वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः १३ · ६९ श्लोकाःSarga 13 · 69 ślokas

सीताजीके नाशकी आशंकासे हनुमान्जीकी चिन्ता, श्रीरामको सीताके न मिलनेकी सूचना देनेसे अनर्थकी सम्भावना देख हनुमान्जीका न लौटनेका निश्चय करके पुनः खोजनेका विचार करना और अशोकवाटिकामें ढूँढ़नेके विषयमें तरह-तरहकी बातें सोचना

॥ ५ · १३ · १ ॥
विमानात् तु संक्रम्य प्राकारं हरियूथपः। हनूमान् वेगवानासीद् यथा विद्युद् घनान्तरे॥

vimānāt tu sa saṁkramya prākāraṁ hariyūthapaḥ।
hanūmān vegavānāsīd yathā vidyud ghanāntare॥

वानरयूथपति हनुमान् विमान से उतरकर महल के परकोटे पर चढ़ आये। वहाँ आकर वे मेघमाला के अंक में चमकती हुई बिजली के समान बड़े वेग से इधर-उधर घूमने लगे

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॥ ५ · १३ · २ ॥
सम्परिक्रम्य हनुमान् रावणस्य निवेशनान्। अदृष्ट्वा जानकीं सीतामब्रवीद् वचनं कपिः॥

samparikramya hanumān rāvaṇasya niveśanān।
adṛṣṭvā jānakīṁ sītāmabravīd vacanaṁ kapiḥ॥

रावण के सभी घरों में एक बार पुनः चक्कर लगाकर जब कपिवर हनुमान्जी ने जनकनन्दिनी सीता को नहीं देखा, तब वे मन-ही-मन इस प्रकार कहने लगे—

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॥ ५ · १३ · ३ ॥
भूयिष्ठं लोलिता लंका रामस्य चरता प्रियम्। हि पश्यामि वैदेहीं सीतां सर्वाङ्गशोभनाम्॥

bhūyiṣṭhaṁ lolitā laṁkā rāmasya caratā priyam।
na hi paśyāmi vaidehīṁ sītāṁ sarvāṅgaśobhanām॥

‘मैंने श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने के लिये कई बार लंका को छान डाला; किंतु सर्वाङ्गसुन्दरी विदेहनन्दिनी सीता मुझे कहीं नहीं दिखायी देती हैं

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॥ ५ · १३ · ४ ॥
पल्वलानि तटाकानि सरांसि सरितस्तथा। नद्योऽनूपवनान्ताश्च दुर्गाश्च धरणीधराः॥ लोलिता वसुधा सर्वा पश्यामि जानकीम्।

palvalāni taṭākāni sarāṁsi saritastathā।
nadyo'nūpavanāntāśca durgāśca dharaṇīdharāḥ॥
lolitā vasudhā sarvā na ca paśyāmi jānakīm।

‘मैंने यहाँ के छोटे तालाब, पोखरे, सरोवर, सरिताएँ, नदियाँ, पानी के आस-पास के जंगल तथा दुर्गम पहाड़—सब देख डाले। इस नगर के आस-पास की सारी भूमि खोज डाली; किंतु कहीं भी मुझे जानकीजी का दर्शन नहीं हुआ

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॥ ५ · १३ · ५ ॥
इह सम्पातिना सीता रावणस्य निवेशने। आख्याता गृध्रराजेन सा दृश्यते किम्॥

iha sampātinā sītā rāvaṇasya niveśane।
ākhyātā gṛdhrarājena na ca sā dṛśyate na kim॥

‘गृध्रराज सम्पाति ने तो सीताजी को यहाँ रावण के महल में ही बताया था। फिर भी न जाने क्यों वे यहाँ दिखायी नहीं देती हैं

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॥ ५ · १३ · ६ ॥
किं नु सीताथ वैदेही मैथिली जनकात्मजा। उपतिष्ठेत विवशा रावणेन हृता बलात्॥

kiṁ nu sītātha vaidehī maithilī janakātmajā।
upatiṣṭheta vivaśā rāvaṇena hṛtā balāt॥

‘क्या रावण के द्वारा बलपूर्वक हरकर लायी हुई विदेह-कुलनन्दिनी मिथिलेशकुमारी जनकदुलारी सीता कभी विवश होकर रावण की सेवा में उपस्थित हो सकती हैं (यह असम्भव है)

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॥ ५ · १३ · ७ ॥
क्षिप्रमुत्पततो मन्ये सीतामादाय रक्षसः। बिभ्यतो रामबाणानामन्तरा पतिता भवेत्॥

kṣipramutpatato manye sītāmādāya rakṣasaḥ।
bibhyato rāmabāṇānāmantarā patitā bhavet॥

‘मैं तो समझता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से भयभीत हो वह राक्षस जब सीता को लेकर शीघ्रतापूर्वक आकाश में उछला है, उस समय कहीं बीच में ही वे छूटकर गिर पड़ी हों

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॥ ५ · १३ · ८ ॥
अथवा ह्रियमाणायाः पथि सिद्धनिषेविते। मन्ये पतितमार्याया हृदयं प्रेक्ष्य सागरम्॥

athavā hriyamāṇāyāḥ pathi siddhaniṣevite।
manye patitamāryāyā hṛdayaṁ prekṣya sāgaram॥

‘अथवा यह भी सम्भव है कि जब आर्या सीता सिद्धसेवित आकाशमार्ग से ले जायी जाती रही हों, उस समय समुद्र को देखकर भय के मारे उनका हृदय ही फटकर नीचे गिर पड़ा हो

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॥ ५ · १३ · ९ ॥
रावणस्योरुवेगेन भुजाभ्यां पीडितेन च। तया मन्ये विशालाक्ष्या त्यक्तं जीवितमार्यया॥

rāvaṇasyoruvegena bhujābhyāṁ pīḍitena ca।
tayā manye viśālākṣyā tyaktaṁ jīvitamāryayā॥

‘अथवा यह भी मालूम होता है कि रावण के प्रबल वेग और उसकी भुजाओं के दृढ़ बन्धन से पीड़ित होकर विशाललोचना आर्या सीता ने अपने प्राणों का परित्याग कर दिया है

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॥ ५ · १३ · १० ॥
उपर्युपरि सा नूनं सागरं क्रमतस्तदा। विचेष्टमाना पतिता समुद्रे जनकात्मजा॥

uparyupari sā nūnaṁ sāgaraṁ kramatastadā।
viceṣṭamānā patitā samudre janakātmajā॥

‘ऐसा भी हो सकता है कि जिस समय रावण उन्हें समुद्र के ऊपर होकर ला रहा हो, उस समय जनककुमारी सीता छटपटाकर समुद्र में गिर पड़ी हों। अवश्य ऐसा ही हुआ होगा

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॥ ५ · १३ · ११ ॥
आहो क्षुद्रेण चानेन रक्षन्ती शीलमात्मनः। अबन्धुर्भक्षिता सीता रावणेन तपस्विनी॥

āho kṣudreṇa cānena rakṣantī śīlamātmanaḥ।
abandhurbhakṣitā sītā rāvaṇena tapasvinī॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · १३ · १२ ॥
अथवा राक्षसेन्द्रस्य पत्नीभिरसितेक्षणा। अदुष्टा दुष्टभावाभिर्भक्षिता सा भविष्यति॥

athavā rākṣasendrasya patnībhirasitekṣaṇā।
aduṣṭā duṣṭabhāvābhirbhakṣitā sā bhaviṣyati॥

॥ ११–१२ ॥

‘अथवा ऐसा तो नहीं हुआ कि अपने शील की रक्षा में तत्पर हुई किसी सहायक बन्धु की सहायता से वञ्चित तपस्विनी सीता को इस नीच रावण ने ही खा लिया हो अथवा मन में दुष्ट भावना रखनेवाली राक्षसराज रावण की पत्नियों ने ही कजरारे नेत्रोंवाली साध्वी सीता को अपना आहार बना लिया होगा

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॥ ५ · १३ · १३ ॥
सम्पूर्णचन्द्रप्रतिमं पद्मपत्रनिभेक्षणम्। रामस्य ध्यायती वक्त्रं पञ्चत्वं कृपणा गता॥

sampūrṇacandrapratimaṁ padmapatranibhekṣaṇam।
rāmasya dhyāyatī vaktraṁ pañcatvaṁ kṛpaṇā gatā॥

‘हाय! श्रीरामचन्द्रजी के पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर तथा प्रफुल्ल कमलदल के सदृश नेत्रवाले मुख का चिन्तन करती हुई दयनीया सीता इस संसार से चल बसीं

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॥ ५ · १३ · १४ ॥
हा राम लक्ष्मणेत्येवं हायोध्ये चेति मैथिली। विलप्य बहु वैदेही न्यस्तदेहा भविष्यति॥

hā rāma lakṣmaṇetyevaṁ hāyodhye ceti maithilī।
vilapya bahu vaidehī nyastadehā bhaviṣyati॥

‘हा राम! हा लक्ष्मण! हा अयोध्यापुरी! इस प्रकार पुकार-पुकारकर बहुत विलाप करके मिथिलेशकुमारी विदेहनन्दिनी सीता ने अपने शरीर को त्याग दिया होगा

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॥ ५ · १३ · १५ ॥
अथवा निहिता मन्ये रावणस्य निवेशने। भृशं लालप्यते बाला पञ्जरस्थेव सारिका॥

athavā nihitā manye rāvaṇasya niveśane।
bhṛśaṁ lālapyate bālā pañjarastheva sārikā॥

‘अथवा मेरी समझ में यह आता है कि वे रावण के ही किसी गुप्त गृह में छिपाकर रखी गयी हैं। हाय! वहाँ वह बाला पींजरे में बन्द हुई मैना की तरह बारम्बार आर्तनाद करती होगी

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॥ ५ · १३ · १६ ॥
जनकस्य कुले जाता रामपत्नी सुमध्यमा। कथमुत्पलपत्राक्षी रावणस्य वशं व्रजेत्॥

janakasya kule jātā rāmapatnī sumadhyamā।
kathamutpalapatrākṣī rāvaṇasya vaśaṁ vrajet॥

‘जो जनक के कुल में उत्पन्न हुई हैं और श्रीरामचन्द्रजी की धर्मपत्नी हैं, वे नील कमल के-से नेत्रोंवाली सुमध्यमा सीता रावण के अधीन कैसे हो सकती हैं?

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॥ ५ · १३ · १७ ॥
विनष्टा वा प्रणष्टा वा मृता वा जनकात्मजा। रामस्य प्रियभार्यस्य निवेदयितुं क्षमम्॥

vinaṣṭā vā praṇaṣṭā vā mṛtā vā janakātmajā।
rāmasya priyabhāryasya na nivedayituṁ kṣamam॥

‘जनककिशोरी सीता चाहे गुप्त गृह में अदृश्य करके रखी गयी हों, चाहे समुद्र में गिरकर प्राणों से हाथ धो बैठी हों अथवा श्रीरामचन्द्रजी के विरह का कष्ट न सह सकने के कारण उन्होंने मृत्यु की शरण ली हो, किसी भी दशा में श्रीरामचन्द्रजी को इस बात की सूचना देना उचित न होगा; क्योंकि वे अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते हैं

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॥ ५ · १३ · १८ ॥
निवेद्यमाने दोषः स्याद् दोषः स्यादनिवेदने। कथं नु खलु कर्तव्यं विषमं प्रतिभाति मे॥

nivedyamāne doṣaḥ syād doṣaḥ syādanivedane।
kathaṁ nu khalu kartavyaṁ viṣamaṁ pratibhāti me॥

‘इस समाचार के बताने में भी दोष है और न बताने में भी दोष की सम्भावना है, ऐसी दशा में किस उपाय से काम लेना चाहिये? मुझे तो बताना और न बताना—दोनों ही दुष्कर प्रतीत होते हैं

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॥ ५ · १३ · १९ ॥
अस्मिन्नेवंगते कार्ये प्राप्तकालं क्षमं किम्। भवेदिति मतिं भूयो हनुमान् प्रविचारयन्॥

asminnevaṁgate kārye prāptakālaṁ kṣamaṁ ca kim।
bhavediti matiṁ bhūyo hanumān pravicārayan॥

‘ऐसी दशा में जब कोई भी कार्य करना दुष्कर प्रतीत होता है, तब मेरे लिये इस समय के अनुसार क्या करना उचित होगा?’ इन्हीं बातों पर हनुमान्जी बारम्बार विचार करने लगे

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॥ ५ · १३ · २० ॥
यदि सीतामदृष्ट्वाहं वानरेन्द्रपुरीमितः। गमिष्यामि ततः को मे पुरुषार्थो भविष्यति॥

yadi sītāmadṛṣṭvāhaṁ vānarendrapurīmitaḥ।
gamiṣyāmi tataḥ ko me puruṣārtho bhaviṣyati॥

(उन्होंने फिर सोचा—) ‘यदि मैं सीताजी को देखे बिना ही यहाँ से वानरराज की पुरी किष्किन्धा को लौट जाऊँगा तो मेरा पुरुषार्थ ही क्या रह जायगा?

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॥ ५ · १३ · २१ ॥
ममेदं लङ्घनं व्यर्थं सागरस्य भविष्यति। प्रवेशश्चैव लंकायां राक्षसानां दर्शनम्॥

mamedaṁ laṅghanaṁ vyarthaṁ sāgarasya bhaviṣyati।
praveśaścaiva laṁkāyāṁ rākṣasānāṁ ca darśanam॥

‘फिर तो मेरा यह समुद्रलंघन, लंका में प्रवेश और राक्षसों को देखना सब व्यर्थ हो जायगा

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॥ ५ · १३ · २२ ॥
किं वा वक्ष्यति सुग्रीवो हरयो वापि संगताः। किष्किन्धामनुसम्प्राप्तं तौ वा दशरथात्मजौ॥

kiṁ vā vakṣyati sugrīvo harayo vāpi saṁgatāḥ।
kiṣkindhāmanusamprāptaṁ tau vā daśarathātmajau॥

‘किष्किन्धा में पहुँचने पर मुझसे मिलकर सुग्रीव, दूसरे-दूसरे वानर तथा वे दोनों दशरथराजकुमार भी क्या कहेंगे?

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॥ ५ · १३ · २३ ॥
गत्वा तु यदि काकुत्स्थं वक्ष्यामि परुषं वचः। दृष्टेति मया सीता ततस्त्यक्ष्यति जीवितम्॥

gatvā tu yadi kākutsthaṁ vakṣyāmi paruṣaṁ vacaḥ।
na dṛṣṭeti mayā sītā tatastyakṣyati jīvitam॥

‘यदि वहाँ जाकर मैं श्रीरामचन्द्रजी से यह कठोर बात कह दूँ कि मुझे सीता का दर्शन नहीं हुआ तो वे प्राणों का परित्याग कर देंगे

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॥ ५ · १३ · २४ ॥
परुषं दारुणं तीक्ष्णं क्रूरमिन्द्रियतापनम्। सीतानिमित्तं दुर्वाक्यं श्रुत्वा भविष्यति॥

paruṣaṁ dāruṇaṁ tīkṣṇaṁ krūramindriyatāpanam।
sītānimittaṁ durvākyaṁ śrutvā sa na bhaviṣyati॥

‘सीताजी के विषय में ऐसे रूखे, कठोर, तीखे और इन्द्रियों को संताप देनेवाले दुर्वचन को सुनकर वे कदापि जीवित नहीं रहेंगे

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॥ ५ · १३ · २५ ॥
तं तु कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा पञ्चत्वगतमानसम्। भृशानुरक्तमेधावी भविष्यति लक्ष्मणः॥

taṁ tu kṛcchragataṁ dṛṣṭvā pañcatvagatamānasam।
bhṛśānuraktamedhāvī na bhaviṣyati lakṣmaṇaḥ॥

‘उन्हें संकट में पड़कर प्राणों के परित्याग का संकल्प करते देख उनके प्रति अत्यन्त अनुराग रखनेवाले बुद्धिमान् लक्ष्मण भी जीवित नहीं रहेंगे

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॥ ५ · १३ · २६ ॥
विनष्टौ भ्रातरौ श्रुत्वा भरतोऽपि मरिष्यति। भरतं मृतं दृष्ट्वा शत्रुघ्नो भविष्यति॥

vinaṣṭau bhrātarau śrutvā bharato'pi mariṣyati।
bharataṁ ca mṛtaṁ dṛṣṭvā śatrughno na bhaviṣyati॥

‘अपने इन दो भाइयों के विनाश का समाचार सुनकर भरत भी प्राण त्याग देंगे और भरत की मृत्यु देखकर शत्रुघ्न भी जीवित नहीं रह सकेंगे

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॥ ५ · १३ · २७ ॥
पुत्रान् मृतान् समीक्ष्याथ भविष्यन्ति मातरः। कौसल्या सुमित्रा कैकेयी संशयः॥

putrān mṛtān samīkṣyātha na bhaviṣyanti mātaraḥ।
kausalyā ca sumitrā ca kaikeyī ca na saṁśayaḥ॥

‘इस प्रकार चारों पुत्रों की मृत्यु हुई देख कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी—ये तीनों माताएँ भी निस्संदेह प्राण दे देंगी

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॥ ५ · १३ · २८ ॥
कृतज्ञः सत्यसंधश्च सुग्रीवः प्लवगाधिपः। रामं तथागतं दृष्ट्वा ततस्त्यक्ष्यति जीवितम्॥

kṛtajñaḥ satyasaṁdhaśca sugrīvaḥ plavagādhipaḥ।
rāmaṁ tathāgataṁ dṛṣṭvā tatastyakṣyati jīvitam॥

‘कृतज्ञ और सत्यप्रतिज्ञ वानरराज सुग्रीव भी जब श्रीरामचन्द्रजी को ऐसी अवस्था में देखेंगे तो स्वयं भी प्राणविसर्जन कर देंगे

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॥ ५ · १३ · २९ ॥
दुर्मना व्यथिता दीना निरानन्दा तपस्विनी। पीडिता भर्तृशोकेन रुमा त्यक्ष्यति जीवितम्॥

durmanā vyathitā dīnā nirānandā tapasvinī।
pīḍitā bhartṛśokena rumā tyakṣyati jīvitam॥

‘तत्पश्चात् पतिशोक से पीड़ित हो दुःखितचित्त, दीन, व्यथित और आनन्दशून्य हुई तपस्विनी रुमा भी जान दे देगी

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॥ ५ · १३ · ३० ॥
वालिजेन तु दुःखेन पीडिता शोककर्शिता। पञ्चत्वमागता राज्ञी तारापि भविष्यति॥

vālijena tu duḥkhena pīḍitā śokakarśitā।
pañcatvamāgatā rājñī tārāpi na bhaviṣyati॥

‘फिर तो रानी तारा भी जीवित नहीं रहेंगी। वे वाली के विरहजनित दुःख से तो पीड़ित थीं ही, इस नूतन शोक से कातर हो शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जायँगी

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॥ ५ · १३ · ३१ ॥
मातापित्रोर्विनाशेन सुग्रीवव्यसनेन च। कुमारोऽप्यंगदस्तस्माद् विजहिष्यति जीवितम्॥

mātāpitrorvināśena sugrīvavyasanena ca।
kumāro'pyaṁgadastasmād vijahiṣyati jīvitam॥

‘माता-पिता के विनाश और सुग्रीव के मरणजनित संकट से पीड़ित हो कुमार अंगद भी अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे

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॥ ५ · १३ · ३२ ॥
भर्तृजेन तु दुःखेन अभिभूता वनौकसः। शिरांस्यभिहनिष्यन्ति तलैर्मुष्टिभिरेव च॥

bhartṛjena tu duḥkhena abhibhūtā vanaukasaḥ।
śirāṁsyabhihaniṣyanti talairmuṣṭibhireva ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · १३ · ३३ ॥
सान्त्वेनानुप्रदानेन मानेन यशस्विना। लालिताः कपिनाथेन प्राणांस्त्यक्ष्यन्ति वानराः॥

sāntvenānupradānena mānena ca yaśasvinā।
lālitāḥ kapināthena prāṇāṁstyakṣyanti vānarāḥ॥

॥ ३२–३३ ॥

‘तदनन्तर स्वामी के दुःख से पीड़ित हुए सारे वानर अपने हाथों और मुक्कों से सिर पीटने लगेंगे। यशस्वी वानरराज ने सान्त्वनापूर्ण वचनों और दान-मान से जिनका लालन-पालन किया था, वे वानर अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे

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॥ ५ · १३ · ३४ ॥
वनेषु शैलेषु निरोधेषु वा पुनः। क्रीडामनुभविष्यन्ति समेत्य कपिकुञ्जराः॥

na vaneṣu na śaileṣu na nirodheṣu vā punaḥ।
krīḍāmanubhaviṣyanti sametya kapikuñjarāḥ॥

‘ऐसी अवस्था में शेष वानर वनों, पर्वतों और गुफाओं में एकत्र होकर फिर कभी क्रीड़ा-विहार का आनन्द नहीं लेंगे

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॥ ५ · १३ · ३५ ॥
सपुत्रदाराः सामात्या भर्तृव्यसनपीडिताः। शैलाग्रेभ्यः पतिष्यन्ति समेषु विषमेषु च॥

saputradārāḥ sāmātyā bhartṛvyasanapīḍitāḥ।
śailāgrebhyaḥ patiṣyanti sameṣu viṣameṣu ca॥

‘अपने राजा के शोक से पीड़ित हो सब वानर अपने पुत्र, स्त्री और मन्त्रियोंसहित पर्वतों के शिखरों से नीचे सम अथवा विषम स्थानों में गिरकर प्राण दे देंगे

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॥ ५ · १३ · ३६ ॥
विषमुद्बन्धनं वापि प्रवेशं ज्वलनस्य वा। उपवासमथो शस्त्रं प्रचरिष्यन्ति वानराः॥

viṣamudbandhanaṁ vāpi praveśaṁ jvalanasya vā।
upavāsamatho śastraṁ pracariṣyanti vānarāḥ॥

‘अथवा सारे विष पी लेंगे या फाँसी लगा लेंगे या जलती आग में प्रवेश कर जायेंगे। उपवास करने लगेंगे अथवा अपने ही शरीर में छुरा भोंक लेंगे

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॥ ५ · १३ · ३७ ॥
घोरमारोदनं मन्ये गते मयि भविष्यति। इक्ष्वाकुकुलनाशश्च नाशश्चैव वनौकसाम्॥

ghoramārodanaṁ manye gate mayi bhaviṣyati।
ikṣvākukulanāśaśca nāśaścaiva vanaukasām॥

‘मेरे वहाँ जाने पर मैं समझता हूँ बड़ा भयंकर आर्तनाद होने लगेगा। इक्ष्वाकुकुल का नाश और वानरों का भी विनाश हो जायगा

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॥ ५ · १३ · ३८ ॥
सोऽहं नैव गमिष्यामि किष्किन्धां नगरीमितः। नहि शक्ष्याम्यहं द्रष्टुं सुग्रीवं मैथिलीं विना॥

so'haṁ naiva gamiṣyāmi kiṣkindhāṁ nagarīmitaḥ।
nahi śakṣyāmyahaṁ draṣṭuṁ sugrīvaṁ maithilīṁ vinā॥

‘इसलिये मैं यहाँ से किष्किन्धापुरी को तो नहीं जाऊँगा। मिथिलेशकुमारी सीता को देखे बिना मैं सुग्रीव का भी दर्शन नहीं कर सकूँगा

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॥ ५ · १३ · ३९ ॥
मय्यगच्छति चेहस्थे धर्मात्मानौ महारथौ। आशया तौ धरिष्येते वानराश्च तरस्विनः॥

mayyagacchati cehasthe dharmātmānau mahārathau।
āśayā tau dhariṣyete vānarāśca tarasvinaḥ॥

‘यदि मैं यहीं रहूँ और वहाँ न जाऊँ तो मेरी आशा लगाये वे दोनों धर्मात्मा महारथी बन्धु प्राण धारण किये रहेंगे और वे वेगशाली वानर भी जीवित रहेंगे

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॥ ५ · १३ · ४० ॥
हस्तादानो मुखादानो नियतो वृक्षमूलिकः। वानप्रस्थो भविष्यामि ह्यदृष्ट्वा जनकात्मजाम्॥

hastādāno mukhādāno niyato vṛkṣamūlikaḥ।
vānaprastho bhaviṣyāmi hyadṛṣṭvā janakātmajām॥

‘जानकीजी का दर्शन न मिलने पर मैं यहाँ वानप्रस्थी हो जाऊँगा। मेरे हाथ पर अपने-आप जो फल आदि खाद्य वस्तु प्राप्त हो जायगी, उसीको खाकर रहूँगा या परेच्छा से मेरे मुँह में जो फल आदि खाद्य वस्तु पड़ जायगी, उसीसे निर्वाह करूँगा तथा शौच, संतोष आदि नियमों के पालनपूर्वक वृक्ष के नीचे निवास करूँगा

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॥ ५ · १३ · ४१ ॥
सागरानूपजे देशे बहुमूलफलोदके। चितिं कृत्वा प्रवेक्ष्यामि समिद्धमरणीसुतम्॥

sāgarānūpaje deśe bahumūlaphalodake।
citiṁ kṛtvā pravekṣyāmi samiddhamaraṇīsutam॥

‘अथवा सागरतटवर्ती स्थान में, जहाँ फल-मूल और जल की अधिकता होती है, मैं चिता बनाकर जलती हुई आग में प्रवेश कर जाऊँगा

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॥ ५ · १३ · ४२ ॥
उपविष्टस्य वा सम्यग् लिंगिनं साधयिष्यतः। शरीरं भक्षयिष्यन्ति वायसाः श्वापदानि च॥

upaviṣṭasya vā samyag liṁginaṁ sādhayiṣyataḥ।
śarīraṁ bhakṣayiṣyanti vāyasāḥ śvāpadāni ca॥

‘अथवा आमरण उपवास के लिये बैठकर लिंगशरीरधारी जीवात्मा का शरीर से वियोग कराने के प्रयत्न में लगे हुए मेरे शरीर को कौवे तथा हिंसक जन्तु अपना आहार बना लेंगे

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॥ ५ · १३ · ४३ ॥
इदमप्यृषिभिर्दृष्टं निर्याणमिति मे मतिः। सम्यगापः प्रवेक्ष्यामि चेत् पश्यामि जानकीम्॥

idamapyṛṣibhirdṛṣṭaṁ niryāṇamiti me matiḥ।
samyagāpaḥ pravekṣyāmi na cet paśyāmi jānakīm॥

‘यदि मुझे जानकीजी का दर्शन नहीं हुआ तो मैं खुशी-खुशी जल-समाधि ले लूँगा। मेरे विचार से इस तरह जल-प्रवेश करके परलोकगमन करना ऋषियों की दृष्टि में भी उत्तम ही है

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॥ ५ · १३ · ४४ ॥
सुजातमूला सुभगा कीर्तिमाला यशस्विनी। प्रभग्ना चिररात्राय मम सीतामपश्यतः॥

sujātamūlā subhagā kīrtimālā yaśasvinī।
prabhagnā cirarātrāya mama sītāmapaśyataḥ॥

‘जिसका प्रारम्भ शुभ है, ऐसी सुभगा, यशस्विनी और मेरी कीर्तिमालारूपा यह दीर्घ रात्रि भी सीताजी को देखे बिना ही बीत चली

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॥ ५ · १३ · ४५ ॥
तापसो वा भविष्यामि नियतो वृक्षमूलिकः। नेतः प्रतिगमिष्यामि तामदृष्ट्वासितेक्षणाम्॥

tāpaso vā bhaviṣyāmi niyato vṛkṣamūlikaḥ।
netaḥ pratigamiṣyāmi tāmadṛṣṭvāsitekṣaṇām॥

‘अथवा अब मैं नियमपूर्वक वृक्ष के नीचे निवास करनेवाला तपस्वी हो जाऊँगा; किंतु उस असितलोचना सीता को देखे बिना यहाँ से कदापि नहीं लौटूँगा

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॥ ५ · १३ · ४६ ॥
यदि तु प्रतिगच्छामि सीतामनधिगम्य ताम्। अंगदः सहितः सर्वैर्वानरैर्न भविष्यति॥

yadi tu pratigacchāmi sītāmanadhigamya tām।
aṁgadaḥ sahitaḥ sarvairvānarairna bhaviṣyati॥

‘यदि सीता का पता लगाये बिना ही मैं लौट जाऊँ तो समस्त वानरोंसहित अंगद जीवित नहीं रहेंगे

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॥ ५ · १३ · ४७ ॥
विनाशे बहवो दोषा जीवन् प्राप्नोति भद्रकम्। तस्मात् प्राणान् धरिष्यामि ध्रुवो जीवति संगमः॥

vināśe bahavo doṣā jīvan prāpnoti bhadrakam।
tasmāt prāṇān dhariṣyāmi dhruvo jīvati saṁgamaḥ॥

‘इस जीवन का नाश कर देने में बहुत-से दोष हैं। जो पुरुष जीवित रहता है, वह कभी-न-कभी अवश्य कल्याण का भागी होता है; अतः मैं इन प्राणों को धारण किये रहूँगा। जीवित रहने पर अभीष्ट वस्तु अथवा सुख की प्राप्ति अवश्यम्भावी है’

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॥ ५ · १३ · ४८ ॥
एवं बहुविधं दुःखं मनसा धारयन् बहु। नाध्यगच्छत् तदा पारं शोकस्य कपिकुञ्जरः॥

evaṁ bahuvidhaṁ duḥkhaṁ manasā dhārayan bahu।
nādhyagacchat tadā pāraṁ śokasya kapikuñjaraḥ॥

इस तरह मन में अनेक प्रकार के दुःख धारण किये कपिकुञ्जर हनुमान्जी शोक का पार न पा सके

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॥ ५ · १३ · ४९ ॥
ततो विक्रममासाद्य धैर्यवान् कपिकुञ्जरः। रावणं वा वधिष्यामि दशग्रीवं महाबलम्। काममस्तु हृता सीता प्रत्याचीर्णं भविष्यति॥

tato vikramamāsādya dhairyavān kapikuñjaraḥ।
rāvaṇaṁ vā vadhiṣyāmi daśagrīvaṁ mahābalam।
kāmamastu hṛtā sītā pratyācīrṇaṁ bhaviṣyati॥

तदनन्तर धैर्यवान् कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने पराक्रम का सहारा लेकर सोचा—‘अथवा महाबली दशमुख रावण का ही वध क्यों न कर डालूँ। भले ही सीता का अपहरण हो गया हो, इस रावण को मार डालने से उस वैर का भरपूर बदला सध जायगा

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॥ ५ · १३ · ५० ॥
अथवैनं समुत्क्षिप्य उपर्युपरि सागरम्। रामायोपहरिष्यामि पशुं पशुपतेरिव॥

athavainaṁ samutkṣipya uparyupari sāgaram।
rāmāyopahariṣyāmi paśuṁ paśupateriva॥

‘अथवा इसे उठाकर समुद्र के ऊपर-ऊपर से ले जाऊँ और जैसे पशुपति (रुद्र या अग्नि)-को पशु अर्पित किया जाय, उसी प्रकार श्रीराम के हाथ में इसको सौंप दूँ’

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॥ ५ · १३ · ५१ ॥
इति चिन्तासमापन्नः सीतामनधिगम्य ताम्। ध्यानशोकपरीतात्मा चिन्तयामास वानरः॥

iti cintāsamāpannaḥ sītāmanadhigamya tām।
dhyānaśokaparītātmā cintayāmāsa vānaraḥ॥

इस प्रकार सीताजी को न पाकर वे चिन्ता में निमग्न हो गये। उनका मन सीता के ध्यान और शोक में डूब गया। फिर वे वानरवीर इस प्रकार विचार करने लगे—

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॥ ५ · १३ · ५२ ॥
यावत् सीतां पश्यामि रामपत्नीं यशस्विनीम्। तावदेतां पुरीं लंकां विचिनोमि पुनः पुनः॥

yāvat sītāṁ na paśyāmi rāmapatnīṁ yaśasvinīm।
tāvadetāṁ purīṁ laṁkāṁ vicinomi punaḥ punaḥ॥

‘जबतक मैं यशस्विनी श्रीराम-पत्नी सीता का दर्शन न कर लूँगा, तबतक इस लंकापुरी में बारंबार उनकी खोज करता रहूँगा

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॥ ५ · १३ · ५३ ॥
सम्पातिवचनाच्चापि रामं यद्यानयाम्यहम्। अपश्यन् राघवो भार्यां निर्दहेत् सर्ववानरान्॥

sampātivacanāccāpi rāmaṁ yadyānayāmyaham।
apaśyan rāghavo bhāryāṁ nirdahet sarvavānarān॥

‘यदि सम्पाति के कहने से भी मैं श्रीराम को यहाँ बुला ले आऊँ तो अपनी पत्नी को यहाँ न देखने पर श्रीरघुनाथजी समस्त वानरों को जलाकर भस्म कर देंगे

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॥ ५ · १३ · ५४ ॥
इहैव नियताहारो वत्स्यामि नियतेन्द्रियः। मत्कृते विनश्येयुः सर्वे ते नरवानराः॥

ihaiva niyatāhāro vatsyāmi niyatendriyaḥ।
na matkṛte vinaśyeyuḥ sarve te naravānarāḥ॥

‘अतः यहीं नियमित आहार और इन्द्रियों के संयमपूर्वक निवास करूँगा। मेरे कारण वे समस्त नर और वानर नष्ट न हों

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॥ ५ · १३ · ५५ ॥
अशोकवनिका चापि महतीयं महाद्रुमा। इमामधिगमिष्यामि नहीयं विचिता मया॥

aśokavanikā cāpi mahatīyaṁ mahādrumā।
imāmadhigamiṣyāmi nahīyaṁ vicitā mayā॥

‘इधर यह बहुत बड़ी अशोकवाटिका है, इसके भीतर बड़े-बड़े वृक्ष हैं। इसमें मैंने अभीतक अनुसंधान नहीं किया है, अतः अब इसीमें चलकर ढूँढ़ूँगा

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॥ ५ · १३ · ५६ ॥
वसून् रुद्रांस्तथाऽऽदित्यानश्विनौ मरुतोऽपि च। नमस्कृत्वा गमिष्यामि रक्षसां शोकवर्धनः॥

vasūn rudrāṁstathā''dityānaśvinau maruto'pi ca।
namaskṛtvā gamiṣyāmi rakṣasāṁ śokavardhanaḥ॥

‘राक्षसों के शोक को बढ़ानेवाला मैं यहाँ से वसु, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार और मरुद्गणों को नमस्कार करके अशोकवाटिका में चलूँगा

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॥ ५ · १३ · ५७ ॥
जित्वा तु राक्षसान् देवीमिक्ष्वाकुकुलनन्दिनीम्। सम्प्रदास्यामि रामाय सिद्धीमिव तपस्विने॥

jitvā tu rākṣasān devīmikṣvākukulanandinīm।
sampradāsyāmi rāmāya siddhīmiva tapasvine॥

‘वहाँ समस्त राक्षसों को जीतकर जैसे तपस्वी को सिद्धि प्रदान की जाती है, इसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के हाथ में इक्ष्वाकुकुल को आनन्दित करनेवाली देवी सीता को सौंप दूँगा’

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॥ ५ · १३ · ५८ ॥
मुहूर्तमिव ध्यात्वा चिन्ताविग्रथितेन्द्रियः। उदतिष्ठन् महाबाहुर्हनूमान् मारुतात्मजः॥

sa muhūrtamiva dhyātvā cintāvigrathitendriyaḥ।
udatiṣṭhan mahābāhurhanūmān mārutātmajaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · १३ · ५९ ॥
नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै तस्यै जनकात्मजायै। नमोऽस्तु रुद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो नमोऽस्तु चन्द्राग्निमरुद्गणेभ्यः॥

namo'stu rāmāya salakṣmaṇāya devyai ca tasyai janakātmajāyai।
namo'stu rudrendrayamānilebhyo namo'stu candrāgnimarudgaṇebhyaḥ॥

॥ ५८–५९ ॥

इस प्रकार दो घड़ीतक सोच-विचारकर चिन्ता से शिथिल इन्द्रियवाले महाबाहु पवनकुमार हनुमान् सहसा उठकर खड़े हो गये (और देवताओं को नमस्कार करते हुए बोले—) ‘लक्ष्मणसहित श्रीराम को नमस्कार है। जनकनन्दिनी सीता देवी को भी नमस्कार है। रुद्र, इन्द्र, यम और वायु देवता को नमस्कार है तथा चन्द्रमा, अग्नि एवं मरुद्गणों को भी नमस्कार है’

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॥ ५ · १३ · ६० ॥
तेभ्यस्तु नमस्कृत्वा सुग्रीवाय मारुतिः। दिशः सर्वाः समालोक्य सोऽशोकवनिकां प्रति॥

sa tebhyastu namaskṛtvā sugrīvāya ca mārutiḥ।
diśaḥ sarvāḥ samālokya so'śokavanikāṁ prati॥

इस प्रकार उन सबको तथा सुग्रीव को भी नमस्कार करके पवनकुमार हनुमान्जी सम्पूर्ण दिशाओं की ओर दृष्टिपात करके अशोकवाटिका में जाने को उद्यत हुए

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॥ ५ · १३ · ६१ ॥
गत्वा मनसा पूर्वमशोकवनिकां शुभाम्। उत्तरं चिन्तयामास वानरो मारुतात्मजः॥

sa gatvā manasā pūrvamaśokavanikāṁ śubhām।
uttaraṁ cintayāmāsa vānaro mārutātmajaḥ॥

उन वानरवीर पवनकुमार ने पहले मन के द्वारा ही उस सुन्दर अशोक-वाटिका में जाकर भावी कर्तव्य का इस प्रकार चिन्तन किया

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॥ ५ · १३ · ६२ ॥
ध्रुवं तु रक्षोबहुला भविष्यति वनाकुला। अशोकवनिका पुण्या सर्वसंस्कारसंस्कृता॥

dhruvaṁ tu rakṣobahulā bhaviṣyati vanākulā।
aśokavanikā puṇyā sarvasaṁskārasaṁskṛtā॥

‘वह पुण्यमयी अशोकवाटिका सींचने-कोड़ने आदि सब प्रकार के संस्कारों से सँवारी गयी है। वह दूसरे-दूसरे वनों से भी घिरी हुई है; अतः उसकी रक्षा के लिये वहाँ निश्चय ही बहुत-से राक्षस तैनात किये गये होंगे

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॥ ५ · १३ · ६३ ॥
रक्षिणश्चात्र विहिता नूनं रक्षन्ति पादपान्। भगवानपि विश्वात्मा नातिक्षोभं प्रवायति॥

rakṣiṇaścātra vihitā nūnaṁ rakṣanti pādapān।
bhagavānapi viśvātmā nātikṣobhaṁ pravāyati॥

‘राक्षसराज के नियुक्त किये हुए रक्षक अवश्य ही वहाँ के वृक्षों की रक्षा करते होंगे; इसलिये जगत् के प्राणस्वरूप भगवान् वायुदेव भी वहाँ अधिक वेग से नहीं बहते होंगे

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॥ ५ · १३ · ६४ ॥
संक्षिप्तोऽयं मयाऽऽत्मा रामार्थे रावणस्य च। सिद्धिं दिशन्तु मे सर्वे देवाः सर्षिगणास्त्विह॥

saṁkṣipto'yaṁ mayā''tmā ca rāmārthe rāvaṇasya ca।
siddhiṁ diśantu me sarve devāḥ sarṣigaṇāstviha॥

‘मैंने श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि तथा रावण से अदृश्य रहने के लिये अपने शरीर को संकुचित करके छोटा बना लिया है। मुझे इस कार्य में ऋषियोंसहित समस्त देवता सिद्धि—सफलता प्रदान करें

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॥ ५ · १३ · ६५ ॥
ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् देवाश्चैव तपस्विनः। सिद्धिमग्निश्च वायुश्च पुरुहूतश्च वज्रभृत्॥

brahmā svayambhūrbhagavān devāścaiva tapasvinaḥ।
siddhimagniśca vāyuśca puruhūtaśca vajrabhṛt॥

‘स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा, अन्य देवगण, तपोनिष्ठ महर्षि, अग्निदेव, वायु तथा वज्रधारी इन्द्र भी मुझे सफलता प्रदान करें

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॥ ५ · १३ · ६६ ॥
वरुणः पाशहस्तश्च सोमादित्यौ तथैव च। अश्विनौ महात्मानौ मरुतः सर्व एव च॥

varuṇaḥ pāśahastaśca somādityau tathaiva ca।
aśvinau ca mahātmānau marutaḥ sarva eva ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · १३ · ६७ ॥
सिद्धिं सर्वाणि भूतानि भूतानां चैव यः प्रभुः। दास्यन्ति मम ये चान्येऽप्यदृष्टाः पथि गोचराः॥

siddhiṁ sarvāṇi bhūtāni bhūtānāṁ caiva yaḥ prabhuḥ।
dāsyanti mama ye cānye'pyadṛṣṭāḥ pathi gocarāḥ॥

॥ ६६–६७ ॥

‘पाशधारी वरुण, सोम, आदित्य, महात्मा अश्विनीकुमार, समस्त मरुद्गण, सम्पूर्ण भूत और भूतों के अधिपति तथा और भी जो मार्ग में दीखनेवाले एवं न दीखनेवाले देवता हैं, वे सब मुझे सिद्धि प्रदान करेंगे

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॥ ५ · १३ · ६८ ॥
तदुन्नसं पाण्डुरदन्तमव्रणं शुचिस्मितं पद्मपलाशलोचनम्। द्रक्ष्ये तदार्यावदनं कदा न्वहं प्रसन्नताराधिपतुल्यवर्चसम्॥

tadunnasaṁ pāṇḍuradantamavraṇaṁ śucismitaṁ padmapalāśalocanam।
drakṣye tadāryāvadanaṁ kadā nvahaṁ prasannatārādhipatulyavarcasam॥

‘जिसकी नाक ऊँची और दाँत सफेद हैं, जिसमें चेचक आदि के दाग नहीं हैं, जहाँ पवित्र मुसकान की छटा छायी रहती है, जिसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान सुशोभित होते हैं तथा जो निष्कलंक कलाधर के तुल्य कमनीय कान्ति से युक्त है, वह आर्या सीता का मुख मुझे कब दिखायी देगा?

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॥ ५ · १३ · ६९ ॥
क्षुद्रेण हीनेन नृशंसमूर्तिना सुदारुणालंकृतवेषधारिणा। बलाभिभूता ह्यबला तपस्विनी कथं नु मे दृष्टिपथेऽद्य सा भवेत्॥

kṣudreṇa hīnena nṛśaṁsamūrtinā sudāruṇālaṁkṛtaveṣadhāriṇā।
balābhibhūtā hyabalā tapasvinī kathaṁ nu me dṛṣṭipathe'dya sā bhavet॥

‘इस क्षुद्र, नीच, नृशंसरूपधारी और अत्यन्त दारुण होने पर भी अलंकारयुक्त विश्वसनीय वेष धारण करनेवाले रावण ने उस तपस्विनी अबला को बलात् अपने अधीन कर लिया है। अब किस प्रकार वह मेरे दृष्टिपथ में आ सकती हैं?’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रयोदशः सर्गः॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १३ ॥