वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः ७ · १७ श्लोकाःSarga 7 · 17 ślokas

रावणके भवन एवं पुष्पक विमानका वर्णन

॥ ५ · ७ · १ ॥
वेश्मजालं बलवान् ददर्श व्यासक्तवैदूर्यसुवर्णजालम्। यथा महत्प्रावृषि मेघजालं विद्युत्पिनद्धं सविहङ्गजालम्॥

sa veśmajālaṁ balavān dadarśa vyāsaktavaidūryasuvarṇajālam।
yathā mahatprāvṛṣi meghajālaṁ vidyutpinaddhaṁ savihaṅgajālam॥

बलवान् वीर हनुमान्जी ने नीलम से जड़ी हुई सोने की खिड़कियों से सुशोभित तथा पक्षि-समूहों से युक्त भवनों का समुदाय देखा, जो वर्षाकाल में बिजली से युक्त महती मेघमाला के समान मनोहर जान पड़ता था।

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॥ ५ · ७ · २ ॥
निवेशनानां विविधाश्च शालाः प्रधानशङ्खायुधचापशालाः। मनोहराश्चापि पुनर्विशाला ददर्श वेश्माद्रिषु चन्द्रशालाः॥

niveśanānāṁ vividhāśca śālāḥ pradhānaśaṅkhāyudhacāpaśālāḥ।
manoharāścāpi punarviśālā dadarśa veśmādriṣu candraśālāḥ॥

उसमें नाना प्रकार की बैठकें, शङ्ख, आयुध और धनुषों की मुख्य-मुख्य शालाएँ तथा पर्वतों के समान ऊँचे महलों के ऊपर मनोहर एवं विशाल चन्द्रशालाएँ (अट्टालिकाएँ) देखीं।

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॥ ५ · ७ · ३ ॥
गृहाणि नानावसुराजितानि देवासुरैश्चापि सुपूजितानि। सर्वैश्च दोषैः परिवर्जितानि कपिर्ददर्श स्वबलार्जितानि॥

gṛhāṇi nānāvasurājitāni devāsuraiścāpi supūjitāni।
sarvaiśca doṣaiḥ parivarjitāni kapirdadarśa svabalārjitāni॥

कपिवर हनुमान् ने वहाँ नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित ऐसे-ऐसे घर देखे, जिनकी देवता और असुर भी प्रशंसा करते थे। वे गृह सम्पूर्ण दोषों से रहित थे तथा रावण ने उन्हें अपने पुरुषार्थ से प्राप्त किया था।

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॥ ५ · ७ · ४ ॥
तानि प्रयत्नाभिसमाहितानि मयेन साक्षादिव निर्मितानि। महीतले सर्वगुणोत्तराणि ददर्श लंकाधिपतेर्गृहाणि॥

tāni prayatnābhisamāhitāni mayena sākṣādiva nirmitāni।
mahītale sarvaguṇottarāṇi dadarśa laṁkādhipatergṛhāṇi॥

वे भवन बड़े प्रयत्न से बनाये गये थे और ऐसे अद्भुत लगते थे, मानो साक्षात् मयदानव ने ही उनका निर्माण किया हो। हनुमान्जी ने उन्हें देखा, लंकापति रावण के वे घर इस भूतल पर सभी गुणों में सबसे बढ़-चढ़कर थे।

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॥ ५ · ७ · ५ ॥
ततो ददर्शोच्छ्रितमेघरूपं मनोहरं काञ्चनचारुरूपम्। रक्षोऽधिपस्यात्मबलानुरूपं गृहोत्तमं ह्यप्रतिरूपरूपम्॥

tato dadarśocchritamegharūpaṁ manoharaṁ kāñcanacārurūpam।
rakṣo'dhipasyātmabalānurūpaṁ gṛhottamaṁ hyapratirūparūpam॥

फिर उन्होंने राक्षसराज रावण का उसकी शक्ति के अनुरूप अत्यन्त उत्तम और अनुपम भवन (पुष्पक विमान) देखा, जो मेघ के समान ऊँचा, सुवर्ण के समान सुन्दर कान्तिवाला तथा मनोहर था।

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॥ ५ · ७ · ६ ॥
महीतले स्वर्गमिव प्रकीर्णं श्रिया ज्वलन्तं बहुरत्नकीर्णम्। नानातरूणां कुसुमावकीर्णं गिरेरिवाग्रं रजसावकीर्णम्॥

mahītale svargamiva prakīrṇaṁ śriyā jvalantaṁ bahuratnakīrṇam।
nānātarūṇāṁ kusumāvakīrṇaṁ girerivāgraṁ rajasāvakīrṇam॥

वह इस भूतल पर बिखरे हुए स्वर्ण के समान जान पड़ता था। अपनी कान्ति से प्रज्वलित-सा हो रहा था। अनेकानेक रत्नों से व्यास, भाँति-भाँति के वृक्षों के फूलों से आच्छादित तथा पुष्पों के पराग से भरे हुए पर्वत-शिखर के समान शोभा पाता था।

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॥ ५ · ७ · ७ ॥
नारीप्रवेकैरिव दीप्यमानं तडिद्भिरम्भोधरमर्च्यमानम्। हंसप्रवेकैरिव वाह्यमानं श्रिया युतं खे सुकृतं विमानम्॥

nārīpravekairiva dīpyamānaṁ taḍidbhirambhodharamarcyamānam।
haṁsapravekairiva vāhyamānaṁ śriyā yutaṁ khe sukṛtaṁ vimānam॥

वह विमानरूप भवन विद्युन्मालाओं से पूजित मेघ के समान रमणी-रत्नों से देदीप्यमान हो रहा था और श्रेष्ठ हंसोंद्वारा आकाश में ढोये जाते हुए विमान की भाँति जान पड़ता था। उस दिव्य विमान को बहुत सुन्दर ढंग से बनाया गया था। वह अद्भुत शोभा से सम्पन्न दिखायी देता था।

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॥ ५ · ७ · ८ ॥
यथा नगाग्रं बहुधातुचित्रं यथा नभश्च ग्रहचन्द्रचित्रम्। ददर्श युक्तीकृतचारुमेघचित्रं विमानं बहुरत्नचित्रम्॥

yathā nagāgraṁ bahudhātucitraṁ yathā nabhaśca grahacandracitram।
dadarśa yuktīkṛtacārumeghacitraṁ vimānaṁ bahuratnacitram॥

जैसे अनेक धातुओं के कारण पर्वतशिखर, ग्रहों और चन्द्रमा के कारण आकाश तथा अनेक वर्णों से युक्त होने के कारण मनोहर मेघ विचित्र शोभा धारण करते हैं, उसी तरह नाना प्रकार के रत्नों से निर्मित होने के कारण वह विमान भी विचित्र शोभा से सम्पन्न दिखायी देता था।

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॥ ५ · ७ · ९ ॥
मही कृता पर्वतराजिपूर्णा शैलाः कृता वृक्षवितानपूर्णाः। वृक्षाः कृताः पुष्पवितानपूर्णाः पुष्पं कृतं केसरपत्रपूर्णम्॥

mahī kṛtā parvatarājipūrṇā śailāḥ kṛtā vṛkṣavitānapūrṇāḥ।
vṛkṣāḥ kṛtāḥ puṣpavitānapūrṇāḥ puṣpaṁ kṛtaṁ kesarapatrapūrṇam॥

उस विमान की आधारभूमि (आरोहियों के खड़े होने का स्थान) सोने और मणियों के द्वारा निर्मित कृत्रिम पर्वत-मालाओं से पूर्ण बनायी गयी थी। वे पर्वत वृक्षों की विस्तृत पंक्तियों से हरे-भरे रचे गये थे। वे वृक्ष फूलों के बाहुल्य से व्यास बनाये गये थे तथा वे पुष्प भी केसर एवं पंखुड़ियों से पूर्ण निर्मित हुए थे।

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॥ ५ · ७ · १० ॥
कृतानि वेश्मानि पाण्डुराणि तथा सुपुष्पाण्यपि पुष्कराणि। पुनश्च पद्मानि सकेसराणि वनानि चित्राणि सरोवराणि॥

kṛtāni veśmāni ca pāṇḍurāṇi tathā supuṣpāṇyapi puṣkarāṇi।
punaśca padmāni sakesarāṇi vanāni citrāṇi sarovarāṇi॥

उस विमान में श्वेतभवन बने हुए थे। सुन्दर फूलों से सुशोभित पोखरे बनाये गये थे। केसरयुक्त कमल, विचित्र वन और अद्भुत सरोवरों का भी निर्माण किया गया था।

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॥ ५ · ७ · ११ ॥
पुष्पाह्वयं नाम विराजमानं रत्नप्रभाभिश्च विघूर्णमानम्। वेश्मोत्तमानामपि चोच्चमानं महाकपिस्तत्र महाविमानम्॥

puṣpāhvayaṁ nāma virājamānaṁ ratnaprabhābhiśca vighūrṇamānam।
veśmottamānāmapi coccamānaṁ mahākapistatra mahāvimānam॥

महाकपि हनुमान् ने जिस सुन्दर विमान को वहाँ देखा, उसका नाम पुष्पक था। वह रत्नों की प्रभा से प्रकाशमान था और इधर-उधर भ्रमण करता था। देवताओं के गृहाकार उत्तम विमानों में सबसे अधिक आदर उस महाविमान पुष्पक का ही होता था।

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॥ ५ · ७ · १२ ॥
कृताश्च वैदूर्यमया विहङ्गा रूप्यप्रवालैश्च तथा विहङ्गाः। चित्राश्च नानावसुभिर्भुजङ्गा जात्यानुरूपास्तुरगाः शुभाङ्गाः॥

kṛtāśca vaidūryamayā vihaṅgā rūpyapravālaiśca tathā vihaṅgāḥ।
citrāśca nānāvasubhirbhujaṅgā jātyānurūpāsturagāḥ śubhāṅgāḥ॥

उसमें नीलम, चाँदी और मूँगों के आकाशचारी पक्षी बनाये गये थे। नाना प्रकार के रत्नों से विचित्र वर्ण के सर्पों का निर्माण किया गया था और अच्छी जाति के घोड़ों के समान ही सुन्दर अंगवाले अश्व भी बनाये गये थे।

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॥ ५ · ७ · १३ ॥
प्रवालजाम्बूनदपुष्पपक्षाः सलीलमावर्जितजिह्मपक्षाः। कामस्य साक्षादिव भान्ति पक्षाः कृता विहङ्गाः सुमुखाः सुपक्षाः॥

pravālajāmbūnadapuṣpapakṣāḥ salīlamāvarjitajihmapakṣāḥ।
kāmasya sākṣādiva bhānti pakṣāḥ kṛtā vihaṅgāḥ sumukhāḥ supakṣāḥ॥

उस विमान पर सुन्दर मुख और मनोहर पंखवाले बहुत-से ऐसे विहङ्गम निर्मित हुए थे, जो साक्षात् कामदेव के सहायक जान पड़ते थे। उनकी पाँखें मूँगे और सुवर्ण के बने हुए फूलों से युक्त थीं तथा उन्होंने लीलापूर्वक अपने बाँके पंखों को समेट रखा था।

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॥ ५ · ७ · १४ ॥
नियुज्यमानाश्च गजाः सुहस्ताः सकेसराश्चोत्पलपत्रहस्ताः। बभूव देवी कृतासुहस्ता लक्ष्मीस्तथा पद्मिनि पद्महस्ता॥

niyujyamānāśca gajāḥ suhastāḥ sakesarāścotpalapatrahastāḥ।
babhūva devī ca kṛtāsuhastā lakṣmīstathā padmini padmahastā॥

उस विमान के कमलमण्डित सरोवर में ऐसे हाथी बनाये गये थे, जो लक्ष्मी के अभिषेक-कार्य में नियुक्त थे। उनकी सूँड़ बड़ी सुन्दर थी। उनके अंगों में कमलों के केसर लगे हुए थे तथा उन्होंने अपनी सूँड़ों में कमल-पुष्प धारण किये थे। उनके साथ ही वहाँ तेजस्विनी लक्ष्मी देवी की प्रतिमा भी विराजमान थी, जिनका उन हाथियों के द्वारा अभिषेक हो रहा था। उनके हाथ बड़े सुन्दर थे। उन्होंने अपने हाथ में कमल-पुष्प धारण कर रखा था।

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॥ ५ · ७ · १५ ॥
इतीव तद्गृहमभिगम्य शोभनं सविस्मयो नगमिव चारुकन्दरम्। पुनश्च तत्परमसुगन्धि सुन्दरं हिमात्यये नगमिव चारुकन्दरम्॥

itīva tadgṛhamabhigamya śobhanaṁ savismayo nagamiva cārukandaram।
punaśca tatparamasugandhi sundaraṁ himātyaye nagamiva cārukandaram॥

इस प्रकार सुन्दर कन्दराओंवाले पर्वत के समान तथा वसन्त-ऋतु में सुन्दर कोटरोंवाले परम सुगन्धयुक्त वृक्ष के समान उस शोभायमान मनोहर भवन (विमान) में पहुँचकर हनुमान्जी बड़े विस्मित हुए।

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॥ ५ · ७ · १६ ॥
ततः तां कपिरभिपत्य पूजितां चरन् पुरीं दशमुखबाहुपालिताम्। अदृश्य तां जनकसुतां सुपूजितां सुदुःखितां पतिगुणवेगनिर्जिताम्॥

tataḥ sa tāṁ kapirabhipatya pūjitāṁ caran purīṁ daśamukhabāhupālitām।
adṛśya tāṁ janakasutāṁ supūjitāṁ suduḥkhitāṁ patiguṇaveganirjitām॥

तदनन्तर दशमुख रावण के बाहुबल से पालित उस प्रशंसित पुरी में जाकर चारों ओर घूमने पर भी पति के गुणों के वेग से पराजित (विमुग्ध) अत्यन्त दुःखिनी और परम पूजनीया जनककिशोरी सीता को न देखकर कपिवर हनुमान् बड़ी चिन्ता में पड़ गये।

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॥ ५ · ७ · १७ ॥
ततस्तदा बहुविधभावितात्मनः कृतात्मनो जनकसुतां सुवर्त्मनः। अपश्यतोऽभवदतिदुःखितं मनः सचक्षुषः प्रविचरतो महात्मनः॥

tatastadā bahuvidhabhāvitātmanaḥ kṛtātmano janakasutāṁ suvartmanaḥ।
apaśyato'bhavadatiduḥkhitaṁ manaḥ sacakṣuṣaḥ pravicarato mahātmanaḥ॥

महात्मा हनुमान्जी अनेक प्रकार से परमार्थ-चिन्तन में तत्पर रहनेवाले कृतात्मा (पवित्र अन्तःकरणवाले) सन्मार्गगामी तथा उत्तम दृष्टि रखनेवाले थे। इधर-उधर बहुत घूमने पर भी जब उन महात्मा को जानकीजी का पता न लगा, तब उनका मन बहुत दुःखी हो गया।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तमः सर्गः॥ ७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७ ॥