राजा दशरथ द्वारा सुरक्षित अयोध्यापुरी का वर्णन
Ayodhyā, the city guarded by King Daśaratha
“स्वर्णपुरी अयोध्या”
॥ १ · ५ · ६–२२ ॥
सरय्वास्तीरे विराजते कोसलानां समृद्धा राजधानी अयोध्या — श्वेतस्वर्णप्रासादैः, उत्तुङ्गप्राकारैः, तोरणैः पताकाभिश्च मण्डिता; पद्मपरिखाभिः परिवृता, रथगजसंकुलमार्गा, सुवर्णशिखरैरुषःप्रभां स्पृशन्ती।
सरयू के तट पर कोसलराज की समृद्ध राजधानी अयोध्या सुशोभित है — श्वेत और स्वर्ण प्रासादों, ऊँचे परकोटों, तोरणों और पताकाओं से मण्डित; कमल-खाइयों से घिरी, रथ-गजों से भरे चौड़े मार्गोंवाली, अपने स्वर्ण-शिखरों से प्रातःकाल की लाली को छूती हुई।
On the banks of the Sarayu rises Ayodhya, the great capital of Kosala in its glory — tier upon tier of white-and-gold palaces, lofty ramparts, arched gateways and banners, lotus moats and broad avenues thronged with elephants and chariots, its golden spires touching a dawn sky of rose and gold.
sarvā pūrvamiyaṁ yeṣāmāsīt kṛtsnā vasundharā ।
prajāpatimupādāya nṛpāṇāṁ jayaśālinām ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
yeṣāṁ sa sagaro nāma sāgaro yena khānitaḥ ।
ṣaṣṭiputrasahasrāṇi yaṁ yāntaṁ paryavārayan ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
ikṣvākūṇāmidaṁ teṣāṁ rājñāṁ vaṁśe mahātmanām ।
mahadutpannamākhyānaṁ rāmāyaṇamiti śrutam ॥
यह सारी पृथ्वी पूर्वकाल में प्रजापति मनु से लेकर अब तक जिस वंश के विजयशाली नरेशों के अधिकार में रही है, जिन्होंने समुद्र को खुदवाया था और जिन्हें यात्राकाल में साठ हजार पुत्र घेरकर चलते थे, वे महाप्रतापी राजा सगर जिनके कुल में उत्पन्न हुए, इन्हीं इक्ष्वाकुवंशी महात्मा राजाओं की कुलपरम्परा में रामायण नाम से प्रसिद्ध इस महान् ऐतिहासिक काव्य की अवतारणा हुई है।
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tadidaṁ vartayiṣyāvaḥ sarvaṁ nikhilamāditaḥ ।
dharmakāmārthasahitaṁ śrotavyamanasūyatā ॥
हम दोनों आदि से अन्त तक इस सारे काव्य का पूर्णरूप से गान करेंगे। इसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है; अतः आपलोग दोषदृष्टि का परित्याग करके इसका श्रवण करें।
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kośalo nāma muditaḥ sphīto janapado mahān ।
niviṣṭaḥ sarayūtīre prabhūtadhanadhānyavān ॥
कोशल नाम से प्रसिद्ध एक बहुत बड़ा जनपद है, जो सरयू नदी के किनारे बसा हुआ है। वह प्रचुर धन-धान्य से सम्पन्न, सुखी और समृद्धिशाली है।
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ayodhyā nāma nagarī tatrāsīllokaviśrutā ।
manunā mānavendreṇa yā purī nirmitā svayam ॥
उसी जनपद में अयोध्या नाम की एक नगरी है, जो समस्त लोकों में विख्यात है। उस पुरी को स्वयं महाराज मनु ने बनवाया और बसाया था।
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āyatā daśa ca dve ca yojanāni mahāpurī ।
śrīmatī trīṇi vistīrṇā suvibhaktamahāpathā ॥
वह शोभाशालिनी महापुरी बारह योजन लम्बी और तीन योजन चौड़ी थी। वहाँ बाहर के जनपदों में जाने का जो विशाल राजमार्ग था, वह उभयपार्श्व में विविध वृक्षावलियों से विभूषित होने के कारण सुस्पष्टतया अन्य मार्गों से विभक्त जान पड़ता था।
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rājamārgeṇa mahatā suvibhaktena śobhitā ।
muktapuṣpāvakīrṇena jalasiktena nityaśaḥ ॥
सुन्दर विभागपूर्वक बना हुआ महान् राजमार्ग उस पुरी की शोभा बढ़ा रहा था। उस पर खिले हुए फूल बिखेरे जाते थे तथा प्रतिदिन उस पर जल का छिड़काव होता था।
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tāṁ tu rājā daśaratho mahārāṣṭravivardhanaḥ ।
purīmāvāsayāmāsa divi devapatiryathā ॥
जैसे स्वर्ग में देवराज इन्द्र ने अमरावतीपुरी बसायी थी, उसी प्रकार धर्म और न्याय के बल से अपने महान् राष्ट्र की वृद्धि करनेवाले राजा दशरथ ने अयोध्यापुरी को पहले की अपेक्षा विशेषरूप से बसाया था।
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kapāṭatoraṇavatīṁ suvibhaktāntarāpaṇām ।
sarvayantrāyudhavatīmuṣitāṁ sarvaśilpibhiḥ ॥
वह पुरी बड़े-बड़े फाटकों और किवाड़ों से सुशोभित थी। उसके भीतर पृथक्-पृथक् बाजारें थीं। वहाँ सब प्रकार के यन्त्र और अस्त्र-शस्त्र संचित थे। उस पुरी में सभी कलाओं के शिल्पी निवास करते थे।
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sūtamāgadhasambādhāṁ śrīmatīmatulaprabhām ।
uccāṭṭāladhvajavatīṁ śataghnīśatasaṁkulām ॥
स्तुति-पाठ करनेवाले सूत और वंशावली का बखान करनेवाले मागध वहाँ भरे रहते थे। वह पुरी सुन्दर शोभा से सम्पन्न थी। उसकी सुषमा की कहीं तुलना नहीं थी। वहाँ ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ थीं, जिनके ऊपर ध्वज फहराते थे। सैकड़ों शतघ्नियों (तोपों) से वह पुरी व्याप्त थी।
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vadhūnāṭakasaṁghaiśca saṁyuktāṁ sarvataḥ purīm ।
udyānāmravaṇopetāṁ mahatīṁ sālamekhalām ॥
उस पुरी में ऐसी बहुत-सी नाटक-मण्डलियाँ थीं, जिनमें केवल स्त्रियाँ ही नृत्य एवं अभिनय करती थीं। उस नगरी में चारों ओर उद्यान तथा आमों के बागीचे थे। लम्बाई और चौड़ाई की दृष्टि से वह पुरी बहुत विशाल थी तथा साल के वन उसे सब ओर से घेरे हुए थे।
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durgagambhīraparikhāṁ durgāmanyairdurāsadām ।
vājivāraṇasampūrṇāṁ gobhiruṣṭraiḥ kharaistathā ॥
उसके चारों ओर गहरी खाई खुदी थी, जिसमें प्रवेश करना या जिसे लाँघना अत्यन्त कठिन था। वह नगरी दूसरों के लिये सर्वथा दुर्गम एवं दुर्जय थी। घोड़े, हाथी, गाय-बैल, ऊँट तथा गदहे आदि उपयोगी पशुओं से वह पुरी भरी-पूरी थी।
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sāmantarājasaṁghaiśca balikarmabhirāvṛtām ।
nānādeśanivāsaiśca vaṇigbhirupaśobhitām ॥
कर देनेवाले सामन्त नरेशों के समुदाय उसे सदा घेरे रहते थे। विभिन्न देशों के निवासी वैश्य उस पुरी की शोभा बढ़ाते थे।
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prāsādai ratnavikṛtaiḥ parvatairiva śobhitām ।
kūṭāgāraiśca sampūrṇāmindrasyevāmarāvatīm ॥
वहाँ के महलों का निर्माण नाना प्रकार के रत्नों से हुआ था। वे गगनचुम्बी प्रासाद पर्वतों के समान जान पड़ते थे। उनसे उस पुरी की बड़ी शोभा हो रही थी। बहुसंख्यक कूटागारों (गुप्तगृहों अथवा स्त्रियों के क्रीड़ाभवनों) से परिपूर्ण वह नगरी इन्द्र की अमरावती के समान जान पड़ती थी।
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citrāmaṣṭāpadākārāṁ varanārīgaṇāyutām ।
sarvaratnasamākīrṇāṁ vimānagṛhaśobhitām ॥
उसकी शोभा विचित्र थी। उसके महलों पर सोने का पानी चढ़ाया गया था (अथवा वह पुरी द्यूतफलक के आकार में बसायी गयी थी)। श्रेष्ठ एवं सुन्दरी नारियों के समूह उस पुरी की शोभा बढ़ाते थे। वह सब प्रकार के रत्नों से भरी-पूरी तथा सतमहले प्रासादों से सुशोभित थी।
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gṛhagāḍhāmavicchidrāṁ samabhūmau niveśitām ।
śālitaṇḍulasampūrṇāmikṣukāṇḍarasodakām ॥
पुरवासियों के घरों से उसकी आबादी इतनी घनी हो गयी थी कि कहीं थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं दिखायी देता था। उसे समतल भूमि पर बसाया गया था। वह नगरी जड़हन धान के चावलों से भरपूर थी। वहाँ का जल इतना मीठा या स्वादिष्ट था, मानो ईख का रस हो।
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dundubhibhirmṛdaṁgaiśca vīṇābhiḥ paṇavaistathā ।
nāditāṁ bhṛśamatyarthaṁ pṛthivyāṁ tāmanuttamām ॥
भूमण्डल की वह सर्वोत्तम नगरी दुन्दुभि, मृदंग, वीणा, पणव आदि वाद्यों की मधुर ध्वनि से अत्यन्त गूँजती रहती थी।
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vimānamiva siddhānāṁ tapasādhigataṁ divi ।
suniveśitaveśmāntāṁ narottamasamāvṛtām ॥
देवलोक में तपस्या से प्राप्त हुए सिद्धों के विमान की भाँति उस पुरी का भूमण्डल में सर्वोत्तम स्थान था। वहाँ के सुन्दर महल बहुत अच्छे ढंग से बनाये और बसाये गये थे। उनके भीतरी भाग बहुत ही सुन्दर थे। बहुत-से श्रेष्ठ पुरुष उस पुरी में निवास करते थे।
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ye ca bāṇairna vidhyanti viviktamaparāparam ।
śabdavedhyaṁ ca vitataṁ laghuhastā viśāradāḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
siṁhavyāghravarāhāṇāṁ mattānāṁ nadatāṁ vane ।
hantāro niśitaiḥ śastrairbalād bāhubalairapi ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
tādṛśānāṁ sahasraistāmabhipūrṇāṁ mahārathaiḥ ।
purīmāvāsayāmāsa rājā daśarathastadā ॥
जो अपने समूह से बिछुड़कर असहाय हो गया हो, जिसके आगे-पीछे कोई न हो (अर्थात् जो पिता और पुत्र दोनों से हीन हो) तथा जो शब्दवेधी बाण द्वारा बेधने योग्य हों अथवा युद्ध से हारकर भागे जा रहे हों, ऐसे पुरुषों पर जो लोग बाणों का प्रहार नहीं करते, जिनके सधे-सधाये हाथ शीघ्रतापूर्वक लक्ष्यवेध करने में समर्थ हैं, अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग में कुशलता प्राप्त कर चुके हैं तथा जो वन में गर्जते हुए मतवाले सिंहों, व्याघ्रों और सूअरों को तीखे शस्त्रों से एवं भुजाओं के बल से भी बलपूर्वक मार डालने में समर्थ हैं, ऐसे सहस्रों महारथी वीरों से अयोध्यापुरी भरी-पूरी थी। उसे महाराज दशरथ ने बसाया और पाला था।
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tāmagnimadbhirguṇavadbhirāvṛtāṁ dvijottamairvedaṣaḍaṁgapāragaiḥ ।
sahasradaiḥ satyaratairmahātmabhirmaharṣikalpairṛṣibhiśca kevalaiḥ ॥
अग्निहोत्री, शम-दम आदि उत्तम गुणों से सम्पन्न तथा छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदों के पारंगत विद्वान् श्रेष्ठ ब्राह्मण उस पुरी को सदा घेरे रहते थे। वे सहस्रों का दान करनेवाले और सत्य में तत्पर रहनेवाले थे। ऐसे महर्षिकल्प महात्माओं तथा ऋषियों से अयोध्यापुरी सुशोभित थी तथा राजा दशरथ उसकी रक्षा करते थे।
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ॥