वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ६ · २८ श्लोकाःSarga 6 · 28 ślokas

राजा दशरथ के शासनकाल में अयोध्या और वहाँ के नागरिकों की उत्तम स्थिति का वर्णन

The city and its people under Daśaratha’s rule

धर्मराज्य का सुख

“धर्मराज्य का सुख”
॥ १ · ६ · ४–२५ ॥

धर्मात्मनो दशरथस्य शासने अयोध्यायाः प्रजाः सुखिनः सन्तुष्टाश्च — सुवस्त्राः पौराः, धान्यस्वर्णपूर्णापणाः स्रग्विणो वणिजः, गायका नर्तक्यश्च, आशीर्वाददा द्विजाः, हृष्टपुष्टा गावः; सर्वत्र शान्तिः समृद्धिर्भक्तिश्च।

धर्मात्मा दशरथ के शासन में अयोध्या की प्रजा सुखी और सन्तुष्ट है — सुन्दर वस्त्रों में नागरिक, अन्न और स्वर्ण से भरे बाजार के मालाधारी व्यापारी, गायक और नर्तकियाँ, आशीर्वाद देते ब्राह्मण, हृष्ट-पुष्ट गायें; गली-गली में शान्ति, समृद्धि और भक्ति का वातावरण है।

Under the just reign of King Dasharatha the people of Ayodhya are happy and content — citizens in fine silks, garlanded merchants at stalls laden with grain and gold, musicians and dancing-girls, brahmins blessing passers-by and well-fed cattle, jasmine strung across the lane — an air of peace, plenty and devotion beneath the serene palace towers.

॥ १ · ६ · १ ॥
तस्यां पुर्यामयोध्यायां वेदवित् सर्वसंग्रहः दीर्घदर्शी महातेजाः पौरजानपदप्रियः

tasyāṁ puryāmayodhyāyāṁ vedavit sarvasaṁgrahaḥ ।
dīrghadarśī mahātejāḥ paurajānapadapriyaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६ · २ ॥
इक्ष्वाकूणामतिरथो यज्वा धर्मपरो वशी महर्षिकल्पो राजर्षिस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः

ikṣvākūṇāmatiratho yajvā dharmaparo vaśī ।
maharṣikalpo rājarṣistriṣu lokeṣu viśrutaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६ · ३ ॥
बलवान् निहतामित्रो मित्रवान् विजितेन्द्रियः धनैश्च संचयैश्चान्यैः शक्रवैश्रवणोपमः

balavān nihatāmitro mitravān vijitendriyaḥ ।
dhanaiśca saṁcayaiścānyaiḥ śakravaiśravaṇopamaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६ · ४ ॥
यथा मनुर्महातेजा लोकस्य परिरक्षिता तथा दशरथो राजा लोकस्य परिरक्षिता

yathā manurmahātejā lokasya parirakṣitā ।
tathā daśaratho rājā lokasya parirakṣitā ॥

॥ १–४ ॥

उस अयोध्यापुरी में रहकर राजा दशरथ प्रजावर्ग का पालन करते थे। वे वेदों के विद्वान् तथा सभी उपयोगी वस्तुओं का संग्रह करनेवाले थे। दूरदर्शी और महान् तेजस्वी थे। नगर और जनपद की प्रजा उनसे बहुत प्रेम रखती थी। वे इक्ष्वाकुकुल के अतिरथी वीर थे। यज्ञ करनेवाले, धर्मपरायण और जितेन्द्रिय थे। महर्षियों के समान दिव्य गुणसम्पन्न राजर्षि थे। उनकी तीनों लोकों में ख्याति थी। वे बलवान्, शत्रुहीन, मित्रों से युक्त एवं इन्द्रियविजयी थे। धन और अन्य वस्तुओं के संचय की दृष्टि से इन्द्र और कुबेर के समान जान पड़ते थे। जैसे महातेजस्वी प्रजापति मनु सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करते थे, उसी प्रकार महाराज दशरथ भी करते थे।

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॥ १ · ६ · ५ ॥
तेन सत्याभिसंधेन त्रिवर्गमनुतिष्ठता पालिता सा पुरी श्रेष्ठा इन्द्रेणेवामरावती

tena satyābhisaṁdhena trivargamanutiṣṭhatā ।
pālitā sā purī śreṣṭhā indreṇevāmarāvatī ॥

धर्म, अर्थ और काम का सम्पादन करनेवाले कर्मों का अनुष्ठान करते हुए वे सत्यप्रतिज्ञ नरेश उस श्रेष्ठ अयोध्यापुरी का उसी तरह पालन करते थे, जैसे इन्द्र अमरावतीपुरी का।

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॥ १ · ६ · ६ ॥
तस्मिन् पुरवरे हृष्टा धर्मात्मानो बहुश्रुताः नरास्तुष्टा धनैः स्वैः स्वैरलुब्धाः सत्यवादिनः

tasmin puravare hṛṣṭā dharmātmāno bahuśrutāḥ ।
narāstuṣṭā dhanaiḥ svaiḥ svairalubdhāḥ satyavādinaḥ ॥

उस उत्तम नगर में निवास करनेवाले सभी मनुष्य प्रसन्न, धर्मात्मा, बहुश्रुत, निर्लोभ, सत्यवादी तथा अपने-अपने धन से संतुष्ट रहनेवाले थे।

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॥ १ · ६ · ७ ॥
नाल्पसंनिचयः कश्चिदासीत् तस्मिन् पुरोत्तमे कुटुम्बी यो ह्यसिद्धार्थोऽगवाश्वधनधान्यवान्

nālpasaṁnicayaḥ kaścidāsīt tasmin purottame ।
kuṭumbī yo hyasiddhārtho'gavāśvadhanadhānyavān ॥

उस श्रेष्ठ पुरी में कोई भी ऐसा कुटुम्बी नहीं था, जिसके पास उत्कृष्ट वस्तुओं का संग्रह अधिक मात्रा में न हो, जिसके धर्म, अर्थ और काममय पुरुषार्थ सिद्ध न हो गये हों तथा जिसके पास गाय-बैल, घोड़े, धन-धान्य आदि का अभाव हो।

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॥ १ · ६ · ८ ॥
कामी वा कदर्यो वा नृशंसः पुरुषः क्वचित् द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान् नास्तिकः

kāmī vā na kadaryo vā nṛśaṁsaḥ puruṣaḥ kvacit ।
draṣṭuṁ śakyamayodhyāyāṁ nāvidvān na ca nāstikaḥ ॥

अयोध्या में कहीं भी कोई कामी, कृपण, क्रूर, मूर्ख और नास्तिक मनुष्य देखने को भी नहीं मिलता था।

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॥ १ · ६ · ९ ॥
सर्वे नराश्च नार्यश्च धर्मशीलाः सुसंयताः मुदिताः शीलवृत्ताभ्यां महर्षय इवामलाः

sarve narāśca nāryaśca dharmaśīlāḥ susaṁyatāḥ ।
muditāḥ śīlavṛttābhyāṁ maharṣaya ivāmalāḥ ॥

वहाँ के सभी स्त्री-पुरुष धर्मशील, संयमी, सदा प्रसन्न रहनेवाले तथा शील और सदाचार की दृष्टि से महर्षियों की भाँति निर्मल थे।

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॥ १ · ६ · १० ॥
नाकुण्डली नामुकुटी नास्रग्वी नाल्पभोगवान् नामृष्टो नलिप्तांगो नासुगन्धश्च विद्यते

nākuṇḍalī nāmukuṭī nāsragvī nālpabhogavān ।
nāmṛṣṭo na naliptāṁgo nāsugandhaśca vidyate ॥

वहाँ कोई भी कुण्डल, मुकुट और पुष्पहार से शून्य नहीं था। किसी के पास भोग-सामग्री की कमी नहीं थी। कोई भी ऐसा नहीं था, जो नहा-धोकर साफ-सुथरा न हो, जिसके अंगों में चन्दन का लेप न हुआ हो तथा जो सुगन्ध से वञ्चित हो।

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॥ १ · ६ · ११ ॥
नामृष्टभोजी नादाता नाप्यनंगदनिष्कधृक् नाहस्ताभरणो वापि दृश्यते नाप्यनात्मवान्

nāmṛṣṭabhojī nādātā nāpyanaṁgadaniṣkadhṛk ।
nāhastābharaṇo vāpi dṛśyate nāpyanātmavān ॥

अपवित्र अन्न भोजन करनेवाला, दान न देनेवाला तथा मन को काबू में न रखनेवाला मनुष्य तो वहाँ कोई दिखायी ही नहीं देता था। कोई भी ऐसा पुरुष देखने में नहीं आता था, जो बाजूबन्द, निष्क (स्वर्णपदक या मोहर) तथा हाथ का आभूषण (कड़ा आदि) धारण न किये हो।

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॥ १ · ६ · १२ ॥
नानाहिताग्निर्नायज्वा क्षुद्रो वा तस्करः कश्चिदासीदयोध्यायां चावृत्तो संकरः

nānāhitāgnirnāyajvā na kṣudro vā na taskaraḥ ।
kaścidāsīdayodhyāyāṁ na cāvṛtto na saṁkaraḥ ॥

अयोध्या में कोई भी ऐसा नहीं था, जो अग्निहोत्र और यज्ञ न करता हो; जो क्षुद्र, चोर, सदाचारशून्य अथवा वर्णसंकर हो।

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॥ १ · ६ · १३ ॥
स्वकर्मनिरता नित्यं ब्राह्मणा विजितेन्द्रियाः दानाध्ययनशीलाश्च संयताश्च प्रतिग्रहे

svakarmaniratā nityaṁ brāhmaṇā vijitendriyāḥ ।
dānādhyayanaśīlāśca saṁyatāśca pratigrahe ॥

वहाँ निवास करनेवाले ब्राह्मण सदा अपने कर्मों में लगे रहते, इन्द्रियों को वश में रखते, दान और स्वाध्याय करते तथा प्रतिग्रह से बचे रहते थे।

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॥ १ · ६ · १४ ॥
नास्तिको नानृती वापि कश्चिदबहुश्रुतः नासूयको चाशक्तो नाविद्वान् विद्यते क्वचित्

nāstiko nānṛtī vāpi na kaścidabahuśrutaḥ ।
nāsūyako na cāśakto nāvidvān vidyate kvacit ॥

वहाँ कहीं एक भी ऐसा द्विज नहीं था, जो नास्तिक, असत्यवादी, अनेक शास्त्रों के ज्ञान से रहित, दूसरों के दोष ढूँढ़नेवाला, साधन में असमर्थ और विद्याहीन हो।

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॥ १ · ६ · १५ ॥
नाषडंगविदत्रास्ति नाव्रतो नासहस्रदः दीनः क्षिप्तचित्तो वा व्यथितो वापि कश्चन

nāṣaḍaṁgavidatrāsti nāvrato nāsahasradaḥ ।
na dīnaḥ kṣiptacitto vā vyathito vāpi kaścana ॥

उस पुरी में वेद के छहों अंगों को न जाननेवाला, व्रतहीन, सहस्रों से कम दान देनेवाला, दीन, विक्षिप्तचित्त अथवा दुःखी भी कोई नहीं था।

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॥ १ · ६ · १६ ॥
कश्चिन्नरो वा नारी वा नाश्रीमान् नाप्यरूपवान् द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नापि राजन्यभक्तिमान्

kaścinnaro vā nārī vā nāśrīmān nāpyarūpavān ।
draṣṭuṁ śakyamayodhyāyāṁ nāpi rājanyabhaktimān ॥

अयोध्या में कोई भी स्त्री या पुरुष ऐसा नहीं देखा जा सकता था, जो श्रीहीन, रूपरहित तथा राजभक्ति से शून्य हो।

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॥ १ · ६ · १७ ॥
वर्णेष्वग्र्यचतुर्थेषु देवतातिथिपूजकाः कृतज्ञाश्च वदान्याश्च शूरा विक्रमसंयुताः

varṇeṣvagryacaturtheṣu devatātithipūjakāḥ ।
kṛtajñāśca vadānyāśca śūrā vikramasaṁyutāḥ ॥

ब्राह्मण आदि चारों वर्णों के लोग देवता और अतिथियों के पूजक, कृतज्ञ, उदार, शूरवीर और पराक्रमी थे।

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॥ १ · ६ · १८ ॥
दीर्घायुषो नराः सर्वे धर्मं सत्यं संश्रिताः सहिताः पुत्रपौत्रैश्च नित्यं स्त्रीभिः पुरोत्तमे

dīrghāyuṣo narāḥ sarve dharmaṁ satyaṁ ca saṁśritāḥ ।
sahitāḥ putrapautraiśca nityaṁ strībhiḥ purottame ॥

उस श्रेष्ठ नगर में निवास करनेवाले सब मनुष्य दीर्घायु तथा धर्म और सत्य का आश्रय लेनेवाले थे। वे सदा स्त्री-पुत्र और पौत्र आदि परिवार के साथ सुख से रहते थे।

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॥ १ · ६ · १९ ॥
क्षत्रं ब्रह्ममुखं चासीद् वैश्याः क्षत्रमनुव्रताः शूद्राः स्वकर्मनिरतास्त्रीन् वर्णानुपचारिणः

kṣatraṁ brahmamukhaṁ cāsīd vaiśyāḥ kṣatramanuvratāḥ ।
śūdrāḥ svakarmaniratāstrīn varṇānupacāriṇaḥ ॥

क्षत्रिय ब्राह्मणों का मुँह जोहते थे, वैश्य क्षत्रियों की आज्ञा का पालन करते थे और शूद्र अपने कर्तव्य का पालन करते हुए उपर्युक्त तीनों वर्णों की सेवा में संलग्न रहते थे।

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॥ १ · ६ · २० ॥
सा तेनेक्ष्वाकुनाथेन पुरी सुपरिरक्षिता यथा पुरस्तान्मनुना मानवेन्द्रेण धीमता

sā tenekṣvākunāthena purī suparirakṣitā ।
yathā purastānmanunā mānavendreṇa dhīmatā ॥

इक्ष्वाकुकुल के स्वामी राजा दशरथ अयोध्यापुरी की रक्षा उसी प्रकार करते थे, जैसे बुद्धिमान् महाराज मनु ने पूर्वकाल में उसकी रक्षा की थी।

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॥ १ · ६ · २१ ॥
योधानामग्निकल्पानां पेशलानाममर्षिणाम् सम्पूर्णा कृतविद्यानां गुहा केसरिणामिव

yodhānāmagnikalpānāṁ peśalānāmamarṣiṇām ।
sampūrṇā kṛtavidyānāṁ guhā kesariṇāmiva ॥

शौर्य की अधिकता के कारण अग्नि के समान दुर्धर्ष, कुटिलता से रहित, अपमान को सहन करने में असमर्थ तथा अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता योद्धाओं के समुदाय से वह पुरी उसी तरह भरी-पूरी रहती थी, जैसे पर्वतों की गुफा सिंहों के समूह से परिपूर्ण होती है।

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॥ १ · ६ · २२ ॥
काम्बोजविषये जातैर्बाह्लीकैश्च हयोत्तमैः वनायुजैर्नदीजैश्च पूर्णा हरिहयोत्तमैः

kāmbojaviṣaye jātairbāhlīkaiśca hayottamaiḥ ।
vanāyujairnadījaiśca pūrṇā harihayottamaiḥ ॥

काम्बोज और बाह्लीक देशों में उत्पन्न हुए उत्तम घोड़ों से, वनायु देश के अश्वों से तथा सिन्धुनद के निकट पैदा होनेवाले दरियाई घोड़ों से, जो इन्द्र के अश्व उच्चैःश्रवा के समान श्रेष्ठ थे, अयोध्यापुरी भरी रहती थी।

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॥ १ · ६ · २३ ॥
विन्ध्यपर्वतजैर्मत्तैः पूर्णा हैमवतैरपि मदान्वितैरतिबलैर्मातंगैः पर्वतोपमैः

vindhyaparvatajairmattaiḥ pūrṇā haimavatairapi ।
madānvitairatibalairmātaṁgaiḥ parvatopamaiḥ ॥

विन्ध्य और हिमालय पर्वतों में उत्पन्न होनेवाले अत्यन्त बलशाली पर्वताकार मदमत्त गजराजों से भी वह नगरी परिपूर्ण रहती थी।

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॥ १ · ६ · २४ ॥
ऐरावतकुलीनैश्च महापद्मकुलैस्तथा अञ्जनादपि निष्कान्तैर्वामनादपि द्विपैः

airāvatakulīnaiśca mahāpadmakulaistathā ।
añjanādapi niṣkāntairvāmanādapi ca dvipaiḥ ॥

ऐरावतकुल में उत्पन्न, महापद्म के वंश में पैदा हुए तथा अञ्जन और वामन नामक दिग्गजों से भी प्रकट हुए हाथी उस पुरी की पूर्णता में सहायक हो रहे थे।

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॥ १ · ६ · २५ ॥
भद्रैर्मन्द्रैर्मृगैश्चैव भद्रमन्द्रमृगैस्तथा भद्रमन्द्रैर्भद्रमृगैर्मृगमन्द्रैश्च सा पुरी

bhadrairmandrairmṛgaiścaiva bhadramandramṛgaistathā ।
bhadramandrairbhadramṛgairmṛgamandraiśca sā purī ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६ · २६ ॥
नित्यमत्तैः सदा पूर्णा नागैरचलसंनिभैः सा योजने द्वे भूयः सत्यनामा प्रकाशते

nityamattaiḥ sadā pūrṇā nāgairacalasaṁnibhaiḥ ।
sā yojane dve ca bhūyaḥ satyanāmā prakāśate ॥

॥ २५–२६ ॥

हिमालय पर्वत पर उत्पन्न भद्रजाति के, विन्ध्यपर्वत पर उत्पन्न हुए मन्द्रजाति के तथा सह्यपर्वत पर पैदा हुए मृग जाति के हाथी भी वहाँ मौजूद थे। भद्र, मन्द्र और मृग — इन तीनों के मेल से उत्पन्न हुए संकरजाति के, भद्र और मन्द्र — इन दो जातियों के मेल से पैदा हुए संकर जाति के, भद्र और मृग जाति के संयोग से उत्पन्न संकरजाति के तथा मृग और मन्द्र — इन दो जातियों के सम्मिश्रण से पैदा हुए पर्वताकार गजराज भी, जो सदा मदोन्मत्त रहते थे, उस पुरी में भरे हुए थे। (तीन योजन के विस्तारवाली अयोध्या में) दो योजन की भूमि तो ऐसी थी, जहाँ पहुँचकर किसी के लिये भी युद्ध करना असम्भव था, इसलिये वह पुरी 'अयोध्या' इस सत्य एवं सार्थक नाम से प्रकाशित होती थी; जिसमें रहते हुए राजा दशरथ इस जगत् का (अपने राज्य का) पालन करते थे।

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॥ १ · ६ · २७ ॥
तां पुरीं महातेजा राजा दशरथो महान् शशास शमितामित्रो नक्षत्राणीव चन्द्रमाः

tāṁ purīṁ sa mahātejā rājā daśaratho mahān ।
śaśāsa śamitāmitro nakṣatrāṇīva candramāḥ ॥

जैसे चन्द्रमा नक्षत्रलोक का शासन करते हैं, उसी प्रकार महातेजस्वी महाराज दशरथ अयोध्यापुरी का शासन करते थे। उन्होंने अपने समस्त शत्रुओं को नष्ट कर दिया था।

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॥ १ · ६ · २८ ॥
तां सत्यनामां दृढतोरणार्गलां गृहैर्विचित्रैरुपशोभितां शिवाम् पुरीमयोध्यां नृसहस्रसंकुलां शशास वै शक्रसमो महीपतिः

tāṁ satyanāmāṁ dṛḍhatoraṇārgalāṁ gṛhairvicitrairupaśobhitāṁ śivām ।
purīmayodhyāṁ nṛsahasrasaṁkulāṁ śaśāsa vai śakrasamo mahīpatiḥ ॥

जिसका अयोध्या नाम सत्य एवं सार्थक था, जिसके दरवाजे और अर्गला सुदृढ़ थे, जो विचित्र गृहों से सदा सुशोभित होती थी, सहस्रों मनुष्यों से भरी हुई उस कल्याणमयी पुरी का इन्द्रतुल्य तेजस्वी राजा दशरथ न्यायपूर्वक शासन करते थे।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छठा सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ॥