वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः ५७ · ५३ श्लोकाःSarga 57 · 53 ślokas

हनुमान्जीका समुद्रको लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदोंसे मिलना

॥ ५ · ५७ · १ ॥
आप्लुत्य महावेगः पक्षवानिव पर्वतः। भुजङ्गयक्षगन्धर्वप्रबुद्धकमलोत्पलम्॥

āplutya ca mahāvegaḥ pakṣavāniva parvataḥ।
bhujaṅgayakṣagandharvaprabuddhakamalotpalam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५७ · २ ॥
चन्द्रकुमुदं रम्यं सार्ककारण्डवं शुभम्। तिष्यश्रवणकादम्बमभ्रशैवलशाद्वलम्॥

sa candrakumudaṁ ramyaṁ sārkakāraṇḍavaṁ śubham।
tiṣyaśravaṇakādambamabhraśaivalaśādvalam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५७ · ३ ॥
पुनर्वसुमहामीनं लोहिताङ्गमहाग्रहम्। ऐरावतमहाद्वीपं स्वातीहंसविलासितम्॥

punarvasumahāmīnaṁ lohitāṅgamahāgraham।
airāvatamahādvīpaṁ svātīhaṁsavilāsitam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५७ · ४ ॥
वातसंघातजालोर्मिचन्द्रांशुशिशिराम्बुमत्। हनूमानपरिश्रान्तः पुप्लुवे गगनार्णवम्॥

vātasaṁghātajālormicandrāṁśuśiśirāmbumat।
hanūmānapariśrāntaḥ pupluve gaganārṇavam॥

॥ १–४ ॥

पंखधारी पर्वत के समान महान् वेगशाली हनुमान्जी बिना थके-माँदे उस सुन्दर एवं रमणीय आकाशरूपी समुद्र को पार करने लगे, जिसमें नाग, यक्ष और गन्धर्व खिले हुए कमल और उत्पल के समान थे। चन्द्रमा कुमुद और सूर्य जलकुक्कुट के समान थे। पुष्य और श्रवण नक्षत्र कलहंस तथा बादल सेवार और घास के तुल्य थे। पुनर्वसु विशाल मत्स्य और मंगल बड़े भारी ग्राह के सदृश थे। ऐरावत हाथी वहाँ महान् द्वीप-सा प्रतीत होता था। वह आकाशरूपी समुद्र स्वातीरूपी हंस के विलास से सुशोभित था तथा वायुसमूहरूप तरङ्गों और चन्द्रमा की किरणरूप शीतल जल से भरा हुआ था

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ५ ॥
ग्रसमान इवाकाशं ताराधिपमिवोल्लिखन्। हरन्निव सनक्षत्रं गगनं सार्कमण्डलम्॥

grasamāna ivākāśaṁ tārādhipamivollikhan।
haranniva sanakṣatraṁ gaganaṁ sārkamaṇḍalam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५७ · ६ ॥
अपारमपरिश्रान्तश्चाम्बुधिं समगाहत। हनूमान् मेघजालानि विकर्षन्निव गच्छति॥

apāramapariśrāntaścāmbudhiṁ samagāhata।
hanūmān meghajālāni vikarṣanniva gacchati॥

॥ ५–६ ॥

हनुमान्जी आकाश को अपना ग्रास बनाते हुए, चन्द्रमण्डल को नखों से खरोंचते हुए, नक्षत्रों तथा सूर्यमण्डलसहित अन्तरिक्ष को समेटते हुए और बादलों के समूह को खींचते हुए-से अनायास ही अपार महासागर के पार चले जा रहे थे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ७ ॥
पाण्डुरारुणवर्णानि नीलमाञ्जिष्ठकानि च। हरितारुणवर्णानि महाभ्राणि चकाशिरे॥

pāṇḍurāruṇavarṇāni nīlamāñjiṣṭhakāni ca।
haritāruṇavarṇāni mahābhrāṇi cakāśire॥

उस समय आसमान में सफेद, लाल, नीले, मंजीठ के रंग के, हरे और अरुण वर्ण के बड़े-बड़े मेघ शोभा पा रहे थे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ८ ॥
प्रविशन्नभ्रजालानि निष्क्रमंश्च पुनः पुनः। प्रकाशश्चाप्रकाशश्च चन्द्रमा इव दृश्यते॥

praviśannabhrajālāni niṣkramaṁśca punaḥ punaḥ।
prakāśaścāprakāśaśca candramā iva dṛśyate॥

वे कभी उन मेघ-समूहों में प्रवेश करते और कभी बाहर निकलते थे। बारम्बार ऐसा करते हुए हनुमान्जी छिपते और प्रकाशित होते हुए चन्द्रमा के समान दृष्टिगोचर हो रहे थे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ९ ॥
विविधाभ्रघनापन्नगोचरो धवलाम्बरः। दृश्यादृश्यतनुर्वीरस्तथा चन्द्रायतेऽम्बरे॥

vividhābhraghanāpannagocaro dhavalāmbaraḥ।
dṛśyādṛśyatanurvīrastathā candrāyate'mbare॥

नाना प्रकार के मेघों की घटाओं के भीतर होकर जाते हुए धवलाम्बरधारी वीरवर हनुमान्जी का शरीर कभी दीखता था और कभी अदृश्य हो जाता था; अतः वे आकाश में बादलों की आड़ में छिपते और प्रकाशित होते चन्द्रमा के समान जान पड़ते थे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · १० ॥
तार्क्ष्यायमाणो गगने बभौ वायुनन्दनः। दारयन् मेघवृन्दानि निष्पतंश्च पुनः पुनः॥

tārkṣyāyamāṇo gagane sa babhau vāyunandanaḥ।
dārayan meghavṛndāni niṣpataṁśca punaḥ punaḥ॥

बारम्बार मेघ-समूहों को विदीर्ण करने और उनमें होकर निकलने के कारण वे पवनकुमार हनुमान् आकाश में गरुड़ के समान प्रतीत होते थे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ११ ॥
नदन् नादेन महता मेघस्वनमहास्वनः। प्रवरान् राक्षसान् हत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः॥

nadan nādena mahatā meghasvanamahāsvanaḥ।
pravarān rākṣasān hatvā nāma viśrāvya cātmanaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५७ · १२ ॥
आकुलां नगरीं कृत्वा व्यथयित्वा रावणम्। अर्दयित्वा महावीरान् वैदेहीमभिवाद्य च॥ आजगाम महातेजाः पुनर्मध्येन सागरम्।

ākulāṁ nagarīṁ kṛtvā vyathayitvā ca rāvaṇam।
ardayitvā mahāvīrān vaidehīmabhivādya ca॥
ājagāma mahātejāḥ punarmadhyena sāgaram।

॥ ११–१२ ॥

इस प्रकार महातेजस्वी हनुमान् अपने महान् सिंहनाद से मेघों की गम्भीर गर्जना को भी मात करते हुए आगे बढ़ रहे थे। वे प्रमुख राक्षसों को मारकर अपना नाम प्रसिद्ध कर चुके थे। बड़े-बड़े वीरों को रौंदकर उन्होंने लङ्कानगरी को व्याकुल तथा रावण को व्यथित कर दिया था। तत्पश्चात् विदेहनन्दिनी सीता को नमस्कार करके वे चले और तीव्र गति से पुनः समुद्र के मध्यभाग में आ पहुँचे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · १३ ॥
पर्वतेन्द्रं सुनाभं समुपस्पृश्य वीर्यवान्॥ ज्यामुक्त इव नाराचो महावेगोऽभ्युपागमत्।

parvatendraṁ sunābhaṁ ca samupaspṛśya vīryavān॥
jyāmukta iva nārāco mahāvego'bhyupāgamat।

वहाँ पर्वतराज सुनाभ (मैनाक)-का स्पर्श करके वे पराक्रमी एवं महान् वेगशाली वानरवीर धनुष से छूटे हुए बाण की भाँति आगे बढ़ गये

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · १४ ॥
किंचिदारात् सम्प्राप्तः समालोक्य महागिरिम्॥ महेन्द्रं मेघसंकाशं ननाद महाकपिः।

sa kiṁcidārāt samprāptaḥ samālokya mahāgirim॥
mahendraṁ meghasaṁkāśaṁ nanāda sa mahākapiḥ।

उत्तर तट के कुछ निकट पहुँचने पर महागिरि महेन्द्र पर दृष्टि पड़ते ही उन महाकपि ने मेघ के समान बड़े जोर से गर्जना की

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · १५ ॥
पूरयामास कपिर्दिशो दश समन्ततः॥ नदन् नादेन महता मेघस्वनमहास्वनः।

sa pūrayāmāsa kapirdiśo daśa samantataḥ॥
nadan nādena mahatā meghasvanamahāsvanaḥ।

उस समय मेघ की भाँति गम्भीर स्वर से बड़ी भारी गर्जना करके उन वानरवीर ने सब ओर से दसों दिशाओं को कोलाहलपूर्ण कर दिया

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · १६ ॥
तं देशमनुप्राप्तः सुहृद्दर्शनलालसः॥ ननाद सुमहानादं लाङ्गूलं चाप्यकम्पयत्।

sa taṁ deśamanuprāptaḥ suhṛddarśanalālasaḥ॥
nanāda sumahānādaṁ lāṅgūlaṁ cāpyakampayat।

फिर वे अपने मित्रों को देखने के लिये उत्सुक होकर उनके विश्रामस्थान की ओर बढ़े और पूँछ हिलाने एवं जोर-जोर से सिंहनाद करने लगे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · १७ ॥
तस्य नानद्यमानस्य सुपर्णाचरिते पथि॥ फलतीवास्य घोषेण गगनं सार्कमण्डलम्।

tasya nānadyamānasya suparṇācarite pathi॥
phalatīvāsya ghoṣeṇa gaganaṁ sārkamaṇḍalam।

जहाँ गरुड़ चलते हैं, उसी मार्ग पर बारम्बार सिंहनाद करते हुए हनुमान्जी के गम्भीर घोष से सूर्यमण्डलसहित आकाश मानो फटा जा रहा था

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · १८ ॥
ये तु तत्रोत्तरे कूले समुद्रस्य महाबलाः॥

ye tu tatrottare kūle samudrasya mahābalāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५७ · १९ ॥
पूर्वं संविष्ठिताः शूरा वायुपुत्रदिदृक्षवः। महतो वायुनुन्नस्य तोयदस्येव निःस्वनम्। शुश्रुवुस्ते तदा घोषमूरुवेगं हनूमतः॥

pūrvaṁ saṁviṣṭhitāḥ śūrā vāyuputradidṛkṣavaḥ।
mahato vāyununnasya toyadasyeva niḥsvanam।
śuśruvuste tadā ghoṣamūruvegaṁ hanūmataḥ॥

॥ १८–१९ ॥

उस समय वायुपुत्र हनुमान् के दर्शन की इच्छा से जो शूरवीर महाबली वानर समुद्र के उत्तर तट पर पहले से ही बैठे थे, उन्होंने वायु से टकराये हुए महान् मेघ की गर्जना के समान हनुमान्जी का जोर-जोर से सिंहनाद सुना

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · २० ॥
ते दीनमनसः सर्वे शुश्रुवुः काननौकसः। वानरेन्द्रस्य निर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम्॥

te dīnamanasaḥ sarve śuśruvuḥ kānanaukasaḥ।
vānarendrasya nirghoṣaṁ parjanyaninadopamam॥

अनिष्ट की आशङ्का से जिनके मन में दीनता छा गयी थी, उन समस्त वनवासी वानरों ने उन वानरश्रेष्ठ हनुमान् का मेघ-गर्जना के समान सिंहनाद सुना

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · २१ ॥
निशम्य नदतो नादं वानरास्ते समन्ततः। बभूवुरुत्सुकाः सर्वे सुहृद्दर्शनकाङ्क्षिणः॥

niśamya nadato nādaṁ vānarāste samantataḥ।
babhūvurutsukāḥ sarve suhṛddarśanakāṅkṣiṇaḥ॥

गर्जते हुए पवनकुमार का वह सिंहनाद सुनकर सब ओर बैठे हुए वे समस्त वानर अपने सुहृद् हनुमान्जी को देखने की अभिलाषा से उत्कण्ठित हो गये

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · २२ ॥
जाम्बवान् हरिश्रेष्ठः प्रीतिसंहृष्टमानसः। उपामन्त्र्य हरीन् सर्वानिदं वचनमब्रवीत्॥

jāmbavān sa hariśreṣṭhaḥ prītisaṁhṛṣṭamānasaḥ।
upāmantrya harīn sarvānidaṁ vacanamabravīt॥

वानर-भालुओं में श्रेष्ठ जाम्बवान् के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। वे हर्ष से खिल उठे और सब वानरों को निकट बुलाकर इस प्रकार बोले—

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · २३ ॥
सर्वथा कृतकार्योऽसौ हनुमान् नात्र संशयः। ह्यस्याकृतकार्यस्य नाद एवंविधो भवेत्॥

sarvathā kṛtakāryo'sau hanumān nātra saṁśayaḥ।
na hyasyākṛtakāryasya nāda evaṁvidho bhavet॥

‘इसमें संदेह नहीं कि हनुमान्जी सब प्रकार से अपना कार्य सिद्ध करके आ रहे हैं। कृतकार्य हुए बिना इनकी ऐसी गर्जना नहीं हो सकती

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · २४ ॥
तस्य बाहूरुवेगं निनादं महात्मनः। निशम्य हरयो हृष्टाः समुत्पेतुर्यतस्ततः॥

tasya bāhūruvegaṁ ca ninādaṁ ca mahātmanaḥ।
niśamya harayo hṛṣṭāḥ samutpeturyatastataḥ॥

महात्मा हनुमान्जी की भुजाओं और जाँघों का महान् वेग देख तथा उनका सिंहनाद सुन सभी वानर हर्ष में भरकर इधर-उधर उछलने-कूदने लगे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · २५ ॥
ते नगाग्रान्नगाग्राणि शिखराच्छिखराणि च। प्रहृष्टाः समपद्यन्त हनूमन्तं दिदृक्षवः॥

te nagāgrānnagāgrāṇi śikharācchikharāṇi ca।
prahṛṣṭāḥ samapadyanta hanūmantaṁ didṛkṣavaḥ॥

हनुमान्जी को देखने की इच्छा से वे प्रसन्नतापूर्वक एक वृक्ष से दूसरे वृक्षों पर तथा एक शिखर से दूसरे शिखरों पर चढ़ने लगे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · २६ ॥
ते प्रीताः पादपाग्रेषु गृह्य शाखामवस्थिताः। वासांसि प्रकाशानि समाविध्यन्त वानराः॥

te prītāḥ pādapāgreṣu gṛhya śākhāmavasthitāḥ।
vāsāṁsi ca prakāśāni samāvidhyanta vānarāḥ॥

वृक्षों की सबसे ऊँची शाखा पर खड़े होकर वे प्रीतियुक्त वानर अपने स्पष्ट दिखायी देनेवाले वस्त्र हिलाने लगे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · २७ ॥
गिरिगह्वरसंलीनो यथा गर्जति मारुतः। एवं जगर्ज बलवान् हनुमान् मारुतात्मजः॥

girigahvarasaṁlīno yathā garjati mārutaḥ।
evaṁ jagarja balavān hanumān mārutātmajaḥ॥

जैसे पर्वत की गुफाओं में अवरुद्ध हुई वायु बड़े जोर से शब्द करती है, उसी प्रकार बलवान् पवनकुमार हनुमान् ने गर्जना की

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · २८ ॥
तमभ्रघनसंकाशमापतन्तं महाकपिम्। दृष्ट्वा ते वानराः सर्वे तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा॥

tamabhraghanasaṁkāśamāpatantaṁ mahākapim।
dṛṣṭvā te vānarāḥ sarve tasthuḥ prāñjalayastadā॥

मेघों की घटा के समान पास आते हुए महाकपि हनुमान् को देखकर वे सब वानर उस समय हाथ जोड़कर खड़े हो गये

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · २९ ॥
ततस्तु वेगवान् वीरो गिरिर्गिरिनिभः कपिः। निपपात गिरेस्तस्य शिखरे पादपाकुले॥

tatastu vegavān vīro girirgirinibhaḥ kapiḥ।
nipapāta girestasya śikhare pādapākule॥

तत्पश्चात् पर्वत के समान विशाल शरीरवाले वेगशाली वीर वानर हनुमान् जो अरिष्ट पर्वत से उछलकर चले थे, वृक्षों से भरे हुए महेन्द्र गिरि के शिखर पर कूद पड़े

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ३० ॥
हर्षेणापूर्यमाणोऽसौ रम्ये पर्वतनिर्झरे। छिन्नपक्ष इवाकाशात् पपात धरणीधरः॥

harṣeṇāpūryamāṇo'sau ramye parvatanirjhare।
chinnapakṣa ivākāśāt papāta dharaṇīdharaḥ॥

हर्ष से भरे हुए हनुमान्जी पर्वत के रमणीय झरने के निकट पंख कटे हुए पर्वत के समान आकाश से नीचे आ गये

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ३१ ॥
ततस्ते प्रीतमनसः सर्वे वानरपुङ्गवाः। हनूमन्तं महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे॥

tataste prītamanasaḥ sarve vānarapuṅgavāḥ।
hanūmantaṁ mahātmānaṁ parivāryopatasthire॥

उस समय वे सभी श्रेष्ठ वानर प्रसन्नचित्त हो महात्मा हनुमान्जी को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ३२ ॥
परिवार्य ते सर्वे परां प्रीतिमुपागताः। प्रहृष्टवदनाः सर्वे तमागतमुपागमन्॥

parivārya ca te sarve parāṁ prītimupāgatāḥ।
prahṛṣṭavadanāḥ sarve tamāgatamupāgaman॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५७ · ३३ ॥
उपायनानि चादाय मूलानि फलानि च। प्रत्यर्चयन् हरिश्रेष्ठं हरयो मारुतात्मजम्॥

upāyanāni cādāya mūlāni ca phalāni ca।
pratyarcayan hariśreṣṭhaṁ harayo mārutātmajam॥

॥ ३२–३३ ॥

उन्हें घेरकर खड़े होने से उन सब को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सब वानर प्रसन्नमुख होकर तुरन्त के आये हुए पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान् के पास भाँति-भाँति की भेंट-सामग्री तथा फल-मूल लेकर आये और उनका स्वागत-सत्कार करने लगे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ३४ ॥
विनेदुमुदिता केचित् केचित् किलकिलां तथा। हृष्टाः पादपशाखाश्च आनिन्युर्वानरर्षभाः॥

vinedumuditā kecit kecit kilakilāṁ tathā।
hṛṣṭāḥ pādapaśākhāśca āninyurvānararṣabhāḥ॥

कोई आनन्दमग्न होकर गर्जने लगे, कोई किलकारियाँ भरने लगे और कितने ही श्रेष्ठ वानर हर्ष से भरकर हनुमान्जी के बैठने के लिये वृक्षों की शाखाएँ तोड़ लाये

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ३५ ॥
हनूमांस्तु गुरून् वृद्धाञ्जाम्बवत्प्रमुखांस्तदा। कुमारमङ्गदं चैव सोऽवन्दत महाकपिः॥

hanūmāṁstu gurūn vṛddhāñjāmbavatpramukhāṁstadā।
kumāramaṅgadaṁ caiva so'vandata mahākapiḥ॥

महाकपि हनुमान्जी ने जाम्बवान् आदि वृद्ध गुरुजनों तथा कुमार अङ्गद को प्रणाम किया

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ३६ ॥
ताभ्यां पूजितः पूज्यः कपिभिश्च प्रसादितः। दृष्टा देवीति विक्रान्तः संक्षेपेण न्यवेदयत्॥

sa tābhyāṁ pūjitaḥ pūjyaḥ kapibhiśca prasāditaḥ।
dṛṣṭā devīti vikrāntaḥ saṁkṣepeṇa nyavedayat॥

फिर जाम्बवान् और अङ्गद ने भी आदरणीय हनुमान्जी का आदर-सत्कार किया तथा दूसरे-दूसरे वानरों ने भी उनका सम्मान करके उनको संतुष्ट किया। तत्पश्चात् उन पराक्रमी वानरवीर ने संक्षेप में निवेदन किया—‘मुझे सीतादेवी का दर्शन हो गया’

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ३७ ॥
निषसाद हस्तेन गृहीत्वा वालिनः सुतम्। रमणीये वनोद्देशे महेन्द्रस्य गिरेस्तदा॥

niṣasāda ca hastena gṛhītvā vālinaḥ sutam।
ramaṇīye vanoddeśe mahendrasya girestadā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५७ · ३८ ॥
हनूमानब्रवीत् पृष्टस्तदा तान् वानरर्षभान्। अशोकवनिकासंस्था दृष्टा सा जनकात्मजा॥

hanūmānabravīt pṛṣṭastadā tān vānararṣabhān।
aśokavanikāsaṁsthā dṛṣṭā sā janakātmajā॥

॥ ३७–३८ ॥

तदनन्तर वालिकुमार अङ्गद का हाथ अपने हाथ में लेकर हनुमान्जी महेन्द्रगिरि के रमणीय वनप्रान्त में जा बैठे और सब के पूछने पर उन वानरशिरोमणियों से इस प्रकार बोले—‘जनकनन्दिनी सीता लङ्का के अशोकवन में निवास करती हैं। वहीं मैंने उनका दर्शन किया है’

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ३९ ॥
रक्ष्यमाणा सुघोराभी राक्षसीभिरनिन्दिता। एकवेणीधरा बाला रामदर्शनलालसा॥ उपवासपरिश्रान्ता मलिना जटिला कृशा।

rakṣyamāṇā sughorābhī rākṣasībhiraninditā।
ekaveṇīdharā bālā rāmadarśanalālasā॥
upavāsapariśrāntā malinā jaṭilā kṛśā।

‘अत्यन्त भयंकर आकारवाली राक्षसियाँ उनकी रखवाली करती हैं। साध्वी सीता बड़ी भोली-भाली हैं। वे एक वेणी धारण किये वहाँ रहती हैं और श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये बहुत ही उत्सुक हैं। उपवास के कारण बहुत थक गयी हैं, दुर्बल और मलिन हो रही हैं तथा उनके केश जटा के रूप में परिणत हो गये हैं’

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ४० ॥
ततो दृष्टेति वचनं महार्थममृतोपमम्॥ निशम्य मारुतेः सर्वे मुदिता वानराभवन्।

tato dṛṣṭeti vacanaṁ mahārthamamṛtopamam॥
niśamya māruteḥ sarve muditā vānarābhavan।

उस समय ‘सीता का दर्शन हो गया’ यह वचन वानरों को अमृत के समान प्रतीत हुआ। यह उनके महान् प्रयोजन की सिद्धि का सूचक था। हनुमान्जी के मुख से यह शुभ संवाद सुनकर सब वानर बड़े प्रसन्न हुए

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ४१ ॥
क्ष्वेडन्त्यन्ये नदन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये महाबलाः॥ चक्रुः किलकिलामन्ये प्रतिगर्जन्ति चापरे।

kṣveḍantyanye nadantyanye garjantyanye mahābalāḥ॥
cakruḥ kilakilāmanye pratigarjanti cāpare।

कोई हर्षनाद और कोई सिंहनाद करने लगे। दूसरे महाबली वानर गर्जने लगे। कितने ही किलकारियाँ भरने लगे और दूसरे वानर एक की गर्जना के उत्तर में स्वयं भी गर्जना करने लगे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ४२ ॥
केचिदुच्छ्रितलाङ्गूलाः प्रहृष्टाः कपिकुञ्जराः॥ आयताञ्चिततदीर्घाणि लाङ्गूलानि प्रविव्यधुः।

keciducchritalāṅgūlāḥ prahṛṣṭāḥ kapikuñjarāḥ॥
āyatāñcitatadīrghāṇi lāṅgūlāni pravivyadhuḥ।

बहुत-से कपिकुञ्जर हर्ष से उल्लसित हो अपनी पूँछ ऊपर उठाकर नाचने लगे। कितने ही अपनी लम्बी और मोटी पूँछें घुमाने या हिलाने लगे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ४३ ॥
अपरे तु हनूमन्तं श्रीमन्तं वानरोत्तमम्॥ आप्लुत्य गिरिशृङ्गेषु संस्पृशन्ति स्म हर्षिताः।

apare tu hanūmantaṁ śrīmantaṁ vānarottamam॥
āplutya giriśṛṅgeṣu saṁspṛśanti sma harṣitāḥ।

कितने ही वानर हर्षोल्लास से भरकर छलाँगें भरते हुए पर्वत-शिखरों पर वानरशिरोमणि श्रीमान् हनुमान् को छूने लगे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ४४ ॥
उक्तवाक्यं हनूमन्तमङ्गदस्तु तदाब्रवीत्॥ सर्वेषां हरिवीराणां मध्ये वाचमनुत्तमाम्।

uktavākyaṁ hanūmantamaṅgadastu tadābravīt॥
sarveṣāṁ harivīrāṇāṁ madhye vācamanuttamām।

हनुमान्जी की उपर्युक्त बात सुनकर अङ्गद ने उस समय समस्त वानरवीरों के बीच में यह परम उत्तम बात कही—

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ४५ ॥
सत्त्वे वीर्ये ते कश्चित्समो वानर विद्यते॥ यदवप्लुत्य विस्तीर्णं सागरं पुनरागतः।

sattve vīrye na te kaścitsamo vānara vidyate॥
yadavaplutya vistīrṇaṁ sāgaraṁ punarāgataḥ।

‘वानरश्रेष्ठ! बल और पराक्रम में तुम्हारे समान कोई नहीं है; क्योंकि तुम इस विशाल समुद्र को लाँघकर फिर इस पार लौट आये

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ४६ ॥
जीवितस्य प्रदाता नस्त्वमेको वानरोत्तम॥ त्वत्प्रसादात्समेष्यामः सिद्धार्था राघवेण ह।

jīvitasya pradātā nastvameko vānarottama॥
tvatprasādātsameṣyāmaḥ siddhārthā rāghaveṇa ha।

‘कपिशिरोमणे! एकमात्र तुम्हीं हमलोगों के जीवनदाता हो। तुम्हारे प्रसाद से ही हम सब लोग सफलमनोरथ होकर श्रीरामचन्द्रजी से मिलेंगे

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ४७ ॥
अहो स्वामिनि ते भक्तिरहो वीर्यमहो धृतिः॥

aho svāmini te bhaktiraho vīryamaho dhṛtiḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५७ · ४८ ॥
दिष्ट्या दृष्टा त्वया देवी रामपत्नी यशस्विनी। दिष्ट्या त्यक्ष्यति काकुत्स्थः शोकं सीतावियोगजम्॥

diṣṭyā dṛṣṭā tvayā devī rāmapatnī yaśasvinī।
diṣṭyā tyakṣyati kākutsthaḥ śokaṁ sītāviyogajam॥

॥ ४७–४८ ॥

‘अपने स्वामी श्रीरघुनाथजी के प्रति तुम्हारी भक्ति अद्भुत है! तुम्हारा पराक्रम और धैर्य भी आश्चर्यजनक है। बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम श्रीरामचन्द्रजी की यशस्विनी पत्नी सीतादेवी का दर्शन कर आये, अब भगवान् श्रीराम सीता के वियोग से उत्पन्न हुए शोक को त्याग देंगे, यह भी सौभाग्य का ही विषय है’

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ४९ ॥
ततोऽङ्गदं हनूमन्तं जाम्बवन्तं वानराः। परिवार्य प्रमुदिता भेजिरे विपुलाः शिलाः॥

tato'ṅgadaṁ hanūmantaṁ jāmbavantaṁ ca vānarāḥ।
parivārya pramuditā bhejire vipulāḥ śilāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५७ · ५० ॥
उपविष्टा गिरेस्तस्य शिलासु विपुलासु ते। श्रोतुकामाः समुद्रस्य लङ्घनं वानरोत्तमाः॥

upaviṣṭā girestasya śilāsu vipulāsu te।
śrotukāmāḥ samudrasya laṅghanaṁ vānarottamāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ५७ · ५१ ॥
दर्शनं चापि लङ्कायाः सीताया रावणस्य च। तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे हनूमद्वदनोन्मुखाः॥

darśanaṁ cāpi laṅkāyāḥ sītāyā rāvaṇasya ca।
tasthuḥ prāñjalayaḥ sarve hanūmadvadanonmukhāḥ॥

॥ ४९–५१ ॥

तत्पश्चात् सभी श्रेष्ठ वानर समुद्रलङ्घन, लङ्का, रावण एवं सीता के दर्शन का समाचार सुनने के लिये एकत्र हुए तथा अङ्गद, हनुमान् और जाम्बवान् को चारों ओर से घेरकर पर्वत की बड़ी-बड़ी शिलाओं पर आनन्दपूर्वक बैठ गये। वे सब-के-सब हाथ जोड़े हुए थे और उन सब की आँखें हनुमान्जी के मुख पर लगी थीं

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ५२ ॥
तस्थौ तत्राङ्गदः श्रीमान् वानरैर्बहुभिर्वृतः। उपास्यमानो विबुधैर्दिवि देवपतिर्यथा॥

tasthau tatrāṅgadaḥ śrīmān vānarairbahubhirvṛtaḥ।
upāsyamāno vibudhairdivi devapatiryathā॥

जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में देवताओंद्वारा सेवित होकर बैठते हैं, उसी प्रकार बहुतेरे वानरों से घिरे हुए श्रीमान् अङ्गद वहाँ बीच में विराजमान हुए

English translation coming soon.

॥ ५ · ५७ · ५३ ॥
हनूमता कीर्तिमता यशस्विना तथाङ्गदेनाङ्गदनद्धबाहुना। मुदा तदाध्यासितमुन्नतं महन्महीधराग्रं ज्वलितं श्रियाभवत्॥

hanūmatā kīrtimatā yaśasvinā tathāṅgadenāṅgadanaddhabāhunā।
mudā tadādhyāsitamunnataṁ mahanmahīdharāgraṁ jvalitaṁ śriyābhavat॥

कीर्तिमान् एवं यशस्वी हनुमान्जी तथा बाँहों में भुजबंद धारण किये अङ्गद के प्रसन्नतापूर्वक बैठने से वह ऊँचा एवं महान् पर्वतशिखर दिव्य कान्ति से प्रकाशित हो उठा

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः॥ ५७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७ ॥