वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ७० · ४५ श्लोकाःSarga 70 · 45 ślokas

राजा जनकका अपने भाई कुशध्वजको सांकाश्या नगरीसे बुलवाना, राजा दशरथके अनुरोधसे वसिष्ठजीका सूर्यवंशका परिचय देते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये सीता तथा ऊर्मिलाको वरण करना

इक्ष्वाकु-वंश परिचय

“इक्ष्वाकु-वंश परिचय”
॥ १ · ७० · १९–४५ ॥

वसिष्ठो मनोरिक्ष्वाकोश्च प्रभृति सूर्यवंशं क्रमेण कीर्तयन् रामलक्ष्मणार्थं सीतोर्मिले वृणोति।

श्वेत वस्त्रधारी महर्षि वसिष्ठ हाथ में पत्र लिये इक्ष्वाकु-वंश की परम्परा का क्रमशः वर्णन कर रहे हैं और ऊपर तेज से दीप्त पूर्वजों की मुखमाला सूर्य तक ऊपर उठती दिखती है; सिंहासन पर बैठे मुकुटधारी जनक और हाथ जोड़े खड़े महाराज दशरथ श्रद्धा से सुन रहे हैं।

Robed in white, the sage Vasishth holds a leaf and recites in order the lineage of the Ikshvaku house, while above him a luminous chain of ancestral faces rises to the sun; enthroned and crowned, Janak and the standing, palm-joined Dasharath listen in reverence.

॥ १ · ७० · १ ॥
ततः प्रभाते जनकः कृतकर्मा महर्षिभिः। उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः शतानन्दं पुरोहितम्‌॥

tataḥ prabhāte janakaḥ kṛtakarmā maharṣibhiḥ।
uvāca vākyaṁ vākyajñaḥ śatānandaṁ purohitam‌॥

तदनन्तर जब सबेरा हुआ और राजा जनक महर्षियों के सहयोग से अपना यज्ञ-कार्य सम्पन्न कर चुके, तब वे वाक्यमर्मज्ञ नरेश अपने पुरोहित शतानन्दजी से इस प्रकार बोले--

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॥ १ · ७० · २ ॥
भ्राता मम महातेजा वीर्यवानतिधार्मिकः। कुशध्वज इति ख्यातः पुरीमध्यवसच्छुभाम्‌॥

bhrātā mama mahātejā vīryavānatidhārmikaḥ।
kuśadhvaja iti khyātaḥ purīmadhyavasacchubhām‌॥

ब्रह्मन्‌! मेरे महातेजस्वी और पराक्रमी भाई कुशध्वज जो अत्यन्त धर्मात्मा हैं, इस समय इक्षुमती नदी का जल पीते हुए उसके किनारे बसी हुई कल्याणमयी सांकाश्या नगरी में निवास करते हैं।

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॥ १ · ७० · ३ ॥
वार्याफलकपर्यन्तां पिबन्निक्षुमतीं नदीम्‌। सांकाश्यां पुण्यसंकाशां विमानमिव पुष्पकम्‌॥

vāryāphalakaparyantāṁ pibannikṣumatīṁ nadīm‌।
sāṁkāśyāṁ puṇyasaṁkāśāṁ vimānamiva puṣpakam‌॥

उसके चारों ओर के परकोटों की रक्षा के लिये शत्रुओं के निवारण में समर्थ बड़े-बड़े यन्त्र लगाये गये हैं। वह पुरी पुष्पकविमान के समान विस्तृत तथा पुण्य से उपलब्ध होनेवाले स्वर्गलोक के सदृश सुन्दर है

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॥ १ · ७० · ४ ॥
तमहं द्रष्टुमिच्छामि यज्ञगोप्ता मे मतः। प्रीतिं सोऽपि महातेजा इमां भोक्ता मया सह॥

tamahaṁ draṣṭumicchāmi yajñagoptā sa me mataḥ।
prītiṁ so'pi mahātejā imāṁ bhoktā mayā saha॥

वहाँ रहनेवाले अपने भाई को इस शुभ अवसर पर मैं यहाँ उपस्थित देखना चाहता हूँ; क्योंकि मेरी दृष्टि में वे मेरे इस यज्ञ के संरक्षक हैं। महातेजस्वी कुशध्वज भी मेरे साथ श्रीसीता-राम के विवाहसम्बन्धी इस मंगल समारोह का सुख उठावेंगे’

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॥ १ · ७० · ५ ॥
एवमुक्ते तु वचने शतानन्दस्य संनिधौ। आगताः केचिदव्यग्रा जनकस्तान्‌ समादिशत्‌॥

evamukte tu vacane śatānandasya saṁnidhau।
āgatāḥ kecidavyagrā janakastān‌ samādiśat‌॥

राजा के इस प्रकार कहने पर शतानन्दजी के समीप कुछ धीर स्वभाव के पुरुष आये और राजा जनक ने उन्हें पूर्वोक्त आदेश सुनाया

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॥ १ · ७० · ६ ॥
शासनात्‌ तु नरेन्द्रस्य प्रययुः शीघ्रवाजिभिः। समानेतुं नरव्याघ्रं विष्णुमिन्द्राज्ञया यथा॥

śāsanāt‌ tu narendrasya prayayuḥ śīghravājibhiḥ।
samānetuṁ naravyāghraṁ viṣṇumindrājñayā yathā॥

राजा की आज्ञा से वे श्रेष्ठ दूत तेज चलनेवाले घोड़ों पर सवार हो पुरुषसिंह कुशध्वज को बुला लाने के लिये चल दिये। मानो इन्द्र की आज्ञा से उनके दूत भगवान्‌ विष्णु को बुलाने जा रहे हों

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॥ १ · ७० · ७ ॥
सांकाश्यां ते समागम्य ददृशुश्च कुशध्वजम्‌। न्यवेदयन्‌ यथावृत्तं जनकस्य चिन्तितम्‌॥

sāṁkāśyāṁ te samāgamya dadṛśuśca kuśadhvajam‌।
nyavedayan‌ yathāvṛttaṁ janakasya ca cintitam‌॥

सांकाश्या में पहुँचकर उन्होंने कुशध्वज से भेंट की और मिथिला का यथार्थ समाचार एवं जनक का अभिप्राय भी निवेदन किया

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॥ १ · ७० · ८ ॥
तद्वृत्तं नृपतिः श्रुत्वा दूतश्रेष्ठैर्महाजवैः। आज्ञया तु नरेन्द्रस्य आजगाम कुशध्वजः॥

tadvṛttaṁ nṛpatiḥ śrutvā dūtaśreṣṭhairmahājavaiḥ।
ājñayā tu narendrasya ājagāma kuśadhvajaḥ॥

उन महावेगशाली श्रेष्ठ दूतों के मुख से मिथिला का सारा वृत्तान्त सुनकर राजा कुशध्वज महाराज जनक की आज्ञा के अनुसार मिथिला में आये

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॥ १ · ७० · ९ ॥
ददर्श महात्मानं जनकं धर्मवत्सलम्‌। सोऽभिवाद्य शतानन्दं जनकं चातिधार्मिकम्‌॥

sa dadarśa mahātmānaṁ janakaṁ dharmavatsalam‌।
so'bhivādya śatānandaṁ janakaṁ cātidhārmikam‌॥

वहाँ उन्होंने धर्मवत्सल महात्मा जनक का दर्शन किया। फिर शतानन्दजी तथा अत्यन्त धार्मिक जनक को प्रणाम करके वे राजा के योग्य परम दिव्य सिंहासन पर विराजमान हुए

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॥ १ · ७० · १० ॥
राजार्हं परमं दिव्यमासनं सोऽध्यरोहत। उपविष्टावुभौ तौ तु भ्रातरावमितद्युती॥

rājārhaṁ paramaṁ divyamāsanaṁ so'dhyarohata।
upaviṣṭāvubhau tau tu bhrātarāvamitadyutī॥

सिंहासन पर बैठे हुए उन दोनों अमिततेजस्वी वीरबन्धुओं ने मन्त्रिप्रवर सुदामन को भेजा और कहा--

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॥ १ · ७० · ११ ॥
प्रेषयामासतुर्वीरौ मन्त्रिश्रेष्ठं सुदामनम्‌। गच्छ मन्त्रिपते शीघ्रमिक्ष्वाकुममितप्रभम्‌॥

preṣayāmāsaturvīrau mantriśreṣṭhaṁ sudāmanam‌।
gaccha mantripate śīghramikṣvākumamitaprabham‌॥

मन्त्रिवर! आप शीघ्र ही अमिततेजस्वी इक्ष्वाकुकुलभूषण महाराज दशरथ के पास जाइये और पुत्रों तथा मन्त्रियोंसहित उन दुर्जय नरेश को यहाँ बुला लाइये’

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॥ १ · ७० · १२ ॥
आत्मजैः सह दुर्धर्षमानयस्व समन्त्रिणम्‌। औपकार्यां गत्वा तु रघूणां कुलवर्धनम्‌॥

ātmajaiḥ saha durdharṣamānayasva samantriṇam‌।
aupakāryāṁ sa gatvā tu raghūṇāṁ kulavardhanam‌॥

आज्ञा पाकर मन्त्री सुदामन महाराज दशरथ के खेमे में जाकर रघुकुल की कीर्ति बढ़ानेवाले उन नरेश से मिले और मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करने के पश्चात्‌ इस प्रकार बोले--

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॥ १ · ७० · १३ ॥
ददर्श शिरसा चैनमभिवाद्येदमब्रवीत्‌। अयोध्याधिपते वीर वैदेहो मिथिलाधिपः॥

dadarśa śirasā cainamabhivādyedamabravīt‌।
ayodhyādhipate vīra vaideho mithilādhipaḥ॥

वीर अयोध्यानरेश! मिथिलापति विदेहराज जनक इस समय उपाध्याय और पुरोहितसहित आपका दर्शन करना चाहते हैं’

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॥ १ · ७० · १४ ॥
त्वां द्रष्टुं व्यवसितः सोपाध्यायपुरोहितम्‌। मन्त्रिश्रेष्ठवचः श्रुत्वा राजा सर्षिगणस्तथा॥

sa tvāṁ draṣṭuṁ vyavasitaḥ sopādhyāyapurohitam‌।
mantriśreṣṭhavacaḥ śrutvā rājā sarṣigaṇastathā॥

मन्त्रिवर सुदामन की बात सुनकर राजा दशरथ ऋषियों और बन्धु-बान्धवों के साथ उस स्थान पर गये जहाँ राजा जनक विद्यमान थे

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॥ १ · ७० · १५ ॥
सबन्धुरगमत्‌ तत्र जनको यत्र वर्तते। राजा मन्त्रिसहितः सोपाध्यायः सबान्धवः॥

sabandhuragamat‌ tatra janako yatra vartate।
rājā ca mantrisahitaḥ sopādhyāyaḥ sabāndhavaḥ॥

मन्त्री, उपाध्याय और भाई-बन्धुओंसहित राजा दशरथ, जो बोलने की कला जाननेवाले विद्वानों में श्रेष्ठ थे, विदेहराज जनक से इस प्रकार बोले--

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॥ १ · ७० · १६ ॥
वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठो वैदेहमिदमब्रवीत्‌। विदितं ते महाराज इक्ष्वाकुकुलदैवतम्‌॥

vākyaṁ vākyavidāṁ śreṣṭho vaidehamidamabravīt‌।
viditaṁ te mahārāja ikṣvākukuladaivatam‌॥

महाराज! आपको तो विदित ही होगा कि इक्ष्वाकुकुल के देवता ये महर्षि वसिष्ठजी हैं। हमारे यहाँ सभी कार्यों में ये भगवान्‌ वसिष्ठ मुनि ही कर्तव्य का उपदेश करते हैं और इन्हींकी आज्ञा का पालन किया जाता है

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॥ १ · ७० · १७ ॥
वक्ता सर्वेषु कृत्येषु वसिष्ठो भगवानृषिः। विश्वामित्राभ्यनुज्ञातः सह सर्वैर्महर्षिभिः॥

vaktā sarveṣu kṛtyeṣu vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ।
viśvāmitrābhyanujñātaḥ saha sarvairmaharṣibhiḥ॥

यदि सम्पूर्ण महर्षियोंसहित विश्वामित्रजी की आज्ञा हो तो ये धर्मात्मा वसिष्ठ ही पहले मेरी कुल-परम्परा का क्रमशः परिचय देंगे’

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॥ १ · ७० · १८ ॥
एष वक्ष्यति धर्मात्मा वसिष्ठो मे यथाक्रमम्‌। तूष्णींभूते दशरथे वसिष्ठो भगवानृषिः॥

eṣa vakṣyati dharmātmā vasiṣṭho me yathākramam‌।
tūṣṇīṁbhūte daśarathe vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ॥

यों कहकर जब राजा दशरथ चुप हो गये, तब वाक्यवेत्ता भगवान्‌ वसिष्ठ मुनि पुरोहितसहित विदेहराज से इस प्रकार बोले--

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॥ १ · ७० · १९ ॥
उवाच वाक्यं वाक्यज्ञो वैदेहं सपुरोधसम्‌। अव्यक्तप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्ययः॥

uvāca vākyaṁ vākyajño vaidehaṁ sapurodhasam‌।
avyaktaprabhavo brahmā śāśvato nitya avyayaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७० · २० ॥
तस्मान्मरीचिः संजज्ञे मरीचेः कश्यपः सुतः। विवस्वान्‌ कश्यपाज्जज्ञे मनुर्वैवस्वतः स्मृतः॥

tasmānmarīciḥ saṁjajñe marīceḥ kaśyapaḥ sutaḥ।
vivasvān‌ kaśyapājjajñe manurvaivasvataḥ smṛtaḥ॥

॥ १९–२० ॥

ब्रह्माजी की उत्पत्ति का कारण अव्यक्त है--ये स्वयम्भू हैं। नित्य, शाश्वत और अविनाशी हैं। उनसे मरीचि की उत्पत्ति हुई। मरीचि के पुत्र कश्यप हैं, कश्यप से विवस्वान्‌ का और विवस्वान्‌ से वैवस्वत मनु का जन्म हुआ

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॥ १ · ७० · २१ ॥
मनुः प्रजापतिः पूर्वमिक्ष्वाकुश्च मनोः सुतः। तमिक्ष्वाकुमयोध्यायां राजानं विद्धि पूर्वकम्‌॥

manuḥ prajāpatiḥ pūrvamikṣvākuśca manoḥ sutaḥ।
tamikṣvākumayodhyāyāṁ rājānaṁ viddhi pūrvakam‌॥

मनु पहले प्रजापति थे, उनसे इक्ष्वाकु नामक पुत्र हुआ। उन इक्ष्वाकु को ही आप अयोध्या के प्रथम राजा समझें

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॥ १ · ७० · २२ ॥
इक्ष्वाकोस्तु सुतः श्रीमान्‌ कुक्षिरित्येव विश्रुतः। कुक्षेरथात्मजः श्रीमान्‌ विकुक्षिरुदपद्यत॥

ikṣvākostu sutaḥ śrīmān‌ kukṣirityeva viśrutaḥ।
kukṣerathātmajaḥ śrīmān‌ vikukṣirudapadyata॥

इक्ष्वाकु के पुत्र का नाम कुक्षि था। वे बड़े तेजस्वी थे। कुक्षि से विकुक्षि नामक कान्तिमान्‌ पुत्र का जन्म हुआ

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॥ १ · ७० · २३ ॥
विकुक्षेस्तु महातेजा बाणः पुत्रः प्रतापवान्‌। बाणस्य तु महातेजा अनरण्यः प्रतापवान्‌॥

vikukṣestu mahātejā bāṇaḥ putraḥ pratāpavān‌।
bāṇasya tu mahātejā anaraṇyaḥ pratāpavān‌॥

विकुक्षि के पुत्र महातेजस्वी और प्रतापी बाण हुए। बाण के पुत्र का नाम अनरण्य था। वे भी बड़े तेजस्वी और प्रतापी थे

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॥ १ · ७० · २४ ॥
अनरण्यात्‌ पृथुर्जज्ञे त्रिशङ्कुस्तु पृथोरपि। त्रिशङ्कोरभवत्‌ पुत्रो धुन्धुमारो महायशाः॥

anaraṇyāt‌ pṛthurjajñe triśaṅkustu pṛthorapi।
triśaṅkorabhavat‌ putro dhundhumāro mahāyaśāḥ॥

अनरण्य से पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ। त्रिशंकु के पुत्र महायशस्वी धुन्धुमार थे

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॥ १ · ७० · २५ ॥
धुन्धुमारान्महातेजा युवनाश्वो महारथः। युवनाश्वसुतश्चासीन्मान्धाता पृथिवीपतिः॥

dhundhumārānmahātejā yuvanāśvo mahārathaḥ।
yuvanāśvasutaścāsīnmāndhātā pṛthivīpatiḥ॥

धुन्धुमार से महातेजस्वी महारथी युवनाश्व का जन्म हुआ। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए, जो समस्त भूमण्डल के स्वामी थे

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॥ १ · ७० · २६ ॥
मान्धातुस्तु सुतः श्रीमान्‌ सुसन्धिरुदपद्यत। सुसन्धेरपि पुत्रौ द्वौ ध्रुवसन्धिः प्रसेनजित्‌॥

māndhātustu sutaḥ śrīmān‌ susandhirudapadyata।
susandherapi putrau dvau dhruvasandhiḥ prasenajit‌॥

मान्धाता से सुसन्धि नामक कान्तिमान्‌ पुत्र का जन्म हुआ। सुसन्धि के भी दो पुत्र हुए--ध्रुवसन्धि और प्रसेनजित्‌

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॥ १ · ७० · २७ ॥
यशस्वी ध्रुवसन्धेस्तु भरतो नाम नामतः। भरतात्‌ तु महातेजा असितो नाम जायत॥

yaśasvī dhruvasandhestu bharato nāma nāmataḥ।
bharatāt‌ tu mahātejā asito nāma jāyata॥

ध्रुवसन्धि से भरत नामक यशस्वी पुत्र का जन्म हुआ। भरत से महातेजस्वी असित की उत्पत्ति हुई

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॥ १ · ७० · २८ ॥
यस्यैते प्रतिराजान उदपद्यन्त शत्रवः। हैहयास्तालजङ्घाश्च शूराश्च शशबिन्दवः॥

yasyaite pratirājāna udapadyanta śatravaḥ।
haihayāstālajaṅghāśca śūrāśca śaśabindavaḥ॥

राजा असित के साथ हैहय, तालजङ्घ और शशबिन्दु--इन तीन राजवंशों के लोग शत्रुता रखने लगे थे

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॥ १ · ७० · २९ ॥
तांश्च प्रतियुध्यन्‌ वै युद्धे राजा प्रवासितः। हिमवन्तमुपागम्य भार्याभ्यां सहितस्तदा॥

tāṁśca sa pratiyudhyan‌ vai yuddhe rājā pravāsitaḥ।
himavantamupāgamya bhāryābhyāṁ sahitastadā॥

युद्ध में इन तीनों शत्रुओं का सामना करते हुए राजा असित प्रवासी हो गये। वे अपनी दो रानियों के साथ हिमालय पर आकर रहने लगे

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॥ १ · ७० · ३० ॥
असितोऽल्पबलो राजा कालधर्ममुपेयिवान्‌। द्वे चास्य भार्ये गर्भिण्यौ बभूवतुरिति श्रुतिः॥

asito'lpabalo rājā kāladharmamupeyivān‌।
dve cāsya bhārye garbhiṇyau babhūvaturiti śrutiḥ॥

राजा असित के पास बहुत थोड़ी सेना शेष रह गयी थी। वे हिमालय पर ही मृत्यु को प्राप्त हो गये। उस समय उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थीं, ऐसा सुना गया है

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॥ १ · ७० · ३१ ॥
एका गर्भविनाशार्थं सपत्यै सगरं ददौ। ततः शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनिः॥

ekā garbhavināśārthaṁ sapatyai sagaraṁ dadau।
tataḥ śailavare ramye babhūvābhirato muniḥ॥

उनमें से एक रानी ने अपनी सौत का गर्भ नष्ट करने के लिये उसे विषयुक्त भोजन दे दिया

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॥ १ · ७० · ३२ ॥
भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवन्तमुपाश्रितः। तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम्‌॥

bhārgavaścyavano nāma himavantamupāśritaḥ।
tatra caikā mahābhāgā bhārgavaṁ devavarcasam‌॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७० · ३३ ॥
ववन्दे पद्मपत्राक्षी कांक्षन्ती सुतमुत्तमम्‌। तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी चाभ्यवादयत्‌॥

vavande padmapatrākṣī kāṁkṣantī sutamuttamam‌।
tamṛṣiṁ sābhyupāgamya kālindī cābhyavādayat‌॥

॥ ३२–३३ ॥

उस समय उस रमणीय एवं श्रेष्ठ पर्वत पर भृगुकुल में उत्पन्न हुए महामुनि च्यवन तपस्या में लगे हुए थे। हिमालय पर ही उनका आश्रम था। उन दोनों रानियों में से एक (जिसे जहर दिया गया था) कालिन्दीनाम से प्रसिद्ध थी। विकसित कमलदल के समान नेत्रोंवाली महाभागा कालिन्दी एक उत्तम पुत्र पाने की इच्छा रखती थी। उसने देवतुल्य तेजस्वी भृगुनन्दन च्यवन के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया

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॥ १ · ७० · ३४ ॥
तामभ्यवदद्‌ विप्रः पुत्रेप्सुं पुत्रजन्मनि। तव कुक्षौ महाभागे सुपुत्रः सुमहाबलः॥

sa tāmabhyavadad‌ vipraḥ putrepsuṁ putrajanmani।
tava kukṣau mahābhāge suputraḥ sumahābalaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७० · ३५ ॥
महावीर्यो महातेजा अचिरात्‌ संजनिष्यति। गरेण सहितः श्रीमान्‌ मा शुचः कमलेक्षणे॥

mahāvīryo mahātejā acirāt‌ saṁjaniṣyati।
gareṇa sahitaḥ śrīmān‌ mā śucaḥ kamalekṣaṇe॥

॥ ३४–३५ ॥

उस समय ब्रह्मर्षि च्यवने पुत्र की अभिलाषा रखनेवाली कालिन्दी से पुत्र-जन्म के विषय में कहा--‘महाभागे! तुम्हारे उदर में एक महान्‌ बलवान्‌, महातेजस्वी और महापराक्रमी उत्तम पुत्र है, वह कान्तिमान्‌ बालक थोड़े ही दिनों में गर (जहर) के साथ उत्पन्न होगा। अतः कमललोचने! तुम पुत्र के लिये चिन्ता न करो’

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॥ १ · ७० · ३६ ॥
च्यवनं नमस्कृत्य राजपुत्री पतिव्रता। पत्या विरहिता तस्मात्‌ पुत्रं देवी व्यजायत॥

cyavanaṁ ca namaskṛtya rājaputrī pativratā।
patyā virahitā tasmāt‌ putraṁ devī vyajāyata॥

वह विधवा राजकुमारी कालिन्दी बड़ी पतिव्रता थी। महर्षि च्यवन को नमस्कार करके वह देवी अपने आश्रम पर लौट आयी। फिर समय आने पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया

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॥ १ · ७० · ३७ ॥
सपत्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिघांसया। सह तेन गरेणैव संजातः सगरोऽभवत्‌॥

sapatyā tu garastasyai datto garbhajighāṁsayā।
saha tena gareṇaiva saṁjātaḥ sagaro'bhavat‌॥

उसकी सौत ने उसके गर्भ को नष्ट कर देने के लिये जो गर (विष) दिया था, उसके साथ ही उत्पन्न होने के कारण वह राजकुमार ‘सगर’ नाम से विख्यात हुआ

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॥ १ · ७० · ३८ ॥
सगरस्यासमञ्जस्तु असमञ्जादथांशुमान्‌। दिलीपोऽंशुमतः पुत्रो दिलीपस्य भगीरथः॥

sagarasyāsamañjastu asamañjādathāṁśumān‌।
dilīpo'ṁśumataḥ putro dilīpasya bhagīrathaḥ॥

सगर के पुत्र असमंज और असमंज के पुत्र अंशुमान्‌ हुए। अंशुमान्‌ के पुत्र दिलीप और दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए

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॥ १ · ७० · ३९ ॥
भगीरथात्‌ ककुत्स्थश्च ककुत्स्थाच्च रघुस्तथा। रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्धः पुरुषादकः॥

bhagīrathāt‌ kakutsthaśca kakutsthācca raghustathā।
raghostu putrastejasvī pravṛddhaḥ puruṣādakaḥ॥

भगीरथ से ककुत्स्थ और ककुत्स्थ से रघु का जन्म हुआ। रघु के तेजस्वी पुत्र प्रवृद्ध हुए, जो शाप से राक्षस हो गये थे

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॥ १ · ७० · ४० ॥
कल्माषपादोऽप्यभवत्‌ तस्माज्जातस्तु शङ्खणः। सुदर्शनः शङ्खणस्य अग्निवर्णः सुदर्शनात्‌॥

kalmāṣapādo'pyabhavat‌ tasmājjātastu śaṅkhaṇaḥ।
sudarśanaḥ śaṅkhaṇasya agnivarṇaḥ sudarśanāt‌॥

वे ही कल्माषपाद नाम से भी प्रसिद्ध हुए थे। उनसे शङ्खण नामक पुत्र का जन्म हुआ था। शङ्खण के पुत्र सुदर्शन और सुदर्शन के अग्निवर्ण हुए

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॥ १ · ७० · ४१ ॥
शीघ्रगस्त्वग्निवर्णस्य शीघ्रगस्य मरुः सुतः। मरोः प्रशुश्रुकस्त्वासीदम्बरीषः प्रशुश्रुकात्‌॥

śīghragastvagnivarṇasya śīghragasya maruḥ sutaḥ।
maroḥ praśuśrukastvāsīdambarīṣaḥ praśuśrukāt‌॥

अग्निवर्ण के शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु थे। मरु से प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक से अम्बरीष की उत्पत्ति हुई

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॥ १ · ७० · ४२ ॥
अम्बरीषस्य पुत्रोऽभून्नहुषश्च महीपतिः। नहुषस्य ययातिस्तु नाभागस्तु ययातिजः॥

ambarīṣasya putro'bhūnnahuṣaśca mahīpatiḥ।
nahuṣasya yayātistu nābhāgastu yayātijaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७० · ४३ ॥
नाभागस्य बभूवाज अजाद्‌ दशरथोऽभवत्‌। अस्माद्‌ दशरथाज्जातौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥

nābhāgasya babhūvāja ajād‌ daśaratho'bhavat‌।
asmād‌ daśarathājjātau bhrātarau rāmalakṣmaṇau॥

॥ ४२–४३ ॥

अम्बरीष के पुत्र राजा नहुष हुए। नहुष के ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग थे। नाभाग के अज हुए। अज से दशरथ का जन्म हुआ। इन्हीं महाराज दशरथ से ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उत्पन्न हुए हैं

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॥ १ · ७० · ४४ ॥
आदिवंशविशुद्धानां राज्ञां परमधर्मिणाम्‌। इक्ष्वाकुकुलजातानां वीराणां सत्यवादिनाम्‌॥

ādivaṁśaviśuddhānāṁ rājñāṁ paramadharmiṇām‌।
ikṣvākukulajātānāṁ vīrāṇāṁ satyavādinām‌॥

इक्ष्वाकुकुल में उत्पन्न हुए राजाओं का वंश आदिकाल से ही शुद्ध रहा है। ये सब-के-सब परम धर्मात्मा, वीर और सत्यवादी होते आये हैं

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॥ १ · ७० · ४५ ॥
रामलक्ष्मणयोरर्थे त्वत्सुते वरये नृप। सदृशाभ्यां नरश्रेष्ठ सदृशे दातुमर्हसि॥

rāmalakṣmaṇayorarthe tvatsute varaye nṛpa।
sadṛśābhyāṁ naraśreṣṭha sadṛśe dātumarhasi॥

नरश्रेष्ठ! नरेश्वर! इसी इक्ष्वाकुकुल में उत्पन्न हुए श्रीराम और लक्ष्मण के लिये मैं आपकी दो कन्याओं का वरण करता हूँ। ये आपकी कन्याओं के योग्य हैं और आपकी कन्याएँ इनके योग्य। अतः आप इन्हें कन्यादान करें’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥ ७० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७० ॥