वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः २३ · १९ श्लोकाःSarga 23 · 19 ślokas

राक्षसियोंका सीताजीको समझाना

॥ ५ · २३ · १ ॥
इत्युक्त्वा मैथिलीं राजा रावणः शत्रुरावणः। संदिश्य ततः सर्वा राक्षसीर्निर्जगाम ह॥

ityuktvā maithilīṁ rājā rāvaṇaḥ śatrurāvaṇaḥ।
saṁdiśya ca tataḥ sarvā rākṣasīrnirjagāma ha॥

शत्रुओं को रुलानेवाला राजा रावण सीताजी से पूर्वोक्त बातें कहकर तथा सब राक्षसियों को उन्हें वश में लाने के लिये आदेश दे वहाँ से निकल गया

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॥ ५ · २३ · २ ॥
निष्क्रान्ते राक्षसेन्द्रे तु पुनरन्तःपुरं गते। राक्षस्यो भीमरूपास्ताः सीतां समभिदुद्रुवुः॥

niṣkrānte rākṣasendre tu punarantaḥpuraṁ gate।
rākṣasyo bhīmarūpāstāḥ sītāṁ samabhidudruvuḥ॥

अशोकवाटिका से निकलकर जब राक्षसराज रावण अन्तःपुर को चला गया, तब वहाँ जो भयानक रूपवाली राक्षसियाँ थीं, वे सब चारों ओर से दौड़ी हुई सीता के पास आयीं

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॥ ५ · २३ · ३ ॥
ततः सीतामुपागम्य राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः। परं परुषया वाचा वैदेहीमिदमब्रुवन्॥

tataḥ sītāmupāgamya rākṣasyaḥ krodhamūrcchitāḥ।
paraṁ paruṣayā vācā vaidehīmidamabruvan॥

विदेहकुमारी सीता के समीप आकर क्रोध से व्याकुल हुई उन राक्षसियों ने अत्यन्त कठोर वाणीद्वारा उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—

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॥ ५ · २३ · ४ ॥
पौलस्त्यस्य वरिष्ठस्य रावणस्य महात्मनः। दशग्रीवस्य भार्यात्वं सीते बहु मन्यसे॥

paulastyasya variṣṭhasya rāvaṇasya mahātmanaḥ।
daśagrīvasya bhāryātvaṁ sīte na bahu manyase॥

‘सीते! तुम पुलस्त्यजी के कुल में उत्पन्न हुए सर्वश्रेष्ठ दशग्रीव महामना रावण की भार्या बनना भी कोई बहुत बड़ी बात नहीं समझती?’

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॥ ५ · २३ · ५ ॥
ततस्त्वेकजटा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्। आमन्त्र्य क्रोधताम्राक्षी सीतां करतलोदरीम्॥

tatastvekajaṭā nāma rākṣasī vākyamabravīt।
āmantrya krodhatāmrākṣī sītāṁ karatalodarīm॥

तत्पश्चात् एकजटा नामवाली राक्षसी ने क्रोध से लाल आँखें करके कृशोदरी सीता को पुकारकर कहा—

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॥ ५ · २३ · ६ ॥
प्रजापतीनां षण्णां तु चतुर्थोऽयं प्रजापतिः। मानसो ब्रह्मणः पुत्रः पुलस्त्य इति विश्रुतः॥

prajāpatīnāṁ ṣaṇṇāṁ tu caturtho'yaṁ prajāpatiḥ।
mānaso brahmaṇaḥ putraḥ pulastya iti viśrutaḥ॥

‘विदेहकुमारी! पुलस्त्यजी छः प्रजापतियों में चौथे हैं और ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं। इस रूप में उनकी सर्वत्र ख्याति है

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॥ ५ · २३ · ७ ॥
पुलस्त्यस्य तु तेजस्वी महर्षिर्मानसः सुतः। नाम्ना विश्रवा नाम प्रजापतिसमप्रभः॥

pulastyasya tu tejasvī maharṣirmānasaḥ sutaḥ।
nāmnā sa viśravā nāma prajāpatisamaprabhaḥ॥

‘पुलस्त्यजी के मानस पुत्र तेजस्वी महर्षि विश्रवा हैं। वे भी प्रजापति के समान ही प्रकाशित होते हैं

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॥ ५ · २३ · ८ ॥
तस्य पुत्रो विशालाक्षि रावणः शत्रुरावणः। तस्य त्वं राक्षसेन्द्रस्य भार्या भवितुमर्हसि॥ मयोक्तं चारुसर्वाङ्गि वाक्यं किं नानुमन्यसे।

tasya putro viśālākṣi rāvaṇaḥ śatrurāvaṇaḥ।
tasya tvaṁ rākṣasendrasya bhāryā bhavitumarhasi॥
mayoktaṁ cārusarvāṅgi vākyaṁ kiṁ nānumanyase।

‘विशाललोचने! ये शत्रुओं के रुलानेवाले महाराज रावण उन्हींके पुत्र हैं और समस्त राक्षसों के राजा हैं। तुम्हें इनकी भार्या हो जाना चाहिये। सर्वांगसुन्दरी! मेरी इस कही हुई बात का तुम अनुमोदन क्यों नहीं करतीं?’

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॥ ५ · २३ · ९ ॥
ततो हरिजटा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्॥

tato harijaṭā nāma rākṣasī vākyamabravīt॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · २३ · १० ॥
विवृत्य नयने कोपान्मार्जारसदृशेक्षणा। येन देवास्त्रयस्त्रिंशद् देवराजश्च निर्जितः॥ तस्य त्वं राक्षसेन्द्रस्य भार्या भवितुमर्हसि।

vivṛtya nayane kopānmārjārasadṛśekṣaṇā।
yena devāstrayastriṁśad devarājaśca nirjitaḥ॥
tasya tvaṁ rākṣasendrasya bhāryā bhavitumarhasi।

॥ ९–१० ॥

इसके बाद बिल्ली के समान भूरे आँखोंवाली हरिजटा नाम की राक्षसी ने क्रोध से आँखें फाड़कर कहना आरम्भ किया—‘अरी! जिन्होंने तैंतीसों देवताओं तथा देवराज इन्द्र को भी परास्त कर दिया है, उन राक्षसराज रावण की रानी तो तुम्हें अवश्य बन जाना चाहिये

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॥ ५ · २३ · ११ ॥
वीर्योत्सिक्तस्य शूरस्य संग्रामेष्वनिवर्तिनः। बलिनो वीर्ययुक्तस्य भार्यात्वं किं लिप्ससे॥

vīryotsiktasya śūrasya saṁgrāmeṣvanivartinaḥ।
balino vīryayuktasya bhāryātvaṁ kiṁ na lipsase॥

‘उन्हें अपने पराक्रम पर गर्व है। वे युद्ध से पीछे न हटनेवाले शूरवीर हैं। ऐसे बल-पराक्रमसम्पन्न पुरुष की भार्या बनना तुम क्यों नहीं चाहती हो?

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॥ ५ · २३ · १२ ॥
प्रियां बहुमतां भार्यां त्यक्त्वा राजा महाबलः। सर्वासां महाभागां त्वामुपैष्यति रावणः॥

priyāṁ bahumatāṁ bhāryāṁ tyaktvā rājā mahābalaḥ।
sarvāsāṁ ca mahābhāgāṁ tvāmupaiṣyati rāvaṇaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · २३ · १३ ॥
समृद्धं स्त्रीसहस्रेण नानारत्नोपशोभितम्। अन्तःपुरं तदुत्सृज्य त्वामुपैष्यति रावणः॥

samṛddhaṁ strīsahasreṇa nānāratnopaśobhitam।
antaḥpuraṁ tadutsṛjya tvāmupaiṣyati rāvaṇaḥ॥

॥ १२–१३ ॥

‘महाबली राजा रावण अपनी अधिक प्रिय और सम्मानित भार्या मन्दोदरी को भी, जो सबकी स्वामिनी हैं, छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे। तुम्हारा कितना महान् सौभाग्य है। वे सहस्रों रमणियों से भरे हुए और अनेक प्रकार के रत्नों से सुशोभित उस अन्तःपुर को छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे (अतः तुम्हें उनकी प्रार्थना मान लेनी चाहिये)’

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॥ ५ · २३ · १४ ॥
अन्या तु विकटा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्। असकृद् भीमवीर्येण नागा गन्धर्वदानवाः। निर्जिताः समरे येन ते पार्श्वमुपागतः॥

anyā tu vikaṭā nāma rākṣasī vākyamabravīt।
asakṛd bhīmavīryeṇa nāgā gandharvadānavāḥ।
nirjitāḥ samare yena sa te pārśvamupāgataḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · २३ · १५ ॥
तस्य सर्वसमृद्धस्य रावणस्य महात्मनः। किमर्थं राक्षसेन्द्रस्य भार्यात्वं नेच्छसेऽधमे॥

tasya sarvasamṛddhasya rāvaṇasya mahātmanaḥ।
kimarthaṁ rākṣasendrasya bhāryātvaṁ necchase'dhame॥

॥ १४–१५ ॥

तदनन्तर विकटा नामवाली दूसरी राक्षसी ने कहा—‘जिन भयानक पराक्रमी राक्षसराज ने नागों, गन्धर्वों और दानवों को भी समरांगण में बारम्बार परास्त किया है, वे ही तुम्हारे पास पधारे थे। नीच नारी! उन्हीं सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न महामना राक्षसराज रावण की भार्या बनने के लिये तुम्हें क्यों इच्छा नहीं होती है?’

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॥ ५ · २३ · १६ ॥
ततस्तां दुर्मुखी नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्। यस्य सूर्यो तपति भीतो यस्य मारुतः। वाति स्मायतापाङ्गि किं त्वं तस्य तिष्ठसे॥

tatastāṁ durmukhī nāma rākṣasī vākyamabravīt।
yasya sūryo na tapati bhīto yasya sa mārutaḥ।
na vāti smāyatāpāṅgi kiṁ tvaṁ tasya na tiṣṭhase॥

फिर उनसे दुर्मुखी नामवाली राक्षसी ने कहा—‘विशाललोचने! जिनसे भय मानकर सूर्य तपना छोड़ देता है और वायु की गति रुक जाती है, उनके पास तुम क्यों नहीं रहती?

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॥ ५ · २३ · १७ ॥
पुष्पवृष्टिं तरवो मुमुचुर्यस्य वै भयात्। शैलाः सुस्रुवुः पानीयं जलदाश्च यदेच्छति॥

puṣpavṛṣṭiṁ ca taravo mumucuryasya vai bhayāt।
śailāḥ susruvuḥ pānīyaṁ jaladāśca yadecchati॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · २३ · १८ ॥
तस्य नैर्ऋतराजस्य राजराजस्य भामिनि। किं त्वं कुरुषे बुद्धिं भार्यार्थे रावणस्य हि॥

tasya nairṛtarājasya rājarājasya bhāmini।
kiṁ tvaṁ na kuruṣe buddhiṁ bhāryārthe rāvaṇasya hi॥

॥ १७–१८ ॥

‘भामिनि! जिनके भय से वृक्ष फूल बरसाने लगते हैं और जो जब इच्छा करते हैं, तभी पर्वत तथा मेघ जल का स्रोत बहाने लगते हैं। उन्हीं राजाधिराज राक्षसराज रावण की भार्या बनने के लिये तुम्हारे मन में क्यों नहीं विचार होता है?

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॥ ५ · २३ · १९ ॥
साधु ते तत्त्वतो देवि कथितं साधु भामिनि। गृहाण सुस्मिते वाक्यमन्यथा भविष्यसि॥

sādhu te tattvato devi kathitaṁ sādhu bhāmini।
gṛhāṇa susmite vākyamanyathā na bhaviṣyasi॥

‘देवि! मैंने तुमसे उत्तम, यथार्थ और हित की बात कही है। सुन्दर मुसकानवाली सीते! तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो तुम्हें प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २३ ॥