वाल्मीकि रामायणम् · सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सुन्दरकाण्डम्Sundara Kāṇḍa

सर्गः ३४ · ३७ श्लोकाःSarga 34 · 37 ślokas

सीताजीका हनुमान्जीके प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान्जीके द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान

॥ ५ · ३४ · १ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनूमान् हरिपुंगवः। दुःखाद् दुःखाभिभूतायाः सान्त्वमुत्तरमब्रवीत्॥

tasyāstad vacanaṁ śrutvā hanūmān haripuṁgavaḥ।
duḥkhād duḥkhābhibhūtāyāḥ sāntvamuttaramabravīt॥

दुःख-पर-दुःख उठाने के कारण पीड़ित हुई सीता का उपर्युक्त वचन सुनकर वानरशिरोमणि हनुमान्जी ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—

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॥ ५ · ३४ · २ ॥
अहं रामस्य संदेशाद् देवि दूतस्तवागतः। वैदेहि कुशली रामः त्वां कौशलमब्रवीत्॥

ahaṁ rāmasya saṁdeśād devi dūtastavāgataḥ।
vaidehi kuśalī rāmaḥ sa tvāṁ kauśalamabravīt॥

‘देवि! मैं श्रीरामचन्द्रजी का दूत हूँ और आपके लिये उनका संदेश लेकर आया हूँ। विदेहनन्दिनी! श्रीरामचन्द्रजी सकुशल हैं और उन्होंने आपका कुशल-समाचार पूछा है

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॥ ५ · ३४ · ३ ॥
यो ब्राह्ममस्त्रं वेदांश्च वेद वेदविदां वरः। त्वां दाशरथी रामो देवि कौशलमब्रवीत्॥

yo brāhmamastraṁ vedāṁśca veda vedavidāṁ varaḥ।
sa tvāṁ dāśarathī rāmo devi kauśalamabravīt॥

‘देवि! जिन्हें ब्रह्मास्त्र और वेदों का भी पूर्ण ज्ञान है, वे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ दशरथनन्दन श्रीराम स्वयं सकुशल रहकर आपकी भी कुशल पूछ रहे हैं

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॥ ५ · ३४ · ४ ॥
लक्ष्मणश्च महातेजा भर्तुस्तेऽनुचरः प्रियः। कृतवाञ्छोकसंतप्तः शिरसा तेऽभिवादनम्॥

lakṣmaṇaśca mahātejā bhartuste'nucaraḥ priyaḥ।
kṛtavāñchokasaṁtaptaḥ śirasā te'bhivādanam॥

‘आपके पति के अनुचर तथा प्रिय महातेजस्वी लक्ष्मण ने भी शोक से संतप्त हो आपके चरणों में मस्तक झुकाकर प्रणाम कहलाया है’

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॥ ५ · ३४ · ५ ॥
सा तयोः कुशलं देवी निशम्य नरसिंहयोः। प्रतिसंहृष्टसर्वाङ्गी हनूमन्तमथाब्रवीत्॥

sā tayoḥ kuśalaṁ devī niśamya narasiṁhayoḥ।
pratisaṁhṛṣṭasarvāṅgī hanūmantamathābravīt॥

पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण का समाचार सुनकर देवी सीता के सम्पूर्ण अंगों में हर्षजनित रोमांच हो आया और वे हनुमान्जी से बोलीं—

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॥ ५ · ३४ · ६ ॥
कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति मा। एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि॥

kalyāṇī bata gātheyaṁ laukikī pratibhāti mā।
eti jīvantamānando naraṁ varṣaśatādapi॥

‘यदि मनुष्य जीवित रहे तो उसे सौ वर्ष बाद भी आनन्द प्राप्त होता ही है, यह लौकिक कहावत आज मुझे बिलकुल सत्य एवं कल्याणमयी जान पड़ती है’

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॥ ५ · ३४ · ७ ॥
तयोः समागमे तस्मिन् प्रीतिरुत्पादिताद्भुता। परस्परेण चालापं विश्वस्तौ तौ प्रचक्रतुः॥

tayoḥ samāgame tasmin prītirutpāditādbhutā।
paraspareṇa cālāpaṁ viśvastau tau pracakratuḥ॥

सीता और हनुमान् के इस मिलाप (परस्पर दर्शन)-से दोनों को ही अद्भुत प्रसन्नता प्राप्त हुई। वे दोनों विश्वस्त होकर एक-दूसरे से वार्तालाप करने लगे

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॥ ५ · ३४ · ८ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः। सीतायाः शोकतप्तायाः समीपमुपचक्रमे॥

tasyāstad vacanaṁ śrutvā hanūmān mārutātmajaḥ।
sītāyāḥ śokataptāyāḥ samīpamupacakrame॥

शोकसंतप्त सीता की वे बातें सुनकर पवनकुमार हनुमान्जी उनके कुछ निकट चले गये

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॥ ५ · ३४ · ९ ॥
यथा यथा समीपं हनूमानुपसर्पति। तथा तथा रावणं सा तं सीता परिशङ्कते॥

yathā yathā samīpaṁ sa hanūmānupasarpati।
tathā tathā rāvaṇaṁ sā taṁ sītā pariśaṅkate॥

हनुमान्जी ज्यों-ज्यों निकट आते, त्यों-ही-त्यों सीता को यह शङ्का होती कि यह कहीं रावण न हो

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॥ ५ · ३४ · १० ॥
अहो धिग् धिक्कृतमिदं कथितं हि यदस्य मे। रूपान्तरमुपागम्य एवायं हि रावणः॥

aho dhig dhikkṛtamidaṁ kathitaṁ hi yadasya me।
rūpāntaramupāgamya sa evāyaṁ hi rāvaṇaḥ॥

ऐसा विचार आते ही वे मन-ही-मन कहने लगीं— ‘अहो! धिक्कार है, जो इसके सामने मैंने अपने मन की बात कह दी। यह दूसरा रूप धारण करके आया हुआ वह रावण ही है’

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॥ ५ · ३४ · ११ ॥
तामशोकस्य शाखां तु विमुक्त्वा शोककर्शिता। तस्यामेवानवद्याङ्गी धरण्यां समुपाविशत्॥

tāmaśokasya śākhāṁ tu vimuktvā śokakarśitā।
tasyāmevānavadyāṅgī dharaṇyāṁ samupāviśat॥

फिर तो निर्दोष अङ्गोंवाली सीता उस अशोक-वृक्ष की शाखा को छोड़ शोक से कातर हो वहीं जमीन पर बैठ गयीं

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॥ ५ · ३४ · १२ ॥
अवन्दत महाबाहुस्ततस्तां जनकात्मजाम्। सा चैनं भयसंत्रस्ता भूयो नैनमुदैक्षत॥

avandata mahābāhustatastāṁ janakātmajām।
sā cainaṁ bhayasaṁtrastā bhūyo nainamudaikṣata॥

तत्पश्चात् महाबाहु हनुमान्जी ने जनकनन्दिनी सीता के चरणों में प्रणाम किया, किंतु वे भयभीत होने के कारण फिर उनकी ओर देख न सकीं

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॥ ५ · ३४ · १३ ॥
तं दृष्ट्वा वन्दमानं सीता शशिनिभानना। अब्रवीद् दीर्घमुच्छ्वस्य वानरं मधुरस्वरा॥

taṁ dṛṣṭvā vandamānaṁ ca sītā śaśinibhānanā।
abravīd dīrghamucchvasya vānaraṁ madhurasvarā॥

वानर हनुमान् को बारम्बार वन्दना करते देख चन्द्रमुखी सीता लम्बी साँस खींचकर उनसे मधुर वाणी में बोलीं—

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॥ ५ · ३४ · १४ ॥
मायां प्रविष्टो मायावी यदि त्वं रावणः स्वयम्। उत्पादयसि मे भूयः संतापं तन्न शोभनम्॥

māyāṁ praviṣṭo māyāvī yadi tvaṁ rāvaṇaḥ svayam।
utpādayasi me bhūyaḥ saṁtāpaṁ tanna śobhanam॥

‘यदि तुम स्वयं मायावी रावण हो और मायामय शरीर में प्रवेश करके फिर मुझे कष्ट दे रहे हो तो यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है

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॥ ५ · ३४ · १५ ॥
स्वं परित्यज्य रूपं यः परिव्राजकरूपवान्। जनस्थाने मया दृष्टस्त्वं एव हि रावणः॥

svaṁ parityajya rūpaṁ yaḥ parivrājakarūpavān।
janasthāne mayā dṛṣṭastvaṁ sa eva hi rāvaṇaḥ॥

‘जिसे मैंने जनस्थान में देखा था तथा जो अपने यथार्थ रूप को छोड़कर संन्यासी का रूप धारण करके आया था, तुम वही रावण हो

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॥ ५ · ३४ · १६ ॥
उपवासकृशां दीनां कामरूप निशाचर। संतापयसि मां भूयः संतापं तन्न शोभनम्॥

upavāsakṛśāṁ dīnāṁ kāmarūpa niśācara।
saṁtāpayasi māṁ bhūyaḥ saṁtāpaṁ tanna śobhanam॥

‘इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले निशाचर! मैं उपवास करते-करते दुबली हो गयी हूँ और मन-ही-मन दुःखी रहती हूँ। इतने पर भी जो तुम फिर मुझे संताप दे रहे हो, यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है

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॥ ५ · ३४ · १७ ॥
अथवा नैतदेवं हि यन्मया परिशङ्कितम्। मनसो हि मम प्रीतिरुत्पन्ना तव दर्शनात्॥

athavā naitadevaṁ hi yanmayā pariśaṅkitam।
manaso hi mama prītirutpannā tava darśanāt॥

‘अथवा जिस बात की मेरे मन में शङ्का हो रही है, वह न भी हो; क्योंकि तुम्हें देखने से मेरे मन में प्रसन्नता हुई है

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॥ ५ · ३४ · १८ ॥
यदि रामस्य दूतस्त्वमागतो भद्रमस्तु ते। पृच्छामि त्वां हरिश्रेष्ठ प्रिया रामकथा हि मे॥

yadi rāmasya dūtastvamāgato bhadramastu te।
pṛcchāmi tvāṁ hariśreṣṭha priyā rāmakathā hi me॥

‘वानरश्रेष्ठ! सचमुच ही यदि तुम भगवान् श्रीराम के दूत हो तो तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमसे उनकी बातें पूछती हूँ; क्योंकि श्रीराम की चर्चा मुझे बहुत ही प्रिय है

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॥ ५ · ३४ · १९ ॥
गुणान् रामस्य कथय प्रियस्य मम वानर। चित्तं हरसि मे सौम्य नदीकूलं यथा रयः॥

guṇān rāmasya kathaya priyasya mama vānara।
cittaṁ harasi me saumya nadīkūlaṁ yathā rayaḥ॥

‘वानर! मेरे प्रियतम श्रीराम के गुणों का वर्णन करो। सौम्य! जैसे जल का वेग नदी के तट को हर लेता है, उसी प्रकार तुम श्रीराम की चर्चा से मेरे चित्त को चुराये लेते हो

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॥ ५ · ३४ · २० ॥
अहो स्वप्नस्य सुखता याहमेव चिराहृता। प्रेषितं नाम पश्यामि राघवेण वनौकसम्॥

aho svapnasya sukhatā yāhameva cirāhṛtā।
preṣitaṁ nāma paśyāmi rāghaveṇa vanaukasam॥

‘अहो! यह स्वप्न कैसा सुखद हुआ? जिससे यहाँ चिरकाल से हरकर लायी गयी मैं आज भगवान् श्रीराम के भेजे हुए दूत वानर को देख रही हूँ

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॥ ५ · ३४ · २१ ॥
स्वप्नेऽपि यद्यहं वीरं राघवं सहलक्ष्मणम्। पश्येयं नावसीदेयं स्वप्नोऽपि मम मत्सरी॥

svapne'pi yadyahaṁ vīraṁ rāghavaṁ sahalakṣmaṇam।
paśyeyaṁ nāvasīdeyaṁ svapno'pi mama matsarī॥

‘यदि मैं लक्ष्मणसहित वीरवर श्रीरघुनाथजी को स्वप्न में भी देख लिया करूँ तो मुझे इतना कष्ट न हो; परंतु स्वप्न भी मुझसे डाह करता है

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॥ ५ · ३४ · २२ ॥
नाहं स्वप्नमिमं मन्ये स्वप्ने दृष्ट्वा हि वानरम्। शक्योऽभ्युदयः प्राप्तुं प्राप्तश्चाभ्युदयो मम॥

nāhaṁ svapnamimaṁ manye svapne dṛṣṭvā hi vānaram।
na śakyo'bhyudayaḥ prāptuṁ prāptaścābhyudayo mama॥

‘मैं इसे स्वप्न नहीं समझती; क्योंकि स्वप्न में वानर को देख लेने पर किसीका अभ्युदय नहीं हो सकता और मैंने यहाँ अभ्युदय प्राप्त किया है (अभ्युदयकाल में जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी ही प्रसन्नता मेरे मन में छा रही है)

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॥ ५ · ३४ · २३ ॥
किं नु स्याच्चित्तमोहोऽयं भवेद् वातगतिस्त्वयम्। उन्मादजो विकारो वा स्यादयं मृगतृष्णिका॥

kiṁ nu syāccittamoho'yaṁ bhaved vātagatistvayam।
unmādajo vikāro vā syādayaṁ mṛgatṛṣṇikā॥

‘अथवा यह मेरे चित्त का मोह तो नहीं है। वात-विकार से होनेवाला भ्रम तो नहीं है। उन्मादका विकार तो नहीं उमड़ आया अथवा यह मृगतृष्णा तो नहीं है

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॥ ५ · ३४ · २४ ॥
अथवा नायमुन्मादो मोहोऽप्युन्मादलक्षणः। सम्बुध्ये चाहमात्मानमिमं चापि वनौकसम्॥

athavā nāyamunmādo moho'pyunmādalakṣaṇaḥ।
sambudhye cāhamātmānamimaṁ cāpi vanaukasam॥

‘अथवा यह उन्मादजनित विकार नहीं है। उन्माद के समान लक्षणवाला मोह भी नहीं है; क्योंकि मैं अपने-आप को देख और समझ रही हूँ तथा इस वानर को भी ठीक-ठीक देखती और समझती हूँ (उन्माद आदि की अवस्थाओं में इस तरह ठीक-ठीक ज्ञान होना सम्भव नहीं है।)’

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॥ ५ · ३४ · २५ ॥
इत्येवं बहुधा सीता सम्प्रधार्य बलाबलम्। रक्षसां कामरूपत्वान्मेने तं राक्षसाधिपम्॥

ityevaṁ bahudhā sītā sampradhārya balābalam।
rakṣasāṁ kāmarūpatvānmene taṁ rākṣasādhipam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ३४ · २६ ॥
एतां बुद्धिं तदा कृत्वा सीता सा तनुमध्यमा। प्रतिव्याजहाराथ वानरं जनकात्मजा॥

etāṁ buddhiṁ tadā kṛtvā sītā sā tanumadhyamā।
na prativyājahārātha vānaraṁ janakātmajā॥

॥ २५–२६ ॥

इस तरह सीता अनेक प्रकार से राक्षसों की प्रबलता और वानर की निर्बलता का निश्चय करके उन्हें राक्षसराज रावण ही माना; क्योंकि राक्षसों में इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति होती है। ऐसा विचारकर सूक्ष्म कटिप्रदेशवाली जनककुमारी सीता ने कपिवर हनुमान्जी से फिर कुछ नहीं कहा

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॥ ५ · ३४ · २७ ॥
सीताया निश्चितं बुद्ध्वा हनुमान् मारुतात्मजः। श्रोत्रानुकूलैर्वचनैस्तदा तां सम्प्रहर्षयन्॥

sītāyā niścitaṁ buddhvā hanumān mārutātmajaḥ।
śrotrānukūlairvacanaistadā tāṁ sampraharṣayan॥

सीता के इस निश्चय को समझकर पवनकुमार हनुमान्जी उस समय कानों को सुख पहुँचानेवाले अनुकूल वचनोंद्वारा उनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले—

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॥ ५ · ३४ · २८ ॥
आदित्य इव तेजस्वी लोककान्तः शशी यथा। राजा सर्वस्य लोकस्य देवो वैश्रवणो यथा॥

āditya iva tejasvī lokakāntaḥ śaśī yathā।
rājā sarvasya lokasya devo vaiśravaṇo yathā॥

‘भगवान् श्रीराम सूर्य के समान तेजस्वी, चन्द्रमा के समान लोककमनीय तथा देव कुबेर की भाँति सम्पूर्ण जगत् के राजा हैं

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॥ ५ · ३४ · २९ ॥
विक्रमेणोपपन्नश्च यथा विष्णुर्महायशाः। सत्यवादी मधुरवाग् देवो वाचस्पतिर्यथा॥

vikrameṇopapannaśca yathā viṣṇurmahāyaśāḥ।
satyavādī madhuravāg devo vācaspatiryathā॥

‘महायशस्वी भगवान् विष्णु के समान पराक्रमी तथा बृहस्पतिजी की भाँति सत्यवादी एवं मधुरभाषी हैं

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॥ ५ · ३४ · ३० ॥
रूपवान् सुभगः श्रीमान् कंदर्प इव मूर्तिमान्। स्थानक्रोधे प्रहर्ता श्रेष्ठो लोके महारथः॥

rūpavān subhagaḥ śrīmān kaṁdarpa iva mūrtimān।
sthānakrodhe prahartā ca śreṣṭho loke mahārathaḥ॥

‘रूपवान्, सौभाग्यशाली और कान्तिमान् तो वे इतने हैं, मानो मूर्तिमान् कामदेव हों। वे क्रोध के पात्र पर ही प्रहार करने में समर्थ और संसार के श्रेष्ठ महारथी हैं

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॥ ५ · ३४ · ३१ ॥
बाहुच्छायामवष्टब्धो यस्य लोको महात्मनः। अपक्रम्याश्रमपदान्मृगरूपेण राघवम्॥ शून्ये येनापनीतासि तस्य द्रक्ष्यसि तत्फलम्।

bāhucchāyāmavaṣṭabdho yasya loko mahātmanaḥ।
apakramyāśramapadānmṛgarūpeṇa rāghavam॥
śūnye yenāpanītāsi tasya drakṣyasi tatphalam।

‘सम्पूर्ण विश्व उन महात्मा की भुजाओं के आश्रय में—उन्हींकी छत्रछाया में विश्राम करता है। मृगरूपधारी निशाचरद्वारा श्रीरघुनाथजी को आश्रम से दूर हटाकर जिसने सूने आश्रम में पहुँचकर आपका अपहरण किया है, उसे उस पाप का जो फल मिलनेवाला है, उसको आप अपनी आँखों देखेंगी

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॥ ५ · ३४ · ३२ ॥
अचिराद् रावणं संख्ये यो वधिष्यति वीर्यवान्॥ क्रोधप्रमुक्तैरिषुभिर्ज्वलद्भिरिव पावकैः।

acirād rāvaṇaṁ saṁkhye yo vadhiṣyati vīryavān॥
krodhapramuktairiṣubhirjvaladbhiriva pāvakaiḥ।

‘पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी क्रोधपूर्वक छोड़े गये प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी बाणोंद्वारा समराङ्गण में शीघ्र ही रावण का वध करेंगे

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॥ ५ · ३४ · ३३ ॥
तेनाहं प्रेषितो दूतस्त्वत्सकाशमिहागतः॥ त्वद्वियोगेन दुःखार्तः त्वां कौशलमब्रवीत्।

tenāhaṁ preṣito dūtastvatsakāśamihāgataḥ॥
tvadviyogena duḥkhārtaḥ sa tvāṁ kauśalamabravīt।

‘मैं उन्हींका भेजा हुआ दूत होकर यहाँ आपके पास आया हूँ। भगवान् श्रीराम आपके वियोगजनित दुःख से पीड़ित हैं। उन्होंने आपके पास अपनी कुशल कहलायी है और आपकी भी कुशल पूछी है

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॥ ५ · ३४ · ३४ ॥
लक्ष्मणश्च महातेजाः सुमित्रानन्दवर्धनः॥ अभिवाद्य महाबाहुः त्वां कौशलमब्रवीत्।

lakṣmaṇaśca mahātejāḥ sumitrānandavardhanaḥ॥
abhivādya mahābāhuḥ sa tvāṁ kauśalamabravīt।

‘सुमित्रा का आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी महाबाहु लक्ष्मण ने भी आपको प्रणाम करके आपकी कुशल पूछी है

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॥ ५ · ३४ · ३५ ॥
रामस्य सखा देवि सुग्रीवो नाम वानरः॥

rāmasya ca sakhā devi sugrīvo nāma vānaraḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ५ · ३४ · ३६ ॥
राजा वानरमुख्यानां त्वां कौशलमब्रवीत्। नित्यं स्मरति ते रामः ससुग्रीवः सलक्ष्मणः॥

rājā vānaramukhyānāṁ sa tvāṁ kauśalamabravīt।
nityaṁ smarati te rāmaḥ sasugrīvaḥ salakṣmaṇaḥ॥

॥ ३५–३६ ॥

‘देवि! श्रीरघुनाथजी के सखा एक सुग्रीव नामक वानर हैं, जो मुख्य-मुख्य वानरों के राजा हैं, उन्होंने भी आपसे कुशल पूछी है। सुग्रीव और लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी प्रतिदिन आपका स्मरण करते हैं

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॥ ५ · ३४ · ३७ ॥
दिष्ट्या जीवसि वैदेहि राक्षसीवशमागता। नचिराद् द्रक्ष्यसे रामं लक्ष्मणं महारथम्॥

diṣṭyā jīvasi vaidehi rākṣasīvaśamāgatā।
nacirād drakṣyase rāmaṁ lakṣmaṇaṁ ca mahāratham॥

‘विदेहनन्दिनि! राक्षसियों के चंगुल में फँसकर भी आप अभीतक जीवित हैं, यह बड़े सौभाग्य की बात है। अब आप शीघ्र ही महारथी श्रीराम और लक्ष्मण का दर्शन करेंगी

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३४ ॥