वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ४ · ३६ श्लोकाःSarga 4 · 36 ślokas

महर्षि वाल्मीकि का चौबीस हजार श्लोकों से युक्त रामायणकाव्य का निर्माण करके उसे लव-कुश को पढ़ाना, मुनिमण्डली में रामायणगान करके लव और कुश का प्रशंसित होना तथा अयोध्या में श्रीराम द्वारा सम्मानित हो उन दोनों का रामदरबार में रामायणगान सुनाना

The poem of twenty-four thousand ślokas; Lava and Kuśa sing it in Rāma’s court

लव-कुश का गान

“लव-कुश का गान”
॥ १ · ४ · १–८ ॥

चतुर्विंशतिसहस्रश्लोकं रामायणं विरच्य महर्षिर्वाल्मीकिस्तत् स्वशिष्यौ यमजौ तपस्विकुमारौ कुश-लवौ अध्यापयति; वल्कलधारिणौ रुद्राक्षभूषितौ बालौ वीणां वादयन्तौ मधुरस्वरेण गायतः, श्रोतारो मुनयो मृगाश्च निस्तब्धाः शृण्वन्ति।

चौबीस हजार श्लोकों का रामायणकाव्य रचकर महर्षि वाल्मीकि उसे अपने दो शिष्य जुड़वाँ तपस्वी-बालकों कुश और लव को सिखा रहे हैं; वल्कलधारी, रुद्राक्ष से सजे दोनों बालक वीणा बजाते मधुर स्वर में गा रहे हैं, और सुननेवाले मुनि तथा वन के मृग स्तब्ध होकर सुन रहे हैं।

Having composed the Ramayana in twenty-four thousand verses, Valmiki teaches it to his disciples — the radiant twin boy-ascetics Kusha and Lava. In bark-cloth and rudraksha they sing it from memory, one striking a vina, while the gathered rishis and even the forest deer listen, spellbound, to the first recital of the epic.

॥ १ · ४ · १ ॥
प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत्

prāptarājyasya rāmasya vālmīkirbhagavānṛṣiḥ ।
cakāra caritaṁ kṛtsnaṁ vicitrapadamarthavat ॥

श्रीरामचन्द्रजी ने जब वन से लौटकर राज्य का शासन अपने हाथ में ले लिया, उसके बाद भगवान् वाल्मीकि मुनि ने उनके सम्पूर्ण चरित्र के आधार पर विचित्र पद और अर्थ से युक्त रामायणकाव्य का निर्माण किया।

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॥ १ · ४ · २ ॥
चतुर्विंशत्सहस्राणि श्लोकानामुक्तवानृषिः तथा सर्गशतान् पञ्च षट्काण्डानि तथोत्तरम्

caturviṁśatsahasrāṇi ślokānāmuktavānṛṣiḥ ।
tathā sargaśatān pañca ṣaṭkāṇḍāni tathottaram ॥

इसमें महर्षि ने चौबीस हजार श्लोक, पाँच सौ सर्ग तथा उत्तरसहित सात काण्डों का प्रतिपादन किया है।

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॥ १ · ४ · ३ ॥
कृत्वा तु तन्महाप्राज्ञः सभविष्यं सहोत्तरम् चिन्तयामास को न्वेतत् प्रयुञ्जीयादिति प्रभुः

kṛtvā tu tanmahāprājñaḥ sabhaviṣyaṁ sahottaram ।
cintayāmāsa ko nvetat prayuñjīyāditi prabhuḥ ॥

भविष्य तथा उत्तरकाण्डसहित समस्त रामायण पूर्ण कर लेने के पश्चात् सामर्थ्यशाली, महाज्ञानी महर्षि ने सोचा कि कौन ऐसा शक्तिशाली पुरुष होगा, जो इस महाकाव्य को पढ़कर जनसमुदाय में सुना सके।

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॥ १ · ४ · ४ ॥
तस्य चिन्तयमानस्य महर्षेर्भावितात्मनः अगृह्णीतां ततः पादौ मुनिवेषौ कुशीलवौ

tasya cintayamānasya maharṣerbhāvitātmanaḥ ।
agṛhṇītāṁ tataḥ pādau muniveṣau kuśīlavau ॥

शुद्ध अन्तःकरणवाले उन महर्षि के इस प्रकार विचार करते ही मुनिवेष में रहनेवाले राजकुमार कुश और लव ने आकर उनके चरणों में प्रणाम किया।

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॥ १ · ४ · ५ ॥
कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ

kuśīlavau tu dharmajñau rājaputrau yaśasvinau ।
bhrātarau svarasampannau dadarśāśramavāsinau ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · ६ ॥
तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः

sa tu medhāvinau dṛṣṭvā vedeṣu pariniṣṭhitau ।
vedopabṛṁhaṇārthāya tāvagrāhayata prabhuḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · ७ ॥
काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरित्रव्रतः

kāvyaṁ rāmāyaṇaṁ kṛtsnaṁ sītāyāścaritaṁ mahat ।
paulastyavadhamityevaṁ cakāra caritravrataḥ ॥

॥ ५–७ ॥

राजकुमार कुश और लव दोनों भाई धर्म के ज्ञाता और यशस्वी थे। उनका स्वर बड़ा ही मधुर था और वे मुनि के आश्रम पर ही रहते थे। उनकी धारणाशक्ति अद्भुत थी और वे दोनों ही वेदों में पारंगत हो चुके थे। भगवान् वाल्मीकि ने उनकी ओर देखा और उन्हें सुयोग्य समझकर उत्तम व्रत का पालन करनेवाले उन महर्षि ने वेदार्थ का विस्तार के साथ ज्ञान कराने के लिये उन्हें सीता के चरित्र से युक्त सम्पूर्ण रामायण नामक महाकाव्य का, जिसका दूसरा नाम पौलस्त्यवध अथवा दशाननवध था, अध्ययन कराया।

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॥ १ · ४ · ८ ॥
पाठ्ये गेये मधुरं प्रमाणैस्त्रिभिरन्वितम् जातिभिः सप्तभिर्युक्तं तन्त्रीलयसमन्वितम्

pāṭhye geye ca madhuraṁ pramāṇaistribhiranvitam ।
jātibhiḥ saptabhiryuktaṁ tantrīlayasamanvitam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · ९ ॥
रसैः शृंगारकरुणहास्यरौद्रभयानकैः वीरादिभी रसैर्युक्तं काव्यमेतदगायताम्

rasaiḥ śṛṁgārakaruṇahāsyaraudrabhayānakaiḥ ।
vīrādibhī rasairyuktaṁ kāvyametadagāyatām ॥

॥ ८–९ ॥

वह महाकाव्य पढ़ने और गाने में भी मधुर, द्रुत, मध्य और विलम्बित — इन तीनों गतियों से अन्वित, षड्ज आदि सातों स्वरों से युक्त, वीणा बजाकर स्वर और ताल के साथ गाने योग्य तथा शृंगार, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक और वीर आदि सभी रसों से अनुप्राणित है। दोनों भाई कुश और लव उस महाकाव्य को पढ़कर उसका गान करने लगे।

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॥ १ · ४ · १० ॥
तौ तु गान्धर्वतत्त्वज्ञौ स्थानमूर्च्छनकोविदौ भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ गन्धर्वाविव रूपिणौ

tau tu gāndharvatattvajñau sthānamūrcchanakovidau ।
bhrātarau svarasampannau gandharvāviva rūpiṇau ॥

वे दोनों भाई गान्धर्व विद्या (संगीत-शास्त्र) के तत्त्वज्ञ, स्थान और मूर्च्छना के जानकार, मधुर स्वर से सम्पन्न तथा गन्धर्वों के समान मनोहर रूपवाले थे।

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॥ १ · ४ · ११ ॥
रूपलक्षणसम्पन्नौ मधुरस्वरभाषिणौ बिम्बादिवोत्थितौ बिम्बौ रामदेहात् तथापरौ

rūpalakṣaṇasampannau madhurasvarabhāṣiṇau ।
bimbādivotthitau bimbau rāmadehāt tathāparau ॥

सुन्दर रूप और शुभ लक्षण उनकी सहज सम्पत्ति थे। वे दोनों भाई बड़े मधुर स्वर से वार्तालाप करते थे। जैसे बिम्ब से प्रतिबिम्ब प्रकट होते हैं, उसी प्रकार श्रीराम के शरीर से उत्पन्न हुए वे दोनों राजकुमार दूसरे युगल श्रीराम ही प्रतीत होते थे।

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॥ १ · ४ · १२ ॥
तौ राजपुत्रौ कात्स्न्र्येन धर्म्यमाख्यानमुत्तमम् वाचोविधेयं तत्सर्वं कृत्वा काव्यमनिन्दितौ

tau rājaputrau kātsnryena dharmyamākhyānamuttamam ।
vācovidheyaṁ tatsarvaṁ kṛtvā kāvyamaninditau ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · १३ ॥
ऋषीणां द्विजातीनां साधूनां समागमे यथोपदेशं तत्त्वज्ञौ जगतुः सुसमाहितौ

ṛṣīṇāṁ ca dvijātīnāṁ sādhūnāṁ ca samāgame ।
yathopadeśaṁ tattvajñau jagatuḥ susamāhitau ॥

॥ १२–१३ ॥

वे दोनों राजपुत्र सब लोगों की प्रशंसा के पात्र थे, उन्होंने उस धर्मानुकूल उत्तम उपाख्यानमय सम्पूर्ण काव्य को जिह्वाग्र कर लिया था और जब कभी ऋषियों, ब्राह्मणों तथा साधुओं का समागम होता था, उस समय उनके बीच में बैठकर वे दोनों तत्त्वज्ञ बालक एकाग्रचित्त हो रामायण का गान किया करते थे।

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॥ १ · ४ · १४ ॥
महात्मानौ महाभागौ सर्वलक्षणलक्षितौ तौ कदाचित् समेतानामृषीणां भावितात्मनाम्

mahātmānau mahābhāgau sarvalakṣaṇalakṣitau ।
tau kadācit sametānāmṛṣīṇāṁ bhāvitātmanām ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · १५ ॥
मध्ये सभं समीपस्थाविदं काव्यमगायताम् तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे बाष्पपर्याकुलेक्षणाः

madhye sabhaṁ samīpasthāvidaṁ kāvyamagāyatām ।
tacchrutvā munayaḥ sarve bāṣpaparyākulekṣaṇāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · १६ ॥
साधु साध्विति तावूचुः परं विस्मयमागताः ते प्रीतमनसः सर्वे मुनयो धर्मवत्सलाः

sādhu sādhviti tāvūcuḥ paraṁ vismayamāgatāḥ ।
te prītamanasaḥ sarve munayo dharmavatsalāḥ ॥

॥ १४–१६ ॥

एक दिन की बात है, बहुत-से शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षियों की मण्डली एकत्र हुई थी। उसमें महान् सौभाग्यशाली तथा समस्त शुभ लक्षणों से सुशोभित महामनस्वी कुश और लव भी उपस्थित थे। उन्होंने बीच सभा में उन महात्माओं के समीप बैठकर उस रामायणकाव्य का गान किया। उसे सुनकर सभी मुनियों के नेत्रों में आँसू भर आये और वे अत्यन्त विस्मय-विमुग्ध होकर उन्हें साधुवाद देने लगे। मुनि धर्मवत्सल तो होते ही हैं; वह धार्मिक उपाख्यान सुनकर उन सबके मन में बड़ी प्रसन्नता हुई।

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॥ १ · ४ · १७ ॥
प्रशशंसुः प्रशस्तव्यौ गायमानौ कुशीलवौ अहो गीतस्य माधुर्यं श्लोकानां विशेषतः

praśaśaṁsuḥ praśastavyau gāyamānau kuśīlavau ।
aho gītasya mādhuryaṁ ślokānāṁ ca viśeṣataḥ ॥

वे रामायण-कथा के गायक कुमार कुश और लव की, जो प्रशंसा के ही योग्य थे, इस प्रकार प्रशंसा करने लगे — "अहो! इन बालकों के गीत में कितना माधुर्य है। श्लोकों की मधुरता तो और भी अद्भुत है।"

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॥ १ · ४ · १८ ॥
चिरनिर्वृत्तमप्येतत् प्रत्यक्षमिव दर्शितम् प्रविश्य तावुभौ सुष्ठु तथाभावमगायताम् सहितौ मधुरं रक्तं सम्पन्नं स्वरसम्पदा

ciranirvṛttamapyetat pratyakṣamiva darśitam ।
praviśya tāvubhau suṣṭhu tathābhāvamagāyatām ॥
sahitau madhuraṁ raktaṁ sampannaṁ svarasampadā ।

यद्यपि इस काव्य में वर्णित घटना बहुत दिनों पहले हो चुकी है तो भी इन दोनों बालकों ने इस सभा में प्रवेश करके एक साथ ऐसे सुन्दर भाव से स्वरसम्पन्न, रागयुक्त मधुरगान किया है कि वे पहले की घटनाएँ भी प्रत्यक्ष-सी दिखायी देने लगी हैं — मानो अभी-अभी आँखों के सामने घटित हो रही हों।

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॥ १ · ४ · १९ ॥
एवं प्रशस्यमानौ तौ तपः श्लाघ्यैर्महर्षिभिः संरक्ततरमत्यर्थं मधुरं तावगायताम्

evaṁ praśasyamānau tau tapaḥ ślāghyairmaharṣibhiḥ ॥
saṁraktataramatyarthaṁ madhuraṁ tāvagāyatām ।

इस प्रकार उत्तम तपस्या से युक्त महर्षिगण उन दोनों कुमारों की प्रशंसा करते और वे उनसे प्रशंसित होकर अत्यन्त मधुर राग से रामायण का गान करते थे।

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॥ १ · ४ · २० ॥
प्रीतः कश्चिन्मुनिस्ताभ्यां संस्थितः कलशं ददौ

prītaḥ kaścinmunistābhyāṁ saṁsthitaḥ kalaśaṁ dadau ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · २१ ॥
प्रसन्नो वल्कलं कश्चिद् ददौ ताभ्यां महायशाः अन्यः कृष्णाजिनमदाद् यज्ञसूत्रं तथापरः

prasanno valkalaṁ kaścid dadau tābhyāṁ mahāyaśāḥ ।
anyaḥ kṛṣṇājinamadād yajñasūtraṁ tathāparaḥ ॥

॥ २०–२१ ॥

उनके गान से संतुष्ट हुए किसी मुनि ने उठकर उन्हें पुरस्कार के रूप में एक कलश प्रदान किया। किसी दूसरे महायशस्वी महर्षि ने प्रसन्न होकर उन दोनों को वल्कल वस्त्र दिया। किसी ने काला मृगचर्म भेंट किया तो किसी ने यज्ञोपवीत।

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॥ १ · ४ · २२ ॥
कश्चित् कमण्डलुं प्रादादमौञ्जीमन्यो महामुनिः बृसीमन्यस्तदा प्रादात् कौपीनमपरो मुनिः

kaścit kamaṇḍaluṁ prādādamauñjīmanyo mahāmuniḥ ।
bṛsīmanyastadā prādāt kaupīnamaparo muniḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · २३ ॥
ताभ्यां ददौ तदा हृष्टः कुठारमपरो मुनिः काषायमपरो वस्त्रं चीरमन्यो ददौ मुनिः

tābhyāṁ dadau tadā hṛṣṭaḥ kuṭhāramaparo muniḥ ।
kāṣāyamaparo vastraṁ cīramanyo dadau muniḥ ॥

॥ २२–२३ ॥

एक ने कमण्डलु दिया तो दूसरे महामुनि ने मुञ्ज की मेखला भेंट की। तीसरे ने आसन और चौथे ने कौपीन प्रदान किया। किसी ने हर्ष में भरकर उन दोनों बालकों के लिये कुठार अर्पित किया। किसी ने गेरुआ वस्त्र दिया तो किसी मुनि ने चीर भेंट किया।

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॥ १ · ४ · २४ ॥
जटाबन्धनमन्यस्तु काष्ठरज्जुं मुदान्वितः यज्ञभाण्डमृषिः कश्चित् काष्ठभारं तथापरः

jaṭābandhanamanyastu kāṣṭharajjuṁ mudānvitaḥ ।
yajñabhāṇḍamṛṣiḥ kaścit kāṣṭhabhāraṁ tathāparaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · २५ ॥
औदुम्बरीं बृसीमन्यः स्वस्ति केचित् तदावदन् आयुष्यमपरे प्राहुर्मुदा तत्र महर्षयः ददुश्चैवं वरान् सर्वे मुनयः सत्यवादिनः

audumbarīṁ bṛsīmanyaḥ svasti kecit tadāvadan ।
āyuṣyamapare prāhurmudā tatra maharṣayaḥ ॥
daduścaivaṁ varān sarve munayaḥ satyavādinaḥ ।

॥ २४–२५ ॥

किसी दूसरे ने आनन्दमग्न होकर जटा बाँधने के लिये रस्सी दी तो किसी ने समिधा बाँधकर लाने के लिये डोरी प्रदान की। एक ऋषि ने यज्ञपात्र दिया तो दूसरे ने काष्ठभार समर्पित किया। किसी ने गूलर की लकड़ी का बना हुआ पीढ़ा अर्पित किया। कुछ लोग उस समय आशीर्वाद देने लगे — "बच्चो! तुम दोनों का कल्याण हो।" दूसरे महर्षि प्रसन्नतापूर्वक बोल उठे — "तुम्हारी आयु बढ़े।" इस प्रकार सभी सत्यवादी मुनियों ने उन दोनों को नाना प्रकार के वर दे दिये।

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॥ १ · ४ · २६ ॥
आश्चर्यमिदमाख्यानं मुनिना सम्प्रकीर्तितम् परं कवीनामाधारं समाप्तं यथाक्रमम्

āścaryamidamākhyānaṁ muninā samprakīrtitam ॥
paraṁ kavīnāmādhāraṁ samāptaṁ ca yathākramam ।

महर्षि वाल्मीकि द्वारा वर्णित यह आश्चर्यमय काव्य परवर्ती कवियों के लिये श्रेष्ठ आधारशिला है। श्रीरामचन्द्रजी के सम्पूर्ण चरित्रों का क्रमशः वर्णन करते हुए इसकी समाप्ति की गयी है।

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॥ १ · ४ · २७ ॥
अभिगीतमिदं गीतं सर्वगीतिषु कोविदौ आयुष्यं पुष्टिजननं सर्वश्रुतिमनोहरम्

abhigītamidaṁ gītaṁ sarvagītiṣu kovidau ॥
āyuṣyaṁ puṣṭijananaṁ sarvaśrutimanoharam ।

सम्पूर्ण गीतों के विशेषज्ञ राजकुमारो! यह काव्य आयु एवं पुष्टि प्रदान करनेवाला तथा सबके कान और मन को मोहनेवाला मधुर संगीत है। तुम दोनों ने बड़े सुन्दर ढंग से इसका गान किया है।

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॥ १ · ४ · २८ ॥
प्रशस्यमानौ सर्वत्र कदाचित् तत्र गायकौ

praśasyamānau sarvatra kadācit tatra gāyakau ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · २९ ॥
रथ्यासु राजमार्गेषु ददर्श भरताग्रजः स्ववेश्म चानीय ततो भ्रातरौ कुशीलवौ

rathyāsu rājamārgeṣu dadarśa bharatāgrajaḥ ।
svaveśma cānīya tato bhrātarau sa kuśīlavau ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · ३० ॥
पूजयामास पूजार्हौ रामः शत्रुनिबर्हणः

pūjayāmāsa pūjārhau rāmaḥ śatrunibarhaṇaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · ३१ ॥
आसीनः काञ्चने दिव्ये सिंहासने प्रभुः उपोपविष्टैः सचिवैर्भ्रातृभिश्च समन्वितः

āsīnaḥ kāñcane divye sa ca siṁhāsane prabhuḥ ।
upopaviṣṭaiḥ sacivairbhrātṛbhiśca samanvitaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · ३२ ॥
दृष्ट्वा तु रूपसम्पन्नौ विनीतौ भ्रातरावुभौ उवाच लक्ष्मणं रामः शत्रुघ्नं भरतं तथा श्रूयतामेतदाख्यानमनयोर्देववर्चसोः विचित्रार्थपदं सम्यग्गायकौ समचोदयत्

dṛṣṭvā tu rūpasampannau vinītau bhrātarāvubhau ।
uvāca lakṣmaṇaṁ rāmaḥ śatrughnaṁ bharataṁ tathā ॥
śrūyatāmetadākhyānamanayordevavarcasoḥ ।
vicitrārthapadaṁ samyaggāyakau samacodayat ।

॥ २८–३२ ॥

एक समय सर्वत्र प्रशंसित होनेवाले राजकुमार कुश और लव अयोध्या की गलियों और सड़कों पर रामायण के श्लोकों का गान करते हुए विचर रहे थे। इसी समय उनके ऊपर भरत के बड़े भाई श्रीराम की दृष्टि पड़ी। उन्होंने उन समादरयोग्य बन्धुओं को अपने घर बुलाकर उनका यथोचित सम्मान किया। तदनन्तर शत्रुओं का संहार करनेवाले श्रीराम स्वर्णमय दिव्य सिंहासन पर विराजमान हुए। उनके मन्त्री और भाई भी उनके पास ही बैठे थे। उन सबके साथ सुन्दर रूपवाले उन दोनों विनयशील बालकों की ओर देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न से कहा — "ये देवता के समान तेजस्वी दोनों कुमार विचित्र अर्थ और पदों से युक्त मधुर काव्य बड़े सुन्दर ढंग से गाकर सुनाते हैं। तुम सब लोग इसे सुनो।" यों कहकर उन्होंने उन दोनों भाइयों को गाने की आज्ञा दी।

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॥ १ · ४ · ३३ ॥
तौ चापि मधुरं रक्तं स्वचित्तायतनिःस्वनम्

tau cāpi madhuraṁ raktaṁ svacittāyataniḥsvanam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४ · ३४ ॥
तन्त्रीलयवदत्यर्थं विश्रुतार्थमगायताम् ह्लादयत् सर्वगात्राणि मनांसि हृदयानि श्रोत्राश्रयसुखं गेयं तद् बभौ जनसंसदि

tantrīlayavadatyarthaṁ viśrutārthamagāyatām ।
hlādayat sarvagātrāṇi manāṁsi hṛdayāni ca ।
śrotrāśrayasukhaṁ geyaṁ tad babhau janasaṁsadi ॥

॥ ३३–३४ ॥

आज्ञा पाकर वे दोनों भाई वीणा के लय के साथ अपने मन के अनुकूल तार (उच्च) एवं मधुर स्वर में राग अलापते हुए रामायणकाव्य का गान करने लगे। उनका उच्चारण इतना स्पष्ट था कि सुनते ही अर्थ का बोध हो जाता था। उनका गान सुनकर श्रोताओं के समस्त अंगों में हर्षजनित रोमाञ्च हो आया तथा उन सबके मन और आत्मा में आनन्द की तरंगें उठने लगीं। उस जनसभा में होनेवाला वह गान सबकी श्रवणेन्द्रियों को अत्यन्त सुखद प्रतीत होता था।

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॥ १ · ४ · ३५ ॥
इमौ मुनी पार्थिवलक्षणान्वितौ कुशीलवौ चैव महातपस्विनौ ममापि तद् भूतिकरं प्रचक्षते महानुभावं चरितं निबोधत

imau munī pārthivalakṣaṇānvitau kuśīlavau caiva mahātapasvinau ।
mamāpi tad bhūtikaraṁ pracakṣate mahānubhāvaṁ caritaṁ nibodhata ॥

उस समय श्रीराम ने अपने भाइयों का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा — "ये दोनों कुमार मुनि होकर भी राजोचित लक्षणों से सम्पन्न हैं। संगीत में कुशल होने के साथ ही महान् तपस्वी भी हैं। ये जिस चरित्र का — प्रबन्धकाव्य का गान करते हैं, वह शब्दार्थालङ्कार, उत्तम गुण एवं सुन्दर रीति आदि से युक्त होने के कारण अत्यन्त प्रभावशाली है। मेरे लिये भी अभ्युदयकारक है; ऐसा वृद्ध पुरुषों का कथन है। अतः तुम सब लोग ध्यान देकर इसे सुनो।"

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॥ १ · ४ · ३६ ॥
ततस्तु तौ रामवचःप्रचोदितावगायतां मार्गविधानसम्पदा चापि रामः परिषद्गतः शनैर्बुभूषयासक्तमना बभूव

tatastu tau rāmavacaḥpracoditāvagāyatāṁ mārgavidhānasampadā ।
sa cāpi rāmaḥ pariṣadgataḥ śanairbubhūṣayāsaktamanā babhūva ॥

तदनन्तर श्रीराम की आज्ञा से प्रेरित हो वे दोनों भाई मार्गविधान की रीति से रामायण का गान करने लगे। सभा में बैठे हुए भगवान् श्रीराम भी धीरे-धीरे उनका गान सुनने में तन्मय हो गये।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौथा सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ॥