अङ्गदका लङ्काको जीतकर सीताको ले आनेका उत्साहपूर्ण विचार और जाम्बवान्के द्वारा उसका निवारण
tasya tad vacanaṁ śrutvā vālisūnurabhāṣata।
aśviputrau mahāvegau balavantau plavaṁgamau॥
हनुमान्जी की यह बात सुनकर बालिपुत्र अङ्गद ने कहा—‘अश्विनीकुमार के पुत्र ये मैन्द और द्विविद दोनों वानर अत्यन्त वेगशाली और बलवान् हैं
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pitāmahavarotsekāt paramaṁ darpamāsthitau।
aśvinormānanārthaṁ hi sarvalokapitāmahaḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
sarvāvadhyatvamatulamanayordattavān purā।
varotsekena mattau ca pramathya mahatīṁ camūm॥
surāṇāmamṛtaṁ vīrau pītavantau mahābalau।
‘पूर्वकाल में ब्रह्माजी का वर मिलने से इनका अभिमान बढ़ गया और ये बड़े घमण्ड में भर गये थे। सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने अश्विनीकुमारों का मान रखने के लिये पहले इन दोनों को यह अनुपम वरदान दिया था कि तुम्हें कोई भी मार नहीं सकता। उस वर के अभिमान से मत्त हो इन दोनों महाबली वीरों ने देवताओं की विशाल सेना को मथकर अमृत पी लिया था
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etāveva hi saṁrabdhau savājirathakuñjaram॥
laṅkāṁ nāśayituṁ śaktau sarve tiṣṭhantu vānarāḥ।
‘ये ही दोनों यदि क्रोध में भर जायँ तो हाथी, घोड़े और रथोंसहित समूची लङ्का का नाश कर सकते हैं। भले ही और सब वानर बैठे रहें
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ahameko'pi paryāptaḥ sarākṣasagaṇāṁ purīm॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
tāṁ laṅkāṁ tarasā hantuṁ rāvaṇaṁ ca mahābalam।
kiṁ punaḥ sahito vīrairbalavadbhiḥ kṛtātmabhiḥ॥
kṛtāstraiḥ plavagaiḥ śaktairbhavadbhirvijayaiṣibhiḥ।
‘मैं अकेला भी राक्षसगणोंसहित समस्त लङ्कापुरी का वेगपूर्वक विध्वंस करने तथा महाबली रावण को मार डालने के लिये पर्याप्त हूँ। फिर यदि सम्पूर्ण अस्त्रों को जाननेवाले आप-जैसे वीर, बलवान्, शुद्धात्मा, शक्तिशाली और विजयाभिलाषी वानरों की सहायता मिल जाय, तब तो कहना ही क्या है?
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vāyusūnorbalenaiva dagdhā laṅketi naḥ śrutam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
dṛṣṭā devī na cānītā iti tatra niveditum।
na yuktamiva paśyāmi bhavadbhiḥ khyātapauruṣaiḥ॥
‘वायुपुत्र हनुमान्जी ने अकेले जाकर अपने पराक्रम से ही लङ्का को फूँक डाला—यह बात हम सबलोगों ने सुन ही ली। आप-जैसे ख्यातनामा पुरुषार्थी वीरों के रहते हुए मुझे भगवान् श्रीराम के सामने यह निवेदन करना उचित नहीं जान पड़ता कि ‘हमने सीतादेवी का दर्शन तो किया, किंतु उन्हें ला नहीं सके’
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nahi vaḥ plavane kaścinnāpi kaścit parākrame।
tulyaḥ sāmaradaityeṣu lokeṣu harisattamāḥ॥
‘वानरशिरोमणियो! देवताओं और दैत्योंसहित सम्पूर्ण लोकों में कोई भी ऐसा वीर नहीं है, जो दूरतक की छलाँग मारने और पराक्रम दिखाने में आप-लोगों की समानता कर सके
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jitvā laṅkāṁ sarakṣaughāṁ hatvā taṁ rāvaṇaṁ raṇe।
sītāmādāya gacchāmaḥ siddhārthā hṛṣṭamānasāḥ॥
‘अतः निशाचरसमुदायसहित लङ्का को जीतकर, युद्ध में रावण का वध करके, सीता को साथ ले, सफल-मनोरथ एवं प्रसन्नचित्त होकर हमलोग श्रीरामचन्द्रजी के पास चलें
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teṣvevaṁ hatavīreṣu rākṣaseṣu hanumatā।
kimanyatra kartavyaṁ gṛhītvā yāma jānakīm॥
‘जब हनुमान्जी ने राक्षसों के प्रमुख वीरों को मार डाला है, ऐसी परिस्थिति में हमारा इसके सिवा और क्या कर्तव्य हो सकता है कि हम जनकनन्दिनी सीता को साथ लेकर ही चलें
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rāmalakṣmaṇayormadhye nyasyāma janakātmajām।
kiṁ vyalīkaistu tān sarvān vānarān vānararṣabhān॥
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vayameva hi gatvā tān hatvā rākṣasapuṅgavān।
rāghavaṁ draṣṭumarhāmaḥ sugrīvaṁ sahalakṣmaṇam॥
‘कपिवरो! हम जनककिशोरी को ले चलकर श्रीराम और लक्ष्मण के बीच में खड़ी कर दें। किष्किन्धा में जुटे हुए उन सब वानरों को कष्ट देने की क्या आवश्यकता है। हमलोग ही लङ्का में चलकर वहाँ के मुख्य-मुख्य राक्षसों का वध कर डालें, उसके बाद लौटकर श्रीराम, लक्ष्मण तथा सुग्रीव का दर्शन करें’
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tamevaṁ kṛtasaṁkalpaṁ jāmbavān harisattamaḥ।
uvāca paramaprīto vākyamarthavadarthavit॥
अङ्गद का ऐसा संकल्प जानकर वानर-भालुओं में श्रेष्ठ और अर्थतत्त्व के ज्ञाता जाम्बवान् ने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह सार्थक बात कही—
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naiṣā buddhirmahābuddhe yad bravīṣi mahākape।
vicetuṁ vayamājñaptā dakṣiṇāṁ diśamuttamām॥
nānetuṁ kapirājena naiva rāmeṇa dhīmatā।
‘महाकपे! तुम बड़े बुद्धिमान् हो तथापि इस समय जो कुछ कह रहे हो, यह बुद्धिमानी की बात नहीं है; क्योंकि वानरराज सुग्रीव तथा परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम ने हमें उत्तम दक्षिण दिशा में केवल सीता को खोजने की आज्ञा दी है, साथ ले आने की नहीं
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kathaṁcinnirjitāṁ sītāmasmābhirnābhirocayet॥
rāghavo nṛpaśārdūlaḥ kulaṁ vyapadiśan svakam।
‘यदि हमलोग किसी तरह सीता को जीतकर उनके पास ले भी चलें तो नृपश्रेष्ठ श्रीराम अपने कुल के व्यवहार का स्मरण करते हुए हमारे इस कार्य को पसंद नहीं करेंगे
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pratijñāya svayaṁ rājā sītāvijayamagrataḥ॥
sarveṣāṁ kapimukhyānāṁ kathaṁ mithyā kariṣyati।
‘राजा श्रीराम ने सभी प्रमुख वानरवीरों के सामने स्वयं ही सीता को जीतकर लाने की प्रतिज्ञा की है, उसे वे मिथ्या कैसे करेंगे?
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viphalaṁ karma ca kṛtaṁ bhavet tuṣṭirna tasya ca॥
vṛthā ca darśitaṁ vīryaṁ bhaved vānarapuṅgavāḥ।
‘अतः वानरशिरोमणियो! ऐसी अवस्था में हमारा किया-कराया कार्य निष्फल हो जायगा। भगवान् श्रीराम को संतोष भी नहीं होगा और हमारा पराक्रम दिखाना भी व्यर्थ सिद्ध होगा
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tasmād gacchāma vai sarve yatra rāmaḥ salakṣmaṇaḥ।
sugrīvaśca mahātejāḥ kāryasyāsya nivedane॥
‘इसलिये हम सब लोग इस कार्य की सूचना देने के लिये वहीं चलें, जहाँ लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीराम और महातेजस्वी सुग्रीव विद्यमान हैं
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na tāvadeṣā matirakṣamā no
yathā bhavān paśyati rājaputra।
yathā tu rāmasya matirniviṣṭā
tathā bhavān paśyatu kāryasiddhim॥
‘राजकुमार! तुम जैसा देखते या सोचते हो, यह विचार हमलोगों के योग्य ही है—हम इसे न कर सकें, ऐसी बात नहीं है; तथापि इस विषय में भगवान् श्रीराम का जैसा निश्चय हो, उसीके अनुसार तुम्हें कार्यसिद्धि पर दृष्टि रखनी चाहिये’
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षष्टितमः सर्गः॥ ६० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६० ॥