वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः ४४ · २० श्लोकाःSarga 44 · 20 ślokas

प्रहस्त-पुत्र जम्बुमालीका वध

॥ ५ · ४४ · १ ॥
संदिष्टो राक्षसेन्द्रेण प्रहस्तस्य सुतो बली। जम्बुमाली महादंष्ट्रो निर्जगाम धनुर्धरः॥

saṁdiṣṭo rākṣasendreṇa prahastasya suto balī।
jambumālī mahādaṁṣṭro nirjagāma dhanurdharaḥ॥

राक्षसराज रावण की आज्ञा पाकर प्रहस्त का बलवान् पुत्र जम्बुमाली, जिसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं, हाथ में धनुष लिये राजमहल से बाहर निकला

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॥ ५ · ४४ · २ ॥
रक्तमाल्याम्बरधरः स्रग्वी रुचिरकुण्डलः। महान् विवृत्तनयनश्चण्डः समरदुर्जयः॥

raktamālyāmbaradharaḥ sragvī rucirakuṇḍalaḥ।
mahān vivṛttanayanaścaṇḍaḥ samaradurjayaḥ॥

वह लाल रंग के फूलों की माला और लाल रंग के ही वस्त्र पहने हुए था। उसके गले में हार और कानों में सुन्दर कुण्डल शोभा दे रहे थे। उसकी आँखें घूम रही थीं। वह विशालकाय, क्रोधी और संग्राम में दुर्जय था

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॥ ५ · ४४ · ३ ॥
धनुः शक्रधनुःप्रख्यं महद् रुचिरसायकम्। विस्फारयाणो वेगेन वज्राशनिसमस्वनम्॥

dhanuḥ śakradhanuḥprakhyaṁ mahad rucirasāyakam।
visphārayāṇo vegena vajrāśanisamasvanam॥

उसका धनुष इन्द्रधनुष के समान विशाल था। उसके द्वारा छोड़े जानेवाले बाण भी बड़े सुन्दर थे। जब वह वेग से उस धनुष को खींचता, तब उससे वज्र और अशनि के समान गड़गड़ाहट पैदा होती थी

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॥ ५ · ४४ · ४ ॥
तस्य विस्फारघोषेण धनुषो महता दिशः। प्रदिशश्च नभश्चैव सहसा समपूर्यत॥

tasya visphāraghoṣeṇa dhanuṣo mahatā diśaḥ।
pradiśaśca nabhaścaiva sahasā samapūryata॥

उस धनुष की महती टंकार-ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाएँ, विदिशाएँ और आकाश सभी सहसा गूँज उठे

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॥ ५ · ४४ · ५ ॥
रथेन खरयुक्तेन तमागतमुदीक्ष्य सः। हनूमान् वेगसम्पन्नो जहर्ष ननाद च॥

rathena kharayuktena tamāgatamudīkṣya saḥ।
hanūmān vegasampanno jaharṣa ca nanāda ca॥

वह गधे जुते हुए रथ पर बैठकर आया था। उसे देखकर वेगशाली हनुमान्जी बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोर से गर्जना करने लगे

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॥ ५ · ४४ · ६ ॥
तं तोरणविटङ्कस्थं हनूमन्तं महाकपिम्। जम्बुमाली महातेजा विव्याध निशितैः शरैः॥

taṁ toraṇaviṭaṅkasthaṁ hanūmantaṁ mahākapim।
jambumālī mahātejā vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ॥

महातेजस्वी जम्बुमाली ने महाकपि हनुमान्जी को फाटक के छज्जे पर खड़ा देख उन्हें तीखे बाणों से बींधना आरम्भ कर दिया

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॥ ५ · ४४ · ७ ॥
अर्धचन्द्रेण वदने शिरस्येकेन कर्णिना। बाह्वोर्विव्याध नाराचैर्दशभिस्तु कपीश्वरम्॥

ardhacandreṇa vadane śirasyekena karṇinā।
bāhvorvivyādha nārācairdaśabhistu kapīśvaram॥

उसने अर्धचन्द्र नामक बाण से उनके मुख पर, कर्णी नामक एक बाण से मस्तक पर और दस नाराचों से उन कपीश्वर की दोनों भुजाओं पर गहरी चोट की

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॥ ५ · ४४ · ८ ॥
तस्य तच्छुशुभे ताम्रं शरेणाभिहतं मुखम्। शरदीवाम्बुजं फुल्लं विद्धं भास्कररश्मिना॥

tasya tacchuśubhe tāmraṁ śareṇābhihataṁ mukham।
śaradīvāmbujaṁ phullaṁ viddhaṁ bhāskararaśminā॥

उसके बाण से घायल हुआ हनुमान्जी का लाल मुँह शरद्-ऋतु में सूर्य की किरणों से विद्ध हो खिले हुए लाल कमल के समान शोभा पा रहा था

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॥ ५ · ४४ · ९ ॥
तत्तस्य रक्तं रक्तेन रञ्जितं शुशुभे मुखम्। यथाऽऽकाशे महापद्मं सिक्तं काञ्चनबिन्दुभिः॥

tattasya raktaṁ raktena rañjitaṁ śuśubhe mukham।
yathā''kāśe mahāpadmaṁ siktaṁ kāñcanabindubhiḥ॥

रक्त से रञ्जित हुआ उनका वह रक्तवर्ण का मुख ऐसी शोभा पा रहा था, मानो आकाश में लाल रंग के विशाल कमल को सुवर्णमय जल की बूँदों से सींच दिया गया हो—उसपर सोने का पानी चढ़ा दिया गया हो

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॥ ५ · ४४ · १० ॥
चुकोप बाणाभिहतो राक्षसस्य महाकपिः। ततः पार्श्वेऽतिविपुलां ददर्श महतीं शिलाम्॥ तरसा तां समुत्पाट्य चिक्षेप जववद् बली।

cukopa bāṇābhihato rākṣasasya mahākapiḥ।
tataḥ pārśve'tivipulāṁ dadarśa mahatīṁ śilām॥
tarasā tāṁ samutpāṭya cikṣepa javavad balī।

राक्षस जम्बुमाली के बाणों की चोट खाकर महाकपि हनुमान्जी कुपित हो उठे। उन्होंने अपने पास ही पत्थर की एक बहुत बड़ी चट्टान पड़ी देखी और उसे वेग से उठाकर उन बलवान् वीर ने बड़े जोर से उस राक्षस की ओर फेंका

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॥ ५ · ४४ · ११ ॥
तां शरैर्दशभिः क्रुद्धस्ताडयामास राक्षसः॥

tāṁ śarairdaśabhiḥ kruddhastāḍayāmāsa rākṣasaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ४४ · १२ ॥
विपन्नं कर्म तद् दृष्ट्वा हनूमांश्चण्डविक्रमः। सालं विपुलमुत्पाट्य भ्रामयामास वीर्यवान्॥

vipannaṁ karma tad dṛṣṭvā hanūmāṁścaṇḍavikramaḥ।
sālaṁ vipulamutpāṭya bhrāmayāmāsa vīryavān॥

॥ ११–१२ ॥

किंतु क्रोध में भरे उस राक्षस ने दस बाण मारकर उस प्रस्तर-शिला को तोड़-फोड़ डाला। अपने उस कर्म को व्यर्थ हुआ देख प्रचण्ड पराक्रमी और बलशाली हनुमान् ने एक विशाल साल का वृक्ष उखाड़कर उसे घुमाना आरम्भ किया

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॥ ५ · ४४ · १३ ॥
भ्रामयन्तं कपिं दृष्ट्वा सालवृक्षं महाबलम्। चिक्षेप सुबहून् बाणाञ्जम्बुमाली महाबलः॥

bhrāmayantaṁ kapiṁ dṛṣṭvā sālavṛkṣaṁ mahābalam।
cikṣepa subahūn bāṇāñjambumālī mahābalaḥ॥

उन महान् बलशाली वानरवीर को साल का वृक्ष घुमाते देख महाबली जम्बुमाली ने उनके ऊपर बहुत-से बाणों की वर्षा की

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॥ ५ · ४४ · १४ ॥
सालं चतुर्भिश्चिच्छेद वानरं पञ्चभिर्भुजे। उरस्येकेन बाणेन दशभिस्तु स्तनान्तरे॥

sālaṁ caturbhiściccheda vānaraṁ pañcabhirbhuje।
urasyekena bāṇena daśabhistu stanāntare॥

उसने चार बाणों से सालवृक्ष को काट गिराया, पाँच से हनुमान्जी की भुजाओं में, एक बाण से उनकी छाती में और दस बाणों से उनके दोनों स्तनों के मध्यभाग में चोट पहुँचायी

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॥ ५ · ४४ · १५ ॥
शरैः पूरिततनुः क्रोधेन महता वृतः। तमेव परिघं गृह्य भ्रामयामास वेगितः॥

sa śaraiḥ pūritatanuḥ krodhena mahatā vṛtaḥ।
tameva parighaṁ gṛhya bhrāmayāmāsa vegitaḥ॥

बाणों से हनुमान्जी का सारा शरीर भर गया। फिर तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उसी परिघ को उठाकर उसे बड़े वेग से घुमाना आरम्भ किया

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॥ ५ · ४४ · १६ ॥
अतिवेगोऽतिवेगेन भ्रामयित्वा बलोत्कटः। परिघं पातयामास जम्बुमालेर्महोरसि॥

ativego'tivegena bhrāmayitvā balotkaṭaḥ।
parighaṁ pātayāmāsa jambumālermahorasi॥

अत्यन्त वेगवान् और उत्कट बलशाली हनुमान् ने बड़े वेग से घुमाकर उस परिघ को जम्बुमाली की विशाल छाती पर दे मारा

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॥ ५ · ४४ · १७ ॥
तस्य चैव शिरो नास्ति बाहू जानुनी च। धनुर्न रथो नाश्वास्तत्रादृश्यन्त नेषवः॥

tasya caiva śiro nāsti na bāhū jānunī na ca।
na dhanurna ratho nāśvāstatrādṛśyanta neṣavaḥ॥

फिर तो न उसके मस्तक का पता लगा और न दोनों भुजाओं तथा घुटनों का ही। न धनुष बचा न रथ, न वहाँ घोड़े दिखायी दिये और न बाण ही

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॥ ५ · ४४ · १८ ॥
हतस्तरसा तेन जम्बुमाली महारथः। पपात निहतो भूमौ चूर्णिताङ्ग इव द्रुमः॥

sa hatastarasā tena jambumālī mahārathaḥ।
papāta nihato bhūmau cūrṇitāṅga iva drumaḥ॥

उस परिघ से वेगपूर्वक मारा गया महारथी जम्बुमाली चूर-चूर हुए वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा

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॥ ५ · ४४ · १९ ॥
जम्बुमालिं सुनिहतं किंकरांश्च महाबलान्। चुक्रोध रावणः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः॥

jambumāliṁ sunihataṁ kiṁkarāṁśca mahābalān।
cukrodha rāvaṇaḥ śrutvā krodhasaṁraktalocanaḥ॥

जम्बुमाली तथा महाबली किंकरों के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण को बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें रोष से रक्तवर्ण की हो गयीं

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॥ ५ · ४४ · २० ॥
रोषसंवर्तितताम्रलोचनः प्रहस्तपुत्रे निहते महाबले। अमात्यपुत्रानतिवीर्यविक्रमान् समादिदेशाशु निशाचरेश्वरः॥

sa roṣasaṁvartitatāmralocanaḥ prahastaputre nihate mahābale।
amātyaputrānativīryavikramān samādideśāśu niśācareśvaraḥ॥

महाबली प्रहस्तपुत्र जम्बुमाली के मारे जाने पर निशाचरराज रावण के नेत्र रोष से लाल होकर घूमने लगे। उसने तुरंत ही अपने मन्त्री के पुत्रों को, जो बड़े बलवान् और पराक्रमी थे, युद्ध के लिये जाने की आज्ञा दी

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४ ॥