वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ६९ · १९ श्लोकाःSarga 69 · 19 ślokas

दल-बलसहित राजा दशरथको मिथिला-यात्रा और वहाँ राजा जनकके द्वारा उनका स्वागत-सत्कार

दशरथ का स्वागत

“दशरथ का स्वागत”
॥ १ · ६९ · १०–१४ ॥

गजसेनासहितमयोध्याधिपं दशरथं मिथिलाधिपो जनकः प्राञ्जलिः सादरं प्रत्युद्गच्छति।

हाथी और सैन्य-समूह के साथ मिथिला पहुँचे स्वर्णाभूषित महाराज दशरथ का राजा जनक हाथ जोड़कर सादर स्वागत कर रहे हैं; पीछे ध्वजाओं से सजी बारात और नगर के तोरण उत्सव की शोभा बढ़ा रहे हैं।

Having arrived at Mithila with elephants and his host, the gold-adorned King Dasharatha is welcomed with folded palms by King Janaka; behind them the banner-decked wedding procession and the city's festal gateways swell the splendour of the occasion.

॥ १ · ६९ · १ ॥
ततो रात्र्यां व्यतीतायां सोपाध्यायः सबान्धवः। राजा दशरथो हृष्टः सुमन्त्रमिदमब्रवीत्‌॥

tato rātryāṁ vyatītāyāṁ sopādhyāyaḥ sabāndhavaḥ।
rājā daśaratho hṛṣṭaḥ sumantramidamabravīt‌॥

तदनन्तर रात्रि व्यतीत होनेपर उपाध्याय और बन्धु-बान्धवोंसहित राजा दशरथ हर्षमें भरकर सुमन्त्र से इस प्रकार बोले-॥ १॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · २ ॥
अद्य सर्वे धनाध्यक्षा धनमादाय पुष्कलम्‌। व्रजन्त्वग्रे सुविहिता नानारत्नसमन्विताः॥

adya sarve dhanādhyakṣā dhanamādāya puṣkalam‌।
vrajantvagre suvihitā nānāratnasamanvitāḥ॥

आज हमारे सभी धनाध्यक्ष (खजांची) बहुत-सा धन लेकर नाना प्रकार के रत्नों से सम्पन्न हो सबसे आगे चलें। उनकी रक्षा के लिये हर तरह की सुव्यवस्था होनी चाहिये॥ २॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · ३ ॥
चतुरंगबलं चापि शीघ्रं निर्यातु सर्वशः। ममाज्ञासमकालं यानं युग्यमनुत्तमम्‌॥

caturaṁgabalaṁ cāpi śīghraṁ niryātu sarvaśaḥ।
mamājñāsamakālaṁ ca yānaṁ yugyamanuttamam‌॥

सारी चतुरंगिणी सेना भी यहाँ से शीघ्र ही कूच कर दे। अभी मेरी आज्ञा सुनते ही सुन्दर-सुन्दर पालकियाँ और अच्छे-अच्छे घोड़े आदि वाहन तैयार होकर चल दें॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · ४ ॥
वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ कश्यपः। मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुऋषिः कात्यायनस्तथा॥

vasiṣṭho vāmadevaśca jābāliratha kaśyapaḥ।
mārkaṇḍeyastu dīrghāyuṛṣiḥ kātyāyanastathā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६९ · ५ ॥
एते द्विजाः प्रयान्त्वग्रे स्यन्दनं योजयस्व मे। यथा कालात्ययो स्याद्‌ दूता हि त्वरयन्ति माम्‌॥

ete dvijāḥ prayāntvagre syandanaṁ yojayasva me।
yathā kālātyayo na syād‌ dūtā hi tvarayanti mām‌॥

॥ ४–५ ॥

वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, दीर्घजीवी मार्कण्डेय मुनि तथा कात्यायन--ये सभी ब्रह्मर्षि आगे-आगे चलें। मेरा रथ भी तैयार करो। देर नहीं होनी चाहिये। राजा जनक के दूत मुझे जल्दी करने के लिये प्रेरित कर रहे हैं'॥ ४-५॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · ६ ॥
वचनाच्च नरेन्द्रस्य सेना चतुरंगिणी। राजानमृषिभिः सार्धं व्रजन्तं पृष्ठतोऽन्वयात्‌॥

vacanācca narendrasya senā ca caturaṁgiṇī।
rājānamṛṣibhiḥ sārdhaṁ vrajantaṁ pṛṣṭhato'nvayāt‌॥

राजा की इस आज्ञा के अनुसार चतुरंगिणी सेना तैयार हो गयी और ऋषियों के साथ यात्रा करते हुए महाराज दशरथ के पीछे-पीछे चली॥ ६॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · ७ ॥
गत्वा चतुरहं मार्गं विदेहानभ्युपेयिवान्‌। राजा जनकः श्रीमान्‌ श्रुत्वा पूजामकल्पयत्‌॥

gatvā caturahaṁ mārgaṁ videhānabhyupeyivān‌।
rājā ca janakaḥ śrīmān‌ śrutvā pūjāmakalpayat‌॥

चार दिन का मार्ग तय करके वे सब लोग विदेह-देश में जा पहुँचे। उनके आगमन का समाचार सुनकर श्रीमान्‌ राजा जनक ने स्वागत-सत्कार की तैयारी की॥ ७॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · ८ ॥
ततो राजानमासाद्य वृद्धं दशरथं नृपम्‌। मुदितो जनको राजा प्रहर्षं परमं ययौ॥

tato rājānamāsādya vṛddhaṁ daśarathaṁ nṛpam‌।
mudito janako rājā praharṣaṁ paramaṁ yayau॥

तत्पश्चात्‌ आनन्दमग्न हुए राजा जनक बूढ़े महाराज दशरथ के पास पहुँचे। उनसे मिलकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ॥ ८॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · ९ ॥
उवाच वचनं श्रेष्ठो नरश्रेष्ठं मुदान्वितम्‌। स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव॥

uvāca vacanaṁ śreṣṭho naraśreṣṭhaṁ mudānvitam‌।
svāgataṁ te naraśreṣṭha diṣṭyā prāpto'si rāghava॥

राजाओं में श्रेष्ठ मिथिलानरेश ने आनन्दमग्न हुए पुरुषप्रवर राजा दशरथ से कहा-- नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आपका स्वागत है। मेरे बड़े भाग्य, जो आप यहाँ पधारे॥९॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · १० ॥
पुत्रयोरुभयोः प्रीतिं लप्स्यसे वीर्यनिर्जिताम्‌। दिष्ट्या प्राप्तो महातेजा वसिष्ठो भगवानृषिः

putrayorubhayoḥ prītiṁ lapsyase vīryanirjitām‌।
diṣṭyā prāpto mahātejā vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ ॥

आप यहाँ अपने दोनों पुत्रों की प्रीति प्राप्त करेंगे, जो उन्होंने अपने पराक्रम से जीतकर पायी है। महातेजस्वी भगवान्‌ वसिष्ठ मुनि ने भी हमारे सौभाग्य से ही यहाँ पदार्पण किया है। ये इन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ वैसी ही शोभा पा रहे हैं, जैसे देवताओं के साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं॥ १०॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · ११ ॥
सह सर्वैर्द्विजश्रेष्ठैर्देवैरिव शतक्रतुः। दिष्ट्या मे निर्जिता विघ्ना दिष्ट्या मे पूजितं कुलम्‌॥

saha sarvairdvijaśreṣṭhairdevairiva śatakratuḥ।
diṣṭyā me nirjitā vighnā diṣṭyā me pūjitaṁ kulam‌॥

सौभाग्य से मेरी सारी विघ्न-बाधाएँ पराजित हो गयीं। रघुकुल के महापुरुष महान्‌ बल से सम्पन्न और पराक्रम में सबसे श्रेष्ठ होते हैं। इस कुल के साथ सम्बन्ध होने के कारण आज मेरे कुल का सम्मान बढ़ गया॥ ११॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · १२ ॥
राघवैः सह सम्बन्धाद्‌ वीर्यश्रेष्ठैर्महाबलैः। श्वः प्रभाते नरेन्द्र त्वं संवर्तयितुमर्हसि॥

rāghavaiḥ saha sambandhād‌ vīryaśreṣṭhairmahābalaiḥ।
śvaḥ prabhāte narendra tvaṁ saṁvartayitumarhasi॥

नरश्रेष्ठ नरेन्द्र! कल सबेरे इन सभी महर्षियों के साथ उपस्थित हो मेरे यज्ञ की समाप्ति के बाद आप श्रीराम के विवाह का शुभकार्य सम्पन्न करें'॥ १२॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · १३ ॥
यज्ञस्यान्ते नरश्रेष्ठ विवाहमृषिसत्तमैः। तस्य तद्‌ वचनं श्रुत्वा ऋषिमध्ये नराधिपः॥

yajñasyānte naraśreṣṭha vivāhamṛṣisattamaiḥ।
tasya tad‌ vacanaṁ śrutvā ṛṣimadhye narādhipaḥ॥

ऋषियों की मण्डली में राजा जनक की यह बात सुनकर बोलने की कला जाननेवाले विद्वानों में श्रेष्ठ एवं वाक्यमर्मज्ञ महाराज दशरथ ने मिथिलानरेश को इस प्रकार उत्तर दिया-॥ १३॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · १४ ॥
वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठः प्रत्युवाच महीपतिम्‌। प्रतिग्रहो दातृवशः श्रुतमेतन्मया पुरा॥

vākyaṁ vākyavidāṁ śreṣṭhaḥ pratyuvāca mahīpatim‌।
pratigraho dātṛvaśaḥ śrutametanmayā purā॥

धर्मज्ञ! मैंने पहले से यह सुन रखा है कि प्रतिग्रह दाता के अधीन होता है। अतः आप जैसा कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे'॥ १४॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · १५ ॥
यथा वक्ष्यसि धर्मज्ञ तत्‌ करिष्यामहे वयम्‌। तद्‌ धर्मिष्ठं यशस्यं वचनं सत्यवादिनः॥

yathā vakṣyasi dharmajña tat‌ kariṣyāmahe vayam‌।
tad‌ dharmiṣṭhaṁ yaśasyaṁ ca vacanaṁ satyavādinaḥ॥

सत्यवादी राजा दशरथ का वह धर्मानुकूल तथा यशोवर्धक वचन सुनकर विदेहराज जनक को बड़ा विस्मय हुआ॥ १५॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · १६ ॥
श्रुत्वा विदेहाधिपतिः परं विस्मयमागतः ततः सर्वे मुनिगणाः परस्परसमागमे॥

śrutvā videhādhipatiḥ paraṁ vismayamāgataḥ ।
tataḥ sarve munigaṇāḥ parasparasamāgame॥

तदनन्तर सभी महर्षि एक-दूसरे से मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और सबने बड़े सुख से वह रात बितायी॥ १६॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · १७ ॥
हर्षेण महता युक्तास्तां रात्रिमवसन्‌ सुखम्‌। अथ रामो महातेजा लक्ष्मणेन समं ययौ॥

harṣeṇa mahatā yuktāstāṁ rātrimavasan‌ sukham‌।
atha rāmo mahātejā lakṣmaṇena samaṁ yayau॥

इधर महातेजस्वी श्रीराम विश्वामित्रजी को आगे करके लक्ष्मण के साथ पिताजी के पास गये और उनके चरणों का स्पर्श किया॥ १७॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · १८ ॥
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य पितुः पादावुपस्पृशन्‌। राजा राघवौ पुत्रौ निशाम्य परिहर्षितः॥

viśvāmitraṁ puraskṛtya pituḥ pādāvupaspṛśan‌।
rājā ca rāghavau putrau niśāmya pariharṣitaḥ॥

राजा दशरथ ने भी जनक के द्वारा आदर-सत्कार पाकर बड़ी प्रसन्नता का अनुभव किया तथा अपने दोनों रघुकुल-रत्न पुत्रों को सकुशल देखकर उन्हें अपार हर्ष हुआ। वे रात में बड़े सुख से वहाँ रहे॥ १८॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६९ · १९ ॥
उवास परमप्रीतो जनकेनाभिपूजितः। जनकोऽपि महातेजाः क्रिया धर्मेण तत्त्ववित्‌। यज्ञस्य सुताभ्यां कृत्वा रात्रिमुवास ह॥

uvāsa paramaprīto janakenābhipūjitaḥ।
janako'pi mahātejāḥ kriyā dharmeṇa tattvavit‌।
yajñasya ca sutābhyāṁ ca kṛtvā rātrimuvāsa ha॥

महातेजस्वी तत्त्वज्ञ राजा जनक ने भी धर्म के अनुसार यज्ञकार्य सम्पन्न किया तथा अपनी दोनों कन्याओं के लिये मंगलाचार का सम्पादन करके सुख से वह रात्रि व्यतीत की॥ १९॥

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ॥ ६९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६९ ॥