वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः ५४ · ५१ श्लोकाःSarga 54 · 51 ślokas

लङ्कापुरीका दहन और राक्षसोंका विलाप

॥ ५ · ५४ · १ ॥
वीक्षमाणस्ततो लङ्कां कपिः कृतमनोरथः। वर्धमानसमुत्साहः कार्यशेषमचिन्तयत्॥

vīkṣamāṇastato laṅkāṁ kapiḥ kṛtamanorathaḥ।
vardhamānasamutsāhaḥ kāryaśeṣamacintayat॥

हनुमान्जी के सभी मनोरथ पूर्ण हो गये थे। उनका उत्साह बढ़ता जा रहा था। अतः वे लङ्का का निरीक्षण करते हुए शेष कार्य के सम्बन्ध में विचार करने लगे—

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॥ ५ · ५४ · २ ॥
किं नु खल्ववशिष्टं मे कर्तव्यमिह साम्प्रतम्। यदेषां रक्षसां भूयः संतापजननं भवेत्॥

kiṁ nu khalvavaśiṣṭaṁ me kartavyamiha sāmpratam।
yadeṣāṁ rakṣasāṁ bhūyaḥ saṁtāpajananaṁ bhavet॥

‘अब इस समय लङ्का में मेरे लिये कौन-सा ऐसा कार्य बाकी रह गया है, जो इन राक्षसों को अधिक संताप देनेवाला हो?

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॥ ५ · ५४ · ३ ॥
वनं तावत्प्रमथितं प्रकृष्टा राक्षसा हताः। बलैकदेशः क्षपितः शेषं दुर्गविनाशनम्॥

vanaṁ tāvatpramathitaṁ prakṛṣṭā rākṣasā hatāḥ।
balaikadeśaḥ kṣapitaḥ śeṣaṁ durgavināśanam॥

‘प्रमदावन को तो मैंने पहले ही उजाड़ दिया था, बड़े-बड़े राक्षसों को भी मौत के घाट उतार दिया और रावण की सेना के भी एक अंश का संहार कर डाला। अब दुर्ग का विध्वंस करना शेष रह गया

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॥ ५ · ५४ · ४ ॥
दुर्गे विनाशिते कर्म भवेत् सुखपरिश्रमम्। अल्पयत्नेन कार्येऽस्मिन् मम स्यात् सफलः श्रमः॥

durge vināśite karma bhavet sukhapariśramam।
alpayatnena kārye'smin mama syāt saphalaḥ śramaḥ॥

‘दुर्ग का विनाश हो जाने पर मेरे द्वारा समुद्र-लङ्घन आदि कर्म के लिये किया गया प्रयास सुखद एवं सफल होगा। मैंने सीताजी की खोज के लिये जो परिश्रम किया है, वह थोड़े-से ही प्रयत्नद्वारा सिद्ध होनेवाले लङ्कादहन से सफल हो जायगा

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॥ ५ · ५४ · ५ ॥
यो ह्ययं मम लाङ्गूले दीप्यते हव्यवाहनः। अस्य संतर्पणं न्याय्यं कर्तुमेभिर्गृहोत्तमैः॥

yo hyayaṁ mama lāṅgūle dīpyate havyavāhanaḥ।
asya saṁtarpaṇaṁ nyāyyaṁ kartumebhirgṛhottamaiḥ॥

‘मेरी पूँछ में जो ये अग्निदेव देदीप्यमान हो रहे हैं, इन्हें इन श्रेष्ठ गृहों की आहुति देकर तृप्त करना न्यायसंगत जान पड़ता है’

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॥ ५ · ५४ · ६ ॥
ततः प्रदीप्तलाङ्गूलः सविद्युदिव तोयदः। भवनाग्रेषु लङ्काया विचचार महाकपिः॥

tataḥ pradīptalāṅgūlaḥ savidyudiva toyadaḥ।
bhavanāgreṣu laṅkāyā vicacāra mahākapiḥ॥

ऐसा सोचकर जलती हुई पूँछ के कारण बिजली-सहित मेघ की भाँति शोभा पानेवाले कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी लङ्का के महलों पर घूमने लगे

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॥ ५ · ५४ · ७ ॥
गृहाद् गृहं राक्षसानामुद्यानानि वानरः। वीक्षमाणो ह्यसंत्रस्तः प्रासादांश्च चचार सः॥

gṛhād gṛhaṁ rākṣasānāmudyānāni ca vānaraḥ।
vīkṣamāṇo hyasaṁtrastaḥ prāsādāṁśca cacāra saḥ॥

वे वानरवीर राक्षसों के एक घर से दूसरे घर पर पहुँचकर उद्यानों और राजभवनों को देखते हुए निर्भय होकर विचरने लगे

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॥ ५ · ५४ · ८ ॥
अवप्लुत्य महावेगः प्रहस्तस्य निवेशनम्। अग्निं तत्र विनिक्षिप्य श्वसनेन समो बली॥

avaplutya mahāvegaḥ prahastasya niveśanam।
agniṁ tatra vinikṣipya śvasanena samo balī॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५४ · ९ ॥
ततोऽन्यत् पुप्लुवे वेश्म महापार्श्वस्य वीर्यवान्। मुमोच हनुमानग्निं कालानलशिखोपमम्॥

tato'nyat pupluve veśma mahāpārśvasya vīryavān।
mumoca hanumānagniṁ kālānalaśikhopamam॥

॥ ८–९ ॥

घूमते-घूमते वायु के समान बलवान् और महान् वेगशाली हनुमान् उछलकर प्रहस्त के महल पर जा पहुँचे और उसमें आग लगाकर दूसरे घर पर कूद पड़े। वह महापार्श्व का निवासस्थान था। पराक्रमी हनुमान् ने उसमें भी कालाग्नि की लपटों के समान प्रज्वलित होनेवाली आग फैला दी

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॥ ५ · ५४ · १० ॥
वज्रदंष्ट्रस्य तथा पुप्लुवे महाकपिः। शुकस्य महातेजाः सारणस्य धीमतः॥

vajradaṁṣṭrasya ca tathā pupluve sa mahākapiḥ।
śukasya ca mahātejāḥ sāraṇasya ca dhīmataḥ॥

तत्पश्चात् वे महातेजस्वी महाकपि क्रमशः वज्रदंष्ट्र, शुक और बुद्धिमान् सारण के घरों पर कूदे और उनमें आग लगाकर आगे बढ़ गये

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॥ ५ · ५४ · ११ ॥
तथा चेन्द्रजितो वेश्म ददाह हरियूथपः। जम्बुमालेः सुमालेश्च ददाह भवनं ततः॥

tathā cendrajito veśma dadāha hariyūthapaḥ।
jambumāleḥ sumāleśca dadāha bhavanaṁ tataḥ॥

इसके बाद वानरयूथपति हनुमान् ने इन्द्रविजयी मेघनाद का घर जलाया। फिर जम्बुमाली और सुमाली के घरों को फूँक दिया

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॥ ५ · ५४ · १२ ॥
रश्मिकेतोश्च भवनं सूर्यशत्रोस्तथैव च। ह्रस्वकर्णस्य दंष्ट्रस्य रोमशस्य रक्षसः॥

raśmiketośca bhavanaṁ sūryaśatrostathaiva ca।
hrasvakarṇasya daṁṣṭrasya romaśasya ca rakṣasaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५४ · १३ ॥
युद्धोन्मत्तस्य मत्तस्य ध्वजग्रीवस्य रक्षसः। विद्युज्जिह्वस्य घोरस्य तथा हस्तिमुखस्य च॥

yuddhonmattasya mattasya dhvajagrīvasya rakṣasaḥ।
vidyujjihvasya ghorasya tathā hastimukhasya ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५४ · १४ ॥
करालस्य विशालस्य शोणिताक्षस्य चैव हि। कुम्भकर्णस्य भवनं मकराक्षस्य चैव हि॥

karālasya viśālasya śoṇitākṣasya caiva hi।
kumbhakarṇasya bhavanaṁ makarākṣasya caiva hi॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५४ · १५ ॥
नरान्तकस्य कुम्भस्य निकुम्भस्य दुरात्मनः। यज्ञशत्रोश्च भवनं ब्रह्मशत्रोस्तथैव च॥

narāntakasya kumbhasya nikumbhasya durātmanaḥ।
yajñaśatrośca bhavanaṁ brahmaśatrostathaiva ca॥

॥ १२–१५ ॥

तदनन्तर रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु, ह्रस्वकर्ण, दंष्ट्र, राक्षस रोमश, रणोन्मत्त मत्त, ध्वजग्रीव, भयानक विद्युज्जिह्व, हस्तिमुख, कराल, विशाल, शोणिताक्ष, कुम्भकर्ण, मकराक्ष, नरान्तक, कुम्भ, दुरात्मा निकुम्भ, यज्ञशत्रु और ब्रह्मशत्रु आदि राक्षसों के घरों में जा-जाकर उन्होंने आग लगायी

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॥ ५ · ५४ · १६ ॥
वर्जयित्वा महातेजा विभीषणगृहं प्रति। क्रममाणः क्रमेणैव ददाह हरिपुङ्गवः॥

varjayitvā mahātejā vibhīṣaṇagṛhaṁ prati।
kramamāṇaḥ krameṇaiva dadāha haripuṅgavaḥ॥

उस समय महातेजस्वी कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने केवल विभीषण का घर छोड़कर अन्य सब घरों में क्रमशः पहुँचकर उन सबमें आग लगा दी

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॥ ५ · ५४ · १७ ॥
तेषु तेषु महाहर्षु भवनेषु महायशाः। गृहेष्वृद्धिमतामृद्धिं ददाह कपिकुञ्जरः॥

teṣu teṣu mahāharṣu bhavaneṣu mahāyaśāḥ।
gṛheṣvṛddhimatāmṛddhiṁ dadāha kapikuñjaraḥ॥

महायशस्वी कपिकुञ्जर पवनकुमार ने विभिन्न बहुमूल्य भवनों में जा-जाकर समृद्धिशाली राक्षसों के घरों की सारी सम्पत्ति जलाकर भस्म कर डाली

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॥ ५ · ५४ · १८ ॥
सर्वेषां समतिक्रम्य राक्षसेन्द्रस्य वीर्यवान्। आससादाथ लक्ष्मीवान् रावणस्य निवेशनम्॥

sarveṣāṁ samatikramya rākṣasendrasya vīryavān।
āsasādātha lakṣmīvān rāvaṇasya niveśanam॥

सबके घरों को लाँघते हुए शोभाशाली पराक्रमी हनुमान् राक्षसराज रावण के महल पर जा पहुँचे

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॥ ५ · ५४ · १९ ॥
ततस्तस्मिन् गृहे मुख्ये नानारत्नविभूषिते। मेरुमन्दरसंकाशे नानामङ्गलशोभिते॥

tatastasmin gṛhe mukhye nānāratnavibhūṣite।
merumandarasaṁkāśe nānāmaṅgalaśobhite॥

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॥ ५ · ५४ · २० ॥
प्रदीप्तमग्निमुत्सृज्य लाङ्गूलाग्रे प्रतिष्ठितम्। ननाद हनुमान् वीरो युगान्तजलदो यथा॥

pradīptamagnimutsṛjya lāṅgūlāgre pratiṣṭhitam।
nanāda hanumān vīro yugāntajalado yathā॥

॥ १९–२० ॥

वही लङ्का के सब महलों में श्रेष्ठ, भाँति-भाँति के रत्नों से विभूषित, मेरुपर्वत के समान ऊँचा और नाना प्रकार के माङ्गलिक उत्सवों से सुशोभित था। अपनी पूँछ के अग्रभाग में प्रतिष्ठित हुई प्रज्वलित अग्नि को उस महल में छोड़कर वीरवर हनुमान् प्रलयकाल के मेघ की भाँति भयानक गर्जना करने लगे

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॥ ५ · ५४ · २१ ॥
श्वसनेन संयोगादतिवेगो महाबलः। कालाग्निरिव जज्वाल प्रावर्धत हुताशनः॥

śvasanena ca saṁyogādativego mahābalaḥ।
kālāgniriva jajvāla prāvardhata hutāśanaḥ॥

हवा का सहारा पाकर वह प्रबल आग बड़े वेग से बढ़ने लगी और कालाग्नि के समान प्रज्वलित हो उठी

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॥ ५ · ५४ · २२ ॥
प्रदीप्तमग्निं पवनस्तेषु वेश्मसु चारयन्। तानि काञ्चनजालानि मुक्तामणिमयानि च॥

pradīptamagniṁ pavanasteṣu veśmasu cārayan।
tāni kāñcanajālāni muktāmaṇimayāni ca॥

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॥ ५ · ५४ · २३ ॥
भवनानि व्यशीर्यन्त रत्नवन्ति महान्ति च। तानि भग्नविमानानि निपेतुर्वसुधातले॥

bhavanāni vyaśīryanta ratnavanti mahānti ca।
tāni bhagnavimānāni nipeturvasudhātale॥

॥ २२–२३ ॥

वायु उस प्रज्वलित अग्नि को सभी घरों में फैलाने लगी। सोने की खिड़कियों से सुशोभित, मोती और मणियोंद्वारा निर्मित तथा रत्नों से विभूषित ऊँचे-ऊँचे प्रासाद एवं सतमहले भवन फट-फटकर पृथ्वी पर गिरने लगे

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॥ ५ · ५४ · २४ ॥
भवनानीव सिद्धानामम्बरात् पुण्यसंक्षये। संजज्ञे तुमुलः शब्दो राक्षसानां प्रधावताम्॥ स्वे स्वे गृहपरित्राणे भग्नोत्साहोज्झितश्रियाम्।

bhavanānīva siddhānāmambarāt puṇyasaṁkṣaye।
saṁjajñe tumulaḥ śabdo rākṣasānāṁ pradhāvatām॥
sve sve gṛhaparitrāṇe bhagnotsāhojjhitaśriyām।

वे गिरते हुए भवन पुण्य का क्षय होने पर आकाश से नीचे गिरनेवाले सिद्धों के घरों के समान जान पड़ते थे। उस समय राक्षस अपने-अपने घरों को बचाने—उनकी आग बुझाने के लिये इधर-उधर दौड़ने लगे। उनका उत्साह जाता रहा और उनकी श्री नष्ट हो गयी थी। उन सबका तुमुल आर्तनाद चारों ओर गूँजने लगा

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॥ ५ · ५४ · २५ ॥
नूनमेषोऽग्निरायातः कपिरूपेण हा इति॥ क्रन्दन्त्यः सहसा पेतुः स्तनन्धयधराः स्त्रियः।

nūnameṣo'gnirāyātaḥ kapirūpeṇa hā iti॥
krandantyaḥ sahasā petuḥ stanandhayadharāḥ striyaḥ।

वे कहते थे—‘हाय! यह वानर के रूप में साक्षात् अग्निदेवता ही आ पहुँचा है।’ कितनी ही स्त्रियाँ गोद में बच्चे लिये सहसा क्रन्दन करती हुई नीचे गिर पड़ीं

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॥ ५ · ५४ · २६ ॥
काश्चिदग्निपरीताङ्ग्यो हर्म्येभ्यो मुक्तमूर्धजाः॥ पतन्त्योरजिरेऽदृश्यः सौदामन्य इवाम्बरात्।

kāścidagniparītāṅgyo harmyebhyo muktamūrdhajāḥ॥
patantyorajire'dṛśyaḥ saudāmanya ivāmbarāt।

कुछ राक्षसियों के सारे अङ्ग आग की लपेट में आ गये, वे बाल बिखेरे अट्टालिकाओं से नीचे गिर पड़ीं। गिरते समय वे आकाश में स्थित मेघों से गिरनेवाली बिजलियों के समान प्रकाशित होती थीं

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॥ ५ · ५४ · २७ ॥
वज्रविद्रुमवैदूर्यमुक्तारजतसंहतान्॥ विचित्रान् भवनाद्धातून् स्यन्दमानान् ददर्श सः।

vajravidrumavaidūryamuktārajatasaṁhatān॥
vicitrān bhavanāddhātūn syandamānān dadarśa saḥ।

हनुमान्जी ने देखा, जलते हुए घरों से हीरा, मूँगा, नीलम, मोती तथा सोने, चाँदी आदि विचित्र-विचित्र धातुओं की राशि पिघल-पिघलकर बही जा रही है

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॥ ५ · ५४ · २८ ॥
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां तृणानां यथा तथा॥

nāgnistṛpyati kāṣṭhānāṁ tṛṇānāṁ ca yathā tathā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५४ · २९ ॥
हनुमान् राक्षसेन्द्राणां वधे किंचिन्न तृप्यति। हनूमद्विशस्तानां राक्षसानां वसुन्धरा॥

hanumān rākṣasendrāṇāṁ vadhe kiṁcinna tṛpyati।
na hanūmadviśastānāṁ rākṣasānāṁ vasundharā॥

॥ २८–२९ ॥

जैसे आग सूखे काठ और तिनकों को जलाने से कभी तृप्त नहीं होती, उसी प्रकार हनुमान् बड़े-बड़े राक्षसों के वध करने से तनिक भी तृप्त नहीं होते थे और हनुमान्जी के मारे हुए राक्षसों को अपनी गोद में धारण करने से इस वसुन्धरा का भी जी नहीं भरता था

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॥ ५ · ५४ · ३० ॥
हनूमता वेगवता वानरेण महात्मना। लङ्कापुरं प्रदग्धं तद् रुद्रेण त्रिपुरं यथा॥

hanūmatā vegavatā vānareṇa mahātmanā।
laṅkāpuraṁ pradagdhaṁ tad rudreṇa tripuraṁ yathā॥

जैसे भगवान् रुद्र ने पूर्वकाल में त्रिपुर को दग्ध किया था, उसी प्रकार वेगशाली वानरवीर महात्मा हनुमान्जी ने लङ्कापुरी को जला दिया

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॥ ५ · ५४ · ३१ ॥
ततः लङ्कापुरपर्वताग्रे समुत्थितो भीमपराक्रमोऽग्निः। प्रसार्य चूडावलयं प्रदीप्तो हनूमता वेगवतोपसृष्टः॥

tataḥ sa laṅkāpuraparvatāgre samutthito bhīmaparākramo'gniḥ।
prasārya cūḍāvalayaṁ pradīpto hanūmatā vegavatopasṛṣṭaḥ॥

तत्पश्चात् लङ्कापुरी के पर्वत-शिखर पर आग लगी, वहाँ अग्निदेव का बड़ा भयानक पराक्रम प्रकट हुआ। वेगशाली हनुमान्जी की लगायी हुई वह आग चारों ओर अपने ज्वाला-मण्डल को फैलाकर बड़े जोर से प्रज्वलित हो उठी

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॥ ५ · ५४ · ३२ ॥
युगान्तकालानलतुल्यरूपः समारुतोऽग्निर्ववृधे दिवस्पृक्। विधूमरश्मिर्भवनेषु सक्तो रक्षःशरीराज्यसमर्पितार्चिः॥

yugāntakālānalatulyarūpaḥ samāruto'gnirvavṛdhe divaspṛk।
vidhūmaraśmirbhavaneṣu sakto rakṣaḥśarīrājyasamarpitārciḥ॥

हवा का सहारा पाकर वह आग इतनी बढ़ गयी कि उसका रूप प्रलयकालीन अग्नि के समान दिखायी देने लगा। उसकी ऊँची लपटें मानो स्वर्गलोक का स्पर्श कर रही थीं। लङ्का के भवनों में लगी हुई उस आग की ज्वाला में धूम का नाम भी नहीं था। राक्षसों के शरीररूपी घी की आहुति पाकर उसकी ज्वालाएँ उत्तरोत्तर बढ़ रही थीं

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॥ ५ · ५४ · ३३ ॥
आदित्यकोटीसदृशः सुतेजा लङ्कां समस्तां परिवार्य तिष्ठन्। शब्दैरनेकैरशनिप्ररूढैर्भिन्दन्निवाण्डं प्रबभौ महाग्निः॥

ādityakoṭīsadṛśaḥ sutejā laṅkāṁ samastāṁ parivārya tiṣṭhan।
śabdairanekairaśaniprarūḍhairbhindannivāṇḍaṁ prababhau mahāgniḥ॥

समूची लङ्कापुरी को अपनी लपटों में लपेटकर फैली हुई वह प्रचण्ड आग करोड़ों सूर्यों के समान प्रज्वलित हो रही थी। मकानों और पर्वतों के फटने आदि से होनेवाले नाना प्रकार के धड़ाकों के शब्द बिजली की कड़क को भी मात करते थे, उस समय वह विशाल अग्नि ब्रह्माण्ड को फोड़ती हुई-सी प्रकाशित हो रही थी

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॥ ५ · ५४ · ३४ ॥
तत्राम्बरादग्निरतिप्रवृद्धो रूक्षप्रभः किंशुकपुष्पचूडः। निर्वाणधूमाकुलराजयश्च नीलोत्पलाभाः प्रचकाशिरेऽभ्राः॥

tatrāmbarādagniratipravṛddho rūkṣaprabhaḥ kiṁśukapuṣpacūḍaḥ।
nirvāṇadhūmākularājayaśca nīlotpalābhāḥ pracakāśire'bhrāḥ॥

वहाँ धरती से आकाशतक फैली हुई अत्यन्त बढ़ी-चढ़ी आग की प्रभा बड़ी तीखी प्रतीत होती थी। उसकी लपटें टेसू के फूल की भाँति लाल दिखायी देती थीं। नीचे से जिनका सम्बन्ध टूट गया था, वे आकाश में फैली हुई धूम-पंक्तियाँ नील कमल के समान रंगवाले मेघों की भाँति प्रकाशित हो रही थीं

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॥ ५ · ५४ · ३५ ॥
वज्री महेन्द्रस्त्रिदशेश्वरो वा साक्षाद् यमो वा वरुणोऽनिलो वा। रौद्रोऽग्निरर्को धनदश्च सोमो वानरोऽयं स्वयमेव कालः॥

vajrī mahendrastridaśeśvaro vā sākṣād yamo vā varuṇo'nilo vā।
raudro'gnirarko dhanadaśca somo na vānaro'yaṁ svayameva kālaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५४ · ३६ ॥
किं ब्रह्मणः सर्वपितामहस्य लोकस्य धातुश्चतुराननस्य। इहागतो वानररूपधारी रक्षोपसंहारकरः प्रकोपः॥

kiṁ brahmaṇaḥ sarvapitāmahasya lokasya dhātuścaturānanasya।
ihāgato vānararūpadhārī rakṣopasaṁhārakaraḥ prakopaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५४ · ३७ ॥
किं वैष्णवं वा कपिरूपमेत्य रक्षोविनाशाय परं सुतेजः। अचिन्त्यमव्यक्तमनन्तमेकं स्वमायया साम्प्रतमागतं वा॥

kiṁ vaiṣṇavaṁ vā kapirūpametya rakṣovināśāya paraṁ sutejaḥ।
acintyamavyaktamanantamekaṁ svamāyayā sāmpratamāgataṁ vā॥

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॥ ५ · ५४ · ३८ ॥
इत्येवमूचुर्बहवो विशिष्टा रक्षोगणास्तत्र समेत्य सर्वे। सप्राणिसङ्घां सगृहां सवृक्षां दग्धां पुरीं तां सहसा समीक्ष्य॥

ityevamūcurbahavo viśiṣṭā rakṣogaṇāstatra sametya sarve।
saprāṇisaṅghāṁ sagṛhāṁ savṛkṣāṁ dagdhāṁ purīṁ tāṁ sahasā samīkṣya॥

॥ ३५–३८ ॥

प्राणियों के समुदाय, गृह और वृक्षोंसहित समस्त लङ्कापुरी को सहसा दग्ध हुई देख बड़े-बड़े राक्षस झुंड-के-झुंड एकत्र हो गये और वे सब-के-सब परस्पर इस प्रकार कहने लगे—‘यह देवताओं का राजा वज्रधारी इन्द्र अथवा साक्षात् यमराज तो नहीं है? वरुण, वायु, रुद्र, अग्नि, सूर्य, कुबेर या चन्द्रमा में से तो कोई नहीं है? यह वानर नहीं साक्षात् काल ही है। क्या सम्पूर्ण जगत् के पितामह चतुर्मुख ब्रह्माजी का प्रचण्ड कोप ही वानर का रूप धारण करके राक्षसों का संहार करने के लिये यहाँ उपस्थित हुआ है? अथवा भगवान् विष्णु का महान् तेज जो अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्त और अद्वितीय है, अपनी माया से वानर का शरीर ग्रहण करके राक्षसों के विनाश के लिये तो इस समय नहीं आया है?’

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॥ ५ · ५४ · ३९ ॥
ततस्तु लङ्का सहसा प्रदग्धा सराक्षसा साश्वरथा सनागा। सपक्षिसङ्घा समृगा सवृक्षा रुरोद दीना तुमुलं सशब्दम्॥

tatastu laṅkā sahasā pradagdhā sarākṣasā sāśvarathā sanāgā।
sapakṣisaṅghā samṛgā savṛkṣā ruroda dīnā tumulaṁ saśabdam॥

इस प्रकार घोड़े, हाथी, रथ, पशु, पक्षी, वृक्ष तथा कितने ही राक्षसोंसहित लङ्कापुरी सहसा दग्ध हो गयी। वहाँ के निवासी दीनभाव से तुमुल नाद करते हुए फूट-फूटकर रोने लगे

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॥ ५ · ५४ · ४० ॥
हा तात हा पुत्रक कान्त मित्र हा जीवितेशाङ्ग हतं सुपुण्यम्। रक्षोभिरेवं बहुधा ब्रुवद्भिः शब्दः कृतो घोरतरः सुभीमः॥

hā tāta hā putraka kānta mitra hā jīviteśāṅga hataṁ supuṇyam।
rakṣobhirevaṁ bahudhā bruvadbhiḥ śabdaḥ kṛto ghorataraḥ subhīmaḥ॥

वे बोले—‘हाय रे बप्पा! हाय बेटा! हा स्वामिन्! हा मित्र! हा प्राणनाथ! हमारे सब पुण्य नष्ट हो गये।’ इस तरह भाँति-भाँति से विलाप करते हुए राक्षसों ने बड़ा भयंकर एवं घोर आर्तनाद किया

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॥ ५ · ५४ · ४१ ॥
हुताशनज्वालसमावृता सा हतप्रवीरा परिवृत्तयोधा। हनुमतः क्रोधबलाभिभूता बभूव शापोपहतेव लङ्का॥

hutāśanajvālasamāvṛtā sā hatapravīrā parivṛttayodhā।
hanumataḥ krodhabalābhibhūtā babhūva śāpopahateva laṅkā॥

हनुमान्जी के क्रोध-बल से अभिभूत हुई लङ्कापुरी आग की ज्वाला से घिर गयी थी। उसके प्रमुख-प्रमुख वीर मार डाले गये थे। समस्त योद्धा तितर-बितर और उद्विग्न हो गये थे। इस प्रकार वह पुरी शाप से आक्रान्त हुई-सी जान पड़ती थी

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॥ ५ · ५४ · ४२ ॥
ससम्भ्रमं त्रस्तविषण्णराक्षसां समुज्ज्वलज्ज्वालहुताशनाङ्किताम्। ददर्श लङ्कां हनुमान् महामनाः स्वयंभुरोषोपहतामिवावनिम्॥

sasambhramaṁ trastaviṣaṇṇarākṣasāṁ samujjvalajjvālahutāśanāṅkitām।
dadarśa laṅkāṁ hanumān mahāmanāḥ svayaṁbhuroṣopahatāmivāvanim॥

महामनस्वी हनुमान् ने लङ्कापुरी को स्वयम्भू ब्रह्माजी के रोष से नष्ट हुई पृथ्वी के समान देखा। वहाँ के समस्त राक्षस बड़ी घबराहट में पड़कर त्रस्त और विषादग्रस्त हो गये थे। अत्यन्त प्रज्वलित ज्वाला-मालाओं से अलंकृत अग्निदेव ने उसपर अपनी छाप लगा दी थी

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॥ ५ · ५४ · ४३ ॥
भङ्क्त्वा वनं पादपरत्नसंकुलं हत्वा तु रक्षांसि महान्ति संयुगे। दग्ध्वा पुरीं तां गृहरत्नमालिनीं तस्थौ हनुमान् पवनात्मजः कपिः॥

bhaṅktvā vanaṁ pādaparatnasaṁkulaṁ hatvā tu rakṣāṁsi mahānti saṁyuge।
dagdhvā purīṁ tāṁ gṛharatnamālinīṁ tasthau hanumān pavanātmajaḥ kapiḥ॥

पवनकुमार वानरवीर हनुमान्जी उत्तमोत्तम वृक्षों से भरे हुए वन को उजाड़कर, युद्ध में बड़े-बड़े राक्षसों को मारकर तथा सुन्दर महलों से सुशोभित लङ्कापुरी को जलाकर शान्त हो गये

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॥ ५ · ५४ · ४४ ॥
राक्षसांस्तान् सुबहूंश्च हत्वा वनं भङ्क्त्वा बहुपादपं तत्। विसृज्य रक्षोभवनेषु चाग्निं जगाम रामं मनसा महात्मा॥

sa rākṣasāṁstān subahūṁśca hatvā vanaṁ ca bhaṅktvā bahupādapaṁ tat।
visṛjya rakṣobhavaneṣu cāgniṁ jagāma rāmaṁ manasā mahātmā॥

महात्मा हनुमान् बहुत-से राक्षसों का वध और बहुसंख्यक वृक्षों से भरे हुए प्रमदावन का विध्वंस करके निशाचरों के घरों में आग लगाकर मन-ही-मन श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करने लगे

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॥ ५ · ५४ · ४५ ॥
ततस्तु तं वानरवीरमुख्यं महाबलं मारुततुल्यवेगम्। महामतिं वायुसुतं वरिष्ठं प्रतुष्टुवुर्देवगणाश्च सर्वे॥

tatastu taṁ vānaravīramukhyaṁ mahābalaṁ mārutatulyavegam।
mahāmatiṁ vāyusutaṁ variṣṭhaṁ pratuṣṭuvurdevagaṇāśca sarve॥

तदनन्तर सम्पूर्ण देवताओं ने वानरवीरों में प्रधान, महाबलवान्, वायु के समान वेगवान्, परम बुद्धिमान् और वायुदेवता के श्रेष्ठ पुत्र हनुमान्जी का स्तवन किया

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॥ ५ · ५४ · ४६ ॥
देवाश्च सर्वे मुनिपुङ्गवाश्च गन्धर्वविद्याधरपन्नगाश्च। भूतानि सर्वाणि महान्ति तत्र जग्मुः परां प्रीतिमतुल्यरूपाम्॥

devāśca sarve munipuṅgavāśca gandharvavidyādharapannagāśca।
bhūtāni sarvāṇi mahānti tatra jagmuḥ parāṁ prītimatulyarūpām॥

उनके इस कार्य से सभी देवता, मुनिवर, गन्धर्व, विद्याधर, नाग तथा सम्पूर्ण महान् प्राणी अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनके उस हर्ष की कहीं तुलना नहीं थी

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॥ ५ · ५४ · ४७ ॥
भङ्क्त्वा वनं महातेजा हत्वा रक्षांसि संयुगे। दग्ध्वा लङ्कापुरीं भीमां रराज महाकपिः॥

bhaṅktvā vanaṁ mahātejā hatvā rakṣāṁsi saṁyuge।
dagdhvā laṅkāpurīṁ bhīmāṁ rarāja sa mahākapiḥ॥

महातेजस्वी महाकपि पवनकुमार प्रमदावन को उजाड़कर, युद्ध में राक्षसों को मारकर और भयंकर लङ्कापुरी को जलाकर बड़ी शोभा पाने लगे

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॥ ५ · ५४ · ४८ ॥
गृहाग्र्यशृङ्गाग्रतले विचित्रे प्रतिष्ठितो वानरराजसिंहः। प्रदीप्तलाङ्गूलकृतार्चिमाली व्यराजतादित्य इवार्चिमाली॥

gṛhāgryaśṛṅgāgratale vicitre pratiṣṭhito vānararājasiṁhaḥ।
pradīptalāṅgūlakṛtārcimālī vyarājatāditya ivārcimālī॥

श्रेष्ठ भवनों के विचित्र शिखर पर खड़े हुए वानरराजसिंह हनुमान् अपनी जलती पूँछ से उठती हुई ज्वाला-मालाओं से अलंकृत हो तेज:पुञ्ज से देदीप्यमान सूर्यदेव के समान प्रकाशित होने लगे

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॥ ५ · ५४ · ४९ ॥
लङ्कां समस्तां सम्पीड्य लाङ्गूलाग्निं महाकपिः। निर्वापयामास तदा समुद्रे हरिपुङ्गवः॥

laṅkāṁ samastāṁ sampīḍya lāṅgūlāgniṁ mahākapiḥ।
nirvāpayāmāsa tadā samudre haripuṅgavaḥ॥

इस प्रकार सारी लङ्कापुरी को पीड़ा दे वानरशिरोमणि महाकपि हनुमान् ने उस समय समुद्र के जल में अपनी पूँछ की आग बुझायी

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॥ ५ · ५४ · ५० ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः। दृष्ट्वा लङ्कां प्रदग्धां तां विस्मयं परमं गताः॥

tato devāḥ sagandharvāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ।
dṛṣṭvā laṅkāṁ pradagdhāṁ tāṁ vismayaṁ paramaṁ gatāḥ॥

तत्पश्चात् लङ्कापुरी को दग्ध हुई देख देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि बड़े विस्मित हुए

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॥ ५ · ५४ · ५१ ॥
तं दृष्ट्वा वानरश्रेष्ठं हनूमन्तं महाकपिम्। कालाग्निरिति संचिन्त्य सर्वभूतानि तत्रसुः॥

taṁ dṛṣṭvā vānaraśreṣṭhaṁ hanūmantaṁ mahākapim।
kālāgniriti saṁcintya sarvabhūtāni tatrasuḥ॥

उस समय वानरश्रेष्ठ महाकपि हनुमान् को देख ‘ये कालाग्नि हैं’ ऐसा मानकर समस्त प्राणी भय से थर्रा उठे

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः॥ ५४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५४ ॥