जीके द्वारा प्रमदावन (अशोकवाटिका)-का विध्वंस
Sarga 41
४२
42
राक्षसियोंके मुखसे एक वानरके द्वारा प्रमदावनके विध्वंसका समाचार सुनकर रावणका किंकर नामक राक्षसोंको भेजना और हनुमान्जीके द्वारा उन सबका संहार
Sarga 42
४३
43
हनुमान्जीके द्वारा चैत्यप्रासादका विध्वंस तथा उसके रक्षकोंका वध
Sarga 43
४४
44
प्रहस्त-पुत्र जम्बुमालीका वध
Sarga 44
४५
45
मन्त्रीके सात पुत्रोंका वध
Sarga 45
४६
46
रावणके पाँच सेनापतियोंका वध
Sarga 46
४७
47
रावणपुत्र अक्षकुमारका पराक्रम और वध
Sarga 47
४८
48
इन्द्रजित् और हनुमान्जीका युद्ध, उसके दिव्यास्त्रके बन्धनमें बँधकर हनुमान्जीका रावणके दरबारमें उपस्थित होना
Sarga 48
४९
49
रावणके प्रभावशाली स्वरूपको देखकर हनुमान्जीके मनमें अनेक प्रकारके विचारोंका उठना
Sarga 49
५०
50
रावणका प्रहस्तके द्वारा हनुमान्जीसे लङ्कामें आनेका कारण पुछवाना और हनुमान्का अपनेको श्रीरामका दूत बताना
Sarga 50
५१
51
हनुमान्जीका श्रीरामके प्रभावका वर्णन करते हुए रावणको समझाना
Sarga 51
५२
52
विभीषणका दूतके वधको अनुचित बताकर उसे दूसरा कोई दण्ड देनेके लिये कहना तथा रावणका उनके अनुरोधको स्वीकार कर लेना
Sarga 52
५३
53
राक्षसोंका हनुमान्जीकी पूँछमें आग लगाकर उन्हें नगरमें घुमाना
Sarga 53
५४
54
लङ्कापुरीका दहन और राक्षसोंका विलाप
Sarga 54
५५
55
सीताजीके लिये हनुमान्जीकी चिन्ता और उसका निवारण
Sarga 55
५६
56
हनुमान्जीका पुनः सीताजीसे मिलकर लौटना और समुद्रको लाँघना
Sarga 56
५७
57
हनुमान्जीका समुद्रको लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदोंसे मिलना
Sarga 57
५८
58
हनुमान्जीका अपनी लङ्कायात्राका सारा वृत्तान्त सुनाना
Sarga 58
५९
59
हनुमान्जीका सीताकी दुरवस्था बताकर वानरोंको लङ्कापर आक्रमण करनेके लिये उत्तेजित करना
Sarga 59
६०
60
अङ्गदका लङ्काको जीतकर सीताको ले आनेका उत्साहपूर्ण विचार और जाम्बवान्के द्वारा उसका निवारण
Sarga 60
६१
61
वानरोंका मधुवनमें जाकर वहाँके मधु एवं फलोंका मनमाना उपभोग करना और वनरक्षकको घसीटना
Sarga 61
६२
62
वानरोंद्वारा मधुवनके रक्षकों और दधिमुखका पराभव तथा सेवकोंसहित दधिमुखका सुग्रीवके पास जाना
Sarga 62
६३
63
दधिमुखसे मधुवनके विध्वंसका समाचार सुनकर सुग्रीवका हनुमान् आदि वानरोंकी सफलताके विषयमें अनुमान
Sarga 63
६४
64
दधिमुखसे सुग्रीवका संदेश सुनकर अङ्गद-हनुमान् आदि वानरोंका किष्किन्धामें पहुँचना और हनुमान्जीका श्रीरामको प्रणाम करके सीता देवीके दर्शनका समाचार बताना
Sarga 64
६५
65
हनुमान्जीका श्रीरामको सीताका समाचार सुनाना
Sarga 65
६६
66
चूडामणिको देखकर और सीताका समाचार पाकर श्रीरामका उनके लिये विलाप
Sarga 66
६७
67
हनुमान्जीका भगवान् श्रीरामको सीताका संदेश सुनाना
Sarga 67
६८
68
हनुमान्जीका सीताके संदेह और अपनेद्वारा उनके निवारणका वृत्तान्त बताना
Sarga 68