वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः ४ · ३० श्लोकाःSarga 4 · 30 ślokas

हनुमान्जीका लंकापुरी एवं रावणके अन्तःपुरमें प्रवेश

॥ ५ · ४ · १ ॥
निर्जित्य पुरीं लंकां श्रेष्ठां तां कामरूपिणीम्। विक्रमेण महातेजा हनूमान् कपिसत्तमः॥

sa nirjitya purīṁ laṁkāṁ śreṣṭhāṁ tāṁ kāmarūpiṇīm।
vikrameṇa mahātejā hanūmān kapisattamaḥ॥

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॥ ५ · ४ · २ ॥
अद्वारेण महावीर्यः प्राकारमवपुप्लुवे। निशि लंकां महासत्त्वो विवेश कपिकुञ्जरः॥

advāreṇa mahāvīryaḥ prākāramavapupluve।
niśi laṁkāṁ mahāsattvo viveśa kapikuñjaraḥ॥

॥ १–२ ॥

इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली श्रेष्ठ राक्षसी लंकापुरी को अपने पराक्रम से परास्त करके महातेजस्वी महाबली महान् सत्त्वशाली वानरशिरोमणि कपिकुञ्जर हनुमान् बिना दरवाजे के ही रात में चहारदीवारी फाँद गये और लंका के भीतर घुस गये

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॥ ५ · ४ · ३ ॥
प्रविश्य नगरीं लंकां कपिराजहितंकरः। चक्रेऽथ पादं सव्यं शत्रूणां तु मूर्धनि॥

praviśya nagarīṁ laṁkāṁ kapirājahitaṁkaraḥ।
cakre'tha pādaṁ savyaṁ ca śatrūṇāṁ sa tu mūrdhani॥

कपिराज सुग्रीव का हित करनेवाले हनुमान्जी ने इस तरह लंकापुरी में प्रवेश करके मानो शत्रुओं के सिर पर अपना बायाँ पैर रख दिया

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॥ ५ · ४ · ४ ॥
प्रविष्टः सत्त्वसम्पन्नो निशायां मारुतात्मजः। महापथमास्थाय मुक्तपुष्पविराजितम्॥ ततस्तु तां पुरीं लंकां रम्यामभिययौ कपिः।

praviṣṭaḥ sattvasampanno niśāyāṁ mārutātmajaḥ।
sa mahāpathamāsthāya muktapuṣpavirājitam॥
tatastu tāṁ purīṁ laṁkāṁ ramyāmabhiyayau kapiḥ।

सत्त्वगुण से सम्पन्न पवनपुत्र हनुमान् उस रात में परकोटे के भीतर प्रवेश करके बिखरे गये फूलों से सुशोभित राजमार्ग का आश्रय ले उस रमणीय लंकापुरी की ओर चले

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॥ ५ · ४ · ५ ॥
हसितोत्कृष्टनिनदैस्तूर्यघोषपुरस्कृतैः॥

hasitotkṛṣṭaninadaistūryaghoṣapuraskṛtaiḥ॥

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॥ ५ · ४ · ६ ॥
वज्राङ्कुशनिकाशैश्च वज्रजालविभूषितैः। गृहमेधैः पुरी रम्या बभासे द्यौरिवाम्बुदैः॥

vajrāṅkuśanikāśaiśca vajrajālavibhūṣitaiḥ।
gṛhamedhaiḥ purī ramyā babhāse dyaurivāmbudaiḥ॥

॥ ५–६ ॥

जैसे आकाश श्वेत बादलों से सुशोभित होता है, उसी प्रकार वह रमणीय पुरी अपने श्वेत मेघसदृश गृहों से उत्तम शोभा पा रही थी। वे गृह अट्टहासजनित उत्कृष्ट शब्दों तथा वाद्यघोषों से मुखरित थे। उनमें वज्रों तथा अंकुशों के चित्र अङ्कित थे और हीरों के बने हुए झरोखे उनकी शोभा बढ़ाते थे

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॥ ५ · ४ · ७ ॥
प्रजज्वाल तदा लंका रक्षोगणगृहैः शुभैः। सिताभ्रसदृशैश्चित्रैः पद्मस्वस्तिकसंस्थितैः॥ वर्धमानगृहैश्चापि सर्वतः सुविभूषितैः।

prajajvāla tadā laṁkā rakṣogaṇagṛhaiḥ śubhaiḥ।
sitābhrasadṛśaiścitraiḥ padmasvastikasaṁsthitaiḥ॥
vardhamānagṛhaiścāpi sarvataḥ suvibhūṣitaiḥ।

उस समय लंका श्वेत बादलों के समान सुन्दर एवं विचित्र राक्षस-गृहों से प्रकाशित हो रही थी। उन गृहों में से कोई तो कमल के आकार में बने हुए थे। कोई स्वस्तिक के चिह्न या आकार से युक्त थे और किन्हींका निर्माण वर्धमानसंज्ञक गृहों के रूप में हुआ था। वे सभी सब ओर से सजाये गये थे

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॥ ५ · ४ · ८ ॥
तां चित्रमाल्याभरणां कपिराजहितंकरः॥ राघवार्थे चरन् श्रीमान् ददर्श ननन्द च।

tāṁ citramālyābharaṇāṁ kapirājahitaṁkaraḥ॥
rāghavārthe caran śrīmān dadarśa ca nananda ca।

वानरराज सुग्रीव का हित करनेवाले श्रीमान् हनुमान् श्रीरघुनाथजी की कार्यसिद्धि के लिये विचित्र पुष्पमय आभरणों से अलंकृत लंका में विचरने लगे। उन्होंने उस पुरी को अच्छी तरह देखा और देखकर प्रसन्नता का अनुभव किया

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॥ ५ · ४ · ९ ॥
भवनाद् भवनं गच्छन् ददर्श कपिकुञ्जरः॥

bhavanād bhavanaṁ gacchan dadarśa kapikuñjaraḥ॥

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॥ ५ · ४ · १० ॥
विविधाकृतिरूपाणि भवनानि ततस्ततः। शुश्राव रुचिरं गीतं त्रिस्थानस्वरभूषितम्॥

vividhākṛtirūpāṇi bhavanāni tatastataḥ।
śuśrāva ruciraṁ gītaṁ tristhānasvarabhūṣitam॥

॥ ९–१० ॥

उन कपिश्रेष्ठ ने जहाँ-तहाँ एक घर से दूसरे घर पर जाते हुए विविध आकार-प्रकार के भवन देखे तथा हृदय, कण्ठ और मूर्धा—इन तीन स्थानों से निकलनेवाले मन्द, मध्यम और उच्च स्वर से विभूषित मनोहर गीत सुने

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॥ ५ · ४ · ११ ॥
स्त्रीणां मदनविद्धानां दिवि चाप्सरसामिव। शुश्राव काञ्चीनिनदं नूपुराणां निःस्वनम्॥

strīṇāṁ madanaviddhānāṁ divi cāpsarasāmiva।
śuśrāva kāñcīninadaṁ nūpurāṇāṁ ca niḥsvanam॥

उन्होंने स्वर्गीय अप्सराओं के समान सुन्दरी तथा कामवेदना से पीड़ित कामिनियों की करधनी और पायजेबों की झनकार सुनी

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॥ ५ · ४ · १२ ॥
सोपाननिनदांश्चापि भवनेषु महात्मनाम्। आस्फोटितनिनादांश्च क्ष्वेडितांश्च ततस्ततः॥

sopānaninadāṁścāpi bhavaneṣu mahātmanām।
āsphoṭitaninādāṁśca kṣveḍitāṁśca tatastataḥ॥

इसी तरह जहाँ-तहाँ महामनस्वी राक्षसों के घरों में सीढ़ियों पर चढ़ते समय स्त्रियों की काञ्ची और मंजीर की मधुरध्वनि तथा पुरुषों के ताल ठोकने और गर्जने की भी आवाजें उन्हें सुनायी दीं

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॥ ५ · ४ · १३ ॥
शुश्राव जपतां तत्र मन्त्रान् रक्षोगृहेषु वै। स्वाध्यायनिरतांश्चैव यातुधानान् ददर्श सः॥

śuśrāva japatāṁ tatra mantrān rakṣogṛheṣu vai।
svādhyāyaniratāṁścaiva yātudhānān dadarśa saḥ॥

राक्षसों के घरों में बहुतों को तो उन्होंने वहाँ मन्त्र जपते हुए सुना और कितने ही निशाचरों को स्वाध्याय में तत्पर देखा

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॥ ५ · ४ · १४ ॥
रावणस्तवसंयुक्तान् गर्जतो राक्षसानपि। राजमार्गं समावृत्य स्थितं रक्षोगणं महत्॥

rāvaṇastavasaṁyuktān garjato rākṣasānapi।
rājamārgaṁ samāvṛtya sthitaṁ rakṣogaṇaṁ mahat॥

कई राक्षसों को उन्होंने रावण की स्तुति के साथ गर्जना करते और निशाचरों की एक बड़ी भीड़ को राजमार्ग रोककर खड़ी हुई देखा

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॥ ५ · ४ · १५ ॥
ददर्श मध्यमे गुल्मे राक्षसस्य चरान् बहून्। दीक्षिताञ्जटिलान् मुण्डान् गोजिनाम्बरवाससः॥

dadarśa madhyame gulme rākṣasasya carān bahūn।
dīkṣitāñjaṭilān muṇḍān gojināmbaravāsasaḥ॥

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॥ ५ · ४ · १६ ॥
दर्भमुष्टिप्रहरणानग्निकुण्डायुधांस्तथा। कूटमुद्गरपाणींश्च दण्डायुधधरानपि॥

darbhamuṣṭipraharaṇānagnikuṇḍāyudhāṁstathā।
kūṭamudgarapāṇīṁśca daṇḍāyudhadharānapi॥

॥ १५–१६ ॥

नगर के मध्यभाग में उन्हें रावण के बहुत-से गुप्तचर दिखायी दिये। उनमें कोई योग की दीक्षा लिये हुए, कोई जटा बढ़ाये, कोई मूँड़ मुँड़ाये, कोई गोचर्म या मृगचर्म धारण किये और कोई नंग-धड़ंग थे। कोई मुट्ठीभर कुशों को ही अस्त्र-रूप से धारण किये हुए थे। किन्हींका अग्निकुण्ड ही आयुध था। किन्हींके हाथ में कूट या मुद्गर था। कोई डंडे को ही हथियाररूप में लिये हुए थे

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॥ ५ · ४ · १७ ॥
एकाक्षानेकवर्णांश्च लंबोदरपयोधरान्। करालान् भुग्नवक्त्रांश्च विकटान् वामनांस्तथा॥

ekākṣānekavarṇāṁśca laṁbodarapayodharān।
karālān bhugnavaktrāṁśca vikaṭān vāmanāṁstathā॥

किन्हींके एक ही आँख थी तो किन्हींके रूप बहुरंगे थे। कितनों के पेट और स्तन बहुत बड़े थे। कोई बड़े विकराल थे। किन्हींके मुँह टेढ़े-मेढ़े थे। कोई विकट थे तो कोई बौने

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॥ ५ · ४ · १८ ॥
धन्विनः खड्गिनश्चैव शतघ्नीमुसलायुधान्। परिघोत्तमहस्तांश्च विचित्रकवचोज्ज्वलान्॥

dhanvinaḥ khaḍginaścaiva śataghnīmusalāyudhān।
parighottamahastāṁśca vicitrakavacojjvalān॥

किन्हींके पास धनुष, खड्ग, शतघ्नी और मूसलरूप आयुध थे। किन्हींके हाथों में उत्तम परिघ विद्यमान थे और कोई विचित्र कवचों से प्रकाशित हो रहे थे

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॥ ५ · ४ · १९ ॥
नातिस्थूलान् नातिकृशान् नातिदीर्घातिह्रस्वकान्। नातिगौरान् नातिकृष्णान्नातिकुब्जान्न वामनान्॥

nātisthūlān nātikṛśān nātidīrghātihrasvakān।
nātigaurān nātikṛṣṇānnātikubjānna vāmanān॥

कुछ निशाचर न तो अधिक मोटे थे, न अधिक दुर्बल, न बहुत लंबे थे न अधिक छोटे, न बहुत गोरे थे न अधिक काले तथा न अधिक कुबड़े थे न विशेष बौने ही

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॥ ५ · ४ · २० ॥
विरूपान् बहुरूपांश्च सुरूपांश्च सुवर्चसः। ध्वजिनः पताकिनश्चैव ददर्श विविधायुधान्॥

virūpān bahurūpāṁśca surūpāṁśca suvarcasaḥ।
dhvajinaḥ patākinaścaiva dadarśa vividhāyudhān॥

कोई बड़े कुरूप थे, कोई अनेक प्रकार के रूप धारण कर सकते थे, किन्हींका रूप सुन्दर था, कोई बड़े तेजस्वी थे तथा किन्हींके पास ध्वजा, पताका और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र थे

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॥ ५ · ४ · २१ ॥
शक्तिवृक्षायुधांश्चैव पट्टिशाशनिधारिणः। क्षेपणीपाशहस्तांश्च ददर्श महाकपिः॥

śaktivṛkṣāyudhāṁścaiva paṭṭiśāśanidhāriṇaḥ।
kṣepaṇīpāśahastāṁśca dadarśa sa mahākapiḥ॥

कोई शक्ति और वृक्षरूप आयुध धारण किये देखे जाते थे तथा किन्हींके पास पट्टिश, वज्र, गुलेल और पाश थे। महाकपि हनुमान् ने उन सबको देखा

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॥ ५ · ४ · २२ ॥
स्रग्विणस्त्वनुलिप्तांश्च वराभरणभूषितान्। नानावेषसमायुक्तान् यथास्वैरचरान् बहून्॥

sragviṇastvanuliptāṁśca varābharaṇabhūṣitān।
nānāveṣasamāyuktān yathāsvairacarān bahūn॥

किन्हींके गले में फूलों के हार थे और ललाट आदि अंग चन्दन से चर्चित थे। कोई श्रेष्ठ आभूषणों से सजे हुए थे। कितने ही नाना प्रकार के वेशभूषा से संयुक्त थे और बहुतेरे स्वेच्छानुसार विचरनेवाले जान पड़ते थे

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॥ ५ · ४ · २३ ॥
तीक्ष्णशूलधरांश्चैव वज्रिणश्च महाबलान्। शतसाहस्रमव्यग्रमारक्षं मध्यमं कपिः॥ रक्षोऽधिपतिनिर्दिष्टं ददर्शान्तःपुराग्रतः।

tīkṣṇaśūladharāṁścaiva vajriṇaśca mahābalān।
śatasāhasramavyagramārakṣaṁ madhyamaṁ kapiḥ॥
rakṣo'dhipatinirdiṣṭaṁ dadarśāntaḥpurāgrataḥ।

कितने ही राक्षस तीखे शूल तथा वज्र लिये हुए थे। वे सब-के-सब महान् बल से सम्पन्न थे। इनके सिवा कपिवर हनुमान् ने एक लाख रक्षक सेना को राक्षसराज रावण की आज्ञा से सावधान होकर नगर के मध्यभाग की रक्षा में संलग्न देखा। वे सारे सैनिक रावण के अन्तःपुर के अग्रभाग में स्थित थे

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॥ ५ · ४ · २४ ॥
तदा तद् गृहं दृष्ट्वा महाहाटकतोरणम्॥

sa tadā tad gṛhaṁ dṛṣṭvā mahāhāṭakatoraṇam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ४ · २५ ॥
राक्षसेन्द्रस्य विख्यातमद्रिमूर्ध्नि प्रतिष्ठितम्। पुण्डरीकावतंसाभिः परिखाभिः समावृतम्॥

rākṣasendrasya vikhyātamadrimūrdhni pratiṣṭhitam।
puṇḍarīkāvataṁsābhiḥ parikhābhiḥ samāvṛtam॥

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॥ ५ · ४ · २६ ॥
प्राकारावृतमत्यन्तं ददर्श महाकपिः। त्रिविष्टपनिभं दिव्यं दिव्यनादविनादितम्॥

prākārāvṛtamatyantaṁ dadarśa sa mahākapiḥ।
triviṣṭapanibhaṁ divyaṁ divyanādavināditam॥

॥ २४–२६ ॥

उस आरक्षाभवन को देखकर महाकपि हनुमान्जी ने राक्षसराज रावण के सुप्रसिद्ध राजमहल पर दृष्टिपात किया, जो त्रिकूट पर्वत के एक शिखर पर प्रतिष्ठित था। वह सब ओर से श्वेत कमलोंद्वारा अलंकृत खाइयों से घिरा हुआ था। उसके चारों ओर बहुत ऊँचा परकोटा था, जिसने उस राजभवन को घेर रखा था। वह दिव्य भवन स्वर्गलोक के समान मनोहर था और वहाँ संगीत आदि के दिव्य शब्द गूँज रहे थे

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॥ ५ · ४ · २७ ॥
वाजिहेषितसंघुष्टं नादितं भूषणैस्तथा। रथैर्यानैर्विमानैश्च तथा हयगजैः शुभैः॥

vājiheṣitasaṁghuṣṭaṁ nāditaṁ bhūṣaṇaistathā।
rathairyānairvimānaiśca tathā hayagajaiḥ śubhaiḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ४ · २८ ॥
वारणैश्च चतुर्दन्तैः श्वेताभ्रनिचयोपमैः। भूषितं रुचिरद्वारं मत्तैश्च मृगपक्षिभिः॥

vāraṇaiśca caturdantaiḥ śvetābhranicayopamaiḥ।
bhūṣitaṁ ruciradvāraṁ mattaiśca mṛgapakṣibhiḥ॥

॥ २७–२८ ॥

घोड़ों की हिनहिनाहट की आवाज भी वहाँ सब ओर फैली हुई थी। आभूषणों की रुनझुन भी कानों में पड़ती रहती थी। नाना प्रकार के रथ, पालकी आदि सवारी, विमान, सुन्दर हाथी, घोड़े, श्वेत बादलों की घटा के समान दिखायी देनेवाले चार दाँतों से युक्त सजे-सजाये मतवाले हाथी तथा मदमत्त पशु-पक्षियों के संचरण से उस राजमहल का द्वार बड़ा सुन्दर दिखायी देता था

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॥ ५ · ४ · २९ ॥
रक्षितं सुमहावीर्यैर्यातुधानैः सहस्रशः। राक्षसाधिपतेर्गुप्तमाविवेश गृहं कपिः॥

rakṣitaṁ sumahāvīryairyātudhānaiḥ sahasraśaḥ।
rākṣasādhipaterguptamāviveśa gṛhaṁ kapiḥ॥

सहस्रों महापराक्रमी निशाचर राक्षसराज के उस महल की रक्षा करते थे। उस गुप्त भवन में भी कपिवर हनुमान्जी जा पहुँचे

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॥ ५ · ४ · ३० ॥
सहेमजाम्बूनदचक्रवालं महार्हमुक्तामणिभूषितान्तम्। परार्ध्यकालागुरुचन्दनार्हं रावणान्तःपुरमाविवेश॥

sahemajāmbūnadacakravālaṁ mahārhamuktāmaṇibhūṣitāntam।
parārdhyakālāgurucandanārhaṁ sa rāvaṇāntaḥpuramāviveśa॥

तदनन्तर जिसके चारों ओर सुवर्ण एवं जाम्बूनद का परकोटा था, जिसका ऊपरी भाग बहुमूल्य मोती और मणियों से विभूषित था तथा अत्यन्त उत्तम काले अगुरु एवं चन्दन से जिसकी अर्चना की जाती थी, रावण के उस अन्तःपुर में हनुमान्जी ने प्रवेश किया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुर्थः सर्गः॥ ४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ॥ ४ ॥