वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः ५५ · ३५ श्लोकाःSarga 55 · 35 ślokas

सीताजीके लिये हनुमान्जीकी चिन्ता और उसका निवारण

॥ ५ · ५५ · १ ॥
संदीप्यमानां वित्रस्तां त्रस्तरक्षोगणां पुरीम्। अवेक्ष्य हनुमाँल्लङ्कां चिन्तयामास वानरः॥

saṁdīpyamānāṁ vitrastāṁ trastarakṣogaṇāṁ purīm।
avekṣya hanumām̐llaṅkāṁ cintayāmāsa vānaraḥ॥

वानरवीर हनुमान्जी ने जब देखा कि सारी लङ्कापुरी जल रही है, वहाँ के निवासियों पर त्रास छा गया है और राक्षसगण अत्यन्त भयभीत हो गये हैं, तब उनके मन में सीता के दग्ध होने की आशङ्का से बड़ी चिन्ता हुई

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॥ ५ · ५५ · २ ॥
तस्याभूत् सुमहांस्त्रासः कुत्सा चात्मन्यजायत। लङ्कां प्रदहता कर्म किंस्वित् कृतमिदं मया॥

tasyābhūt sumahāṁstrāsaḥ kutsā cātmanyajāyata।
laṅkāṁ pradahatā karma kiṁsvit kṛtamidaṁ mayā॥

साथ ही उनपर महान् त्रास छा गया और उन्हें अपने प्रति घृणा-सी होने लगी। वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हाय! मैंने लङ्का को जलाते समय यह कैसा कुत्सित कर्म कर डाला?

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॥ ५ · ५५ · ३ ॥
धन्याः खलु महात्मानो ये बुद्ध्या कोपमुत्थितम्। निरुन्धन्ति महात्मानो दीप्तमग्निमिवाम्भसा॥

dhanyāḥ khalu mahātmāno ye buddhyā kopamutthitam।
nirundhanti mahātmāno dīptamagnimivāmbhasā॥

‘जो महामनस्वी महात्मा पुरुष उठे हुए कोप को अपनी बुद्धि के द्वारा उसी प्रकार रोक देते हैं, जैसे साधारण लोग जल से प्रज्वलित अग्नि को शान्त कर देते हैं, वे ही इस संसार में धन्य हैं

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॥ ५ · ५५ · ४ ॥
क्रुद्धः पापं कुर्यात् कः क्रुद्धो हन्याद् गुरूनपि। क्रुद्धः परुषया वाचा नरः साधूनधिक्षिपेत्॥

kruddhaḥ pāpaṁ na kuryāt kaḥ kruddho hanyād gurūnapi।
kruddhaḥ paruṣayā vācā naraḥ sādhūnadhikṣipet॥

‘क्रोध से भर जाने पर कौन पुरुष पाप नहीं करता? क्रोध के वशीभूत हुआ मनुष्य गुरुजनों की भी हत्या कर सकता है। क्रोधी मानव साधु पुरुषों पर भी कटुवचनोंद्वारा आक्षेप करने लगता है

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॥ ५ · ५५ · ५ ॥
वाच्यावाच्यं प्रकुपितो विजानाति कर्हिचित्। नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नावाच्यं विद्यते क्वचित्॥

vācyāvācyaṁ prakupito na vijānāti karhicit।
nākāryamasti kruddhasya nāvācyaṁ vidyate kvacit॥

‘अधिक कुपित हुआ मनुष्य कभी इस बात का विचार नहीं करता कि मुँह से क्या कहना चाहिये और क्या नहीं? क्रोधी के लिये कोई ऐसा बुरा काम नहीं, जिसे वह न कर सके और कोई ऐसी बुरी बात नहीं, जिसे वह मुँह से न निकाल सके

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॥ ५ · ५५ · ६ ॥
यः समुत्पतितं क्रोधं क्षमयैव निरस्यति। यथोरगस्त्वचं जीर्णां वै पुरुष उच्यते॥

yaḥ samutpatitaṁ krodhaṁ kṣamayaiva nirasyati।
yathoragastvacaṁ jīrṇāṁ sa vai puruṣa ucyate॥

‘जो हृदय में उत्पन्न हुए क्रोध को क्षमा के द्वारा उसी तरह निकाल देता है, जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुल को छोड़ देता है, वही पुरुष कहलाता है

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॥ ५ · ५५ · ७ ॥
धिगस्तु मां सुदुर्बुद्धिं निर्लज्जं पापकृत्तमम्। अचिन्तयित्वा तां सीतामग्निदं स्वामिघातकम्॥

dhigastu māṁ sudurbuddhiṁ nirlajjaṁ pāpakṛttamam।
acintayitvā tāṁ sītāmagnidaṁ svāmighātakam॥

‘मेरी बुद्धि बड़ी खोटी है, मैं निर्लज्ज और महान् पापाचारी हूँ। मैंने सीता की रक्षा का कोई विचार न करके लङ्का में आग लगा दी और इस तरह अपने स्वामी की ही हत्या कर डाली। मुझे धिक्कार है

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॥ ५ · ५५ · ८ ॥
यदि दग्धा त्वियं सर्वा नूनमार्यापि जानकी। दग्धा तेन मया भर्तुर्हितं कार्यमजानता॥

yadi dagdhā tviyaṁ sarvā nūnamāryāpi jānakī।
dagdhā tena mayā bharturhitaṁ kāryamajānatā॥

‘यदि यह सारी लङ्का जल गयी तो आर्या जानकी भी निश्चय ही उसमें दग्ध हो गयी होंगी। ऐसा करके मैंने अनजान में अपने स्वामी का सारा काम ही चौपट कर डाला

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॥ ५ · ५५ · ९ ॥
यदर्थमयमारम्भस्तत्कार्यमवसादितम्। मया हि दहता लङ्कां सीता परिरक्षिता॥

yadarthamayamārambhastatkāryamavasāditam।
mayā hi dahatā laṅkāṁ na sītā parirakṣitā॥

‘जिस कार्य की सिद्धि के लिये यह सारा उद्योग किया गया था, वह कार्य ही मैंने नष्ट कर दिया; क्योंकि लङ्का जलाते समय मैंने सीता की रक्षा नहीं की

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॥ ५ · ५५ · १० ॥
ईषत्कार्यमिदं कार्यं कृतमासीन्न संशयः। तस्य क्रोधाभिभूतेन मया मूलक्षयः कृतः॥

īṣatkāryamidaṁ kāryaṁ kṛtamāsīnna saṁśayaḥ।
tasya krodhābhibhūtena mayā mūlakṣayaḥ kṛtaḥ॥

‘इसमें संदेह नहीं कि यह लङ्का-दहन एक छोटा-सा कार्य शेष रह गया था, जिसे मैंने पूर्ण किया; परंतु क्रोध से पागल होने के कारण मैंने श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की तो जड़ ही काट डाली

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॥ ५ · ५५ · ११ ॥
विनष्टा जानकी व्यक्तं ह्यदग्धः प्रदृश्यते। लङ्कायाः कश्चिदुद्देशः सर्वा भस्मीकृता पुरी॥

vinaṣṭā jānakī vyaktaṁ na hyadagdhaḥ pradṛśyate।
laṅkāyāḥ kaściduddeśaḥ sarvā bhasmīkṛtā purī॥

‘लङ्का का कोई भी भाग ऐसा नहीं दिखायी देता, जहाँ आग न लगी हो। सारी पुरी ही मैंने भस्म कर डाली है, अतः जानकी नष्ट हो गयी, यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है

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॥ ५ · ५५ · १२ ॥
यदि तद्विहितं कार्यं मया प्रज्ञाविपर्ययात्। इहैव प्राणसंन्यासो ममापि ह्यद्य रोचते॥

yadi tadvihitaṁ kāryaṁ mayā prajñāviparyayāt।
ihaiva prāṇasaṁnyāso mamāpi hyadya rocate॥

‘यदि अपनी विपरीत बुद्धि के कारण मैंने सारा काम चौपट कर दिया तो यहीं आज मेरे प्राणों का भी विसर्जन हो जाना चाहिये। यही मुझे अच्छा जान पड़ता है

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॥ ५ · ५५ · १३ ॥
किमग्नौ निपताम्यद्य आहोस्विद् वडवामुखे। शरीरमिह सत्त्वानां दद्मि सागरवासिनाम्॥

kimagnau nipatāmyadya āhosvid vaḍavāmukhe।
śarīramiha sattvānāṁ dadmi sāgaravāsinām॥

‘क्या मैं अब जलती आग में कूद पड़ूँ या वडवानल के मुख में? अथवा समुद्र में निवास करनेवाले जल-जन्तुओं को ही यहाँ अपना शरीर समर्पित कर दूँ

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॥ ५ · ५५ · १४ ॥
कथं नु जीवता शक्यो मया द्रष्टुं हरीश्वरः। तौ वा पुरुषशार्दूलौ कार्यसर्वस्वघातिना॥

kathaṁ nu jīvatā śakyo mayā draṣṭuṁ harīśvaraḥ।
tau vā puruṣaśārdūlau kāryasarvasvaghātinā॥

‘जब मैंने सारा कार्य ही नष्ट कर दिया, तब अब जीते-जी कैसे वानरराज सुग्रीव अथवा उन दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण का दर्शन कर सकता हूँ या उन्हें अपना मुँह दिखा सकता हूँ?

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॥ ५ · ५५ · १५ ॥
मया खलु तदेवेदं रोषदोषात् प्रदर्शितम्। प्रथितं त्रिषु लोकेषु कपित्वमनवस्थितम्॥

mayā khalu tadevedaṁ roṣadoṣāt pradarśitam।
prathitaṁ triṣu lokeṣu kapitvamanavasthitam॥

‘मैंने रोष के दोष से तीनों लोकों में विख्यात इस वानरोचित चपलता का ही यहाँ प्रदर्शन किया है

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॥ ५ · ५५ · १६ ॥
धिगस्तु राजसं भावमनीशमनवस्थितम्। ईश्वरेणापि यद् रागान्मया सीता रक्षिता॥

dhigastu rājasaṁ bhāvamanīśamanavasthitam।
īśvareṇāpi yad rāgānmayā sītā na rakṣitā॥

‘यह राजस भाव कार्य-साधन में असमर्थ और अव्यवस्थित है, इसे धिक्कार है; क्योंकि इस रजोगुणमूलक क्रोध के ही कारण समर्थ होते हुए भी मैंने सीता की रक्षा नहीं की

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॥ ५ · ५५ · १७ ॥
विनष्टायां तु सीतायां तावुभौ विनशिष्यतः। तयोर्विनाशे सुग्रीवः सबन्धुर्विनशिष्यति॥

vinaṣṭāyāṁ tu sītāyāṁ tāvubhau vinaśiṣyataḥ।
tayorvināśe sugrīvaḥ sabandhurvinaśiṣyati॥

‘सीता के नष्ट हो जाने से वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण भी नष्ट हो जायँगे। उन दोनों का नाश होने पर बन्धु-बान्धवोंसहित सुग्रीव भी जीवित नहीं रहेंगे

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॥ ५ · ५५ · १८ ॥
एतदेव वचः श्रुत्वा भरतो भ्रातृवत्सलः। धर्मात्मा सहशत्रुघ्नः कथं शक्ष्यति जीवितुम्॥

etadeva vacaḥ śrutvā bharato bhrātṛvatsalaḥ।
dharmātmā sahaśatrughnaḥ kathaṁ śakṣyati jīvitum॥

‘फिर इसी समाचार को सुन लेने पर भ्रातृवत्सल धर्मात्मा भरत और शत्रुघ्न भी कैसे जीवन धारण कर सकेंगे?

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॥ ५ · ५५ · १९ ॥
इक्ष्वाकुवंशे धर्मिष्ठे गते नाशमसंशयम्। भविष्यन्ति प्रजाः सर्वाः शोकसंतापपीडिताः॥

ikṣvākuvaṁśe dharmiṣṭhe gate nāśamasaṁśayam।
bhaviṣyanti prajāḥ sarvāḥ śokasaṁtāpapīḍitāḥ॥

‘इस प्रकार धर्मनिष्ठ इक्ष्वाकुवंश के नष्ट हो जाने पर सारी प्रजा भी शोक-संताप से पीड़ित हो जायगी, इसमें संशय नहीं है

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॥ ५ · ५५ · २० ॥
तदहं भाग्यरहितो लुप्तधर्मार्थसंग्रहः। रोषदोषपरीतात्मा व्यक्तं लोकविनाशनः॥

tadahaṁ bhāgyarahito luptadharmārthasaṁgrahaḥ।
roṣadoṣaparītātmā vyaktaṁ lokavināśanaḥ॥

‘अतः सीता की रक्षा न करने के कारण मैंने धर्म और अर्थ के संग्रह को नष्ट कर दिया, अतएव मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ। मेरा हृदय रोषदोष के वशीभूत हो गया है, इसलिये मैं अवश्य ही समस्त लोक का विनाशक हो गया हूँ—मुझे सम्पूर्ण जगत् के विनाश के पाप का भागी होना पड़ेगा’

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॥ ५ · ५५ · २१ ॥
इति चिन्तयतस्तस्य निमित्तान्युपपेदिरे। पूर्वमप्युपलब्धानि साक्षात् पुनरचिन्तयत्॥

iti cintayatastasya nimittānyupapedire।
pūrvamapyupalabdhāni sākṣāt punaracintayat॥

इस प्रकार चिन्ता में पड़े हुए हनुमान्जी को कई शुभ शकुन दिखायी पड़े, जिनके अच्छे फलों का वे पहले भी प्रत्यक्ष अनुभव कर चुके थे; अतः वे फिर इस प्रकार सोचने लगे—

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॥ ५ · ५५ · २२ ॥
अथ वा चारुसर्वाङ्गी रक्षिता स्वेन तेजसा। नशिष्यति कल्याणी नाग्निरग्नौ प्रवर्तते॥

atha vā cārusarvāṅgī rakṣitā svena tejasā।
na naśiṣyati kalyāṇī nāgniragnau pravartate॥

‘अथवा सम्भव है सर्वाङ्गसुन्दरी सीता अपने ही तेज से सुरक्षित हों। कल्याणी जनकनन्दिनी का नाश कदापि नहीं होगा; क्योंकि आग आग को नहीं जलाती है

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॥ ५ · ५५ · २३ ॥
नहि धर्मात्मनस्तस्य भार्याममिततेजसः। स्वचरित्राभिगुप्तां तां स्प्रष्टुमर्हति पावकः॥

nahi dharmātmanastasya bhāryāmamitatejasaḥ।
svacaritrābhiguptāṁ tāṁ spraṣṭumarhati pāvakaḥ॥

‘सीता अमित तेजस्वी धर्मात्मा भगवान् श्रीराम की पत्नी हैं। वे अपने चरित्र के बल से—पातिव्रत्य के प्रभाव से सुरक्षित हैं। आग उन्हें छू भी नहीं सकती

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॥ ५ · ५५ · २४ ॥
नूनं रामप्रभावेण वैदेह्याः सुकृतेन च। यन्मां दहनकर्मायं नादहद्धव्यवाहनः॥

nūnaṁ rāmaprabhāveṇa vaidehyāḥ sukṛtena ca।
yanmāṁ dahanakarmāyaṁ nādahaddhavyavāhanaḥ॥

‘अवश्य श्रीराम के प्रभाव तथा विदेहनन्दिनी सीता के पुण्यबल से ही यह दाहक अग्नि मुझे नहीं जला सकी है

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॥ ५ · ५५ · २५ ॥
त्रयाणां भरतादीनां भ्रातृणां देवता या। रामस्य मनःकान्ता सा कथं विनशिष्यति॥

trayāṇāṁ bharatādīnāṁ bhrātṛṇāṁ devatā ca yā।
rāmasya ca manaḥkāntā sā kathaṁ vinaśiṣyati॥

‘फिर जो भरत आदि तीनों भाइयों की आराध्य देवी और श्रीरामचन्द्रजी की हृदयवल्लभा हैं, वे आग से कैसे नष्ट हो सकेंगी

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॥ ५ · ५५ · २६ ॥
यद् वा दहनकर्मायं सर्वत्र प्रभुरव्ययः। मे दहति लाङ्गूलं कथमार्यां प्रधक्ष्यति॥

yad vā dahanakarmāyaṁ sarvatra prabhuravyayaḥ।
na me dahati lāṅgūlaṁ kathamāryāṁ pradhakṣyati॥

‘यह दाहक एवं अविनाशी अग्नि सर्वत्र अपना प्रभाव रखती है, सबको जला सकती है, तो भी यह जिनके प्रभाव से मेरी पूँछ को नहीं जला पाती है, उन्हीं साक्षात् माता जानकी को कैसे जला सकेगी?’

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॥ ५ · ५५ · २७ ॥
पुनश्चाचिन्तयत् तत्र हनुमान् विस्मितस्तदा। हिरण्यनाभस्य गिरेर्जलमध्ये प्रदर्शनम्॥

punaścācintayat tatra hanumān vismitastadā।
hiraṇyanābhasya girerjalamadhye pradarśanam॥

उस समय हनुमान्जी ने वहाँ विस्मित होकर पुनः उस घटना को स्मरण किया, जब कि समुद्र के जल में उन्हें मैनाक पर्वत का दर्शन हुआ था

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॥ ५ · ५५ · २८ ॥
तपसा सत्यवाक्येन अनन्यत्वाच्च भर्तरि। असौ विनिर्दहेदग्निं तामग्निः प्रधक्ष्यति॥

tapasā satyavākyena ananyatvācca bhartari।
asau vinirdahedagniṁ na tāmagniḥ pradhakṣyati॥

वे सोचने लगे—‘तपस्या, सत्यभाषण तथा पति में अनन्य भक्ति के कारण आर्या सीता ही अग्नि को जला सकती हैं, आग उन्हें नहीं जला सकती’

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॥ ५ · ५५ · २९ ॥
तथा चिन्तयंस्तत्र देव्या धर्मपरिग्रहम्। शुश्राव हनुमांस्तत्र चारणानां महात्मनाम्॥

sa tathā cintayaṁstatra devyā dharmaparigraham।
śuśrāva hanumāṁstatra cāraṇānāṁ mahātmanām॥

इस प्रकार भगवती सीता की धर्मपरायणता का विचार करते हुए हनुमान्जी ने वहाँ महात्मा चारणों के मुख से निकली हुई ये बातें सुनीं—

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॥ ५ · ५५ · ३० ॥
अहो खलु कृतं कर्म दुर्विगाहं हनूमता। अग्निं विसृजता तीक्ष्णं भीमं राक्षससद्मनि॥

aho khalu kṛtaṁ karma durvigāhaṁ hanūmatā।
agniṁ visṛjatā tīkṣṇaṁ bhīmaṁ rākṣasasadmani॥

‘अहो! हनुमान्जी ने राक्षसों के घरों में दुःसह एवं भयंकर आग लगाकर बड़ा ही अद्भुत और दुष्कर कार्य किया है

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॥ ५ · ५५ · ३१ ॥
प्रपलायितरक्षःस्त्रीबालवृद्धसमाकुला। जनकोलाहलाध्माता क्रन्दन्तीवाद्रिकन्दरैः॥

prapalāyitarakṣaḥstrībālavṛddhasamākulā।
janakolāhalādhmātā krandantīvādrikandaraiḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५५ · ३२ ॥
दग्धेयं नगरी लङ्का साट्टप्राकारतोरणा। जानकी दग्धेति विस्मयोऽद्भुत एव नः॥

dagdheyaṁ nagarī laṅkā sāṭṭaprākāratoraṇā।
jānakī na ca dagdheti vismayo'dbhuta eva naḥ॥

॥ ३१–३२ ॥

‘घर में से भागे हुए राक्षसों, स्त्रियों, बालकों और वृद्धों से भरी हुई सारी लङ्का जन-कोलाहल से परिपूर्ण हो चीत्कार करती हुई-सी जान पड़ती है। पर्वत की कन्दराओं, अटारियों, परकोटों और नगर के फाटकोंसहित यह सारी लङ्का नगरी दग्ध हो गयी; परंतु सीता पर आँच नहीं आयी। यह हमारे लिये बड़ी अद्भुत और आश्चर्य की बात है’

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॥ ५ · ५५ · ३३ ॥
इति शुश्राव हनुमान् वाचं ताममृतोपमाम्। बभूव चास्य मनसो हर्षस्तत्कालसम्भवः॥

iti śuśrāva hanumān vācaṁ tāmamṛtopamām।
babhūva cāsya manaso harṣastatkālasambhavaḥ॥

हनुमान्जी ने जब चारणों के कहे हुए ये अमृत के समान मधुर वचन सुने, तब उनके हृदय में तत्काल हर्षोल्लास छा गया

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॥ ५ · ५५ · ३४ ॥
निमित्तैश्च दृष्टार्थैः कारणैश्च महागुणैः। ऋषिवाक्यैश्च हनुमानभवत् प्रीतमानसः॥

sa nimittaiśca dṛṣṭārthaiḥ kāraṇaiśca mahāguṇaiḥ।
ṛṣivākyaiśca hanumānabhavat prītamānasaḥ॥

अनेक बार के प्रत्यक्ष अनुभव किये हुए शुभ शकुनों, महान् गुणदायक कारणों तथा चारणों के कहे हुए पूर्वोक्त वचनोंद्वारा सीताजी के जीवित होने का निश्चय करके हनुमान्जी के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई

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॥ ५ · ५५ · ३५ ॥
ततः कपिः प्राप्तमनोरथार्थस्तामक्षतां राजसुतां विदित्वा। प्रत्यक्षतस्तां पुनरेव दृष्ट्वा प्रतिप्रयाणाय मतिं चकार॥

tataḥ kapiḥ prāptamanorathārthastāmakṣatāṁ rājasutāṁ viditvā।
pratyakṣatastāṁ punareva dṛṣṭvā pratiprayāṇāya matiṁ cakāra॥

राजकुमारी सीता को कोई क्षति नहीं पहुँची है, यह जानकर कपिवर हनुमान्जी ने अपना सम्पूर्ण मनोरथ सफल समझा और पुनः उनका प्रत्यक्ष दर्शन करके लौट जाने का विचार किया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५ ॥