वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ७१ · २४ श्लोकाःSarga 71 · 24 ślokas

राजा जनकका अपने कुलका परिचय देते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये क्रमशः सीता और ऊर्मिलाको देनेकी प्रतिज्ञा करना

सीता-ऊर्मिला वरदान

“सीता-ऊर्मिला वरदान”
॥ १ · ७१ · २०–२३ ॥

जनको निजवंशं कीर्तयन् पावकसमक्षं रामलक्ष्मणाभ्यां सीतोर्मिले समर्पयितुं प्रतिजानीते।

मुकुटधारी राजा जनक हाथ उठाकर अपने कुल का परिचय देते हुए प्रतिज्ञा कर रहे हैं कि वे सीता को श्रीराम और ऊर्मिला को लक्ष्मण को सौंपेंगे; उनके पास लाल वस्त्रों में सजी दोनों कन्याएँ खड़ी हैं और प्रज्वलित यज्ञाग्नि के सम्मुख महाराज दशरथ हाथ जोड़े बैठे हैं।

Crowned King Janaka, hand raised as he recounts his own lineage, pledges to give Sita to Rama and Urmila to Lakshmana; his two daughters stand beside him in red bridal attire while, before the blazing sacrificial fire, King Dasharatha kneels with folded palms.

॥ १ · ७१ · १ ॥
एवं ब्रुवाणं जनकः प्रत्युवाच कृताञ्जलिः। श्रोतुमर्हसि भद्रं ते कुलं नः परिकीर्तितम्॥

evaṁ bruvāṇaṁ janakaḥ pratyuvāca kṛtāñjaliḥ।
śrotumarhasi bhadraṁ te kulaṁ naḥ parikīrtitam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७१ · २ ॥
प्रदाने हि मुनिश्रेष्ठ कुलं निरवशेषतः। वक्तव्यं कुलजातेन तन्निबोध महामते॥

pradāne hi muniśreṣṭha kulaṁ niravaśeṣataḥ।
vaktavyaṁ kulajātena tannibodha mahāmate॥

॥ १–२ ॥

महर्षि वसिष्ठ जब इस प्रकार इक्ष्वाकुवंश का परिचय दे चुके, तब राजा जनक ने हाथ जोड़कर उनसे कहा— मुनिश्रेष्ठ! आपका भला हो। अब हम भी अपने कुल का परिचय दे रहे हैं, सुनिये। महामते! कुलीन पुरुष के लिये कन्यादान के समय अपने कुल का पूर्णरूपेण परिचय देना आवश्यक है; अतः आप सुनने की कृपा करें॥ १-२॥

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॥ १ · ७१ · ३ ॥
राजाभूत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतः स्वेन कर्मणा। निमिः परमधर्मात्मा सर्वसत्त्ववतां वरः॥

rājābhūt triṣu lokeṣu viśrutaḥ svena karmaṇā।
nimiḥ paramadharmātmā sarvasattvavatāṁ varaḥ॥

प्राचीन काल में निमि नामक एक परम धर्मात्मा राजा हुए हैं, जो सम्पूर्ण धैर्यशाली महापुरुषों में श्रेष्ठ तथा अपने पराक्रम से तीनों लोकों में विख्यात थे॥ ३॥

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॥ १ · ७१ · ४ ॥
तस्य पुत्रो मिथिर्नाम जनको मिथिपुत्रकः। प्रथमो जनको राजा जनकादप्युदावसुः॥

tasya putro mithirnāma janako mithiputrakaḥ।
prathamo janako rājā janakādapyudāvasuḥ॥

उनके मिथि नामक एक पुत्र हुआ। मिथि के पुत्र का नाम जनक हुआ। ये ही हमारे कुल में पहले जनक हुए हैं (इन्हीं के नाम पर हमारे वंश का प्रत्येक राजा 'जनक' कहलाता है)। जनक से उदावसु का जन्म हुआ॥ ४॥

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॥ १ · ७१ · ५ ॥
उदावसोस्तु धर्मात्मा जातो वै नन्दिवर्धनः। नन्दिवर्धसुतः शूरः सुकेतुर्नाम नामतः॥

udāvasostu dharmātmā jāto vai nandivardhanaḥ।
nandivardhasutaḥ śūraḥ suketurnāma nāmataḥ॥

उदावसु से धर्मात्मा नन्दिवर्धन उत्पन्न हुए। नन्दिवर्धन के शूरवीर पुत्र का नाम सुकेतु हुआ॥ ५॥

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॥ १ · ७१ · ६ ॥
सुकेतोरपि धर्मात्मा देवरातो महाबलः। देवरातस्य राजर्षेर्बृहद्रथ इति स्मृतः॥

suketorapi dharmātmā devarāto mahābalaḥ।
devarātasya rājarṣerbṛhadratha iti smṛtaḥ॥

सुकेतु के भी देवरात नामक पुत्र हुआ। देवरात महान् बलवान् और धर्मात्मा थे। राजर्षि देवरात के बृहद्रथ नाम से प्रसिद्ध एक पुत्र हुआ॥ ६॥

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॥ १ · ७१ · ७ ॥
बृहद्रथस्य शूरोऽभून्महावीरः प्रतापवान्। महावीरस्य धृतिमान् सुधृतिः सत्यविक्रमः॥

bṛhadrathasya śūro'bhūnmahāvīraḥ pratāpavān।
mahāvīrasya dhṛtimān sudhṛtiḥ satyavikramaḥ॥

बृहद्रथ के पुत्र महावीर हुए, जो शूर और प्रतापी थे। महावीर के सुधृति हुए, जो धैर्यवान् और सत्यपराक्रमी थे॥ ७॥

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॥ १ · ७१ · ८ ॥
सुधृतेरपि धर्मात्मा धृष्टकेतुः सुधार्मिकः। धृष्टकेतोश्च राजर्षेर्हर्यश्व इति विश्रुतः॥

sudhṛterapi dharmātmā dhṛṣṭaketuḥ sudhārmikaḥ।
dhṛṣṭaketośca rājarṣerharyaśva iti viśrutaḥ॥

सुधृति के भी धर्मात्मा धृष्टकेतु हुए, जो परम धार्मिक थे। राजर्षि धृष्टकेतु का पुत्र हर्यश्व नाम से विख्यात हुआ॥ ८॥

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॥ १ · ७१ · ९ ॥
हर्यश्वस्य मरुः पुत्रो मरोः पुत्रः प्रतीन्धकः। प्रतीन्धकस्य धर्मात्मा राजा कीर्तिरथः सुतः॥

haryaśvasya maruḥ putro maroḥ putraḥ pratīndhakaḥ।
pratīndhakasya dharmātmā rājā kīrtirathaḥ sutaḥ॥

हर्यश्व के पुत्र मरु, मरु के पुत्र प्रतीन्धक तथा प्रतीन्धक के पुत्र धर्मात्मा राजा कीर्तिरथ हुए॥ ९॥

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॥ १ · ७१ · १० ॥
पुत्रः कीर्तिरथस्यापि देवमीढ इति स्मृतः। देवमीढस्य विबुधो विबुधस्य महीध्रकः॥

putraḥ kīrtirathasyāpi devamīḍha iti smṛtaḥ।
devamīḍhasya vibudho vibudhasya mahīdhrakaḥ॥

कीर्तिरथ के पुत्र देवमीढ नाम से विख्यात हुए। देवमीढ के विबुध और विबुध के पुत्र महीध्रक हुए॥ १०॥

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॥ १ · ७१ · ११ ॥
महीध्रकसुतो राजा कीर्तिरातो महाबलः। कीर्तिरातस्य राजर्षेर्महारोमा व्यजायत॥

mahīdhrakasuto rājā kīrtirāto mahābalaḥ।
kīrtirātasya rājarṣermahāromā vyajāyata॥

महीध्रक के पुत्र महाबली राजा कीर्तिरात हुए। राजर्षि कीर्तिरात के महारोमा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ११॥

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॥ १ · ७१ · १२ ॥
महारोम्णस्तु धर्मात्मा स्वर्णरोमा व्यजायत। स्वर्णरोम्णस्तु राजर्षेर्ह्रस्वरोमा व्यजायत॥

mahāromṇastu dharmātmā svarṇaromā vyajāyata।
svarṇaromṇastu rājarṣerhrasvaromā vyajāyata॥

महारोमा से धर्मात्मा स्वर्णरोमा का जन्म हुआ। राजर्षि स्वर्णरोमा से ह्रस्वरोमा उत्पन्न हुए॥ १२॥

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॥ १ · ७१ · १३ ॥
तस्य पुत्रद्वयं राज्ञो धर्मज्ञस्य महात्मनः। ज्येष्ठोऽहमनुजो भ्राता मम वीरः कुशध्वजः॥

tasya putradvayaṁ rājño dharmajñasya mahātmanaḥ।
jyeṣṭho'hamanujo bhrātā mama vīraḥ kuśadhvajaḥ॥

धर्मज्ञ महात्मा राजा ह्रस्वरोमा के दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें ज्येष्ठ तो मैं ही हूँ और कनिष्ठ मेरा छोटा भाई वीर कुशध्वज है॥ १३॥

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॥ १ · ७१ · १४ ॥
मां तु ज्येष्ठं पिता राज्ये सोऽभिषिच्य पिता मम। कुशध्वजं समावेश्य भारं मयि वनं गतः॥

māṁ tu jyeṣṭhaṁ pitā rājye so'bhiṣicya pitā mama।
kuśadhvajaṁ samāveśya bhāraṁ mayi vanaṁ gataḥ॥

मेरे पिता मुझ ज्येष्ठ पुत्र को राज्य पर अभिषिक्त करके कुशध्वज का सारा भार मुझे सौंपकर वन में चले गये॥ १४॥

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॥ १ · ७१ · १५ ॥
वृद्धे पितरि स्वर्याते धर्मेण धुरमावहम्। भ्रातरं देवसंकाशं स्नेहात् पश्यन् कुशध्वजम्॥

vṛddhe pitari svaryāte dharmeṇa dhuramāvaham।
bhrātaraṁ devasaṁkāśaṁ snehāt paśyan kuśadhvajam॥

वृद्ध पिता के स्वर्गगामी हो जाने पर अपने देवतुल्य भाई कुशध्वज को स्नेह-दृष्टि से देखता हुआ मैं इस राज्य का भार धर्म के अनुसार वहन करने लगा॥ १५॥

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॥ १ · ७१ · १६ ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य सांकाश्यादागतः पुरात्। सुधन्वा वीर्यवान् राजा मिथिलामवरोधकः॥

kasyacittvatha kālasya sāṁkāśyādāgataḥ purāt।
sudhanvā vīryavān rājā mithilāmavarodhakaḥ॥

कुछ काल के अनन्तर पराक्रमी राजा सुधन्वा ने सांकाश्य नगर से आकर मिथिला को चारों ओर से घेर लिया॥ १६॥

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॥ १ · ७१ · १७ ॥
मे प्रेषयामास शैवं धनुरनुत्तमम्। सीता कन्या पद्माक्षी मह्यं वै दीयतामिति॥

sa ca me preṣayāmāsa śaivaṁ dhanuranuttamam।
sītā ca kanyā padmākṣī mahyaṁ vai dīyatāmiti॥

उसने मेरे पास दूत भेजकर कहलाया कि 'तुम शिवजी के परम उत्तम धनुष तथा अपनी कमलनयनी कन्या सीता को मेरे हवाले कर दो'॥ १७॥

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॥ १ · ७१ · १८ ॥
तस्याप्रदानान्महर्षे युद्धमासीन्मया सह। हतोऽभिमुखो राजा सुधन्वा तु मया रणे॥

tasyāpradānānmaharṣe yuddhamāsīnmayā saha।
sa hato'bhimukho rājā sudhanvā tu mayā raṇe॥

महर्षे! मैंने उसकी माँग पूरी नहीं की। इसलिये मेरे साथ उसका युद्ध हुआ। उस संग्राम में सम्मुख युद्ध करता हुआ राजा सुधन्वा मेरे हाथ से मारा गया॥ १८॥

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॥ १ · ७१ · १९ ॥
निहत्य तं मुनिश्रेष्ठ सुधन्वानं नराधिपम्। सांकाश्ये भ्रातरं शूरमभ्यषिञ्चं कुशध्वजम्॥

nihatya taṁ muniśreṣṭha sudhanvānaṁ narādhipam।
sāṁkāśye bhrātaraṁ śūramabhyaṣiñcaṁ kuśadhvajam॥

मुनिश्रेष्ठ! राजा सुधन्वा का वध करके मैंने सांकाश्य नगर के राज्य पर अपने शूरवीर भ्राता कुशध्वज को अभिषिक्त कर दिया॥ १९॥

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॥ १ · ७१ · २० ॥
कनीयानेष मे भ्राता अहं ज्येष्ठो महामुने। ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते मुनिपुंगव॥

kanīyāneṣa me bhrātā ahaṁ jyeṣṭho mahāmune।
dadāmi paramaprīto vadhvau te munipuṁgava॥

महामुने! ये मेरे छोटे भाई कुशध्वज हैं और मैं इनका बड़ा भाई हूँ। मुनिवर! मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ आपको दो बहुएँ प्रदान करता हूँ॥ २०॥

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॥ १ · ७१ · २१ ॥
सीतां रामाय भद्रं ते ऊर्मिलां लक्ष्मणाय वै। वीर्यशुल्कां मम सुतां सीतां सुरसुतोपमाम्॥

sītāṁ rāmāya bhadraṁ te ūrmilāṁ lakṣmaṇāya vai।
vīryaśulkāṁ mama sutāṁ sītāṁ surasutopamām॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७१ · २२ ॥
द्वितीयामूर्मिलां चैव त्रिर्वदामि संशयः। ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते मुनिपुंगव॥

dvitīyāmūrmilāṁ caiva trirvadāmi na saṁśayaḥ।
dadāmi paramaprīto vadhvau te munipuṁgava॥

॥ २१–२२ ॥

आपका भला हो! मैं सीता को श्रीराम के लिये और ऊर्मिला को लक्ष्मण के लिये समर्पित करता हूँ। पराक्रम ही जिसको पाने का शुल्क (शर्त) था, उस देवकन्या के समान सुन्दरी अपनी प्रथम पुत्री सीता को श्रीराम के लिये तथा दूसरी पुत्री ऊर्मिला को लक्ष्मण के लिये दे रहा हूँ। मैं इस बात को तीन बार दुहराता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मुनिप्रवर! मैं परम प्रसन्न होकर आपको दो बहुएँ दे रहा हूँ'॥ २१-२२॥

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॥ १ · ७१ · २३ ॥
रामलक्ष्मणयो राजन् गोदानं कारयस्व ह। पितृकार्यं भद्रं ते ततो वैवाहिकं कुरु॥

rāmalakṣmaṇayo rājan godānaṁ kārayasva ha।
pitṛkāryaṁ ca bhadraṁ te tato vaivāhikaṁ kuru॥

(वसिष्ठजी से ऐसा कहकर राजा जनक ने महाराज दशरथ से कहा—) राजन्! अब आप श्रीराम और लक्ष्मण के मंगल के लिये इनसे गोदान करवाइये, आपका कल्याण हो। नान्दीमुख श्राद्ध का कार्य भी सम्पन्न कीजिये। इसके बाद विवाह का कार्य आरम्भ कीजियेगा॥ २३॥

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॥ १ · ७१ · २४ ॥
मघा ह्यद्य महाबाहो तृतीयदिवसे प्रभो। फल्गुन्यामुत्तरे राजंस्तस्मिन् वैवाहिकं कुरु। रामलक्ष्मणयोरर्थे दानं कार्यं सुखोदयम्॥

maghā hyadya mahābāho tṛtīyadivase prabho।
phalgunyāmuttare rājaṁstasmin vaivāhikaṁ kuru।
rāmalakṣmaṇayorarthe dānaṁ kāryaṁ sukhodayam॥

महाबाहो! प्रभो! आज मघा नक्षत्र है। राजन्! आज के तीसरे दिन उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र में वैवाहिक कार्य कीजियेगा। आज श्रीराम और लक्ष्मण के अभ्युदय के लिये (गो, भूमि, तिल और सुवर्ण आदि का) दान कराना चाहिये; क्योंकि वह भविष्य में सुख देनेवाला होता है'॥ २४॥

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ॥ ७१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७१ ॥