हनुमान्जीके द्वारा प्रमदावन (अशोकवाटिका)-का विध्वंस
sa ca vāgbhiḥ praśastābhirgamiṣyan pūjitastayā।
tasmād deśādapākramya cintayāmāsa vānaraḥ॥
सीताजी से उत्तम वचनोंद्वारा समादर पाकर वानरवीर हनुमान्जी जब वहाँ से जाने लगे, तब उस स्थान से दूसरी जगह हटकर वे इस प्रकार विचार करने लगे—
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alpaśeṣamidaṁ kāryaṁ dṛṣṭeyamasitekṣaṇā।
trīnupāyānatikramya caturthaṁ iha dṛśyate॥
‘मैंने कजरारे नेत्रोंवाली सीताजी का दर्शन तो कर लिया, अब मेरे इस कार्य का थोड़ा-सा अंश (शत्रु की शक्ति का पता लगाना) शेष रह गया है। इसके लिये चार उपाय हैं—साम, दान, भेद और दण्ड। यहाँ साम आदि तीन उपायों को लाँघकर केवल चौथे उपाय (दण्ड)-का प्रयोग ही उपयोगी दिखायी देता है
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na sāma rakṣaḥsu guṇāya kalpate na dānamarthopaciteṣu yujyate।
na bhedasādhyā baladarpitā janāḥ parākramastveṣa mameha rocate॥
‘राक्षसों के प्रति सामनीति का प्रयोग करने से कोई लाभ नहीं होता। इनके पास धन भी बहुत है, अतः इन्हें दान देने का भी कोई उपयोग नहीं है। इसके सिवा, ये बल के अभिमान में चूर रहते हैं, अतः भेदनीति के द्वारा भी इन्हें वश में नहीं किया जा सकता। ऐसी दशा में मुझे यहाँ पराक्रम दिखाना ही उचित जान पड़ता है
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na cāsya kāryasya parākramādṛte viniścayaḥ kaścidihopapadyate।
hatapravīrāśca raṇe tu rākṣasāḥ kathaṁcidīyuryadihādya mārdavam॥
‘इस कार्य की सिद्धि के लिये पराक्रम के सिवा यहाँ और किसी उपाय का अवलम्बन ठीक नहीं जँचता। यदि युद्ध में राक्षसों के मुख्य-मुख्य वीर मारे जायँ तो ये लोग किसी तरह कुछ नरम पड़ सकते हैं
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kārye karmaṇi nirvṛtte yo bahūnyapi sādhayet।
pūrvakāryāvirodhena sa kāryaṁ kartumarhati॥
‘जो पुरुष प्रधान कार्य के सम्पन्न हो जाने पर दूसरे-दूसरे बहुत-से कार्यों को भी सिद्ध कर लेता है और पहले के कार्यों में बाधा नहीं आने देता, वही कार्य को सुचारु रूप में कर सकता है
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na hyekaḥ sādhako hetuḥ svalpasyāpīha karmaṇaḥ।
yo hyarthaṁ bahudhā veda sa samartho'rthasādhane॥
‘छोटे-से-छोटे कर्म की भी सिद्धि के लिये कोई एक ही साधक हेतु नहीं हुआ करता। जो पुरुष किसी कार्य या प्रयोजन को अनेक प्रकार से सिद्ध करने की कला जानता हो, वही कार्य-साधन में समर्थ हो सकता है
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ihaiva tāvatkṛtaniścayo hyahaṁ vrajeyamadya plavageśvarālayam।
parātmasammardaviśeṣatattvavit tataḥ kṛtaṁ syānmama bhartṛśāsanam॥
‘यदि इसी यात्रा में मैं इस बात को ठीक-ठीक समझ लूँ कि अपने और शत्रुपक्ष में युद्ध होने पर कौन प्रबल होगा और कौन निर्बल, तत्पश्चात् भविष्य के कार्य का भी निश्चय करके आज सुग्रीव के पास चलूँ तो मेरे द्वारा स्वामी की आज्ञा का पूर्णरूप से पालन हुआ समझा जायगा
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kathaṁ nu khalvadya bhavet sukhāgataṁ prasahya yuddhaṁ mama rākṣasaiḥ saha।
tathaiva khalvātmabalaṁ ca sāravat samānayenmāṁ ca raṇe daśānanaḥ॥
‘परंतु आज मेरा यहाँतक आना सुखद अथवा शुभ परिणाम का जनक कैसे होगा? राक्षसों के साथ हठात् युद्ध करने का अवसर मुझे कैसे प्राप्त होगा? तथा दशमुख रावण समर में अपनी सेना को और मुझे भी तुलनात्मक दृष्टि से देखकर कैसे यह समझ सकेगा कि कौन सबल है?
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tataḥ samāsādya raṇe daśānanaṁ samantrivargaṁ sabalaṁ sayāyinam।
hṛdi sthitaṁ tasya mataṁ balaṁ ca sukhena matvāhamitaḥ punarvraje॥
‘उस युद्ध में मन्त्री, सेना और सहायकोंसहित रावण का सामना करके मैं उसके हार्दिक अभिप्राय तथा सैनिक-शक्ति का अनायास ही पता लगा लूँगा। उसके बाद यहाँ से जाऊँगा
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idamasya nṛśaṁsasya nandanopamamuttamam।
vanaṁ netramanaḥkāntaṁ nānādrumalatāyutam॥
‘इस निर्दयी रावण का यह सुन्दर उपवन नेत्रों को आनन्द देनेवाला और मनोरम है। नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से व्याप्त होने के कारण यह नन्दनवन के समान उत्तम प्रतीत होता है
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idaṁ vidhvaṁsayiṣyāmi śuṣkaṁ vanamivānalaḥ।
asmin bhagne tataḥ kopaṁ kariṣyati sa rāvaṇaḥ॥
‘जैसे आग सूखे वन को जला डालती है, उसी प्रकार मैं भी आज इस उपवन का विध्वंस कर डालूँगा। इसके भग्न हो जाने पर रावण अवश्य मुझपर क्रोध करेगा
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tato mahatsāśvamahārathadvipaṁ balaṁ samāneṣyati rākṣasādhipaḥ।
triśūlakālāyasapaṭṭiśāyudhaṁ tato mahadyuddhamidaṁ bhaviṣyati॥
‘तत्पश्चात् वह राक्षसराज हाथी, घोड़े तथा विशाल रथों से युक्त और त्रिशूल, कालायस एवं पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित बहुत बड़ी सेना लेकर आयेगा। फिर तो यहाँ महान् संग्राम छिड़ जायगा’
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ahaṁ ca taiḥ saṁyati caṇḍavikramaiḥ sametya rakṣobhirabhaṅgavikramaḥ।
nihatya tad rāvaṇacoditaṁ balaṁ sukhaṁ gamiṣyāmi harīśvarālayam॥
‘उस युद्ध में मेरी गति रुक नहीं सकती। मेरा पराक्रम कुण्ठित नहीं हो सकता। मैं प्रचण्ड पराक्रम दिखानेवाले उन राक्षसों से भिड़ जाऊँगा और रावण की भेजी हुई उस सारी सेना को मौत के घाट उतारकर सुखपूर्वक सुग्रीव के निवासस्थान किष्किन्धापुरी को लौट जाऊँगा’
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tato mārutavat kruddho mārutirbhīmavikramaḥ।
ūruvegena mahatā drumān kṣeptumathārabhat॥
ऐसा सोचकर भयानक पुरुषार्थ प्रकट करनेवाले पवनकुमार हनुमान्जी क्रोध से भर गये और वायु के समान बड़े भारी वेग से वृक्षों को उखाड़-उखाड़कर फेंकने लगे
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tatastu hanumān vīro babhañja pramadāvanam।
mattadvijasamāghuṣṭaṁ nānādrumalatāyutam॥
तदनन्तर वीर हनुमान् ने मतवाले पक्षियों के कलरव से मुखरित और नाना प्रकार के वृक्षों एवं लताओं से भरे-पूरे उस प्रमदावन (अन्तःपुर के उपवन)-को उजाड़ डाला
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tadvanaṁ mathitairvṛkṣairbhinnaiśca salilāśayaiḥ।
cūrṇitaiḥ parvatāgraiśca babhūvāpriyadarśanam॥
वहाँ के वृक्षों को खण्ड-खण्ड कर दिया। जलाशयों को मथ डाला और पर्वत-शिखरों को चूर-चूर कर डाला। इससे वह सुन्दर वन कुछ ही क्षणों में अभव्य दिखायी देने लगा
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nānāśakuntavirutaiḥ prabhinnasalilāśayaiḥ।
tāmraiḥ kisalayaiḥ klāntaiḥ klāntadrumalatāyutaiḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
na babhau tad vanaṁ tatra dāvānalahataṁ yathā।
vyākulāvaraṇā rejurvihvalā iva tā latāḥ॥
नाना प्रकार के पक्षी वहाँ भय के मारे चें-चें करने लगे, जलाशयों के घाट टूट-फूट गये, तामे के समान वृक्षों के लाल-लाल पल्लव मुरझा गये तथा वहाँ के वृक्ष और लताएँ भी रौंद डाली गयीं। इन सब कारणों से वह प्रमदावन वहाँ ऐसा जान पड़ता था, मानो दावानल से झुलस गया हो। वहाँ की लताएँ अपने आवरणों के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने से घबरायी हुई स्त्रियों के समान प्रतीत होती थीं
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latāgṛhaiścitragṛhaiśca sāditairvyālairmṛgairārtaravaiśca pakṣibhiḥ।
śilāgṛhairunmathitaistathā gṛhaiḥ praṇaṣṭarūpaṁ tadabhūnmahad vanam॥
लतामण्डप और चित्रशालाएँ उजाड़ हो गयीं। पाले हुए हिंसक जन्तु, मृग तथा तरह-तरह के पक्षी आर्तनाद करने लगे। प्रस्तरनिर्मित प्रासाद तथा अन्य साधारण गृह भी तहस-नहस हो गये। इससे उस महान् प्रमदावन का सारा रूप-सौन्दर्य नष्ट हो गया
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sā vihvalāśokalatāpratānā vanasthalī śokalatāpratānā।
jātā daśāsyapramadāvanasya kaperbalāddhi pramadāvanasya॥
दशमुख रावण की स्त्रियों की रक्षा करनेवाले तथा अन्तःपुर के क्रीडाविहार के लिये उपयोगी उस विशाल कानन की भूमि, जहाँ चंचल अशोक-लताओं के समूह शोभा पाते थे, कपिवर हनुमान्जी के बलप्रयोग से श्रीहीन होकर शोचनीय लताओं के विस्तार से युक्त हो गयी (उसकी दुरवस्था देखकर दर्शक के मन में दुःख होता था)
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tataḥ sa kṛtvā jagatīpatermahān mahad vyalīkaṁ manaso mahātmanaḥ।
yuyutsureko bahubhirmahābalaiḥ śriyā jvalaṁstoraṇamāśritaḥ kapiḥ॥
इस प्रकार महामना राजा रावण के मन को विशेष कष्ट पहुँचानेवाला कार्य करके अनेक महाबलियों के साथ अकेले ही युद्ध करने का हौसला लेकर कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी प्रमदावन के फाटक पर आ गये। उस समय वे अपने अद्भुत तेज से प्रकाशित हो रहे थे
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१ ॥