वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः ६६ · १५ श्लोकाःSarga 66 · 15 ślokas

चूडामणिको देखकर और सीताका समाचार पाकर श्रीरामका उनके लिये विलाप

॥ ५ · ६६ · १ ॥
एवमुक्तो हनुमता रामो दशरथात्मजः। तं मणिं हृदये कृत्वा रुरोद सहलक्ष्मणः॥

evamukto hanumatā rāmo daśarathātmajaḥ।
taṁ maṇiṁ hṛdaye kṛtvā ruroda sahalakṣmaṇaḥ॥

हनुमान्जी के ऐसा कहने पर दशरथनन्दन श्रीराम उस मणि को अपनी छाती से लगाकर रोने लगे। साथ ही लक्ष्मण भी रो पड़े

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · २ ॥
तं तु दृष्ट्वा मणिश्रेष्ठं राघवः शोककर्शितः। नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां सुग्रीवमिदमब्रवीत्॥

taṁ tu dṛṣṭvā maṇiśreṣṭhaṁ rāghavaḥ śokakarśitaḥ।
netrābhyāmaśrupūrṇābhyāṁ sugrīvamidamabravīt॥

उस श्रेष्ठ मणि की ओर देखकर शोक से व्याकुल हुए श्रीरघुनाथजी अपने दोनों नेत्रों में आँसू भरकर सुग्रीव से इस प्रकार बोले—

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · ३ ॥
यथैव धेनुः स्रवति स्नेहाद् वत्सस्य वत्सला। तथा ममापि हृदयं मणिश्रेष्ठस्य दर्शनात्॥

yathaiva dhenuḥ sravati snehād vatsasya vatsalā।
tathā mamāpi hṛdayaṁ maṇiśreṣṭhasya darśanāt॥

‘मित्र! जैसे वत्सला धेनु अपने बछड़े के स्नेह से थनों से दूध झरने लगती है, उसी प्रकार इस उत्तम मणि को देखकर आज मेरा हृदय भी द्रवीभूत हो रहा है

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · ४ ॥
मणिरत्नमिदं दत्तं वैदेह्याः श्वशुरेण मे। वधूकाले यथा बद्धमधिकं मूर्ध्नि शोभते॥

maṇiratnamidaṁ dattaṁ vaidehyāḥ śvaśureṇa me।
vadhūkāle yathā baddhamadhikaṁ mūrdhni śobhate॥

‘मेरे श्वशुर राजा जनक ने विवाह के समय वैदेही को यह मणिरत्न दिया था, जो उसके मस्तक पर आबद्ध होकर बड़ी शोभा पाता था

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · ५ ॥
अयं हि जलसम्भूतो मणिः प्रवरपूजितः। यज्ञे परमतुष्टेन दत्तः शक्रेण धीमता॥

ayaṁ hi jalasambhūto maṇiḥ pravarapūjitaḥ।
yajñe paramatuṣṭena dattaḥ śakreṇa dhīmatā॥

‘जल से प्रकट हुई यह मणि श्रेष्ठ देवताओंद्वारा पूजित है। किसी यज्ञ में बहुत संतुष्ट हुए बुद्धिमान् इन्द्र ने राजा जनक को यह मणि दी थी

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · ६ ॥
इमं दृष्ट्वा मणिश्रेष्ठं तथा तातस्य दर्शनम्। अद्यास्म्यवगतः सौम्य वैदेहस्य तथा विभोः॥

imaṁ dṛṣṭvā maṇiśreṣṭhaṁ tathā tātasya darśanam।
adyāsmyavagataḥ saumya vaidehasya tathā vibhoḥ॥

‘सौम्य! इस मणिरत्न का दर्शन करके आज मुझे मानो अपने पूज्य पिता का और विदेहराज महाराज जनक का भी दर्शन मिल गया हो, ऐसा अनुभव हो रहा है

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · ७ ॥
अयं हि शोभते तस्याः प्रियाया मूर्ध्नि मे मणिः। अद्यास्य दर्शनेनाहं प्राप्तां तामिव चिन्तये॥

ayaṁ hi śobhate tasyāḥ priyāyā mūrdhni me maṇiḥ।
adyāsya darśanenāhaṁ prāptāṁ tāmiva cintaye॥

‘यह मणि सदा मेरी प्रिया सीता के सीमन्त पर शोभा पाती थी। आज इसे देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो सीता ही मुझे मिल गयी

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · ८ ॥
किमाह सीता वैदेही ब्रूहि सौम्य पुनः पुनः। परासुमिव तोयेन सिञ्चन्ती वाक्यवारिणा॥

kimāha sītā vaidehī brūhi saumya punaḥ punaḥ।
parāsumiva toyena siñcantī vākyavāriṇā॥

‘सौम्य पवनकुमार! जैसे बेहोश हुए मनुष्य को होश में लाने के लिये उसपर जल के छींटे दिये जाते हैं, उसी प्रकार विदेहनन्दिनी सीता ने मूर्च्छित हुए-से मुझ राम को अपने वाक्यरूपी शीतल जल से सींचते हुए क्या-क्या कहा है? यह बारंबार बताओ’

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · ९ ॥
इतस्तु किं दुःखतरं यदिमं वारिसम्भवम्। मणिं पश्यामि सौमित्रे वैदेहीमागतां विना॥

itastu kiṁ duḥkhataraṁ yadimaṁ vārisambhavam।
maṇiṁ paśyāmi saumitre vaidehīmāgatāṁ vinā॥

(अब वे लक्ष्मण से बोले—) ‘सुमित्रानन्दन! सीता के यहाँ आये बिना ही जो जल से उत्पन्न हुई इस मणि को मैं देख रहा हूँ। इससे बढ़कर दुःख की बात और क्या हो सकती है’

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · १० ॥
चिरं जीवति वैदेही यदि मासं धरिष्यति। क्षणं वीर जीवेयं विना तामसितेक्षणाम्॥

ciraṁ jīvati vaidehī yadi māsaṁ dhariṣyati।
kṣaṇaṁ vīra na jīveyaṁ vinā tāmasitekṣaṇām॥

(फिर वे हनुमान्जी से बोले—) ‘वीर पवनकुमार! यदि विदेहनन्दिनी सीता एक मासतक जीवन धारण कर लेगी, तब तो वह बहुत समयतक जी रही है। मैं तो कजरारे नेत्रोंवाली जानकी के बिना अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · ११ ॥
नय मामपि तं देशं यत्र दृष्टा मम प्रिया। तिष्ठेयं क्षणमपि प्रवृत्तिमुपलभ्य च॥

naya māmapi taṁ deśaṁ yatra dṛṣṭā mama priyā।
na tiṣṭheyaṁ kṣaṇamapi pravṛttimupalabhya ca॥

‘तुमने जहाँ मेरी प्रिया को देखा है, उसी देश में मुझे भी ले चलो। उसका समाचार पाकर अब मैं एक क्षण भी यहाँ नहीं रुक सकता

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · १२ ॥
कथं सा मम सुश्रोणी भीरुभीरुः सती तदा। भयावहानां घोराणां मध्ये तिष्ठति रक्षसाम्॥

kathaṁ sā mama suśroṇī bhīrubhīruḥ satī tadā।
bhayāvahānāṁ ghorāṇāṁ madhye tiṣṭhati rakṣasām॥

‘हाय! मेरी सती-साध्वी सुमध्यमा सीता बड़ी भीरु है। वह उन घोर रूपधारी भयंकर राक्षसों के बीच में कैसे रहती होगी?

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · १३ ॥
शारदस्तिमिरोन्मुक्तो नूनं चन्द्र इवाम्बुदैः। आवृतो वदनं तस्या विराजति साम्प्रतम्॥

śāradastimironmukto nūnaṁ candra ivāmbudaiḥ।
āvṛto vadanaṁ tasyā na virājati sāmpratam॥

‘निश्चय ही अन्धकार से मुक्त किंतु बादलों से ढके हुए शरत्कालीन चन्द्रमा के समान सीता का मुख इस समय शोभा नहीं पा रहा होगा

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · १४ ॥
किमाह सीता हनुमंस्तत्त्वतः कथयस्व मे। एतेन खलु जीविष्ये भेषजेनातुरो यथा॥

kimāha sītā hanumaṁstattvataḥ kathayasva me।
etena khalu jīviṣye bheṣajenāturo yathā॥

‘हनुमन्! मुझे ठीक-ठीक बताओ, सीता ने क्या-क्या कहा है? जैसे रोगी दवा लेने से जीता है, उसी प्रकार मैं सीता के इस संदेश-वाक्य को सुनकर ही जीवन धारण करूँगा

English translation coming soon.

॥ ५ · ६६ · १५ ॥
मधुरा मधुरालापा किमाह मम भामिनी। मद्विहीना वरारोहा हनुमन् कथयस्व मे। दुःखाद् दुःखतरं प्राप्य कथं जीवति जानकी॥

madhurā madhurālāpā kimāha mama bhāminī।
madvihīnā varārohā hanuman kathayasva me।
duḥkhād duḥkhataraṁ prāpya kathaṁ jīvati jānakī॥

‘हनुमन्! मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी सुन्दर कटिप्रदेशवाली मधुरभाषिणी सुन्दरी प्रियतमा जनकनन्दिनी सीता ने मेरे लिये कौन-सा संदेश दिया है? वह दुःख-पर-दुःख उठाकर भी कैसे जीवन धारण कर रही है?’

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः॥ ६६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६ ॥