वनकी शोभा देखते हुए हनुमान्जीका एक चैत्यप्रासाद (मन्दिर)-के पास सीताको दयनीय अवस्थामें देखना, पहचानना और प्रसन्न होना
sa vīkṣamāṇastatrastho mārgamāṇaśca maithilīm।
avekṣamāṇaśca mahīṁ sarvāṁ tāmanvavaikṣata॥
उस अशोकवृक्ष पर बैठे-बैठे हनुमान्जी सम्पूर्ण वन को देखते और सीता को ढूँढ़ते हुए वहाँ की सारी भूमि पर दृष्टिपात करने लगे
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saṁtānakalatābhiśca pādapairupaśobhitām।
divyagandharasopetāṁ sarvataḥ samalaṁkṛtām॥
वह भूमि कल्पवृक्ष की लताओं तथा वृक्षों से सुशोभित थी, दिव्य गन्ध तथा दिव्य रस से परिपूर्ण थी और सब ओर से सजायी गयी थी
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tāṁ sa nandanasaṁkāśāṁ mṛgapakṣibhirāvṛtām।
harmyaprāsādasambādhāṁ kokilākulaniḥsvanām॥
मृगों और पक्षियों से व्याप्त होकर वह भूमि नन्दनवन के समान शोभा पा रही थी, अट्टालिकाओं तथा राजभवनों से युक्त थी तथा कोकिल-समूहों की काकली से कोलाहलपूर्ण जान पड़ती थी
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kāñcanotpalapadmābhirvāpībhirupaśobhitām।
bahvāsanakuthopetāṁ bahubhūmigṛhāyutām॥
सुवर्णमय उत्पल और कमलों से भरी हुई बावड़ियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। बहुत-से आसन और कालीन वहाँ बिछे हुए थे। अनेकानेक भूमिगृह वहाँ शोभा पा रहे थे
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sarvartukusumai ramyaiḥ phalavadbhiśca pādapaiḥ।
puṣpitānāmaśokānāṁ śriyā sūryodayaprabhām॥
सभी ऋतुओं में फूल देनेवाले और फलों से भरे हुए रमणीय वृक्ष उस भूमि को विभूषित कर रहे थे। खिले हुए अशोकों की शोभा से सूर्योदयकाल की छटा-सी छिटक रही थी
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pradīptāmiva tatrastho mārutiḥ samudaikṣata।
niṣpatraśākhāṁ vihagaiḥ kriyamāṇāmivāsakṛt॥
पवनकुमार हनुमान् ने उस अशोक पर बैठे-बैठे ही उस दमकती हुई-सी वाटिका को देखा। वहाँ के पक्षी उस वाटिका को बारंबार पत्रों और शाखाओं से हीन कर रहे थे
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viniṣpatadbhiḥ śataśaścitraiḥ puṣpāvataṁsakaiḥ।
samūlapuṣparacitairaśokaiḥ śokanāśanaiḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
puṣpabhārātibhāraiśca spṛśadbhiriva medinīm।
karṇikāraiḥ kusumitaiḥ kiṁśukaiśca supuṣpitaiḥ॥
sa deśaḥ prabhayā teṣāṁ pradīpta iva sarvataḥ।
वृक्षों से झड़ते हुए सैकड़ों विचित्र पुष्प-गुच्छों से नीचे से ऊपरतक मानो फूल से बने हुए शोकनाशक अशोकों से, फूलों के भारी भार से झुककर पृथ्वी का स्पर्श-सा करते हुए खिले हुए कनेरों से तथा सुन्दर फूलवाले पलाशों से उपलक्षित वह भूभाग उनकी प्रभा के कारण सब ओर से उद्दीप्त-सा हो रहा था
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puṁnāgāḥ saptaparṇāśca campakoddālakāstathā॥
vivṛddhamūlā bahavaḥ śobhante sma supuṣpitāḥ।
पुंनाग (श्वेत कमल या नागकेसर), छितवन, चम्पा तथा बहुवार आदि बहुत-से सुन्दर पुष्पवाले वृक्ष, जिनकी जड़ें बहुत मोटी थीं, वहाँ शोभा पा रहे थे
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śātakumbhanibhāḥ kecit kecidagniśikhaprabhāḥ॥
nīlāñjananibhāḥ kecit tatrāśokāḥ sahasraśaḥ।
वहाँ सहस्रों अशोक के वृक्ष थे, जिनमें से कुछ तो सुवर्ण के समान कान्तिमान् थे, कुछ आग की ज्वाला के समान प्रकाशित हो रहे थे और कोई-कोई काले काजल की-सी कान्तिवाले थे
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nandanaṁ vibudhodyānaṁ citraṁ caitrarathaṁ yathā॥
ativṛttamivācintyaṁ divyaṁ ramyaśriyāyutam।
वह अशोकवन देवोद्यान नन्दन के समान आनन्ददायी, कुबेर के चैत्ररथ वन के समान विचित्र तथा उन दोनों से भी बढ़कर अचिन्त्य, दिव्य एवं रमणीय शोभा से सम्पन्न था
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dvitīyamiva cākāśaṁ puṣpajyotirgaṇāyutam॥
puṣparatnaśataiścitraṁ pañcamaṁ sāgaraṁ yathā।
वह पुष्परूपी नक्षत्रों से युक्त दूसरे आकाश के समान सुशोभित होता था तथा पुष्पमय सैकड़ों रत्नों से विचित्र शोभा पानेवाले पाँचवें समुद्र के समान जान पड़ता था
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sarvartupuṣpairnicitaṁ pādapairmadhugandhibhiḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
nānāninādairudyānaṁ ramyaṁ mṛgagaṇadvijaiḥ।
anekagandhapravahaṁ puṇyagandhaṁ manoharam॥
śailendramiva gandhāḍhyaṁ dvitīyaṁ gandhamādanam।
सब ऋतुओं में फूल देनेवाले मनोरम गन्धयुक्त वृक्षों से भरा हुआ तथा भाँति-भाँति के कलरव करनेवाले मृगों और पक्षियों से सुशोभित वह उद्यान बड़ा रमणीय प्रतीत होता था। वह अनेक प्रकार की सुगन्ध का भार वहन करने के कारण पवित्र गन्ध से युक्त और मनोहर जान पड़ता था। दूसरे गिरिराज गन्धमादन के समान उत्तम सुगन्ध से व्याप्त था
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aśokavanikāyāṁ tu tasyāṁ vānarapuṁgavaḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
sa dadarśāvidūrasthaṁ caityaprāsādamūrjitam।
madhye stambhasahasreṇa sthitaṁ kailāsapāṇḍuram॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
pravālakṛtasopānaṁ taptakāñcanavedikam।
muṣṇantamiva cakṣūṁṣi dyotamānamiva śriyā॥
nirmalaṁ prāṁśubhāvatvādullikhantamivāmbaram।
उस अशोकवाटिका में वानर-शिरोमणि हनुमान् ने थोड़ी ही दूर पर एक गोलाकार ऊँचा मन्दिर देखा, जिसके भीतर एक हजार खंभे लगे हुए थे। वह मन्दिर कैलास पर्वत के समान श्वेत वर्ण का था। उसमें मूँगे की सीढ़ियाँ बनी थीं तथा तपाये हुए सोने की वेदियाँ बनायी गयी थीं। वह निर्मल प्रासाद अपनी शोभा से देदीप्यमान-सा हो रहा था। दर्शकों की दृष्टि में चकाचौंध-सा पैदा कर देता था और बहुत ऊँचा होने के कारण आकाश में रेखा खींचता-सा जान पड़ता था
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tato malinasaṁvītāṁ rākṣasībhiḥ samāvṛtām॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
upavāsakṛśāṁ dīnāṁ niḥśvasantīṁ punaḥ punaḥ।
dadarśa śuklapakṣādau candrarekhāmivāmalām॥
वह चैत्यप्रासाद (मन्दिर) देखने के अनन्तर उनकी दृष्टि वहाँ एक सुन्दरी स्त्री पर पड़ी, जो मलिन वस्त्र धारण किये राक्षसियों से घिरी हुई बैठी थी। वह उपवास करने के कारण अत्यन्त दुर्बल और दीन दिखायी देती थी तथा बारंबार सिसक रही थी। शुक्लपक्ष के आरम्भ में चन्द्रमा की कला जैसी निर्मल और कृश दिखायी देती है, वैसी ही वह भी दृष्टिगोचर होती थी
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mandaprakhyāyamānena rūpeṇa ruciraprabhām।
pinaddhāṁ dhūmajālena śikhāmiva vibhāvasoḥ॥
धुँधली-सी स्मृति के आधार पर कुछ-कुछ पहचाने जानेवाले अपने रूप से वह सुन्दर प्रभा बिखेर रही थी और धूएँ से ढकी हुई अग्नि की ज्वाला के समान जान पड़ती थी
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pītenaikena saṁvītāṁ kliṣṭenottamavāsasā।
sapaṅkāmanalaṁkārāṁ vipadmāmiva padminīm॥
एक ही पीले रंग के पुराने रेशमी वस्त्र से उसका शरीर ढका हुआ था। वह मलिन, अलंकारशून्य होने के कारण कमलों से रहित पुष्करिणी के समान श्रीहीन दिखायी देती थी
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pīḍitāṁ duḥkhasaṁtaptāṁ parikṣīṇāṁ tapasvinīm।
graheṇāṁgārakeṇeva pīḍitāmiva rohiṇīm॥
वह तपस्विनी मंगलग्रह से आक्रान्त रोहिणी के समान शोक से पीड़ित, दुःख से संतप्त और सर्वथा क्षीणकाय हो रही थी
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aśrupūrṇamukhīṁ dīnāṁ kṛśāmanaśanena ca।
śokadhyānaparāṁ dīnāṁ nityaṁ duḥkhaparāyaṇām॥
उपवास से दुर्बल हुई उस दुःखिया नारी के मुँह पर आँसुओं की धारा बह रही थी। वह शोक और चिन्ता में मग्न हो दीन दशा में पड़ी हुई थी एवं निरन्तर दुःख में ही डूबी रहती थी
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priyaṁ janamapaśyantīṁ paśyantīṁ rākṣasīgaṇam।
svagaṇena mṛgīṁ hīnāṁ śvagaṇenāvṛtāmiva॥
वह अपने प्रियजनों को तो देख नहीं पाती थी। उसकी दृष्टि के समक्ष सदा राक्षसियों का समूह ही बैठा रहता था। जैसे कोई मृगी अपने यूथ से बिछुड़कर कुत्तों के झुंड से घिर गयी हो, वही दशा उसकी भी हो रही थी
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nīlanāgābhayā veṇyā jaghanaṁ gatayaikayā।
nīlayā nīradāpāye vanarājyā mahīmiva॥
काली नागिन के समान कटि से नीचेतक लटकी हुई एकमात्र काली वेणी के द्वारा उपलक्षित होनेवाली वह नारी बादलों के हट जाने पर नीली वनश्रेणी से घिरी हुई पृथ्वी के समान प्रतीत होती थी
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sukhārhāṁ duḥkhasaṁtaptāṁ vyasanānāmakovidām।
tāṁ vilokya viśālākṣīmadhikaṁ malināṁ kṛśām॥
tarkayāmāsa sīteti kāraṇairupapādibhiḥ।
वह सुख भोगने के योग्य थी, किंतु दुःख से संतप्त हो रही थी। इसके पहले उसे संकटों का कोई अनुभव नहीं था। उस विशाल नेत्रोंवाली, अत्यन्त मलिन और क्षीणकाय अबला का अवलोकन करके युक्तियुक्त कारणोंद्वारा हनुमान्जी ने यह अनुमान किया कि हो-न-हो यही सीता है
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hriyamāṇā tadā tena rakṣasā kāmarūpiṇā॥
yathārūpā hi dṛṣṭā sā tathārūpeyamaṁganā।
इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला वह राक्षस जब सीताजी को हरकर ले जा रहा था, उस दिन जिस रूप में उनका दर्शन हुआ था, कल्याणी नारी भी वैसे ही रूप से युक्त दिखायी देती है
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pūrṇacandrānanāṁ subhrūṁ cāruvṛttapayodharām॥
kurvatīṁ prabhayā devīṁ sarvā vitimirā diśaḥ।
देवी सीता का मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर था। उनकी भौंहें बड़ी सुन्दर थीं। दोनों स्तन मनोहर और गोलाकार थे। वे अपनी अंगकान्ति से सम्पूर्ण दिशाओं का अन्धकार दूर किये देती थीं
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tāṁ nīlakaṇṭhīṁ bimboṣṭhīṁ sumadhyāṁ supratiṣṭhitām॥
उनके केश काले-काले और ओष्ठ बिम्बफल के समान लाल थे। कटिभाग बहुत ही सुन्दर था। सारे अंग सुडौल और सुगठित थे
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sītāṁ padmapalāśākṣīṁ manmathasya ratiṁ yathā।
iṣṭāṁ sarvasya jagataḥ pūrṇacandraprabhāmiva॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
bhūmau sutanumāsīnāṁ niyatāmiva tāpasīm।
niḥśvāsabahulāṁ bhīruṁ bhujagendravadhūmiva॥
कमलनयनी सीता कामदेव की प्रेयसी रति के समान सुन्दरी थीं, पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा के समान समस्त जगत् के लिये प्रिय थीं। उनका शरीर बहुत ही सुन्दर था। वे नियमपरायणा तापसी के समान भूमि पर बैठी थीं। यद्यपि वे स्वभाव से ही भीरु और चिन्ता के कारण बारंबार लंबी साँस खींचती थीं तो भी दूसरों के लिये नागिन के समान भयंकर थीं
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śokajālena mahatā vitatena na rājatīm।
saṁsaktāṁ dhūmajālena śikhāmiva vibhāvasoḥ॥
वे विस्तृत महान् शोकजाल से आच्छादित होने के कारण विशेष शोभा नहीं पा रही थीं। धूएँ के समूह से मिली हुई अग्निशिखा के समान दिखायी देती थीं
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tāṁ smṛtīmiva saṁdigdhāmṛddhiṁ nipatitāmiva।
vihatāmiva ca śraddhāmāśāṁ pratihatāmiva॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
sopasargāṁ yathā siddhiṁ buddhiṁ sakaluṣāmiva।
abhūtenāpavādena kīrtiṁ nipatitāmiva॥
वे संदिग्ध अर्थवाली स्मृति, भूतल पर गिरी हुई ऋद्धि, टूटी हुई श्रद्धा, भग्न हुई आशा, विघ्नयुक्त सिद्धि, कलुषित बुद्धि और मिथ्या कलंक से भ्रष्ट हुई कीर्ति के समान जान पड़ती थीं
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rāmoparodhavyathitāṁ rakṣogaṇanipīḍitām।
abalāṁ mṛgaśāvākṣīṁ vīkṣamāṇāṁ tatastataḥ॥
श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में रुकावट पड़ जाने से उनके मन में बड़ी व्यथा हो रही थी। राक्षसों से पीड़ित हुई मृगशावकनयनी अबला सीता असहाय की भाँति इधर-उधर देख रही थीं
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bāṣpāmbuparipūrṇena kṛṣṇavaktrākṣipakṣmaṇā।
vadanenāprasannena niḥśvasantīṁ punaḥ punaḥ॥
उनका मुख प्रसन्न नहीं था। उस पर आँसुओं की धारा बह रही थी और नेत्रों की पलकें काली एवं टेढ़ी दिखायी देती थीं। वे बारंबार लंबी साँस खींचती थीं
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malapaṅkadharāṁ dīnāṁ maṇḍanārhāmamaṇḍitām।
prabhāṁ nakṣatrarājasya kālameghairivāvṛtām॥
उनके शरीर पर मैल जम गयी थी। वे दीनता की मूर्ति बनी बैठी थीं तथा शृंगार और भूषण धारण करने के योग्य होने पर भी अलंकारशून्य थीं, अतः काले बादलों से ढकी हुई चन्द्रमा की प्रभा के समान जान पड़ती थीं
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tasya saṁdidihe buddhistathā sītāṁ nirīkṣya ca।
āmnāyānāmayogena vidyāṁ praśithilāmiva॥
अभ्यास न करने से शिथिल (विस्मृत) हुई विद्या के समान क्षीण हुई सीता को देखकर हनुमान्जी की बुद्धि संदेह में पड़ गयी
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duḥkhena bubudhe sītāṁ hanumānanalaṁkṛtām।
saṁskāreṇa yathā hīnāṁ vācamarthāntaraṁ gatām॥
अलंकार तथा स्नान-अनुलेपन आदि अंगसंस्कार से रहित हुई सीता व्याकरणादिजनित संस्कार से शून्य होने के कारण अर्थान्तर को प्राप्त हुई वाणी के समान पहचानी नहीं जा रही थीं। हनुमान्जी ने बड़े कष्ट से उन्हें पहचाना
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tāṁ samīkṣya viśālākṣīṁ rājaputrīmaninditām।
tarkayāmāsa sīteti kāraṇairupapādayan॥
उन विशाललोचना सती-साध्वी राजकुमारी को देखकर उन्होंने कारणों (युक्तियों)-द्वारा उपपादन करते हुए मन में निश्चय किया कि यही सीता हैं
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vaidehyā yāni cāṁgeṣu tadā rāmo'nvakīrtayat।
tānyābharaṇajālāni gātraśobhīnyalakṣayat॥
उन दिनों श्रीरामचन्द्रजी ने विदेहकुमारी के अंगों में जिन-जिन आभूषणों के होने की चर्चा की थी, वे ही आभूषण-समूह इस समय उनके अंगों की शोभा बढ़ा रहे थे। हनुमान्जी ने इस बात की ओर लक्ष्य किया
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sukṛtau karṇaveṣṭau ca śvadaṁṣṭrau ca susaṁsthitau।
maṇividrumacitrāṇi hasteṣvābharaṇāni ca॥
सुन्दर बने हुए कुण्डल और कुत्ते के दाँतों की-सी आकृतिवाले त्रिकर्ण नामधारी कर्णफूल कानों में सुन्दर ढंग से सुप्रतिष्ठित एवं सुशोभित थे। हाथों में कंगन आदि आभूषण थे, जिनमें मणि और मूँगे जड़े हुए थे
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śyāmāni cirayuktatvāt tathā saṁsthānavanti ca।
tānyevaitāni manye'haṁ yāni rāmo'nvakīrtayat॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
tatra yānyavahīnāni tānyahaṁ nopalakṣaye।
yānyasyā nāvahīnāni tānīmāni na saṁśayaḥ॥
यद्यपि बहुत दिनों से पहने गये होने के कारण वे कुछ काले पड़ गये थे, तथापि उनके आकार-प्रकार वैसे ही थे। (हनुमान्जी ने सोचा—) ‘श्रीरामचन्द्रजी ने जिनकी चर्चा की थी, मेरी समझ में ये वे ही आभूषण हैं। सीताजी ने जो आभूषण वहाँ गिरा दिये थे, उनको मैं इनके अंगों में नहीं देख रहा हूँ। इनके जो आभूषण मार्ग में गिराये नहीं गये थे, वे ही ये दिखायी देते हैं, इसमें संशय नहीं है
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pītaṁ kanakapaṭṭābhaṁ srastaṁ tadvasanaṁ śubham।
uttarīyaṁ nagāsaktaṁ tadā dṛṣṭaṁ plavaṁgamaiḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
bhūṣaṇāni ca mukhyāni dṛṣṭāni dharaṇītale।
anayaivāpaviddhāni svanavanti mahānti ca॥
‘उस समय वानरों ने पर्वत पर गिराये हुए सुवर्णपत्र के समान जो सुन्दर पीला वस्त्र और पृथ्वी पर पड़े हुए उत्तमोत्तम बहुमूल्य एवं बजनेवाले आभूषण देखे थे, वे इन्हीं के गिराये हुए थे
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idaṁ ciragṛhītatvād vasanaṁ kliṣṭavattaram।
tathāpyanūnaṁ tadvarṇaṁ tathā śrīmadyathetarat॥
‘यह वस्त्र बहुत दिनों से पहने जाने के कारण यद्यपि बहुत पुराना हो गया है, तथापि इसका पीला रंग अभीतक उतरा नहीं है। यह भी वैसा ही कान्तिमान् है, जैसा वह दूसरा वस्त्र था
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iyaṁ kanakavarṇāṁgī rāmasya mahiṣī priyā।
praṇaṣṭāpi satī yasya manaso na praṇaśyati॥
‘ये सुवर्ण के समान गौर अंगवाली श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी महारानी हैं, जो अदृश्य हो जाने पर भी उनके मन से विलग नहीं हुई हैं
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iyaṁ sā yatkṛte rāmaścaturbhiriha tapyate।
kāruṇyenānṛśaṁsyena śokena madanena ca॥
‘ये वे ही सीता हैं, जिनके लिये श्रीरामचन्द्रजी इस जगत् में करुणा, दया, शोक और प्रेम—इन चार कारणों से संतप्त होते रहते हैं
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strī praṇaṣṭeti kāruṇyādāśritetyānṛśaṁsyataḥ।
patnī naṣṭeti śokena priyeti madanena ca॥
‘एक स्त्री खो गयी, यह सोचकर उनके हृदय में करुणा भर आती है। वह हमारे आश्रित थी, यह सोचकर वे दया से द्रवित हो उठते हैं। मेरी पत्नी ही मुझसे बिछुड़ गयी, इसका विचार करके वे शोक से व्याकुल हो उठते हैं तथा मेरी प्रियतमा मेरे पास नहीं रही, ऐसी भावना करके उनके हृदय में प्रेम की वेदना होने लगती है
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asyā devyā yathārūpamaṁgapratyaṁgasauṣṭhavam।
rāmasya ca yathārūpaṁ tasyeyamasitekṣaṇā॥
जैसा अलौकिक रूप श्रीरामचन्द्रजी का है तथा जैसा मनोहर रूप एवं अंग-प्रत्यंग की सुघड़ता इन देवी सीता में है; इसे देखते हुए कजरारे नेत्रोंवाली सीता उन्हीं के योग्य पत्नी हैं
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asyā devyā manastasmiṁstasya cāsyāṁ pratiṣṭhitam।
teneyaṁ sa ca dharmātmā muhūrtamapi jīvati॥
‘इन देवी का मन श्रीरघुनाथजी में और श्रीरघुनाथजी का मन इनमें लगा हुआ है, इसीलिये ये तथा धर्मात्मा श्रीराम जीवित हैं। इनके मुहूर्तमात्र जीवन में भी यही कारण है
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duṣkaraṁ kṛtavān rāmo hīno yadanayā prabhuḥ।
dhārayatyātmano dehaṁ na śokenāvasīdati॥
‘इनके बिछुड़ जाने पर भी भगवान् श्रीराम जो अपने शरीर को धारण करते हैं, शोक से शिथिल नहीं हो जाते हैं, यह उन्होंने अत्यन्त दुष्कर कार्य किया है’
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evaṁ sītāṁ tathā dṛṣṭvā hṛṣṭaḥ pavanasambhavaḥ।
jagāma manasā rāmaṁ praśaśaṁsa ca taṁ prabhum॥
इस प्रकार उस अवस्था में सीता का दर्शन पाकर पवनपुत्र हनुमान्जी बहुत प्रसन्न हुए। वे मन-ही-मन भगवान् श्रीराम के पास जा पहुँचे—उनका चिन्तन करने लगे तथा सीता-जैसी साध्वी को पत्नीरूप में पाने से उनके सौभाग्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चदशः सर्गः॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १५ ॥