वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः १७ · ३२ श्लोकाःSarga 17 · 32 ślokas

भयंकर राक्षसियोंसे घिरी हुई सीताके दर्शनसे हनुमान्जीका प्रसन्न होना

॥ ५ · १७ · १ ॥
ततः कुमुदखण्डाभो निर्मलं निर्मलोदयः। प्रजगाम नभश्चन्द्रो हंसो नीलमिवोदकम्॥

tataḥ kumudakhaṇḍābho nirmalaṁ nirmalodayaḥ।
prajagāma nabhaścandro haṁso nīlamivodakam॥

तदनन्तर वह दिन बीतने के पश्चात् कुमुदसमूह के समान श्वेत वर्णवाले तथा निर्मलरूप से उदित हुए चन्द्रदेव स्वच्छ आकाश में कुछ ऊपर को चढ़ आये। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई हंस किसी नील जलराशि में तैर रहा हो

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॥ ५ · १७ · २ ॥
साचिव्यमिव कुर्वन् प्रभया निर्मलप्रभः। चन्द्रमा रश्मिभिः शीतैः सिषेवे पवनात्मजम्॥

sācivyamiva kurvan sa prabhayā nirmalaprabhaḥ।
candramā raśmibhiḥ śītaiḥ siṣeve pavanātmajam॥

निर्मल कान्तिवाले चन्द्रमा अपनी प्रभा से सीताजी के दर्शन आदि में पवनकुमार हनुमान्जी की सहायता-सी करते हुए अपनी शीतल किरणोंद्वारा उनकी सेवा करने लगे

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॥ ५ · १७ · ३ ॥
ददर्श ततः सीतां पूर्णचन्द्रनिभाननाम्। शोकभारैरिव न्यस्तां भारैर्नावमिवाम्भसि॥

sa dadarśa tataḥ sītāṁ pūrṇacandranibhānanām।
śokabhārairiva nyastāṁ bhārairnāvamivāmbhasi॥

उस समय उन्होंने पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली सीता को देखा, जो जल में अधिक बोझ के कारण दबी हुई नौका की भाँति शोक के भारी भार से मानो झुक गयी थीं

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॥ ५ · १७ · ४ ॥
दिदृक्षमाणो वैदेहीं हनुमान् मारुतात्मजः। ददर्शाविदूरस्था राक्षसीर्घोरदर्शनाः॥

didṛkṣamāṇo vaidehīṁ hanumān mārutātmajaḥ।
sa dadarśāvidūrasthā rākṣasīrghoradarśanāḥ॥

वायुपुत्र हनुमान्जी ने जब विदेहकुमारी सीता को देखने के लिये अपनी दृष्टि दौड़ायी, तब उन्हें उनके पास ही बैठी हुई भयानक दृष्टिवाली बहुत-सी राक्षसियाँ दिखायी दीं

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॥ ५ · १७ · ५ ॥
एकाक्षीमेककर्णां कर्णप्रावरणां तथा। अकर्णां शङ्कुकर्णां मस्तकोच्छ्वासनासिकाम्॥

ekākṣīmekakarṇāṁ ca karṇaprāvaraṇāṁ tathā।
akarṇāṁ śaṅkukarṇāṁ ca mastakocchvāsanāsikām॥

उनमें से किसी के एक आँख थी तो दूसरी के एक कान। किसी-किसी के कान इतने बड़े थे कि वह उन्हें चादर की भाँति ओढ़े हुए थीं। किसी के कान ही नहीं थे और किसी के कान ऐसे दिखायी देते थे मानो खूँटे गड़े हुए हों। किसी-किसी की साँस लेनेवाली नाक उसके मस्तक पर थी

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॥ ५ · १७ · ६ ॥
अतिकायोत्तमांगीं तनुदीर्घशिरोधराम्। ध्वस्तकेशीं तथाकेशीं केशकम्बलधारिणीम्॥

atikāyottamāṁgīṁ ca tanudīrghaśirodharām।
dhvastakeśīṁ tathākeśīṁ keśakambaladhāriṇīm॥

किसी का शरीर बहुत बड़ा था और किसी का बहुत उत्तम। किसी की गर्दन पतली और बड़ी थी। किसी के केश उड़ गये थे और किसी-किसी के माथे पर केश उगे ही नहीं थे। कोई-कोई राक्षसी अपने शरीर के केशों का ही कम्बल धारण किये हुए थी

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॥ ५ · १७ · ७ ॥
लम्बकर्णललाटां लम्बोदरपयोधराम्। लम्बोष्ठीं चिबुकोष्ठीं लम्बास्यां लम्बजानुकाम्॥

lambakarṇalalāṭāṁ ca lambodarapayodharām।
lamboṣṭhīṁ cibukoṣṭhīṁ ca lambāsyāṁ lambajānukām॥

किसी के कान और ललाट बड़े-बड़े थे तो किसी के पेट और स्तन लंबे थे। किसी के ओठ बड़े होने के कारण लटक रहे थे तो किसी के ठोड़ी में ही सटे हुए थे। किसी का मुँह बड़ा था और किसी के घुटने

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॥ ५ · १७ · ८ ॥
ह्रस्वां दीर्घां कुब्जां विकटां वामनां तथा। करालां भुग्नवक्त्रां पिंगाक्षीं विकृताननाम्॥

hrasvāṁ dīrghāṁ ca kubjāṁ ca vikaṭāṁ vāmanāṁ tathā।
karālāṁ bhugnavaktrāṁ ca piṁgākṣīṁ vikṛtānanām॥

कोई नाटी, कोई लंबी, कोई कुबड़ी, कोई टेढ़ी-मेढ़ी, कोई बवनी, कोई विकराल, कोई टेढ़े मुँहवाली, कोई पीली आँखवाली और कोई विकट मुँहवाली थीं

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॥ ५ · १७ · ९ ॥
विकृताः पिंगलाः कालीः क्रोधनाः कलहप्रियाः। कालायसमहाशूलकूटमुद्गरधारिणीः॥

vikṛtāḥ piṁgalāḥ kālīḥ krodhanāḥ kalahapriyāḥ।
kālāyasamahāśūlakūṭamudgaradhāriṇīḥ॥

कितनी ही राक्षसियाँ बिगड़े शरीरवाली, काली, पीली, क्रोध करनेवाली और कलह पसंद करनेवाली थीं। उन सबने काले लोहे के बने हुए बड़े-बड़े शूल, कूट और मुद्गर धारण कर रखे थे

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॥ ५ · १७ · १० ॥
वराहमृगशार्दूलमहिषाजशिवामुखाः। गजोष्ट्रहयपादाश्च निखातशिरसोऽपराः॥

varāhamṛgaśārdūlamahiṣājaśivāmukhāḥ।
gajoṣṭrahayapādāśca nikhātaśiraso'parāḥ॥

कितनी ही राक्षसियों के मुख सूअर, मृग, सिंह, भैंस, बकरी और सियारिनों के समान थे। किन्हीं के पैर हाथियों के समान, किन्हीं के ऊँटों के समान और किन्हीं के घोड़ों के समान थे। किन्हीं-किन्हीं के सिर कबन्ध की भाँति छाती में स्थित थे; अतः गड्ढे के समान दिखायी देते थे। (अथवा किन्हीं-किन्हीं के सिर में गड्ढे थे)

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॥ ५ · १७ · ११ ॥
एकहस्तैकपादाश्च खरकर्ण्यश्वकर्णिकाः। गोकर्णींहस्तिकर्णींश्च हरिकर्णींस्तथापराः॥

ekahastaikapādāśca kharakarṇyaśvakarṇikāḥ।
gokarṇīṁhastikarṇīṁśca harikarṇīṁstathāparāḥ॥

किन्हीं के एक हाथ थे तो किन्हीं के एक पैर। किन्हीं के कान गदहों के समान थे तो किन्हीं के घोड़ों के समान। किन्हीं-किन्हीं के कान गौओं, हाथियों और सिंहों के समान दृष्टिगोचर होते थे

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॥ ५ · १७ · १२ ॥
अतिनासाश्च काश्चिच्च तिर्यङ्नासा अनासिकाः। गजसंनिभनासाश्च ललाटोच्छ्वासनासिकाः॥

atināsāśca kāścicca tiryaṅnāsā anāsikāḥ।
gajasaṁnibhanāsāśca lalāṭocchvāsanāsikāḥ॥

किन्हीं की नासिकाएँ बहुत बड़ी थीं और किन्हीं की तिरछी। किन्हीं-किन्हीं के नाक ही नहीं थी। कोई-कोई हाथी की सूँड़ के समान नाकवाली थीं और किन्हीं-किन्हीं की नासिकाएँ ललाट में ही थीं, जिनसे वे साँस लिया करती थीं

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॥ ५ · १७ · १३ ॥
हस्तिपादा महापादा गोपादाः पादचूलिकाः। अतिमात्रशिरोग्रीवा अतिमात्रकुचोदरीः॥

hastipādā mahāpādā gopādāḥ pādacūlikāḥ।
atimātraśirogrīvā atimātrakucodarīḥ॥

किन्हीं के पैर हाथियों के समान थे और किन्हीं के गौओं के समान। कोई बड़े-बड़े पैर धारण करती थीं और कितनी ही ऐसी थीं जिनके पैरों में चोटी के समान केश उगे हुए थे। बहुत-सी राक्षसियाँ बेहद लंबे सिर और गर्दनवाली थीं और कितनों के पेट तथा स्तन बहुत बड़े-बड़े थे

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॥ ५ · १७ · १४ ॥
अतिमात्रास्यनेत्राश्च दीर्घजिह्वाननास्तथा। अजामुखीर्हस्तिमुखीर्गोमुखीः सूकरीमुखीः॥ हयोष्ट्रखरवक्त्राश्च राक्षसीर्घोरदर्शनाः।

atimātrāsyanetrāśca dīrghajihvānanāstathā।
ajāmukhīrhastimukhīrgomukhīḥ sūkarīmukhīḥ॥
hayoṣṭrakharavaktrāśca rākṣasīrghoradarśanāḥ।

किन्हीं के मुँह और नेत्र सीमा से अधिक बड़े थे, किन्हीं-किन्हीं के मुखों में बड़ी-बड़ी जिह्वाएँ थीं और कितनी ही ऐसी राक्षसियाँ थीं, जो बकरी, हाथी, गाय, सूअर, घोड़े, ऊँट और गदहों के समान मुँह धारण करती थीं। इसीलिये वे देखने में बड़ी भयंकर थीं

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॥ ५ · १७ · १५ ॥
शूलमुद्गरहस्ताश्च क्रोधनाः कलहप्रियाः॥

śūlamudgarahastāśca krodhanāḥ kalahapriyāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · १७ · १६ ॥
कराला धूम्रकेशिन्यो राक्षसीर्विकृताननाः। पिबन्ति सततं पानं सुरामांससदाप्रियाः॥

karālā dhūmrakeśinyo rākṣasīrvikṛtānanāḥ।
pibanti satataṁ pānaṁ surāmāṁsasadāpriyāḥ॥

॥ १५–१६ ॥

किन्हीं के हाथ में शूल थे तो किन्हीं के मुद्गर। कोई क्रोधी स्वभाव की थीं तो कोई कलह से प्रेम रखती थीं। धुएँ-जैसे केश और विकृत मुखवाली कितनी ही विकराल राक्षसियाँ सदा मद्यपान किया करती थीं। मदिरा और मांस उन्हें सदा प्रिय थे

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॥ ५ · १७ · १७ ॥
मांसशोणितदिग्धांगीर्मांसशोणितभोजनाः। ता ददर्श कपिश्रेष्ठो रोमहर्षणदर्शनाः॥

māṁsaśoṇitadigdhāṁgīrmāṁsaśoṇitabhojanāḥ।
tā dadarśa kapiśreṣṭho romaharṣaṇadarśanāḥ॥

कितनी ही अपने अंगों में रक्त और मांस का लेप लगाये रहती थीं। रक्त और मांस ही उनके भोजन थे। उन्हें देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी ने उन सबको देखा

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॥ ५ · १७ · १८ ॥
स्कन्धवन्तमुपासीनाः परिवार्य वनस्पतिम्। तस्याधस्ताच्च तां देवीं राजपुत्रीमनिन्दिताम्॥

skandhavantamupāsīnāḥ parivārya vanaspatim।
tasyādhastācca tāṁ devīṁ rājaputrīmaninditām॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · १७ · १९ ॥
लक्षयामास लक्ष्मीवान् हनूमाञ्जनकात्मजाम्। निष्प्रभां शोकसंतप्तां मलसंकुलमूर्धजाम्॥

lakṣayāmāsa lakṣmīvān hanūmāñjanakātmajām।
niṣprabhāṁ śokasaṁtaptāṁ malasaṁkulamūrdhajām॥

॥ १८–१९ ॥

वे उत्तम शाखावाले उस अशोकवृक्ष को चारों ओर से घेरकर उससे थोड़ी दूर पर बैठी थीं और सती साध्वी राजकुमारी सीता देवी उसी वृक्ष के नीचे उसकी जड़ से सटी हुई बैठी थीं। उस समय शोभाशाली हनुमान्जी ने जनककिशोरी जानकीजी की ओर विशेषरूप से लक्ष्य किया। उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। वे शोक से संतप्त थीं और उनके केशों में मैल जम गयी थी

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॥ ५ · १७ · २० ॥
क्षीणपुण्यां च्युतां भूमौ तारां निपतितामिव। चारित्रव्यपदेशाढ्यां भर्तृदर्शनदुर्गताम्॥

kṣīṇapuṇyāṁ cyutāṁ bhūmau tārāṁ nipatitāmiva।
cāritravyapadeśāḍhyāṁ bhartṛdarśanadurgatām॥

जैसे पुण्य क्षीण हो जाने पर कोई तारा स्वर्ग से टूटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा हो, उसी तरह वे भी कान्तिहीन दिखायी देती थीं। वे आदर्श चरित्र (पातिव्रत्य) से सम्पन्न तथा इसके लिये सुविख्यात थीं। उन्हें पति के दर्शन के लिये लाले पड़े थे

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॥ ५ · १७ · २१ ॥
भूषणैरुत्तमैर्हीनां भर्तृवात्सल्यभूषिताम्। राक्षसाधिपसंरुद्धां बन्धुभिश्च विनाकृताम्॥

bhūṣaṇairuttamairhīnāṁ bhartṛvātsalyabhūṣitām।
rākṣasādhipasaṁruddhāṁ bandhubhiśca vinākṛtām॥

वे उत्तम भूषणों से रहित थीं तो भी पति के वात्सल्य से विभूषित थीं (पति का स्नेह ही उनके लिये शृंगार था)। राक्षसराज रावण ने उन्हें बंदिनी बना रखा था। वे स्वजनों से बिछुड़ गयी थीं

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॥ ५ · १७ · २२ ॥
वियूथां सिंहसंरुद्धां बद्धां गजवधूमिव। चन्द्ररेखां पयोदान्ते शारदाभ्रैरिवावृताम्॥

viyūthāṁ siṁhasaṁruddhāṁ baddhāṁ gajavadhūmiva।
candrarekhāṁ payodānte śāradābhrairivāvṛtām॥

जैसे कोई हथिनी अपने यूथ से अलग हो गयी हो, यूथपति के स्नेह से बँधी हो और उसे किसी सिंह ने रोक लिया हो। रावण की कैद में पड़ी हुई सीता की भी वैसी ही दशा थी। वे वर्षाकाल बीत जाने पर शरद्-ऋतु के श्वेत बादलों से घिरी हुई चन्द्ररेखा के समान प्रतीत होती थीं

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॥ ५ · १७ · २३ ॥
क्लिष्टरूपामसंस्पर्शादयुक्तामिव वल्लकीम्। तां भर्तृहिते युक्तामयुक्तां रक्षसां वशे॥

kliṣṭarūpāmasaṁsparśādayuktāmiva vallakīm।
sa tāṁ bhartṛhite yuktāmayuktāṁ rakṣasāṁ vaśe॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · १७ · २४ ॥
अशोकवनिकामध्ये शोकसागरमाप्लुताम्। ताभिः परिवृतां तत्र सग्रहामिव रोहिणीम्॥

aśokavanikāmadhye śokasāgaramāplutām।
tābhiḥ parivṛtāṁ tatra sagrahāmiva rohiṇīm॥

॥ २३–२४ ॥

जैसे वीणा अपने स्वामी की अंगुलियों के स्पर्श से वञ्चित हो वादन आदि की क्रिया से रहित अयोग्य अवस्था में मूक पड़ी रहती है, उसी प्रकार सीता पति के सम्पर्क से दूर होने के कारण महान् क्लेश में पड़कर ऐसी अवस्था को पहुँच गयी थीं, जो उनके योग्य नहीं थी। पति के हित में तत्पर रहनेवाली सीता राक्षसों के अधीन रहने के योग्य नहीं थीं; फिर भी वैसी दशा में पड़ी थीं। अशोकवाटिका में रहकर भी वे शोक के सागर में डूबी हुई थीं। क्रूर ग्रह से आक्रान्त हुई रोहिणी की भाँति वे वहाँ उन राक्षसियों से घिरी हुई थीं। हनुमान्जी ने उन्हें देखा। वे पुष्पहीन लता की भाँति श्रीहीन हो रही थीं

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॥ ५ · १७ · २५ ॥
ददर्श हनुमांस्तत्र लतामकुसुमामिव। सा मलेन दिग्धांगी वपुषा चाप्यलंकृता। मृणाली पङ्कदिग्धेव विभाति भाति च॥

dadarśa hanumāṁstatra latāmakusumāmiva।
sā malena ca digdhāṁgī vapuṣā cāpyalaṁkṛtā।
mṛṇālī paṅkadigdheva vibhāti ca na bhāti ca॥

उनके सारे अंगों में मैल जम गयी थी। केवल शरीर-सौन्दर्य ही उनका अलंकार था। वे कीचड़ से लिपटी हुई कमलनाल की भाँति शोभा और अशोभा दोनों से युक्त हो रही थीं

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॥ ५ · १७ · २६ ॥
मलिनेन तु वस्त्रेण परिक्लिष्टेन भामिनीम्। संवृतां मृगशावाक्षीं ददर्श हनुमान् कपिः॥

malinena tu vastreṇa parikliṣṭena bhāminīm।
saṁvṛtāṁ mṛgaśāvākṣīṁ dadarśa hanumān kapiḥ॥

मैले और पुराने वस्त्र से ढकी हुई मृगशावकनयनी भामिनी सीता को कपिवर हनुमान् ने उस अवस्था में देखा

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॥ ५ · १७ · २७ ॥
तां देवीं दीनवदनामदीनां भर्तृतेजसा। रक्षितां स्वेन शीलेन सीतामसितलोचनाम्॥

tāṁ devīṁ dīnavadanāmadīnāṁ bhartṛtejasā।
rakṣitāṁ svena śīlena sītāmasitalocanām॥

यद्यपि देवी सीता के मुख पर दीनता छा रही थी तथापि अपने पति के तेज का स्मरण हो आने से उनके हृदय से वह दैन्य दूर हो जाता था। कजरारे नेत्रोंवाली सीता अपने शील से ही सुरक्षित थीं

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॥ ५ · १७ · २८ ॥
तां दृष्ट्वा हनुमान् सीतां मृगशावनिभेक्षणाम्। मृगकन्यामिव त्रस्तां वीक्षमाणां समन्ततः॥

tāṁ dṛṣṭvā hanumān sītāṁ mṛgaśāvanibhekṣaṇām।
mṛgakanyāmiva trastāṁ vīkṣamāṇāṁ samantataḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · १७ · २९ ॥
दहन्तीमिव निःश्वासैर्वृक्षान् पल्लवधारिणः। संघातमिव शोकानां दुःखस्योर्मिमिवोत्थिताम्॥

dahantīmiva niḥśvāsairvṛkṣān pallavadhāriṇaḥ।
saṁghātamiva śokānāṁ duḥkhasyormimivotthitām॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · १७ · ३० ॥
तां क्षमां सुविभक्तांगीं विनाभरणशोभिनीम्। प्रहर्षमतुलं लेभे मारुतिः प्रेक्ष्य मैथिलीम्॥

tāṁ kṣamāṁ suvibhaktāṁgīṁ vinābharaṇaśobhinīm।
praharṣamatulaṁ lebhe mārutiḥ prekṣya maithilīm॥

॥ २८–३० ॥

उनके नेत्र मृगछौनों के समान चञ्चल थे। वे डरी हुई मृगकन्या की भाँति सब ओर सशंक दृष्टि से देख रही थीं। अपने उच्छ्वासों से पल्लवधारी वृक्षों को दग्ध-सी करती जान पड़ती थीं। शोकों की मूर्तिमती प्रतिमा-सी दिखायी देती थीं और दुःख की उठी हुई तरंग-सी प्रतीत होती थीं। उनके सभी अंगों का विभाग सुन्दर था। यद्यपि वे विरह-शोक से दुर्बल हो गयी थीं तथापि आभूषणों के बिना ही शोभा पाती थीं। इस अवस्था में मिथिलेशकुमारी सीता को देखकर पवनपुत्र हनुमान् को उनका पता लग जाने के कारण अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ

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॥ ५ · १७ · ३१ ॥
हर्षजानि सोऽश्रूणि तां दृष्ट्वा मदिरेक्षणाम्। मुमोच हनुमांस्तत्र नमश्चक्रे राघवम्॥

harṣajāni ca so'śrūṇi tāṁ dṛṣṭvā madirekṣaṇām।
mumoca hanumāṁstatra namaścakre ca rāghavam॥

मनोहर नेत्रवाली सीता को वहाँ देखकर हनुमान्जी हर्ष के आँसू बहाने लगे। उन्होंने मन-ही-मन श्रीरघुनाथजी को नमस्कार किया

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॥ ५ · १७ · ३२ ॥
नमस्कृत्वाथ रामाय लक्ष्मणाय वीर्यवान्। सीतादर्शनसंहृष्टो हनुमान् संवृतोऽभवत्॥

namaskṛtvātha rāmāya lakṣmaṇāya ca vīryavān।
sītādarśanasaṁhṛṣṭo hanumān saṁvṛto'bhavat॥

सीता के दर्शन से उल्लसित हो श्रीराम और लक्ष्मण को नमस्कार करके पराक्रमी हनुमान् वहीं छिपे रहे

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तदशः सर्गः॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १७ ॥