रावणपुत्र अक्षकुमारका पराक्रम और वध
senāpatīn pañca sa tu pramāpitān hanūmatā sānucarān savāhanān।
niśamya rājā samaroddhatonmukhaṁ kumāramakṣaṁ prasamaikṣatākṣam॥
हनुमान्जीके द्वारा अपने पाँच सेनापतियों को सेवकों और वाहनोंसहित मारा गया सुनकर राजा रावण ने अपने सामने बैठे हुए पुत्र अक्षकुमार की ओर देखा, जो युद्ध में उद्धत और उसके लिये उत्कण्ठित रहनेवाला था
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sa tasya dṛṣṭyarpaṇasampracoditaḥ pratāpavān kāñcanacitrakārmukaḥ।
samutpapātātha sadasyudīrito dvijātimukhyairhaviṣeva pāvakaḥ॥
पिता के दृष्टिपातमात्र से प्रेरित हो वह प्रतापी वीर युद्ध के लिये उत्साहपूर्वक उठा। उसका धनुष सुवर्णजटित होने के कारण विचित्र शोभा धारण करता था। जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञशाला में हविष्य की आहुति देने पर अग्निदेव प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार वह भी सभा में उठकर खड़ा हो गया
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tato mahān bāladivākaraprabhaṁ prataptajāmbūnadajālasaṁtatam।
rathaṁ samāsthāya yayau sa vīryavān mahāhariṁ taṁ prati nairṛtarṣabhaḥ॥
वह महापराक्रमी राक्षसशिरोमणि अक्ष प्रातःकालीन सूर्य के समान कान्तिमान् तथा तपाये हुए सुवर्ण के जाल से आच्छादित रथ पर आरूढ़ हो उन महाकपि हनुमान्जी के पास चल दिया
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tatastapaḥsaṁgrahasaṁcayārjitaṁ prataptajāmbūnadajālacitritam।
patākinaṁ ratnavibhūṣitadhvajaṁ manojavāṣṭāśvavaraiḥ suyojitam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
surāsurādhṛṣyamasaṅgacāriṇaṁ taḍitprabhaṁ vyomacaraṁ samāhitam।
satūṇamaṣṭāsinibaddhabandhuraṁ yathākramāveśitaśaktitomaram॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
virājamānaṁ pratipūrṇavastunā sahemadāmnā śaśisūryavarcasā।
divākarābhaṁ rathamāsthitastataḥ sa nirjagāmāmaratulyavikramaḥ॥
वह रथ उसे बड़ी भारी तपस्याओं के संग्रह से प्राप्त हुआ था। उसमें तपे हुए जाम्बूनद (सुवर्ण)-की जाली जड़ी हुई थी। पताका फहरा रही थी। उसका ध्वजदण्ड रत्नों से विभूषित था। उसमें मन के समान वेगवाले आठ घोड़े अच्छी तरह जुते हुए थे। देवता और असुर कोई भी उस रथ को नष्ट नहीं कर सकते थे। उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी। वह बिजली के समान प्रकाशित होता और आकाश में भी चलता था। उस रथ को सब सामग्रियों से सुसज्जित किया गया था। उसमें तरकस रखे गये थे। आठ तलवारों के बँधे रहने से वह और भी सुन्दर दिखायी देता था। उसमें यथास्थान शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्र क्रम से रखे गये थे। चन्द्रमा और सूर्य के समान दीप्तिमान् तथा सोने की रस्सी से युक्त युद्ध के समस्त उपकरणों से सुशोभित उस सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ पर बैठकर देवताओं के तुल्य पराक्रमी अक्षकुमार राजमहल से बाहर निकला
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sa pūrayan khaṁ ca mahīṁ ca sācalāṁ turaṅgamātaṅgamahārathasvanaiḥ।
balaiḥ sametaiḥ sahatoraṇasthitaṁ samarthamāsīnamupāgamat kapim॥
घोड़े, हाथी और बड़े-बड़े रथों की भयंकर आवाज से पर्वतोंसहित पृथ्वी तथा आकाश को गुँजाता हुआ वह बड़ी भारी सेना साथ लेकर वाटिका के द्वार पर बैठे हुए शक्तिशाली वीर वानर हनुमान्जी के पास जा पहुँचा
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sa taṁ samāsādya hariṁ harīkṣaṇo yugāntakālāgnimiva prajākṣaye।
avasthitaṁ vismitajātasambhramaṁ samaikṣatākṣo bahumānacakṣuṣā॥
सिंह के समान भयंकर नेत्रवाले अक्ष ने वहाँ पहुँचकर लोकसंहार के समय प्रज्वलित हुई प्रलयाग्नि के समान स्थित और विस्मय एवं सम्भ्रम में पड़े हुए हनुमान्जी को अत्यन्त गर्वभरी दृष्टि से देखा
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sa tasya vegaṁ ca kapermahātmanaḥ parākramaṁ cāriṣu rāvaṇātmajaḥ।
vicārayan svaṁ ca balaṁ mahābalo yugakṣaye sūrya ivābhivardhata॥
उन महात्मा कपिश्रेष्ठ के वेग तथा शत्रुओं के प्रति उनके पराक्रम का और अपने बल का भी विचार करके वह महाबली रावणकुमार प्रलयकाल के सूर्य की भाँति बढ़ने लगा
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sa jātamanyuḥ prasamīkṣya vikramaṁ sthitaḥ sthiraḥ saṁyati durnivāraṇam।
samāhitātmā hanumantamāhave pracodayāmāsa śitaiḥ śaraistribhiḥ॥
हनुमान्जी के पराक्रम पर दृष्टिपात करके उसे क्रोध आ गया। अतः स्थिरतापूर्वक स्थित हो उसने एकाग्रचित्त से तीन तीखे बाणोंद्वारा रणदुर्जय हनुमान्जी को युद्ध के लिये प्रेरित किया
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tataḥ kapiṁ taṁ prasamīkṣya garvitaṁ jitaśramaṁ śatruparājayocitam।
avaikṣatākṣaḥ samudīrṇamānasaṁ sabāṇapāṇiḥ pragṛhītakārmukaḥ॥
तदनन्तर हाथ में धनुष और बाण लिये अक्ष ने यह जानकर कि ‘ये खेद या थकावट को जीत चुके हैं, शत्रुओं को पराजित करने की योग्यता रखते हैं और युद्ध के लिये इनके मन का उत्साह बढ़ा हुआ है; इसीलिये ये गर्वीले दिखायी देते हैं’, उनकी ओर दृष्टिपात किया
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sa hemaniṣkāṅgadacārukuṇḍalaḥ samāsasādāśuparākramaḥ kapim।
tayorbabhūvāpratimaḥ samāgamaḥ surāsurāṇāmapi sambhramapradaḥ॥
गले में सुवर्ण के निष्क (पदक), बाँहों में बाजूबंद और कानों में मनोहर कुण्डल धारण किये वह शीघ्रपराक्रमी रावणकुमार हनुमान्जी के पास आया। उस समय उन दोनों वीरों में जो टक्कर हुई, उसकी कहीं तुलना नहीं थी। उनका युद्ध देवताओं और असुरों के मन में भी घबराहट पैदा कर देनेवाला था
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rarāsa bhūmirna tatāpa bhānumān vavau na vāyuḥ pracacāla cācalaḥ।
kapeḥ kumārasya ca vīryasaṁyugaṁ nanāda ca dyaurudadhiśca cukṣubhe॥
कपिश्रेष्ठ हनुमान् और अक्षकुमार का वह संग्राम देखकर भूतल के सारे प्राणी चीख उठे। सूर्य का ताप कम हो गया। वायु की गति रुक गयी। पर्वत हिलने लगे। आकाश में भयंकर शब्द होने लगा और समुद्र में तूफान आ गया
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sa tasya vīraḥ sumukhān patatriṇaḥ suvarṇapuṅkhān saviṣānivoragān।
samādhisaṁyogavimokṣatattvaviccharānatha trīn kapimūrdhnyatāḍayat॥
अक्षकुमार निशाना साधने, बाण को धनुष पर चढ़ाने और उसे लक्ष्य की ओर छोड़ने में बड़ा प्रवीण था। उस वीर ने विषधर सर्पों के समान भयंकर, सुवर्णमय पंखों से युक्त, सुन्दर अग्रभागवाले तथा पत्रयुक्त तीन बाण हनुमान्जी के मस्तक में मारे
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sa taiḥ śarairmūrdhni samaṁ nipātitaiḥ kṣarannasṛgdigdhavivṛttanetraḥ।
navoditādityanibhaḥ śarāṁśumān vyarājatāditya ivāṁśumālikaḥ॥
उन तीनों की चोट हनुमान्जी के माथे में एक साथ ही लगी, इससे खून की धारा गिरने लगी। वे उस रक्त से नहा उठे और उनकी आँखें घूमने लगीं। उस समय बाणरूपी किरणों से युक्त हो वे तुरंत के उगे हुए अंशुमाली सूर्य के समान शोभा पाने लगे
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tataḥ plavaṅgādhipamantrisattamaḥ samīkṣya taṁ rājavarātmajaṁ raṇe।
udagracitrāyudhacitrakārmukaṁ jaharṣa cāpūryata cāhavonmukhaḥ॥
तदनन्तर वानरराज के श्रेष्ठ मन्त्री हनुमान्जी राक्षसराज रावण के राजकुमार अक्ष को अति उत्तम विचित्र आयुध एवं अद्भुत धनुष धारण किये देख हर्ष और उत्साह से भर गये और युद्ध के लिये उत्कण्ठित हो अपने शरीर को बढ़ाने लगे
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sa mandarāgrastha ivāṁśumālī vivṛddhakopo balavīryasaṁvṛtaḥ।
kumāramakṣaṁ sabalaṁ savāhanaṁ dadāha netrāgnimarīcibhistadā॥
हनुमान्जी का क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था। वे बल और पराक्रम से सम्पन्न थे, अतः मन्दराचल के शिखर पर प्रकाशित होनेवाले सूर्यदेव के समान वे अपनी नेत्राग्निमयी किरणों से उस समय सेना और सवारियोंसहित राजकुमार अक्ष को दग्ध-सा करने लगे
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tataḥ sa bāṇāsanaśakrakārmukaḥ śarapravarṣo yudhi rākṣasāmbudaḥ।
śarān mumocāśu harīśvarācale balāhako vṛṣṭimivācalottame॥
तब जैसे बादल श्रेष्ठ पर्वत पर जल बरसाता है, उसी प्रकार युद्धस्थल में अपने शरासनरूपी इन्द्र-धनुष से युक्त वह राक्षसरूपी मेघ बाणवर्षी होकर कपिश्रेष्ठ हनुमान्रूपी पर्वत पर बड़े वेग से बाणों की वृष्टि करने लगा
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kapistatastaṁ raṇacaṇḍavikramaṁ pravṛddhatejobalavīryasāyakam।
kumāramakṣaṁ prasamīkṣya saṁyuge nanāda harṣād ghanatulyaniḥsvanaḥ॥
रणभूमि में अक्षकुमार का पराक्रम बड़ा प्रचण्ड दिखायी देता था। उसके तेज, बल, पराक्रम और बाण सभी बढ़े-चढ़े थे। युद्धस्थल में उसकी ओर दृष्टिपात करके हनुमान्जी ने हर्ष और उत्साह में भरकर मेघ के समान भयानक गर्जना की
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sa bālabhāvād yudhi vīryadarpitaḥ pravṛddhamanyuḥ kṣatajopamekṣaṇaḥ।
samāsasādāpratimaṁ raṇe kapiṁ gajo mahākūpamivāvṛtaṁ tṛṇaiḥ॥
समराङ्गण में बल के घमंड में भरे हुए अक्षकुमार को उनकी गर्जना सुनकर बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें रक्त के समान लाल हो गयीं। वह अपने बालोचित अज्ञान के कारण अनुपम पराक्रमी हनुमान्जी का सामना करने के लिये आगे बढ़ा। ठीक उसी तरह, जैसे कोई हाथी तिनकों से ढके हुए विशाल कूप की ओर अग्रसर होता है
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sa tena bāṇaiḥ prasabhaṁ nipātitaiścakāra nādaṁ ghananādaniḥsvanaḥ।
samutsāhenāśu nabhaḥ samārujan bhujoruvikṣepaṇaghoradarśanaḥ॥
उसके बलपूर्वक चलाये हुए बाणों से विद्ध होकर हनुमान्जी ने तुरंत ही उत्साहपूर्वक आकाश को विदीर्ण करते हुए-से मेघ के समान गम्भीर स्वर से भीषण गर्जना की। उस समय दोनों भुजाओं और जाँघों को चलाने के कारण वे बड़े भयंकर दिखायी देते थे
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tamutpatantaṁ samabhidravad balī sa rākṣasānāṁ pravaraḥ pratāpavān।
rathī rathaśreṣṭhataraḥ kiran śaraiḥ payodharaḥ śailamivāśmavṛṣṭibhiḥ॥
उन्हें आकाश में उछलते देख रथियों में श्रेष्ठ और रथ पर चढ़े हुए उस बलवान्, प्रतापी एवं राक्षसशिरोमणि वीर ने बाणों की वर्षा करते हुए उनका पीछा किया। उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो कोई मेघ किसी पर्वत पर ओले और पत्थरों की वर्षा कर रहा हो
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sa tāñcharāṁstasya harirvimokṣayaṁścacāra vīraḥ pathi vāyusevite।
śarāntare mārutavad viniṣpatan manojavaḥ saṁyati bhīmavikramaḥ॥
उस युद्धस्थल में मन के समान वेगवाले वीर हनुमान्जी भयंकर पराक्रम प्रकट करने लगे। वे अक्षकुमार के उन बाणों को व्यर्थ करते हुए वायु के पथ पर विचरते और दो बाणों के बीच से हवा की भाँति निकल जाते थे
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tamāttabāṇāsanamāhavonmukhaṁ khamāstṛṇantaṁ vividhaiḥ śarottamaiḥ।
avaikṣatākṣaṁ bahumānacakṣuṣā jagāma cintāṁ sa ca mārutātmajaḥ॥
अक्षकुमार हाथ में धनुष लिये युद्ध के लिये उन्मुख हो नाना प्रकार के उत्तम बाणोंद्वारा आकाश को आच्छादित किये देता था। पवनकुमार हनुमान् ने उसे बड़े आदर की दृष्टि से देखा और वे मन-ही-मन कुछ सोचने लगे
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tataḥ śarairbhinnabhujāntaraḥ kapiḥ kumāravaryeṇa mahātmanā nadan।
mahābhujaḥ karmaviśeṣatattvavid vicintayāmāsa raṇe parākramam॥
इतने ही में महामना वीर अक्षकुमार ने अपने बाणोंद्वारा कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी की दोनों भुजाओं के मध्यभाग—छाती में गहरा आघात किया। वे महाबाहु वानरवीर समयोचित कर्तव्यविशेष को ठीक-ठीक जानते थे; अतः वे रणक्षेत्र में उस चोट को सहकर सिंहनाद करते हुए उसके पराक्रम के विषय में इस प्रकार विचार करने लगे—
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abālavad bāladivākaraprabhaḥ karotyayaṁ karma mahanmahābalaḥ।
na cāsya sarvāhavakarmaśālinaḥ pramāpaṇe me matiratra jāyate॥
‘यह महाबली अक्षकुमार बालसूर्य के समान तेजस्वी है और बालक होकर भी बड़ों के समान महान् कर्म कर रहा है। युद्धसम्बन्धी समस्त कर्मों में कुशल होने के कारण अद्भुत शोभा पानेवाले इस वीर को यहाँ मार डालने की मेरी इच्छा नहीं हो रही है
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ayaṁ mahātmā ca mahāṁśca vīryataḥ samāhitaścātisahaśca saṁyuge।
asaṁśayaṁ karmaguṇodayādayaṁ sanāgayakṣairmunibhiśca pūjitaḥ॥
‘यह महामनस्वी राक्षसकुमार बल-पराक्रम की दृष्टि से महान् है। युद्ध में सावधान एवं एकाग्रचित्त है तथा शत्रु के वेग को सहन करने में अत्यन्त समर्थ है। अपने कर्म और गुणों की उत्कृष्टता के कारण यह नागों, यक्षों और मुनियोंके द्वारा भी प्रशंसित हुआ होगा, इसमें संशय नहीं है
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parākramotsāhavivṛddhamānasaḥ samīkṣate māṁ pramukho'grataḥ sthitaḥ।
parākramo hyasya manāṁsi kampayet surāsurāṇāmapi śīghrakāriṇaḥ॥
‘पराक्रम और उत्साह से इसका मन बढ़ा हुआ है। यह युद्ध के मुहाने पर मेरे सामने खड़ा हो मुझे ही देख रहा है। शीघ्रतापूर्वक युद्ध करनेवाले इस वीर का पराक्रम देवताओं और असुरों के हृदय को भी कम्पित कर सकता है
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na khalvayaṁ nābhibhavedupekṣitaḥ parākramo hyasya raṇe vivardhate।
pramāpaṇaṁ hyasya mamādya rocate na vardhamāno'gnirupekṣituṁ kṣamaḥ॥
‘किंतु यदि इसकी उपेक्षा की गयी तो यह मुझे परास्त किये बिना नहीं रहेगा; क्योंकि संग्राम में इसका पराक्रम बढ़ता जा रहा है। अतः अब इसे मार डालना ही मुझे अच्छा जान पड़ता है। बढ़ती हुई आग की उपेक्षा करना कदापि उचित नहीं है’
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iti pravegaṁ tu parasya tarkayan svakarmayogaṁ ca vidhāya vīryavān।
cakāra vegaṁ tu mahābalastadā matiṁ ca cakre'sya vadhe tadānīm॥
इस प्रकार शत्रु के वेग का विचार कर उसके प्रतीकार के लिये अपने कर्तव्य का निश्चय करके महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न हनुमान्जी ने उस समय अपना वेग बढ़ाया और उस शत्रु को मार डालने का विचार किया
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sa tasya tānaṣṭa varān mahāhayān samāhitān bhārasahān vivartane।
jaghāna vīraḥ pathi vāyusevite talaprahāraiḥ pavanātmajaḥ kapiḥ॥
तत्पश्चात् आकाश में विचरते हुए वीर वानर पवनकुमार ने थप्पड़ों की मार से अक्षकुमार के उन आठों उत्तम और विशाल घोड़ों को, जो भार सहन करने में समर्थ और नाना प्रकार के पैंतरे बदलने की कला में सुशिक्षित थे, यमलोक पहुँचा दिया
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tatastalenābhihato mahārathaḥ sa tasya piṅgādhipamantrinirjitaḥ।
sa bhagnanīḍaḥ parivṛttakūbaraḥ papāta bhūmau hatavājirambarāt॥
तदनन्तर वानरराज सुग्रीव के मन्त्री हनुमान्जी ने अक्षकुमार के उस विशाल रथ को भी अभिभूत कर दिया, उन्होंने हाथ से ही पीटकर रथ की बैठक तोड़ डाली और उसके हरसे को उलट दिया। घोड़े तो पहले ही मर चुके थे, अतः वह महान् रथ आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़ा
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sa taṁ parityajya mahāratho rathaṁ sakārmukaḥ khaḍgadharaḥ khamutpatan।
tato'bhiyogādṛṣirugravīryavān vihāya dehaṁ marutāmivālayam॥
उस समय महारथी अक्षकुमार धनुष और तलवार ले रथ छोड़कर अन्तरिक्ष में ही उड़ने लगा। ठीक वैसे ही, जैसे कोई उग्रशक्ति से सम्पन्न महर्षि योगमार्ग से शरीर त्यागकर स्वर्गलोक की ओर चला जा रहा हो
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kapistatastaṁ vicarantamambare patattrirājānilasiddhasevite।
sametya taṁ mārutavegavikramaḥ krameṇa jagrāha ca pādayordṛḍham॥
तब वायु के समान वेग और पराक्रमवाले कपिवर हनुमान्जी ने पक्षिराज गरुड़, वायु तथा सिद्धों से सेवित व्योममार्ग में विचरते हुए उस राक्षस के पास पहुँचकर क्रमशः उसके दोनों पैर दृढ़तापूर्वक पकड़ लिये
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sa taṁ samāvidhya sahasraśaḥ kapirmahoragaṁ gṛhya ivāṇḍajeśvaraḥ।
mumoca vegāt pitṛtulyavikramo mahītale saṁyati vānarottamaḥ॥
फिर तो अपने पिता वायु देवता के तुल्य पराक्रमी वानर-शिरोमणि हनुमान् ने जिस प्रकार गरुड़ बड़े-बड़े सर्पों को घुमाते हैं, उसी तरह उसे हजारों बार घुमाकर बड़े वेग से उस युद्ध-भूमि में पटक दिया
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sa bhagnabāhūrukaṭīpayodharaḥ kṣarannasṛṅnirmathitāsthilocanaḥ।
sambhinnasaṁdhiḥ pravikīrṇabandhano hataḥ kṣitau vāyusutena rākṣasaḥ॥
नीचे गिरते ही उसकी भुजा, जाँघ, कमर और छाती के टुकड़े-टुकड़े हो गये, खून की धारा बहने लगी, शरीर की हड्डियाँ चूर-चूर हो गयीं, आँखें बाहर निकल आयीं, अस्थियों के जोड़ टूट गये और नस-नाड़ियों के बन्धन शिथिल हो गये। इस तरह वह राक्षस पवनकुमार हनुमान्जी के हाथ से मारा गया
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mahākapirbhūmitale nipīḍya taṁ cakāra rakṣo'dhipatermahadbhayam।
maharṣibhiścakracaraiḥ samāgataiḥ sametya bhūtaiśca sayakṣapannagaiḥ।
suraiśca sendrairbhṛśajātavismayairhate kumāre sa kapirnirīkṣitaḥ॥
अक्षकुमार को पृथ्वी पर पटककर महाकपि हनुमान्जी ने राक्षसराज रावण के हृदय में बहुत बड़ा भय उत्पन्न कर दिया। उसके मारे जाने पर नक्षत्र-मण्डल में विचरनेवाले महर्षियों, यक्षों, नागों, भूतों तथा इन्द्रसहित देवताओं ने वहाँ एकत्र होकर बड़े विस्मय के साथ हनुमान्जी का दर्शन किया
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nihatya taṁ vajrisutopamaṁ raṇe kumāramakṣaṁ kṣatajopamekṣaṇam।
tadeva vīro'bhijagāma toraṇaṁ kṛtakṣaṇaḥ kāla iva prajākṣaye॥
युद्ध में इन्द्रपुत्र जयन्त के समान पराक्रमी और लाल-लाल आँखोंवाले अक्षकुमार का काम तमाम करके वीरवर हनुमान्जी प्रजा के संहार के लिये उद्यत हुए काल की भाँति पुनः युद्ध की प्रतीक्षा करते हुए वाटिका के उसी द्वार पर जा पहुँचे
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४७ ॥