वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ७ · २४ श्लोकाःSarga 7 · 24 ślokas

राजमन्त्रियों के गुण और नीति का वर्णन

The virtues and statecraft of the king’s ministers

मन्त्रि-परिषद्

“मन्त्रि-परिषद्”
॥ १ · ७ · ३–२० ॥

स्वर्णस्तम्भमण्डपे सिंहासनस्थो वृद्धो राजा दशरथः; पुरतः प्राज्ञा मन्त्रिणः पुरोहिताश्च मन्त्रयन्ते — श्वेतश्मश्रुर्धीरो वसिष्ठः, विश्वासपात्रं सूतमन्त्री सुमन्त्रश्च गम्भीरगिरा विचारयन्तः; सुशासनस्य प्रशान्ता गरिमा सर्वत्र।

स्वर्णस्तम्भोंवाले मण्डप में सिंहासन पर विराजमान वृद्ध राजा दशरथ; सामने उनके विद्वान् मन्त्री और पुरोहित मन्त्रणा कर रहे हैं — श्वेत-श्मश्रुधारी धीर वसिष्ठ और विश्वासपात्र सूत-मन्त्री सुमन्त्र गम्भीर वाणी में विचार करते हुए; सुशासन की प्रशान्त गरिमा चारों ओर है।

In a pillared hall of gold the aged King Dasharatha sits enthroned, dignified and noble; before him his learned counsellors and family priests confer — the serene white-bearded sage Vasishtha and the trusted charioteer-minister Sumantra among them — gesturing in grave, wise discussion, amid scrolls and a lamp and the calm gravity of good governance.

॥ १ · ७ · १ ॥
तस्यामात्या गुणैरासन्निक्ष्वाकोः सुमहात्मनः मन्त्रज्ञाश्चेङ्गितज्ञाश्च नित्यं प्रियहिते रताः

tasyāmātyā guṇairāsannikṣvākoḥ sumahātmanaḥ ।
mantrajñāśceṅgitajñāśca nityaṁ priyahite ratāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७ · २ ॥
अष्टौ बभूवुर्वीरस्य तस्यामात्या यशस्विनः शुचयश्चानुरक्ताश्च राजकृत्येषु नित्यशः

aṣṭau babhūvurvīrasya tasyāmātyā yaśasvinaḥ ।
śucayaścānuraktāśca rājakṛtyeṣu nityaśaḥ ॥

॥ १–२ ॥

इक्ष्वाकुवंशी वीर महामना महाराज दशरथ के मन्त्रिजनोचित गुणों से सम्पन्न आठ मन्त्री थे, जो मन्त्र के तत्त्व को जाननेवाले और बाहरी चेष्टा देखकर ही मन के भाव को समझ लेनेवाले थे। वे सदा ही राजा के प्रिय एवं हित में लगे रहते थे। इसीलिये उनका यश बहुत फैला हुआ था। वे सभी शुद्ध आचार-विचार से युक्त थे और राजकीय कार्यों में निरन्तर संलग्न रहते थे।

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॥ १ · ७ · ३ ॥
धृष्टिर्जयन्तो विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्धनः अकोपो धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चाष्टमोऽर्थवित्

dhṛṣṭirjayanto vijayaḥ surāṣṭro rāṣṭravardhanaḥ ।
akopo dharmapālaśca sumantraścāṣṭamo'rthavit ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं — धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और आठवें सुमन्त्र, जो अर्थशास्त्र के ज्ञाता थे।

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॥ १ · ७ · ४ ॥
ऋत्विजौ द्वावभिमतौ तस्यास्तामृषिसत्तमौ वसिष्ठो वामदेवश्च मन्त्रिणश्च तथापरे

ṛtvijau dvāvabhimatau tasyāstāmṛṣisattamau ।
vasiṣṭho vāmadevaśca mantriṇaśca tathāpare ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७ · ५ ॥
सुयज्ञोऽप्यथ जाबालिः काश्यपोऽप्यथ गौतमः मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुस्तथा कात्यायनो द्विजः

suyajño'pyatha jābāliḥ kāśyapo'pyatha gautamaḥ ।
mārkaṇḍeyastu dīrghāyustathā kātyāyano dvijaḥ ॥

॥ ४–५ ॥

ऋषियों में श्रेष्ठतम वसिष्ठ और वामदेव — ये दो महर्षि राजा के माननीय ऋत्विज् (पुरोहित) थे। इनके सिवा सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, दीर्घायु मार्कण्डेय और विप्रवर कात्यायन भी महाराज के मन्त्री थे।

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॥ १ · ७ · ६ ॥
एतैर्ब्रह्मर्षिभिर्नित्यमृत्विजस्तस्य पौर्वकाः विद्याविनीता ह्रीमन्तः कुशला नियतेन्द्रियाः

etairbrahmarṣibhirnityamṛtvijastasya paurvakāḥ ।
vidyāvinītā hrīmantaḥ kuśalā niyatendriyāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७ · ७ ॥
श्रीमन्तश्च महात्मानः शस्त्रज्ञा दृढविक्रमाः कीर्तिमन्तः प्रणिहिता यथावचनकारिणः

śrīmantaśca mahātmānaḥ śastrajñā dṛḍhavikramāḥ ।
kīrtimantaḥ praṇihitā yathāvacanakāriṇaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७ · ८ ॥
तेजःक्षमायशःप्राप्ताः स्मितपूर्वाभिभाषिणः क्रोधात् कामार्थहेतोर्वा ब्रूयुरनृतं वचः

tejaḥkṣamāyaśaḥprāptāḥ smitapūrvābhibhāṣiṇaḥ ।
krodhāt kāmārthahetorvā na brūyuranṛtaṁ vacaḥ ॥

॥ ६–८ ॥

इन ब्रह्मर्षियों के साथ राजा के पूर्वपरम्परागत ऋत्विज् भी सदा मन्त्री का कार्य करते थे। वे सब-के-सब विद्वान् होने के कारण विनयशील, सलज्ज, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय, श्रीसम्पन्न, महात्मा, शास्त्र के ज्ञाता, सुदृढ़ पराक्रमी, यशस्वी, समस्त राजकार्यों में सावधान, राजा की आज्ञा के अनुसार कार्य करनेवाले, तेजस्वी, क्षमाशील, कीर्तिमान् तथा मुसकराकर बात करनेवाले थे। वे कभी काम, क्रोध या स्वार्थ के वशीभूत होकर झूठ नहीं बोलते थे।

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॥ १ · ७ · ९ ॥
तेषामविदितं किंचित् स्वेषु नास्ति परेषु वा क्रियमाणं कृतं वापि चारेणापि चिकीर्षितम्

teṣāmaviditaṁ kiṁcit sveṣu nāsti pareṣu vā ।
kriyamāṇaṁ kṛtaṁ vāpi cāreṇāpi cikīrṣitam ॥

अपने या शत्रुपक्ष के राजाओं की कोई भी बात उनसे छिपी नहीं रहती थी। दूसरे राजा क्या करते हैं, क्या कर चुके हैं और क्या करना चाहते हैं — ये सभी बातें गुप्तचरों द्वारा उन्हें मालूम रहती थीं।

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॥ १ · ७ · १० ॥
कुशला व्यवहारेषु सौहृदेषु परीक्षिताः प्राप्तकालं यथा दण्डं धारयेयुः सुतेष्वपि

kuśalā vyavahāreṣu sauhṛdeṣu parīkṣitāḥ ।
prāptakālaṁ yathā daṇḍaṁ dhārayeyuḥ suteṣvapi ॥

वे सभी व्यवहारकुशल थे। उनके सौहार्द की अनेक अवसरों पर परीक्षा ली जा चुकी थी। वे मौका पड़ने पर अपने पुत्र को भी उचित दण्ड देने में भी नहीं हिचकते थे।

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॥ १ · ७ · ११ ॥
कोशसंग्रहणे युक्ता बलस्य परिग्रहे अहितं चापि पुरुषं हिंस्युरविदूषकम्

kośasaṁgrahaṇe yuktā balasya ca parigrahe ।
ahitaṁ cāpi puruṣaṁ na hiṁsyuravidūṣakam ॥

कोष के संचय तथा चतुरंगिणी सेना के संग्रह में सदा लगे रहते थे। शत्रु ने भी यदि अपराध न किया हो तो वे उसकी हिंसा नहीं करते थे।

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॥ १ · ७ · १२ ॥
वीराश्च नियतोत्साहा राजशास्त्रमनुष्ठिताः शुचीनां रक्षितारश्च नित्यं विषयवासिनाम्

vīrāśca niyatotsāhā rājaśāstramanuṣṭhitāḥ ।
śucīnāṁ rakṣitāraśca nityaṁ viṣayavāsinām ॥

उन सब में सदा शौर्य एवं उत्साह भरा रहता था। वे राजनीति के अनुसार कार्य करते तथा अपने राज्य के भीतर रहनेवाले सत्पुरुषों की सदा रक्षा करते थे।

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॥ १ · ७ · १३ ॥
ब्रह्मक्षत्रमहिंसन्तस्ते कोशं समपूरयन् सुतीक्ष्णदण्डाः सम्प्रेक्ष्य पुरुषस्य बलाबलम्

brahmakṣatramahiṁsantaste kośaṁ samapūrayan ।
sutīkṣṇadaṇḍāḥ samprekṣya puruṣasya balābalam ॥

ब्राह्मणों और क्षत्रियों को कष्ट न पहुँचाकर न्यायोचित धन से राजा का खजाना भरते थे। वे अपराधी पुरुष के बलाबल को देखकर उसके प्रति तीक्ष्ण अथवा मृदु दण्ड का प्रयोग करते थे।

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॥ १ · ७ · १४ ॥
शुचीनामेकबुद्धीनां सर्वेषां सम्प्रजानताम् नासीत्पुरे वा राष्ट्रे वा मृषावादी नरः क्वचित्

śucīnāmekabuddhīnāṁ sarveṣāṁ samprajānatām ।
nāsītpure vā rāṣṭre vā mṛṣāvādī naraḥ kvacit ॥

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॥ १ · ७ · १५ ॥
क्वचिन्न दुष्टस्त्रासीत् परदाररतिर्नरः प्रशान्तं सर्वमेवासीद् राष्ट्रं पुरवरं तत्

kvacinna duṣṭastrāsīt paradāraratirnaraḥ ।
praśāntaṁ sarvamevāsīd rāṣṭraṁ puravaraṁ ca tat ॥

॥ १४–१५ ॥

उन सबके भाव शुद्ध और विचार एक थे। उनकी जानकारी में अयोध्यापुरी अथवा कोसलराज्य के भीतर कहीं एक भी मनुष्य ऐसा नहीं था, जो मिथ्यावादी, दुष्ट और परस्त्रीलम्पट हो। सम्पूर्ण राष्ट्र और नगर में पूर्ण शान्ति छायी रहती थी।

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॥ १ · ७ · १६ ॥
सुवाससः सुवेषाश्च ते सर्वे शुचिव्रताः हितार्थाश्च नरेन्द्रस्य जाग्रतो नयचक्षुषा

suvāsasaḥ suveṣāśca te ca sarve śucivratāḥ ।
hitārthāśca narendrasya jāgrato nayacakṣuṣā ॥

उन मन्त्रियों के वस्त्र और वेष स्वच्छ एवं सुन्दर होते थे। वे उत्तम व्रत का पालन करनेवाले तथा राजा के हितैषी थे। नीतिरूपी नेत्रों से देखते हुए सदा जागते रहते थे।

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॥ १ · ७ · १७ ॥
गुरोर्गुणगृहीताश्च प्रख्याताश्च पराक्रमैः विदेशेष्वपि विज्ञाताः सर्वतो बुद्धिनिश्चयाः

gurorguṇagṛhītāśca prakhyātāśca parākramaiḥ ।
videśeṣvapi vijñātāḥ sarvato buddhiniścayāḥ ॥

अपने गुणों के कारण वे सभी मन्त्री गुरुतुल्य समादरणीय राजा के अनुग्रहपात्र थे। अपने पराक्रमों के कारण उनकी सर्वत्र ख्याति थी। विदेशों में भी सब लोग उन्हें जानते थे। वे सभी बातों में बुद्धि द्वारा भलीभाँति विचार करके किसी निश्चय पर पहुँचते थे।

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॥ १ · ७ · १८ ॥
अभितो गुणवन्तश्च चासन् गुणवर्जिताः संधिविग्रहतत्त्वज्ञाः प्रकृत्या सम्पदान्विताः

abhito guṇavantaśca na cāsan guṇavarjitāḥ ।
saṁdhivigrahatattvajñāḥ prakṛtyā sampadānvitāḥ ॥

समस्त देशों और कालों में वे गुणवान् ही सिद्ध होते थे, गुणहीन नहीं। संधि और विग्रह के उपयोग और अवसर का उन्हें अच्छी तरह ज्ञान था। वे स्वभाव से ही सम्पत्तिशाली (दैवी सम्पत्ति से युक्त) थे।

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॥ १ · ७ · १९ ॥
मन्त्रसंवरणे शक्ताः शक्ताः सूक्ष्मासु बुद्धिषु नीतिशास्त्रविशेषज्ञाः सततं प्रियवादिनः

mantrasaṁvaraṇe śaktāḥ śaktāḥ sūkṣmāsu buddhiṣu ।
nītiśāstraviśeṣajñāḥ satataṁ priyavādinaḥ ॥

उनमें राजकीय मन्त्रणा को गुप्त रखने की पूर्ण शक्ति थी। वे सूक्ष्मविषय का विचार करने में कुशल थे। नीतिशास्त्र में उनकी विशेष जानकारी थी तथा वे सदा ही प्रिय लगनेवाली बात बोलते थे।

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॥ १ · ७ · २० ॥
ईदृशैस्तैरमात्यैश्च राजा दशरथोऽनघः उपपन्नो गुणोपेतैरन्वशासद् वसुन्धराम्

īdṛśaistairamātyaiśca rājā daśaratho'naghaḥ ।
upapanno guṇopetairanvaśāsad vasundharām ॥

ऐसे गुणवान् मन्त्रियों के साथ रहकर निष्पाप राजा दशरथ उस भूमण्डल का शासन करते थे।

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॥ १ · ७ · २१ ॥
अवेक्ष्यमाणश्चारेण प्रजा धर्मेण रक्षयन् प्रजानां पालनं कुर्वन्नधर्मं परिवर्जयन्

avekṣyamāṇaścāreṇa prajā dharmeṇa rakṣayan ।
prajānāṁ pālanaṁ kurvannadharmaṁ parivarjayan ॥

वे गुप्तचरों के द्वारा अपने और शत्रु-राज्य के वृत्तान्तों पर दृष्टि रखते थे, प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करते थे तथा प्रजापालन करते हुए अधर्म से दूर ही रहते थे।

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॥ १ · ७ · २२ ॥
विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु वदान्यः सत्यसंगरः तत्र पुरुषव्याघ्रः शशास पृथिवीमिमाम्

viśrutastriṣu lokeṣu vadānyaḥ satyasaṁgaraḥ ।
sa tatra puruṣavyāghraḥ śaśāsa pṛthivīmimām ॥

उनकी तीनों लोकों में प्रसिद्धि थी। वे उदार और सत्यप्रतिज्ञ थे। पुरुषसिंह राजा दशरथ अयोध्या में ही रहकर इस पृथ्वी का शासन करते थे।

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॥ १ · ७ · २३ ॥
नाध्यगच्छद्विशिष्टं वा तुल्यं वा शत्रुमात्मनः मित्रवानतसामन्तः प्रतापहतकण्टकः शशास जगद् राजा दिवि देवपतिर्यथा

nādhyagacchadviśiṣṭaṁ vā tulyaṁ vā śatrumātmanaḥ ।
mitravānatasāmantaḥ pratāpahatakaṇṭakaḥ ।
sa śaśāsa jagad rājā divi devapatiryathā ॥

उन्हें कभी अपने से बड़ा अथवा अपने समान भी कोई शत्रु नहीं मिला। उनके मित्रों की संख्या बहुत थी। सभी सामन्त उनके चरणों में मस्तक झुकाते थे। उनके प्रताप से राज्य के सारे कण्टक (शत्रु एवं चोर आदि) नष्ट हो गये थे। जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में रहकर तीनों लोकों का पालन करते हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ अयोध्या में रहकर सम्पूर्ण जगत् का शासन करते थे।

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॥ १ · ७ · २४ ॥
तैर्मन्त्रिभिर्मन्त्रहिते निविष्टैर्वृतोऽनुरक्तैः कुशलैः समर्थैः पार्थिवो दीप्तिमवाप युक्तस्तेजोमयैर्गोभिरिवोदितोऽर्कः

tairmantribhirmantrahite niviṣṭairvṛto'nuraktaiḥ kuśalaiḥ samarthaiḥ ।
sa pārthivo dīptimavāpa yuktastejomayairgobhirivodito'rkaḥ ॥

उनके मन्त्री मन्त्रणा को गुप्त रखने तथा राज्य के हित-साधन में संलग्न रहते थे। वे राजा के प्रति अनुरक्त, कार्यकुशल और शक्तिशाली थे। जैसे सूर्य अपनी तेजोमयी किरणों के साथ उदित होकर प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ उन तेजस्वी मन्त्रियों से घिरे रहकर बड़ी शोभा पाते थे।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ॥