वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः ४८ · ६१ श्लोकाःSarga 48 · 61 ślokas

इन्द्रजित् और हनुमान्जीका युद्ध, उसके दिव्यास्त्रके बन्धनमें बँधकर हनुमान्जीका रावणके दरबारमें उपस्थित होना

॥ ५ · ४८ · १ ॥
ततस्तु रक्षोऽधिपतिर्महात्मा हनूमताक्षे निहते कुमारे। मनः समाधाय देवकल्पं समादिदेशेन्द्रजितं सरोषः॥

tatastu rakṣo'dhipatirmahātmā hanūmatākṣe nihate kumāre।
manaḥ samādhāya sa devakalpaṁ samādideśendrajitaṁ saroṣaḥ॥

तदनन्तर हनुमान्जी के द्वारा अक्षकुमार के मारे जाने पर राक्षसों का स्वामी महाकाय रावण अपने मन को किसी तरह सुस्थिर करके रोष से जल उठा और देवताओं के तुल्य पराक्रमी कुमार इन्द्रजित् (मेघनाद) को इस प्रकार आज्ञा दी

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॥ ५ · ४८ · २ ॥
त्वमस्त्रविच्छस्त्रभृतां वरिष्ठः सुरासुराणामपि शोकदाता। सुरेषु सेन्द्रेषु दृष्टकर्मा पितामहाराधनसंचितास्त्रः॥

tvamastravicchastrabhṛtāṁ variṣṭhaḥ surāsurāṇāmapi śokadātā।
sureṣu sendreṣu ca dṛṣṭakarmā pitāmahārādhanasaṁcitāstraḥ॥

‘बेटा! तुमने ब्रह्माजी की आराधना करके अनेक प्रकार के अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है। तुम अस्त्रवेत्ता, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ तथा देवताओं और असुरों को भी शोक प्रदान करनेवाले हो। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं के समुदाय में तुम्हारा पराक्रम देखा गया है

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॥ ५ · ४८ · ३ ॥
त्वदस्त्रबलमासाद्य ससुराः समरुद्गणाः। शेकुः समरे स्थातुं सुरेश्वरसमाश्रिताः॥

tvadastrabalamāsādya sasurāḥ samarudgaṇāḥ।
na śekuḥ samare sthātuṁ sureśvarasamāśritāḥ॥

‘इन्द्र के आश्रय में रहनेवाले देवता और मरुद्गण भी समरभूमि में तुम्हारे अस्त्र-बल का सामना होने पर टिक नहीं सके हैं

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॥ ५ · ४८ · ४ ॥
कश्चित् त्रिषु लोकेषु संयुगे गतश्रमः। भुजवीर्याभिगुप्तश्च तपसा चाभिरक्षितः। देशकालप्रधानश्च त्वमेव मतिसत्तमः॥

na kaścit triṣu lokeṣu saṁyuge na gataśramaḥ।
bhujavīryābhiguptaśca tapasā cābhirakṣitaḥ।
deśakālapradhānaśca tvameva matisattamaḥ॥

‘तीनों लोकों में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो युद्ध से थकता न हो। तुम अपने बाहुबल से तो सुरक्षित हो ही, तपस्या के बल से भी पूर्णतः निरापद हो। देश-काल का ज्ञान रखनेवालों में प्रधान और बुद्धि की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ तुम्हीं हो

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॥ ५ · ४८ · ५ ॥
तेऽस्त्यशक्यं समरेषु कर्मणां तेऽस्त्यकार्यं मतिपूर्वमन्त्रणे। सोऽस्ति कश्चित् त्रिषु संग्रहेषु वेद यस्तेऽस्त्रबलं बलं च॥

na te'styaśakyaṁ samareṣu karmaṇāṁ na te'styakāryaṁ matipūrvamantraṇe।
na so'sti kaścit triṣu saṁgraheṣu na veda yaste'strabalaṁ balaṁ ca॥

‘युद्ध में तुम्हारे वीरोचित कर्मों के द्वारा कुछ भी असाध्य नहीं है। शास्त्रानुकूल बुद्धिपूर्वक राजकार्य का विचार करते समय तुम्हारे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। तुम्हारा कोई भी विचार ऐसा नहीं होता, जो कार्य का साधक न हो। त्रिलोकी में एक भी ऐसा वीर नहीं है, जो तुम्हारी शारीरिक शक्ति और अस्त्र-बल को न जानता हो

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॥ ५ · ४८ · ६ ॥
ममानुरूपं तपसो बलं ते पराक्रमश्चास्त्रबलं संयुगे। त्वां समासाद्य रणावमर्दे मनः श्रमं गच्छति निश्चितार्थम्॥

mamānurūpaṁ tapaso balaṁ ca te parākramaścāstrabalaṁ ca saṁyuge।
na tvāṁ samāsādya raṇāvamarde manaḥ śramaṁ gacchati niścitārtham॥

‘तुम्हारा तपोबल, युद्धविषयक पराक्रम और अस्त्र-बल मेरे ही समान है। युद्धस्थल में तुमको पाकर मेरा मन कभी खेद या विषाद को नहीं प्राप्त होता; क्योंकि इसे यह निश्चित विश्वास रहता है कि विजय तुम्हारे पक्ष में होगी

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॥ ५ · ४८ · ७ ॥
निहताः किंकराः सर्वे जम्बुमाली राक्षसः। अमात्यपुत्रा वीराश्च पञ्च सेनाग्रगामिनः॥

nihatāḥ kiṁkarāḥ sarve jambumālī ca rākṣasaḥ।
amātyaputrā vīrāśca pañca senāgragāminaḥ॥

‘देखो, किंकर नामवाले समस्त राक्षस मार डाले गये। जम्बुमाली नाम का राक्षस भी जीवित न रह सका, मन्त्री के सातों वीर पुत्र तथा मेरे पाँच सेनापति भी काल के गाल में चले गये

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॥ ५ · ४८ · ८ ॥
बलानि सुसमृद्धानि साश्वनागरथानि च। सहोदरस्ते दयितः कुमारोऽक्षश्च सूदितः। तु तेष्वेव मे सारो यस्त्वय्यरिनिषूदन॥

balāni susamṛddhāni sāśvanāgarathāni ca।
sahodaraste dayitaḥ kumāro'kṣaśca sūditaḥ।
na tu teṣveva me sāro yastvayyariniṣūdana॥

‘उनके साथ ही हाथी, घोड़े और रथोंसहित मेरी बहुत-सी बल-वीर्य से सम्पन्न सेनाएँ भी नष्ट हो गयीं और तुम्हारा प्रिय बन्धु कुमार अक्ष भी मार डाला गया। शत्रुसूदन! मुझमें जो तीनों लोकों पर विजय पाने की शक्ति है, वह तुम्हींमें है। पहले जो लोग मारे गये हैं, उनमें वह शक्ति नहीं थी (इसलिये तुम्हारी विजय निश्चित है)

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॥ ५ · ४८ · ९ ॥
इदं दृष्ट्वा निहतं महद् बलं कपेः प्रभावं पराक्रमं च। त्वमात्मनश्चापि निरीक्ष्य सारं कुरुष्व वेगं स्वबलानुरूपम्॥

idaṁ ca dṛṣṭvā nihataṁ mahad balaṁ kapeḥ prabhāvaṁ ca parākramaṁ ca।
tvamātmanaścāpi nirīkṣya sāraṁ kuruṣva vegaṁ svabalānurūpam॥

‘इस प्रकार अपनी विशाल सेना का संहार और उस वानर का प्रभाव एवं पराक्रम देखकर तुम अपने बल का भी विचार कर लो; फिर अपनी शक्ति के अनुसार उद्योग करो

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॥ ५ · ४८ · १० ॥
बलावमर्दस्त्वयि संनिकृष्टे यथा गते शाम्यति शान्तशत्रौ। तथा समीक्ष्यात्मबलं परं समारभस्वास्त्रभृतां वरिष्ठ॥

balāvamardastvayi saṁnikṛṣṭe yathā gate śāmyati śāntaśatrau।
tathā samīkṣyātmabalaṁ paraṁ ca samārabhasvāstrabhṛtāṁ variṣṭha॥

‘शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वीर! तुम्हारे सब शत्रु शान्त हो चुके हैं। तुम अपने और पराये बल का विचार करके ऐसा प्रयत्न करो, जिससे युद्धभूमि के निकट तुम्हारे पहुँचते ही मेरी सेना का विनाश रुक जाय

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॥ ५ · ४८ · ११ ॥
वीर सेना गणशो च्यवन्ति वज्रमादाय विशालसारम्। मारुतस्यास्ति गतिप्रमाणं चाग्निकल्पः करणेन हन्तुम्॥

na vīra senā gaṇaśo cyavanti na vajramādāya viśālasāram।
na mārutasyāsti gatipramāṇaṁ na cāgnikalpaḥ karaṇena hantum॥

‘वीरवर! तुम्हें अपने साथ सेना नहीं ले जानी चाहिये; क्योंकि वे सेनाएँ समूह-की-समूह या तो भाग जाती हैं या मारी जाती हैं। इसी तरह अधिक तीक्ष्णता और कठोरता से युक्त वज्र लेकर भी जाने की कोई आवश्यकता नहीं है (क्योंकि उसके ऊपर वह भी व्यर्थ सिद्ध हो चुका है)। उस वायुपुत्र हनुमान् की गति अथवा शक्ति का कोई माप-तौल या सीमा नहीं है। वह अग्नि-तुल्य तेजस्वी वानर किसी साधनविशेष से नहीं मारा जा सकता

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॥ ५ · ४८ · १२ ॥
तमेवमर्थं प्रसमीक्ष्य सम्यक् स्वकर्मसाम्याद्धि समाहितात्मा। स्मरंश्च दिव्यं धनुषोऽस्य वीर्यं व्रजाक्षतं कर्म समारभस्व॥

tamevamarthaṁ prasamīkṣya samyak svakarmasāmyāddhi samāhitātmā।
smaraṁśca divyaṁ dhanuṣo'sya vīryaṁ vrajākṣataṁ karma samārabhasva॥

‘इन सब बातों का अच्छी तरह विचार करके प्रतिपक्षी में अपने समान ही पराक्रम समझकर तुम अपने चित्त को एकाग्र कर लो—सावधान हो जाओ। अपने इस धनुष के दिव्य प्रभाव को याद रखते हुए आगे बढ़ो और ऐसा पराक्रम करके दिखाओ, जो खाली न जाय

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॥ ५ · ४८ · १३ ॥
खल्वियं मतिश्रेष्ठ यत्त्वां सम्प्रेषयाम्यहम्। इयं राजधर्माणां क्षत्रस्य मतिर्मता॥

na khalviyaṁ matiśreṣṭha yattvāṁ sampreṣayāmyaham।
iyaṁ ca rājadharmāṇāṁ kṣatrasya ca matirmatā॥

‘उत्तम बुद्धिवाले वीर! मैं तुम्हें जो ऐसे संकट में भेज रहा हूँ, यह यद्यपि (स्नेह की दृष्टि से) उचित नहीं है, तथापि मेरा यह विचार राजनीति और क्षत्रिय-धर्म के अनुकूल है

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॥ ५ · ४८ · १४ ॥
नानाशस्त्रेषु संग्रामे वैशारद्यमरिंदम। अवश्यमेव बोद्धव्यं काम्यश्च विजयो रणे॥

nānāśastreṣu saṁgrāme vaiśāradyamariṁdama।
avaśyameva boddhavyaṁ kāmyaśca vijayo raṇe॥

‘शत्रुदमन! वीर पुरुष को संग्राम में नाना प्रकार के शस्त्रों की कुशलता अवश्य प्राप्त करनी चाहिये, साथ ही युद्ध में विजय पाने की भी अभिलाषा रखनी चाहिये’

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॥ ५ · ४८ · १५ ॥
ततः पितुस्तद्वचनं निशम्य प्रदक्षिणं दक्षसुतप्रभावः। चकार भर्तारमतित्वरेण रणाय वीरः प्रतिपन्नबुद्धिः॥

tataḥ pitustadvacanaṁ niśamya pradakṣiṇaṁ dakṣasutaprabhāvaḥ।
cakāra bhartāramatitvareṇa raṇāya vīraḥ pratipannabuddhiḥ॥

अपने पिता राक्षसराज रावण के इस वचन को सुनकर देवताओं के समान प्रभावशाली वीर मेघनाद ने युद्ध के लिये निश्चित विचार करके जल्दी से अपने स्वामी रावण की परिक्रमा की

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॥ ५ · ४८ · १६ ॥
ततस्तैः स्वगणैरिष्टैरिन्द्रजित् प्रतिपूजितः। युद्धोद्धतकृतोत्साहः संग्रामं सम्प्रपद्यत॥

tatastaiḥ svagaṇairiṣṭairindrajit pratipūjitaḥ।
yuddhoddhatakṛtotsāhaḥ saṁgrāmaṁ samprapadyata॥

तत्पश्चात् सभा में बैठे हुए अपने दल के प्रिय राक्षसोंद्वारा भूरि-भूरि प्रशंसित हो इन्द्रजित् विकट युद्ध के लिये मन में उत्साह भरकर संग्रामभूमि की ओर जाने को उद्यत हुआ

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॥ ५ · ४८ · १७ ॥
श्रीमान् पद्मविशालाक्षो राक्षसाधिपतेः सुतः। निर्जगाम महातेजाः समुद्र इव पर्वणि॥

śrīmān padmaviśālākṣo rākṣasādhipateḥ sutaḥ।
nirjagāma mahātejāḥ samudra iva parvaṇi॥

उस समय प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल नेत्रोंवाला राक्षसराज रावण का पुत्र महातेजस्वी श्रीमान् इन्द्रजित् पर्व के दिन उमड़े हुए समुद्र के समान विशेष हर्ष और उत्साह से पूर्ण हो राजमहल से बाहर निकला

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॥ ५ · ४८ · १८ ॥
पक्षिराजोपमतुल्यवेगैर्व्यग्रैश्चतुर्भिः तु तीक्ष्णदंष्ट्रैः। रथं समायुक्तमसह्यवेगः समारुरोहेन्द्रजिदिन्द्रकल्पः॥

sa pakṣirājopamatulyavegairvyagraiścaturbhiḥ sa tu tīkṣṇadaṁṣṭraiḥ।
rathaṁ samāyuktamasahyavegaḥ samārurohendrajidindrakalpaḥ॥

जिसका वेग शत्रुओं के लिये असह्य था, वह इन्द्र के समान पराक्रमी मेघनाद पक्षिराज गरुड़ के समान तीव्र गति तथा तीखे दाढ़ोंवाले चार सिंहों से जुते हुए उत्तम रथ पर आरूढ़ हुआ

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॥ ५ · ४८ · १९ ॥
रथी धन्विनां श्रेष्ठः शस्त्रज्ञोऽस्त्रविदां वरः। रथेनाभिययौ क्षिप्रं हनूमान् यत्र सोऽभवत्॥

sa rathī dhanvināṁ śreṣṭhaḥ śastrajño'stravidāṁ varaḥ।
rathenābhiyayau kṣipraṁ hanūmān yatra so'bhavat॥

अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता, अस्त्रवेत्ताओं में अग्रगण्य और धनुर्धरों में श्रेष्ठ वह रथी वीर रथ के द्वारा शीघ्र उस स्थान पर गया, जहाँ हनुमान्जी उसकी प्रतीक्षा में बैठे थे

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॥ ५ · ४८ · २० ॥
तस्य रथनिर्घोषं ज्यास्वनं कार्मुकस्य च। निशम्य हरिवीरोऽसौ सम्प्रहृष्टतरोऽभवत्॥

sa tasya rathanirghoṣaṁ jyāsvanaṁ kārmukasya ca।
niśamya harivīro'sau samprahṛṣṭataro'bhavat॥

उसके रथ की घर्घराहट और धनुष की प्रत्यञ्चा का गम्भीर घोष सुनकर वानरवीर हनुमान्जी अत्यन्त हर्ष और उत्साह से भर गये

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॥ ५ · ४८ · २१ ॥
इन्द्रजिच्चापमादाय शितशल्यांश्च सायकान्। हनूमन्तमभिप्रेत्य जगाम रणपण्डितः॥

indrajiccāpamādāya śitaśalyāṁśca sāyakān।
hanūmantamabhipretya jagāma raṇapaṇḍitaḥ॥

इन्द्रजित् युद्ध की कला में प्रवीण था। वह धनुष और तीखे अग्रभागवाले सायकों को लेकर हनुमान्जी को लक्ष्य करके आगे बढ़ा

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॥ ५ · ४८ · २२ ॥
तस्मिंस्ततः संयति जातहर्षे रणाय निर्गच्छति बाणपाणौ। दिशश्च सर्वाः कलुषा बभूवुर्मृगाश्च रौद्रा बहुधा विनेदुः॥

tasmiṁstataḥ saṁyati jātaharṣe raṇāya nirgacchati bāṇapāṇau।
diśaśca sarvāḥ kaluṣā babhūvurmṛgāśca raudrā bahudhā vineduḥ॥

हृदय में हर्ष और उत्साह तथा हाथों में बाण लेकर वह ज्यों ही युद्ध के लिये निकला, त्यों ही सम्पूर्ण दिशाएँ मलिन हो गयीं और भयानक पशु नाना प्रकार से आर्तनाद करने लगे

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॥ ५ · ४८ · २३ ॥
समागतास्तत्र तु नागयक्षा महर्षयश्चक्रचराश्च सिद्धाः। नभः समावृत्य पक्षिसङ्घा विनेदुरुच्चैः परमप्रहृष्टाः॥

samāgatāstatra tu nāgayakṣā maharṣayaścakracarāśca siddhāḥ।
nabhaḥ samāvṛtya ca pakṣisaṅghā vineduruccaiḥ paramaprahṛṣṭāḥ॥

उस समय वहाँ नाग, यक्ष, महर्षि और नक्षत्र-मण्डल में विचरनेवाले सिद्धगण भी आ गये। साथ ही पक्षियों के समुदाय भी आकाश को आच्छादित करके अत्यन्त हर्ष में भरकर उच्च स्वर से चहचहाने लगे

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॥ ५ · ४८ · २४ ॥
आयान्तं रथं दृष्ट्वा तूर्णमिन्द्रध्वजं कपिः। ननाद महानादं व्यवर्धत वेगवान्॥

āyāntaṁ sa rathaṁ dṛṣṭvā tūrṇamindradhvajaṁ kapiḥ।
nanāda ca mahānādaṁ vyavardhata ca vegavān॥

इन्द्राकार चिह्नवाली ध्वजा से सुशोभित रथ पर बैठकर शीघ्रतापूर्वक आते हुए मेघनाद को देखकर वेगशाली वानर-वीर हनुमान् ने बड़े जोर से गर्जना की और अपने शरीर को बढ़ाया

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॥ ५ · ४८ · २५ ॥
इन्द्रजित् रथं दिव्यमाश्रितश्चित्रकार्मुकः। धनुर्विस्फारयामास तडिदूर्जितनिःस्वनम्॥

indrajit sa rathaṁ divyamāśritaścitrakārmukaḥ।
dhanurvisphārayāmāsa taḍidūrjitaniḥsvanam॥

उस दिव्य रथ पर बैठकर विचित्र धनुष धारण करनेवाले इन्द्रजित् ने बिजली की गड़गड़ाहट के समान टंकार करनेवाले अपने धनुष को खींचा

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॥ ५ · ४८ · २६ ॥
ततः समेतावतितीक्ष्णवेगौ महाबलौ तौ रणनिर्विशङ्कौ। कपिश्च रक्षोऽधिपतेस्तनूजः सुरासुरेन्द्राविव बद्धवैरौ॥

tataḥ sametāvatitīkṣṇavegau mahābalau tau raṇanirviśaṅkau।
kapiśca rakṣo'dhipatestanūjaḥ surāsurendrāviva baddhavairau॥

फिर तो अत्यन्त दुःसह वेग और महान् बल से सम्पन्न हो युद्ध में निर्भय होकर आगे बढ़नेवाले वे दोनों वीर कपिवर हनुमान् तथा राक्षसराजकुमार मेघनाद परस्पर वैर बाँधकर देवराज इन्द्र और दैत्यराज बलि की भाँति एक-दूसरे से भिड़ गये

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॥ ५ · ४८ · २७ ॥
तस्य वीरस्य महारथस्य धनुष्मतः संयति सम्मतस्य। शरप्रवेगं व्यहनत् प्रवृद्धश्चार मार्गे पितुरप्रमेयः॥

sa tasya vīrasya mahārathasya dhanuṣmataḥ saṁyati sammatasya।
śarapravegaṁ vyahanat pravṛddhaścāra mārge pituraprameyaḥ॥

अप्रमेय शक्तिशाली हनुमान्जी विशाल शरीर धारण करके अपने पिता वायु के मार्ग पर विचरने और युद्ध में सम्मानित होनेवाले उस धनुर्धर महारथी राक्षसवीर के बाणों के महान् वेग को व्यर्थ करने लगे

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॥ ५ · ४८ · २८ ॥
ततः शरानायततीक्ष्णशल्यान् सुपत्रिणः काञ्चनचित्रपुङ्खान्। मुमोच वीरः परवीरहन्ता सुसंततान् वज्रसमानवेगान्॥

tataḥ śarānāyatatīkṣṇaśalyān supatriṇaḥ kāñcanacitrapuṅkhān।
mumoca vīraḥ paravīrahantā susaṁtatān vajrasamānavegān॥

इतनेहीमें शत्रुवीरों का संहार करनेवाले इन्द्रजित् ने बड़ी और तीखी नोक तथा सुन्दर परोंवाले, सोने की विचित्र पंखों से सुशोभित और वज्र के समान वेगशाली बाणों को लगातार छोड़ना आरम्भ किया

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॥ ५ · ४८ · २९ ॥
ततः तत्स्यन्दननिःस्वनं मृदङ्गभेरीपटहस्वनं च। विकृष्यमाणस्य कार्मुकस्य निशम्य घोषं पुनरुत्पपात॥

tataḥ sa tatsyandananiḥsvanaṁ ca mṛdaṅgabherīpaṭahasvanaṁ ca।
vikṛṣyamāṇasya ca kārmukasya niśamya ghoṣaṁ punarutpapāta॥

उस समय उसके रथ की घर्घराहट, मृदङ्ग, भेरी और पटह आदि बाजों के शब्द एवं खींचे जाते हुए धनुष की टंकार सुनकर हनुमान्जी फिर ऊपर की ओर उछले

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॥ ५ · ४८ · ३० ॥
शराणामन्तरेष्वाशु व्यावर्तत महाकपिः। हरिस्तस्याभिलक्ष्यस्य मोक्षयँल्लक्ष्यसंग्रहम्॥

śarāṇāmantareṣvāśu vyāvartata mahākapiḥ।
haristasyābhilakṣyasya mokṣayam̐llakṣyasaṁgraham॥

ऊपर जाकर वे महाकपि वानरवीर लक्ष्य बेधने में प्रसिद्ध मेघनाद के साधे हुए निशाने को व्यर्थ करते हुए उसके छोड़े हुए बाणों के बीच से शीघ्रतापूर्वक निकलकर अपने को बचाने लगे

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॥ ५ · ४८ · ३१ ॥
शराणामग्रतस्तस्य पुनः समभिवर्तत। प्रसार्य हस्तौ हनुमानुत्पपातानिलात्मजः॥

śarāṇāmagratastasya punaḥ samabhivartata।
prasārya hastau hanumānutpapātānilātmajaḥ॥

वे पवनकुमार हनुमान् बारंबार उसके बाणों के सामने आकर खड़े हो जाते और फिर दोनों हाथ फैलाकर बात-की-बात में उड़ जाते थे

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॥ ५ · ४८ · ३२ ॥
तावुभौ वेगसम्पन्नौ रणकर्मविशारदौ। सर्वभूतमनोग्राहि चक्रतुर्युद्धमुत्तमम्॥

tāvubhau vegasampannau raṇakarmaviśāradau।
sarvabhūtamanogrāhi cakraturyuddhamuttamam॥

वे दोनों वीर महान् वेग से सम्पन्न तथा युद्ध करने की कला में चतुर थे। वे सम्पूर्ण भूतों के चित्त को आकर्षित करनेवाला उत्तम युद्ध करने लगे

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॥ ५ · ४८ · ३३ ॥
हनूमतो वेद राक्षसोऽन्तरं मारुतिस्तस्य महात्मनोऽन्तरम्। परस्परं निर्विषहौ बभूवतुः समेत्य तौ देवसमानविक्रमौ॥

hanūmato veda na rākṣaso'ntaraṁ na mārutistasya mahātmano'ntaram।
parasparaṁ nirviṣahau babhūvatuḥ sametya tau devasamānavikramau॥

वह राक्षस हनुमान्जी पर प्रहार करने का अवसर नहीं पाता था और पवनकुमार हनुमान्जी भी उस महामनस्वी वीर को धर दबाने का मौका नहीं पाते थे। देवताओं के समान पराक्रमी वे दोनों वीर परस्पर भिड़कर एक-दूसरे के लिये दुःसह हो उठे थे

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॥ ५ · ४८ · ३४ ॥
ततस्तु लक्ष्ये विहन्यमाने शरेष्वमोघेषु सम्पतत्सु। जगाम चिन्तां महतीं महात्मा समाधिसंयोगसमाहितात्मा॥

tatastu lakṣye sa vihanyamāne śareṣvamogheṣu ca sampatatsu।
jagāma cintāṁ mahatīṁ mahātmā samādhisaṁyogasamāhitātmā॥

लक्ष्यवेध के लिये चलाये हुए मेघनाद के वे अमोघ बाण भी जब व्यर्थ होकर गिर पड़े, तब लक्ष्य पर बाणों का संधान करने में सदा एकाग्रचित्त रहनेवाले उस महामनस्वी वीर को बड़ी चिन्ता हुई

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॥ ५ · ४८ · ३५ ॥
ततो मतिं राक्षसराजसूनुश्चकार तस्मिन् हरिवीरमुख्ये। अवध्यतां तस्य कपेः समीक्ष्य कथं निगच्छेदिति निग्रहार्थम्॥

tato matiṁ rākṣasarājasūnuścakāra tasmin harivīramukhye।
avadhyatāṁ tasya kapeḥ samīkṣya kathaṁ nigacchediti nigrahārtham॥

उन कपिश्रेष्ठ को अवध्य समझकर राक्षसराजकुमार मेघनाद वानरवीरों में प्रमुख हनुमान्जी के विषय में यह विचार करने लगा कि ‘इन्हें किसी तरह कैद कर लेना चाहिये, परंतु ये मेरी पकड़ में आ कैसे सकते हैं?’

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॥ ५ · ४८ · ३६ ॥
ततः पैतामहं वीरः सोऽस्त्रमस्त्रविदां वरः। संदधे सुमहातेजास्तं हरिप्रवरं प्रति॥

tataḥ paitāmahaṁ vīraḥ so'stramastravidāṁ varaḥ।
saṁdadhe sumahātejāstaṁ haripravaraṁ prati॥

फिर तो अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ उस महातेजस्वी वीर ने उन कपिश्रेष्ठ को लक्ष्य करके अपने धनुष पर ब्रह्माजी के दिये हुए अस्त्र का संधान किया

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॥ ५ · ४८ · ३७ ॥
अवध्योऽयमिति ज्ञात्वा तमस्त्रेणास्त्रतत्त्ववित्। निजग्राह महाबाहुं मारुतात्मजमिन्द्रजित्॥

avadhyo'yamiti jñātvā tamastreṇāstratattvavit।
nijagrāha mahābāhuṁ mārutātmajamindrajit॥

अस्त्रतत्त्व के ज्ञाता इन्द्रजित् ने महाबाहु पवनकुमार को अवध्य जानकर उन्हें उस अस्त्र से बाँध लिया

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॥ ५ · ४८ · ३८ ॥
तेन बद्धस्ततोऽस्त्रेण राक्षसेन वानरः। अभवन्निर्विचेष्टश्च पपात महीतले॥

tena baddhastato'streṇa rākṣasena sa vānaraḥ।
abhavannirviceṣṭaśca papāta ca mahītale॥

राक्षसद्वारा उस अस्त्र से बाँध लिये जाने पर वानरवीर हनुमान्जी निश्चेष्ट होकर पृथ्वी पर गिर पड़े

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॥ ५ · ४८ · ३९ ॥
ततोऽथ बुद्ध्वा तदस्त्रबन्धं प्रभोः प्रभावाद् विगताल्पवेगः। पितामहानुग्रहमात्मनश्च विचिन्तयामास हरिप्रवीरः॥

tato'tha buddhvā sa tadastrabandhaṁ prabhoḥ prabhāvād vigatālpavegaḥ।
pitāmahānugrahamātmanaśca vicintayāmāsa haripravīraḥ॥

अपने को ब्रह्मास्त्र से बँधा हुआ जानकर भी उन्हीं भगवान् ब्रह्मा के प्रभाव से हनुमान्जी को थोड़ी-सी भी पीड़ा का अनुभव नहीं हुआ। वे प्रमुख वानरवीर अपने ऊपर ब्रह्माजी के महान् अनुग्रह का विचार करने लगे

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॥ ५ · ४८ · ४० ॥
ततः स्वायम्भुवैर्मन्त्रैर्ब्रह्मास्त्रं चाभिमन्त्रितम्। हनूमांश्चिन्तयामास वरदानं पितामहात्॥

tataḥ svāyambhuvairmantrairbrahmāstraṁ cābhimantritam।
hanūmāṁścintayāmāsa varadānaṁ pitāmahāt॥

जिन मन्त्रों के देवता साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्मा हैं, उनसे अभिमन्त्रित हुए उस ब्रह्मास्त्र को देखकर हनुमान्जी को पितामह ब्रह्मा से अपने लिये मिले हुए वरदान का स्मरण हो आया (ब्रह्माजी ने उन्हें वर दिया था कि मेरा अस्त्र तुम्हें एक ही मुहूर्त में अपने बन्धन से मुक्त कर देगा)

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॥ ५ · ४८ · ४१ ॥
मेऽस्य बन्धस्य शक्तिरस्ति विमोक्षणे लोकगुरोः प्रभावात्। इत्येवमेवं विहितोऽस्त्रबन्धो मयाऽऽत्मयोनेरनुवर्तितव्यः॥

na me'sya bandhasya ca śaktirasti vimokṣaṇe lokaguroḥ prabhāvāt।
ityevamevaṁ vihito'strabandho mayā''tmayoneranuvartitavyaḥ॥

फिर वे सोचने लगे ‘लोकगुरु ब्रह्मा के प्रभाव से मुझमें इस अस्त्र के बन्धन से छुटकारा पाने की शक्ति नहीं है—ऐसा मानकर ही इन्द्रजित् ने मुझे इस प्रकार बाँधा है, तथापि मुझे भगवान् ब्रह्मा के सम्मानार्थ इस अस्त्रबन्धन का अनुसरण करना चाहिये’

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॥ ५ · ४८ · ४२ ॥
वीर्यमस्त्रस्य कपिर्विचार्य पितामहानुग्रहमात्मनश्च। विमोक्षशक्तिं परिचिन्तयित्वा पितामहाज्ञामनुवर्तते स्म॥

sa vīryamastrasya kapirvicārya pitāmahānugrahamātmanaśca।
vimokṣaśaktiṁ paricintayitvā pitāmahājñāmanuvartate sma॥

कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी ने उस अस्त्र की शक्ति, अपने ऊपर पितामह की कृपा तथा अपने में उसके बन्धन से छूट जाने की सामर्थ्य—इन तीनों पर विचार करके अन्त में ब्रह्माजी की आज्ञा का ही अनुसरण किया

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॥ ५ · ४८ · ४३ ॥
अस्त्रेणापि हि बद्धस्य भयं मम जायते। पितामहमहेन्द्राभ्यां रक्षितस्यानिलेन च॥

astreṇāpi hi baddhasya bhayaṁ mama na jāyate।
pitāmahamahendrābhyāṁ rakṣitasyānilena ca॥

उनके मन में यह बात आयी कि ‘इस अस्त्र से बँध जाने पर भी मुझे कोई भय नहीं है; क्योंकि ब्रह्मा, इन्द्र और वायुदेवता तीनों मेरी रक्षा करते हैं

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॥ ५ · ४८ · ४४ ॥
ग्रहणे चापि रक्षोभिर्महन्मे गुणदर्शनम्। राक्षसेन्द्रेण संवादस्तस्माद् गृह्णन्तु मां परे॥

grahaṇe cāpi rakṣobhirmahanme guṇadarśanam।
rākṣasendreṇa saṁvādastasmād gṛhṇantu māṁ pare॥

‘राक्षसोंद्वारा पकड़े जाने में भी मुझे महान् लाभ ही दिखायी देता है; क्योंकि इससे मुझे राक्षसराज रावण के साथ बातचीत करने का अवसर मिलेगा। अतः शत्रु मुझे पकड़कर ले चलें’

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॥ ५ · ४८ · ४५ ॥
निश्चितार्थः परवीरहन्ता समीक्ष्यकारी विनिवृत्तचेष्टः। परैः प्रसह्याभिगतैर्निगृह्य ननाद तैस्तैः परिभर्त्स्यमानः॥

sa niścitārthaḥ paravīrahantā samīkṣyakārī vinivṛttaceṣṭaḥ।
paraiḥ prasahyābhigatairnigṛhya nanāda taistaiḥ paribhartsyamānaḥ॥

ऐसा निश्चय करके विचारपूर्वक कार्य करनेवाले शत्रुवीरों के संहारक हनुमान्जी निश्चेष्ट हो गये। फिर तो सभी शत्रु निकट आकर उन्हें बलपूर्वक पकड़ने और डाँट बताने लगे। उस समय हनुमान्जी, मानो कष्ट पा रहे हों, इस प्रकार चीखते और कटकटाते थे

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॥ ५ · ४८ · ४६ ॥
ततस्ते राक्षसा दृष्ट्वा विनिश्चेष्टमरिंदमम्। बबन्धुः शणवल्कैश्च द्रुमचीरैश्च संहतैः॥

tataste rākṣasā dṛṣṭvā viniśceṣṭamariṁdamam।
babandhuḥ śaṇavalkaiśca drumacīraiśca saṁhataiḥ॥

तब वे शत्रुहन्ता हनुमान्जी को सुतरी और वृक्षों के वल्कल को बटकर बनाये गये रस्सों से बाँधने लगे

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॥ ५ · ४८ · ४७ ॥
रोचयामास परैश्च बन्धं प्रसह्य वीरैरभिगर्हणं च। कौतूहलान्मां यदि राक्षसेन्द्रो द्रष्टुं व्यवस्येदिति निश्चितार्थः॥

sa rocayāmāsa paraiśca bandhaṁ prasahya vīrairabhigarhaṇaṁ ca।
kautūhalānmāṁ yadi rākṣasendro draṣṭuṁ vyavasyediti niścitārthaḥ॥

शत्रुवीरों ने जो उन्हें हठपूर्वक बाँधा और उनका तिरस्कार किया, यह सब कुछ उस समय उन्हें अच्छा लगा। उनके मन में यह निश्चित विचार हो गया था कि ऐसी अवस्था में राक्षसराज रावण सम्भवतः कौतूहलवश मुझे देखने की इच्छा करेगा (इसीलिये वे सब कुछ सह रहे थे)

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॥ ५ · ४८ · ४८ ॥
बद्धस्तेन वल्केन विमुक्तोऽस्त्रेण वीर्यवान्। अस्त्रबन्धः चान्यं हि बन्धमनुवर्तते॥

sa baddhastena valkena vimukto'streṇa vīryavān।
astrabandhaḥ sa cānyaṁ hi na bandhamanuvartate॥

वल्कल के रस्से से बँध जाने पर पराक्रमी हनुमान् ब्रह्मास्त्र के बन्धन से मुक्त हो गये; क्योंकि उस अस्त्र का बन्धन किसी दूसरे बन्धन के साथ नहीं रहता

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॥ ५ · ४८ · ४९ ॥
अथेन्द्रजित् तं द्रुमचीरबद्धं विचार्य वीरः कपिसत्तमं तम्। विमुक्तमस्त्रेण जगाम चिन्तामन्येन बद्धोऽप्यनुवर्ततेऽस्त्रम्॥

athendrajit taṁ drumacīrabaddhaṁ vicārya vīraḥ kapisattamaṁ tam।
vimuktamastreṇa jagāma cintāmanyena baddho'pyanuvartate'stram॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ४८ · ५० ॥
अहो महत् कर्म कृतं निरर्थं राक्षसैर्मन्त्रगतिर्विमृष्टा। पुनश्च नास्त्रे विहतेऽस्त्रमन्यत् प्रवर्तते संशयिताः स्म सर्वे॥

aho mahat karma kṛtaṁ nirarthaṁ na rākṣasairmantragatirvimṛṣṭā।
punaśca nāstre vihate'stramanyat pravartate saṁśayitāḥ sma sarve॥

॥ ४९–५० ॥

वीर इन्द्रजित् ने जब देखा कि यह वानरशिरोमणि तो केवल वृक्षों के वल्कल से बँधा है, दिव्यास्त्र के बन्धन से मुक्त हो चुका है, तब उसे बड़ी चिन्ता हुई। वह सोचने लगा—‘दूसरी वस्तुओं से बँधा हुआ होने पर भी यह अस्त्र-बन्धन में बँधे हुए की भाँति बर्ताव कर रहा है। ओह! इन राक्षसों ने मेरा किया हुआ बहुत बड़ा काम चौपट कर दिया। इन्होंने मन्त्र की शक्ति पर विचार नहीं किया। यह अस्त्र जब एक बार व्यर्थ हो जाता है, तब पुनः दूसरी बार इसका प्रयोग नहीं हो सकता। अब तो विजयी होकर भी हम सब लोग संशय में पड़ गये

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॥ ५ · ४८ · ५१ ॥
अस्त्रेण हनुमान् मुक्तो नात्मानमवबुध्यते। कृष्यमाणस्तु रक्षोभिस्तैश्च बन्धैर्निपीडितः॥

astreṇa hanumān mukto nātmānamavabudhyate।
kṛṣyamāṇastu rakṣobhistaiśca bandhairnipīḍitaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ४८ · ५२ ॥
हन्यमानस्ततः क्रूरै राक्षसैः कालमुष्टिभिः। समीपं राक्षसेन्द्रस्य प्राकृष्यत वानरः॥

hanyamānastataḥ krūrai rākṣasaiḥ kālamuṣṭibhiḥ।
samīpaṁ rākṣasendrasya prākṛṣyata sa vānaraḥ॥

॥ ५१–५२ ॥

हनुमान्जी यद्यपि अस्त्र के बन्धन से मुक्त हो गये थे तो भी उन्होंने ऐसा बर्ताव किया, मानो वे इस बात को जानते ही न हों। क्रूर राक्षस उन्हें बन्धनों से पीड़ा देते और कठोर मुक्कों से मारते हुए खींचकर ले चले। इस तरह वे वानरवीर राक्षसराज रावण के पास पहुँचाये गये

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॥ ५ · ४८ · ५३ ॥
अथेन्द्रजित् तं प्रसमीक्ष्य मुक्तमस्त्रेण बद्धं द्रुमचीरसूत्रैः। व्यदर्शयत् तत्र महाबलं तं हरिप्रवीरं सगणाय राज्ञे॥

athendrajit taṁ prasamīkṣya muktamastreṇa baddhaṁ drumacīrasūtraiḥ।
vyadarśayat tatra mahābalaṁ taṁ haripravīraṁ sagaṇāya rājñe॥

तब इन्द्रजित् ने उन महाबली वानरवीर को ब्रह्मास्त्र से मुक्त तथा वृक्ष के वल्कलों की रस्सियों से बँधा देख उन्हें वहाँ सभासद्गणोंसहित राजा रावण को दिखाया

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॥ ५ · ४८ · ५४ ॥
तं मत्तमिव मातङ्गं बद्धं कपिवरोत्तमम्। राक्षसा राक्षसेन्द्राय रावणाय न्यवेदयन्॥

taṁ mattamiva mātaṅgaṁ baddhaṁ kapivarottamam।
rākṣasā rākṣasendrāya rāvaṇāya nyavedayan॥

मतवाले हाथी के समान बँधे हुए उन वानर-शिरोमणि को राक्षसों ने राक्षसराज रावण की सेवा में समर्पित कर दिया

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॥ ५ · ४८ · ५५ ॥
कोऽयं कस्य कुतो वापि किं कार्यं कोऽभ्युपाश्रयः। इति राक्षसवीराणां दृष्ट्वा संजज्ञिरे कथाः॥

ko'yaṁ kasya kuto vāpi kiṁ kāryaṁ ko'bhyupāśrayaḥ।
iti rākṣasavīrāṇāṁ dṛṣṭvā saṁjajñire kathāḥ॥

उन्हें देखकर राक्षसवीर आपस में कहने लगे—‘यह कौन है? किसका पुत्र या सेवक है? कहाँ से आया है? यहाँ इसका क्या काम है? तथा इसे सहारा देनेवाला कौन है?’

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॥ ५ · ४८ · ५६ ॥
हन्यतां दह्यतां वापि भक्ष्यतामिति चापरे। राक्षसास्तत्र संक्रुद्धाः परस्परमथाब्रुवन्॥

hanyatāṁ dahyatāṁ vāpi bhakṣyatāmiti cāpare।
rākṣasāstatra saṁkruddhāḥ parasparamathābruvan॥

कुछ दूसरे राक्षस जो अत्यन्त क्रोध से भरे थे, परस्पर इस प्रकार बोले—‘इस वानर को मार डालो, जला डालो या खा डालो’

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॥ ५ · ४८ · ५७ ॥
अतीत्य मार्गं सहसा महात्मा तत्र रक्षोऽधिपपादमूले। ददर्श राज्ञः परिचारवृद्धान् गृहं महारत्नविभूषितं च॥

atītya mārgaṁ sahasā mahātmā sa tatra rakṣo'dhipapādamūle।
dadarśa rājñaḥ paricāravṛddhān gṛhaṁ mahāratnavibhūṣitaṁ ca॥

महात्मा हनुमान्जी सारा रास्ता तै करके जब सहसा राक्षसराज रावण के पास पहुँच गये, तब उन्होंने उसके चरणों के समीप बहुत-से बड़े-बूढ़े सेवकों को और बहुमूल्य रत्नों से विभूषित सभाभवन को भी देखा

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॥ ५ · ४८ · ५८ ॥
ददर्श महातेजा रावणः कपिसत्तमम्। रक्षोभिर्विकृताकारैः कृष्यमाणमितस्ततः॥

sa dadarśa mahātejā rāvaṇaḥ kapisattamam।
rakṣobhirvikṛtākāraiḥ kṛṣyamāṇamitastataḥ॥

उस समय महातेजस्वी रावण ने विकट आकारवाले राक्षसों के द्वारा इधर-उधर घसीटे जाते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी को देखा

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॥ ५ · ४८ · ५९ ॥
राक्षसाधिपतिं चापि ददर्श कपिसत्तमः। तेजोबलसमायुक्तं तपन्तमिव भास्करम्॥

rākṣasādhipatiṁ cāpi dadarśa kapisattamaḥ।
tejobalasamāyuktaṁ tapantamiva bhāskaram॥

कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने भी राक्षसराज रावण को तपते हुए सूर्य के समान तेज और बल से सम्पन्न देखा

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॥ ५ · ४८ · ६० ॥
रोषसंवर्तितताम्रदृष्टिर्दशाननस्तं कपिमन्ववेक्ष्य। अथोपविष्टान् कुलशीलवृद्धान् समादिशत् तं प्रति मुख्यमन्त्रीन्॥

sa roṣasaṁvartitatāmradṛṣṭirdaśānanastaṁ kapimanvavekṣya।
athopaviṣṭān kulaśīlavṛddhān samādiśat taṁ prati mukhyamantrīn॥

हनुमान्जी को देखकर दशमुख रावण की आँखें रोष से चञ्चल और लाल हो गयीं। उसने वहाँ बैठे हुए कुलीन, सुशील और मुख्य मन्त्रियों को उनसे परिचय पूछने के लिये आज्ञा दी

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॥ ५ · ४८ · ६१ ॥
यथाक्रमं तैः कपिश्च पृष्टः कार्यार्थमर्थस्य मूलमादौ। निवेदयामास हरीश्वरस्य दूतः सकाशादहमागतोऽस्मि॥

yathākramaṁ taiḥ sa kapiśca pṛṣṭaḥ kāryārthamarthasya ca mūlamādau।
nivedayāmāsa harīśvarasya dūtaḥ sakāśādahamāgato'smi॥

उन सबने पहले क्रमशः कपिवर हनुमान् से उनका कार्य, प्रयोजन तथा उसके मूल कारण के विषय में पूछा। तब उन्होंने यह बताया कि ‘मैं वानरराज सुग्रीव के पास से उनका दूत होकर आया हूँ’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः॥ ४८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८ ॥