वाल्मीकि रामायणम्

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

७७ सर्गाः · २२७० श्लोकाः77 sargas · 2,270 ślokas
  1. 1 नारदजी का वाल्मीकि मुनि को संक्षेप से श्रीरामचरित्र सुनाना Nārada narrates Rāma’s story in brief to Vālmīki
  2. 2 रामायणकाव्य का उपक्रम — तमसा के तट पर क्रौञ्चवध से संतप्त हुए महर्षि वाल्मीकि के शोक का श्लोक-रूप में प्रकट होना तथा ब्रह्माजी का उन्हें रामचरित्रमय काव्य के निर्माण का आदेश देना The krauñca’s death on the Tamasā — grief becomes the first śloka, and Brahmā commands the poem
  3. 3 वाल्मीकि मुनि द्वारा रामायणकाव्य में निबद्ध विषयों का संक्षेप से उल्लेख Vālmīki outlines the contents of the Rāmāyaṇa
  4. 4 महर्षि वाल्मीकि का चौबीस हजार श्लोकों से युक्त रामायणकाव्य का निर्माण करके उसे लव-कुश को पढ़ाना, मुनिमण्डली में रामायणगान करके लव और कुश का प्रशंसित होना तथा अयोध्या में श्रीराम द्वारा सम्मानित हो उन दोनों का रामदरबार में रामायणगान सुनाना The poem of twenty-four thousand ślokas; Lava and Kuśa sing it in Rāma’s court
  5. 5 राजा दशरथ द्वारा सुरक्षित अयोध्यापुरी का वर्णन Ayodhyā, the city guarded by King Daśaratha
  6. 6 राजा दशरथ के शासनकाल में अयोध्या और वहाँ के नागरिकों की उत्तम स्थिति का वर्णन The city and its people under Daśaratha’s rule
  7. 7 राजमन्त्रियों के गुण और नीति का वर्णन The virtues and statecraft of the king’s ministers
  8. 8 राजा का पुत्र के लिये अश्वमेधयज्ञ करने का प्रस्ताव और मन्त्रियों तथा ब्राह्मणों द्वारा उनका अनुमोदन Daśaratha proposes the aśvamedha for a son; ministers and brāhmaṇas approve
  9. 9 सुमन्त्र का राजा को ऋष्यशृंग मुनि को बुलाने की सलाह देते हुए उनके अंगदेश में जाने और शान्ता के साथ विवाह करने का प्रसंग सुनाना Sumantra counsels inviting Ṛṣyaśṛṅga, and tells of his coming to Aṅga and marriage to Śāntā
  10. १०10 अंगदेश में ऋष्यशृंग के आने तथा शान्ता के साथ विवाह होने के प्रसंग का कुछ विस्तार के साथ वर्णन Ṛṣyaśṛṅga’s arrival in Aṅga and marriage to Śāntā, told at length
  11. ११11 सुमन्त्र के कहने से राजा दशरथ का सपरिवार अंगराज के यहाँ जाकर वहाँ से शान्ता और ऋष्यशृंग को अपने घर ले आना Daśaratha brings Ṛṣyaśṛṅga and Śāntā to his own house
  12. १२12 राजा का ऋषियों से यज्ञ कराने के लिये प्रस्ताव, ऋषियों का राजा को और राजा का मन्त्रियों को यज्ञ की आवश्यक तैयारी करने के लिये आदेश देना The king proposes the sacrifice; sages and ministers are set to prepare it
  13. १३13 राजा का वसिष्ठजी से यज्ञ की तैयारी के लिये अनुरोध, वसिष्ठजी द्वारा इसके लिये सेवकों की नियुक्ति और सुमन्त्र को राजाओं को बुलाने के लिये आदेश, समागत राजाओं का सत्कार तथा पत्नियोंसहित राजा दशरथ का यज्ञ की दीक्षा लेना Vasiṣṭha directs the preparations; the kings are welcomed; Daśaratha takes the vow
  14. १४14 महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेध यज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान The aśvamedha of King Daśaratha performed in full
  15. १५15 ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, देवताओं की प्रार्थना से ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ़ निकालना तथा भगवान् विष्णु का देवताओं को आश्वासन देना The putreṣṭi begins; the gods seek Rāvaṇa’s death; Viṣṇu reassures them
  16. १६16 देवताओं का श्रीहरि से रावणवध के लिये मनुष्यरूप में अवतीर्ण होने को कहना, राजा के पुत्रेष्टि यज्ञ में अग्निकुण्ड से प्राजापत्य पुरुष का प्रकट होकर खीर अर्पण करना और उसे खाकर रानियों का गर्भवती होना Viṣṇu agrees to be born as man; the divine pāyasa, and the queens conceive
  17. १७17 ब्रह्माजी की प्रेरणा से देवता आदि के द्वारा विभिन्न वानरयूथपतियों की उत्पत्ति At Brahmā’s word the gods father the vānara chiefs
  18. १८18 राजाओं तथा ऋष्यशृंग को विदा करके राजा दशरथ का रानियोंसहित पुरी में आगमन, श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के जन्म, संस्कार, शील-स्वभाव एवं सद्गुण, राजा के दरबार में विश्वामित्र का आगमन और उनका सत्कार Birth of Rāma, Bharata, Lakṣmaṇa and Śatrughna; Viśvāmitra comes to court
  19. १९19 विश्वामित्र के मुख से श्रीराम को साथ ले जाने की माँग सुनकर राजा दशरथ का दुःखित एवं मूर्छित होना Viśvāmitra asks for Rāma; Daśaratha grieves and faints
  20. २०20 राजा दशरथ का विश्वामित्र को अपना पुत्र देने से इनकार करना और विश्वामित्र का कुपित होना Daśaratha refuses to give his son; Viśvāmitra’s anger
  21. २१21 विश्वामित्र के रोषपूर्ण वचन तथा वसिष्ठ का राजा दशरथ को समझाना Viśvāmitra’s wrathful words; Vasiṣṭha persuades the king
  22. २२22 राजा दशरथ का स्वस्तिवाचनपूर्वक राम-लक्ष्मण को मुनि के साथ भेजना, मार्ग में उन्हें विश्वामित्र से बला और अतिबला नामक विद्या की प्राप्ति Rāma and Lakṣmaṇa depart with the sage; the vidyās Balā and Atibalā
  23. २३23 विश्वामित्रसहित श्रीराम और लक्ष्मण का सरयू-गंगासंगम के समीप पुण्य आश्रम में रात को ठहरना Night at the holy āśrama by the Sarayū-Gaṅgā confluence
  24. २४24 श्रीराम और लक्ष्मण का गंगापार होते समय विश्वामित्रजी से जल में उठती हुई तुमुलध्वनि के विषय में प्रश्न करना, विश्वामित्रजी का उन्हें इसका कारण बताना तथा मलद, करूष एवं ताटका वन का परिचय देते हुए इन्हें ताटकावध के लिये आज्ञा प्रदान करना Crossing the Gaṅgā; the lands of Malada and Karūṣa, and the Tāṭakā forest
  25. २५25 श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्रजी का उनसे ताटका की उत्पत्ति, विवाह एवं शाप आदि का प्रसंग सुनाकर उन्हें ताटका-वध के लिये प्रेरित करना Tāṭakā’s origin, marriage and curse; Rāma urged to slay her
  26. २६26 श्रीरामद्वारा ताटका का वध Rāma slays Tāṭakā
  27. २७27 विश्वामित्रद्वारा श्रीराम को दिव्यास्त्र-दान Viśvāmitra bestows the divine weapons on Rāma
  28. २८28 विश्वामित्र का श्रीराम को अस्त्रों की संहारविधि बताना तथा उन्हें अन्यान्य अस्त्रों का उपदेश करना, श्रीराम का एक आश्रम एवं यज्ञस्थान के विषय में मुनि से प्रश्न The withdrawal of the astras; Rāma asks about an āśrama and its sacrificial ground
  29. २९29 विश्वामित्रजी का श्रीराम से सिद्धाश्रम का पूर्ववृत्तान्त बताना और उन दोनों भाइयों के साथ अपने आश्रम पर पहुँचकर पूजित होना The story of Siddhāśrama; arrival at Viśvāmitra’s hermitage
  30. ३०30 श्रीरामद्वारा विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों का संहार Rāma guards the sacrifice and destroys the rākṣasas
  31. ३१31 श्रीराम, लक्ष्मण तथा ऋषियोंसहित विश्वामित्र का मिथिला को प्रस्थान तथा मार्ग में संध्या के समय शोणभद्रतट पर विश्राम Departure for Mithilā; evening rest on the bank of the Śoṇa
  32. ३२32 ब्रह्मपुत्र कुश के चार पुत्रों का वर्णन, शोणभद्र-तटवर्ती प्रदेश को वसु की भूमि बताना, कुशनाभ की सौ कन्याओं का वायु के कोप से 'कुब्जा' होना The four sons of Kuśa; Kuśanābha’s hundred daughters bent by the Wind-god
  33. ३३33 राजा कुशनाभद्वारा कन्याओं के धैर्य एवं क्षमाशीलता की प्रशंसा, ब्रह्मदत्त की उत्पत्ति तथा उनके साथ कुशनाभ की कन्याओं का विवाह Kuśanābha praises his daughters’ forbearance; Brahmadatta weds them
  34. ३४34 गाधि की उत्पत्ति, कौशिकी की प्रशंसा, विश्वामित्रजी का कथा बंद करके आधी रात का वर्णन करते हुए सबको सोने की आज्ञा देकर शयन करना The birth of Gādhi; praise of the Kauśikī; the midnight rest
  35. ३५35 शोणभद्र पार करके विश्वामित्र आदि का गंगाजी के तट पर पहुँचकर वहाँ रात्रिवास करना तथा श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्रजी का उन्हें गंगाजी की उत्पत्ति की कथा सुनाना Across the Śoṇa to the Gaṅgā’s bank; the tale of Gaṅgā’s origin begins
  36. ३६36 देवताओं का शिव-पार्वती को सुरतक्रीडा से निवृत्त करना तथा उमादेवी का देवताओं और पृथ्वी को शाप देना The gods interrupt Śiva and Pārvatī; Umā’s curse on the gods and the earth
  37. ३७37 गंगा से कार्तिकेय की उत्पत्ति का प्रसंग The birth of Kārttikeya from the Gaṅgā
  38. ३८38 राजा सगर के पुत्रों की उत्पत्ति तथा यज्ञ की तैयारी The birth of King Sagara’s sons and the readying of his sacrifice
  39. ३९39 इन्द्र के द्वारा राजा सगर के यज्ञसम्बन्धी अश्व का अपहरण, सगरपुत्रोंद्वारा सारी पृथ्वी का भेदन तथा देवताओं का ब्रह्माजी को यह सब समाचार बताना Indra steals the sacrificial horse; Sagara’s sons rend the whole earth
  40. ४०40 सगरपुत्रों के भावी विनाश की सूचना देकर ब्रह्माजी का देवताओं को शान्त करना, सगर के पुत्रों का पृथ्वी को खोदते हुए कपिलजी के पास पहुँचना और उनके रोष से जलकर भस्म होना Sarga 40
  41. ४१41 सगर की आज्ञा से अंशुमान् का रसातल में जाकर घोड़े को ले आना और अपने चाचाओं के निधन का समाचार सुनाना Sarga 41
  42. ४२42 अंशुमान् और भगीरथ की तपस्या, ब्रह्माजी का भगीरथ को अभीष्ट वर देकर गंगाजी को धारण करने के लिये भगवान् शङ्कर को राजी करने के निमित्त प्रयत्न करने की सलाह देना Sarga 42
  43. ४३43 भगीरथ की तपस्या से संतुष्ट हुए भगवान् शङ्कर का गंगा को अपने सिर पर धारण करके बिन्दुसरोवर में छोड़ना और उनका सात धाराओं में विभक्त हो भगीरथ के साथ जाकर उनके पितरों का उद्धार करना Sarga 43
  44. ४४44 ब्रह्माजी का भगीरथ की प्रशंसा करते हुए उन्हें गंगाजल से पितरों के तर्पण की आज्ञा देना और राजा का वह सब करके अपने नगर को जाना, गंगावतरण के उपाख्यान की महिमा Sarga 44
  45. ४५45 देवताओं और दैत्योंद्वारा क्षीर-समुद्र-मन्थन, भगवान् रुद्रद्वारा हालाहल विषका पान, भगवान् विष्णुके सहयोगसे मन्दराचलका पातालसे उद्धार और उसके द्वारा मन्थन, धन्वन्तरि, अप्सरा, वारुणी, उच्चैःश्रवा, कौस्तुभ तथा अमृतकी उत्पत्ति और देवासुर-संग्राममें दैत्योंका संहार Sarga 45
  46. ४६46 पुत्रवधसे दुःखी दितिका कश्यपजीसे इन्द्रहन्ता पुत्रकी प्राप्तिके उद्देश्यसे तपके लिये आज्ञा लेकर कुशप्लवमें तप करना, इन्द्रद्वारा उनकी परिचर्या तथा उन्हें अपवित्र अवस्थामें पाकर इन्द्रका उनके गर्भके सात टुकड़े कर डालना Sarga 46
  47. ४७47 दितिका अपने पुत्रोंको मरुद्गण बनाकर देवलोकमें रखनेके लिये इन्द्रसे अनुरोध, इन्द्रद्वारा उसकी स्वीकृति, दितिके तपोवनमें ही इक्ष्वाकु-पुत्र विशालद्वारा विशाला नगरीका निर्माण तथा वहाँके तत्कालीन राजा सुमतिद्वारा विश्वामित्र मुनिका सत्कार Sarga 47
  48. ४८48 राजा सुमतिसे सत्कृत हो एक रात विशालामें रहकर मुनियोंसहित श्रीरामका मिथिलापुरीमें पहुँचना और वहाँ सूने आश्रमके विषयमें पूछनेपर विश्वामित्रजीका उनसे अहल्याको शाप प्राप्त होनेकी कथा सुनाना Sarga 48
  49. ४९49 पितृदेवताओंद्वारा इन्द्रको भेड़ेके अण्डकोषसे युक्त करना तथा भगवान् श्रीरामके द्वारा अहल्याका उद्धार एवं उन दोनों दम्पतिके द्वारा इनका सत्कार Sarga 49
  50. ५०50 श्रीराम आदिका मिथिला-गमन, राजा जनकद्वारा विश्वामित्रका सत्कार तथा उनका श्रीराम और लक्ष्मणके विषयमें जिज्ञासा करना एवं परिचय पाना Sarga 50
  51. ५१51 शतानन्दके पूछनेपर विश्वामित्रका उन्हें श्रीरामके द्वारा अहल्याके उद्धारका समाचार बताना तथा शतानन्दद्वारा श्रीरामका अभिनन्दन करते हुए विश्वामित्रजीके पूर्वचरित्रका वर्णन Sarga 51
  52. ५२52 महर्षि वसिष्ठद्वारा विश्वामित्रका सत्कार और कामधेनुको अभीष्ट वस्तुओंकी सृष्टि करनेका आदेश Sarga 52
  53. ५३53 कामधेनुकी सहायतासे उत्तम अन्न-पानद्वारा सेनासहित तृप्त हुए विश्वामित्रका वसिष्ठसे उनकी कामधेनुको माँगना और उनका देनेसे अस्वीकार करना Sarga 53
  54. ५४54 विश्वामित्रका वसिष्ठजीकी गौको बलपूर्वक ले जाना, गौका दुःखी होकर वसिष्ठजीसे इसका कारण पूछना और उनकी आज्ञासे शक, यवन, पह्लव आदि वीरोंकी सृष्टि करके उनके द्वारा विश्वामित्रजीकी सेनाका संहार करना Sarga 54
  55. ५५55 अपने सौ पुत्रों और सारी सेनाके नष्ट हो जानेपर विश्वामित्रका तपस्या करके महादेवजीसे दिव्यास्त्र पाना तथा उनका वसिष्ठके आश्रमपर प्रयोग करना एवं वसिष्ठजीका ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना Sarga 55
  56. ५६56 विश्वामित्रद्वारा वसिष्ठजीपर नाना प्रकारके दिव्यास्त्रोंका प्रयोग और वसिष्ठद्वारा ब्रह्मदण्डसे ही उनका शमन एवं विश्वामित्रका ब्राह्मणत्वकी प्राप्तिके लिये तप करनेका निश्चय Sarga 56
  57. ५७57 विश्वामित्रकी तपस्या, राजा त्रिशंकुका अपना यज्ञ करानेके लिये पहले वसिष्ठजीसे प्रार्थना करना और उनके इन्कार कर देनेपर उन्हींके पुत्रोंकी शरणमें जाना Sarga 57
  58. ५८58 वसिष्ठ ऋषिके पुत्रोंका त्रिशंकुको डाँट बताकर घर लौटनेके लिये आज्ञा देना तथा उन्हें दूसरा पुरोहित बनानेके लिये उद्यत देख शाप-प्रदान और उनके शापसे चाण्डाल हुए त्रिशंकुका विश्वामित्रजीकी शरणमें जाना Sarga 58
  59. ५९59 विश्वामित्रका त्रिशंकुको आश्वासन देकर उनका यज्ञ करानेके लिये ऋषि-मुनियोंको आमन्त्रित करना और उनकी बात न माननेवाले महोदय तथा ऋषिपुत्रोंको शाप देकर नष्ट करना Sarga 59
  60. ६०60 विश्वामित्रका ऋषियोंसे त्रिशंकुका यज्ञ करानेके लिये अनुरोध, ऋषियोंद्वारा यज्ञका आरम्भ, त्रिशंकुका सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्रद्वारा स्वर्गसे उनके गिराये जानेपर क्षुब्ध हुए विश्वामित्रका नूतन देवसर्गके लिये उद्योग, फिर देवताओंके अनुरोधसे उनका इस कार्यसे विरत होना Sarga 60
  61. ६१61 विश्वामित्रकी पुष्कर तीर्थमें तपस्या तथा राजर्षि अम्बरीषका ऋचीकके मध्यम पुत्र शुनःशेपको यज्ञ-पशु बनानेके लिये खरीदकर लाना Sarga 61
  62. ६२62 विश्वामित्रद्वारा शुनःशेपकी रक्षाका सफल प्रयत्न और तपस्या Sarga 62
  63. ६३63 विश्वामित्रको ऋषि एवं महर्षिपदकी प्राप्ति, मेनकाद्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपदकी प्राप्तिके लिये उनकी घोर तपस्या Sarga 63
  64. ६४64 विश्वामित्रका रम्भाको शाप देकर पुनः घोर तपस्याके लिये दीक्षा लेना Sarga 64
  65. ६५65 विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना Sarga 65
  66. ६६66 राजा जनकका विश्वामित्र और राम-लक्ष्मणका सत्कार करके उन्हें अपने यहाँ रखे हुए धनुषका परिचय देना और धनुष चढ़ा देनेपर श्रीरामके साथ उनके ब्याहका निश्चय प्रकट करना Sarga 66
  67. ६७67 श्रीरामके द्वारा धनुर्भंग तथा राजा जनकका विश्‍वामित्रकी आज्ञासे राजा दशरथको बुलानेके लिये मन्त्रियोंको भेजना Sarga 67
  68. ६८68 राजा जनक का संदेश पाकर मन्त्रियोंसहित महाराज दशरथ का मिथिला जाने के लिये उद्यत होना Sarga 68
  69. ६९69 दल-बलसहित राजा दशरथको मिथिला-यात्रा और वहाँ राजा जनकके द्वारा उनका स्वागत-सत्कार Sarga 69
  70. ७०70 राजा जनकका अपने भाई कुशध्वजको सांकाश्या नगरीसे बुलवाना, राजा दशरथके अनुरोधसे वसिष्ठजीका सूर्यवंशका परिचय देते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये सीता तथा ऊर्मिलाको वरण करना Sarga 70
  71. ७१71 राजा जनकका अपने कुलका परिचय देते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये क्रमशः सीता और ऊर्मिलाको देनेकी प्रतिज्ञा करना Sarga 71
  72. ७२72 विश्वामित्रद्वारा भरत और शत्रुघ्नके लिये कुशध्वजकी कन्याओंका वरण, राजा जनकद्वारा इसकी स्वीकृति तथा राजा दशरथका अपने पुत्रोंके मंगलके लिये नान्दीश्राद्ध एवं गोदान करना Sarga 72
  73. ७३73 श्रीराम आदि चारों भाइयों का विवाह Sarga 73
  74. ७४74 विश्वामित्रका अपने आश्रमको प्रस्थान, राजा जनकका कन्याओंको भारी दहेज देकर राजा दशरथ आदिको विदा करना, मार्गमें शुभाशुभ शकुन और परशुरामजीका आगमन Sarga 74
  75. ७५75 राजा दशरथकी बात अनसुनी करके परशुरामका श्रीरामको वैष्णव-धनुषपर बाण चढ़ानेके लिये ललकारना Sarga 75
  76. ७६76 श्रीराम का वैष्णव-धनुष को चढ़कर अमोघ बाण के द्वारा परशुराम के तपःप्राप्त पुण्यलोकोँ का नाश करना तथा परशुराम का महेन्द्रपर्वत को लौट जाना Sarga 76
  77. ७७77 राजा दशरथ का पुत्रों और वधुओं के साथ अयोध्या में प्रवेश, शत्रुघ्नसहित भरत का मामा के यहाँ जाना, श्रीराम के बर्ताव से सबका संतोष तथा सीता और श्रीराम का पारस्परिक प्रेम Sarga 77