वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ७२ · २५ श्लोकाःSarga 72 · 25 ślokas

विश्वामित्रद्वारा भरत और शत्रुघ्नके लिये कुशध्वजकी कन्याओंका वरण, राजा जनकद्वारा इसकी स्वीकृति तथा राजा दशरथका अपने पुत्रोंके मंगलके लिये नान्दीश्राद्ध एवं गोदान करना

चतुर्वरण

“चतुर्वरण”
॥ १ · ७२ · १–२२ ॥

यज्ञाग्नेः समीपे जनको दशरथश्च हस्तौ संगृह्य सम्बन्धं स्थापयतः, पृष्ठतः रामसीतादयश्चत्वारो वधूवरयुगलाः मालाभिः शोभन्ते।

विवाह-वेदी की पवित्र अग्नि के दोनों ओर बैठे विदेहराज जनक और महाराज दशरथ परस्पर हाथ पकड़कर दोनों कुलों का धर्म-सम्बन्ध दृढ़ कर रहे हैं; पीछे पुष्पमालाओं से सजे श्रीराम-सीता तथा शेष तीनों भाइयों के वर-वधू युगल वरण के लिये खड़े हैं। नीले वर्ण के मुकुटधारी श्रीराम सीता के साथ सबसे शोभायमान हैं।

On either side of the wedding fire, King Janaka of Videha and King Dasharatha clasp hands, sealing the dharmic bond between their two houses; behind them, garlanded, stand the four bridal couples — Rama and Sita and his three brothers each beside a bride — while attendants kneel below. The blue, crown-banded Rama stands radiant beside Sita.

॥ १ · ७२ · १ ॥
तमुक्तवन्तं वैदेहं विश्वामित्रो महामुनिः। उवाच वचनं वीरं वसिष्ठसहितो नृपम्‌॥

tamuktavantaṁ vaidehaṁ viśvāmitro mahāmuniḥ।
uvāca vacanaṁ vīraṁ vasiṣṭhasahito nṛpam‌॥

विदेहराज जनक जब अपनी बात समाप्त कर चुके, तब वसिष्ठसहित महामुनि विश्वामित्र उन वीर नरेशसे इस प्रकार बोले-॥ १॥

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॥ १ · ७२ · २ ॥
अचिन्त्यान्यप्रमेयाणि कुलानि नरपुंगव। इक्ष्वाकूणां विदेहानां नैषां तुल्योऽस्ति कश्चन॥

acintyānyaprameyāṇi kulāni narapuṁgava।
ikṣvākūṇāṁ videhānāṁ naiṣāṁ tulyo'sti kaścana॥

'नरश्रेष्ठ! इक्ष्वाकु और विदेह दोनों ही राजाओंके वंश अचिन्तनीय हैं। दोनोंके ही प्रभावकी कोई सीमा नहीं है। इन दोनोंकी समानता करनेवाला दूसरा कोई राजवंश नहीं है॥ २॥

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॥ १ · ७२ · ३ ॥
सदृशो धर्मसम्बन्धः सदृशो रूपसम्पदा। रामलक्ष्मणयो राजन्‌ सीता चोर्मिलया सह॥

sadṛśo dharmasambandhaḥ sadṛśo rūpasampadā।
rāmalakṣmaṇayo rājan‌ sītā cormilayā saha॥

'राजन्‌! इन दोनों कुलोंमें जो यह धर्म-सम्बन्ध स्थापित होने जा रहा है, सर्वथा एक-दूसरेके योग्य है। रूप-वैभवकी दृष्टिसे भी समान योग्यताका यह है; क्योंकि ऊर्मिलासहित सीता श्रीराम और लक्ष्मणके अनुरूप है॥ ३॥

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॥ १ · ७२ · ४ ॥
वक्तव्यं नरश्रेष्ठ श्रूयतां वचनं मम। भ्राता यवीयान्‌ धर्मज्ञ एष राजा कुशध्वजः॥

vaktavyaṁ ca naraśreṣṭha śrūyatāṁ vacanaṁ mama।
bhrātā yavīyān‌ dharmajña eṣa rājā kuśadhvajaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७२ · ५ ॥
अस्य धर्मात्मनो राजन्‌ रूपेणाप्रतिमं भुवि। सुताद्वयं नरश्रेष्ठ पत्यर्थं वरयामहे॥

asya dharmātmano rājan‌ rūpeṇāpratimaṁ bhuvi।
sutādvayaṁ naraśreṣṭha patyarthaṁ varayāmahe॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७२ · ६ ॥
भरतस्य कुमारस्य शत्रुघ्नस्य धीमतः। वरये ते सुते राजंस्तयोरर्थे महात्मनोः॥

bharatasya kumārasya śatrughnasya ca dhīmataḥ।
varaye te sute rājaṁstayorarthe mahātmanoḥ॥

॥ ४–६ ॥

'नरश्रेष्ठ! इसके बाद मुझे भी कुछ कहना है; आप मेरी बात सुनिये। राजन्‌! आपके छोटे भाई जो ये धर्मज्ञ राजा कुशध्वज बैठे हैं, इन धर्मात्मा नरेशके भी दो कन्याएँ हैं, जो इस भूमण्डलमें अनुपम सुन्दरी हैं। नरश्रेष्ठ! भूपाल! मैं आपकी उन दोनों कन्याओंका कुमार भरत और बुद्धिमान्‌ शत्रुघ्न इन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंके लिये इनकी धर्मपत्नी बनानेके उद्देश्यसे वरण करता हूँ॥ ४-६॥

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॥ १ · ७२ · ७ ॥
पुत्रा दशरथस्येमे रूपयौवनशालिनः। लोकपालसमाः सर्वे देवतुल्यपराक्रमाः॥

putrā daśarathasyeme rūpayauvanaśālinaḥ।
lokapālasamāḥ sarve devatulyaparākramāḥ॥

'राजा दशरथके ये सभी पुत्र रूप और यौवनसे सुशोभित, लोकपालोंके समान तेजस्वी तथा देवताओंके तुल्य पराक्रमी हैं॥ ७॥

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॥ १ · ७२ · ८ ॥
उभयोरपि राजेन्द्र सम्बन्धेनानुबध्यताम्‌। इक्ष्वाकुकुलमव्यग्रं भवतः पुण्यकर्मणः॥

ubhayorapi rājendra sambandhenānubadhyatām‌।
ikṣvākukulamavyagraṁ bhavataḥ puṇyakarmaṇaḥ॥

'राजेन्द्र! इन दोनों भाइयों (भरत और शत्रुघ्न) को भी कन्यादान करके आप इस समस्त इक्ष्वाकुकुलको अपने सम्बन्धसे बाँध लीजिये। आप पुण्यकर्मा पुरुष हैं; आपके चित्तमें व्यग्रता नहीं आनी चाहिये (अर्थात्‌ आप यह सोचकर व्यग्र न हों कि ऐसे महान्‌ सम्राट्के साथ मैं एक ही समय चार वैवाहिक सम्बन्धोंका निर्वाह कैसे कर सकता हूँ।)'॥ ८॥

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॥ १ · ७२ · ९ ॥
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा वसिष्ठस्य मते तदा। जनकः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच मुनिपुंगवौ॥

viśvāmitravacaḥ śrutvā vasiṣṭhasya mate tadā।
janakaḥ prāñjalirvākyamuvāca munipuṁgavau॥

वसिष्ठजीकी सम्मतिके अनुसार विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर उस समय राजा जनकने हाथ जोड़कर उन दोनों मुनिवरोंसे कहा-॥ ९॥

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॥ १ · ७२ · १० ॥
कुलं धन्यमिदं मन्ये येषां तौ मुनिपुंगवौ। सदृशं कुलसम्बन्धं यदाज्ञापयतः स्वयम्‌॥

kulaṁ dhanyamidaṁ manye yeṣāṁ tau munipuṁgavau।
sadṛśaṁ kulasambandhaṁ yadājñāpayataḥ svayam‌॥

'मुनिपुंगवो! मैं अपने इस कुलको धन्य मानता हूँ, जिसे आप दोनों इक्ष्वाकुवंशके योग्य समझकर इसके साथ सम्बन्ध जोड़नेके लिये स्वयं आज्ञा दे रहे हैं॥ १०॥

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॥ १ · ७२ · ११ ॥
एवं भवतु भद्रं वः कुशध्वजसुते इमे। पत्यौ भजेतां सहितौ शत्रुघ्नभरतावुभौ॥

evaṁ bhavatu bhadraṁ vaḥ kuśadhvajasute ime।
patyau bhajetāṁ sahitau śatrughnabharatāvubhau॥

'आपका कल्याण हो। आप जैसा कहते हैं, ऐसा ही हो। ये सदा साथ रहनेवाले दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न कुशध्वजकी इन दोनों कन्याओं (मेंसे एक-एक) को अपनी-अपनी धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण करें॥ ११॥

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॥ १ · ७२ · १२ ॥
एकाह्ना राजपुत्रीणां चतसृणां महामुने। पाणीन्‌ गृह्णन्तु चत्वारो राजपुत्रा महाबलाः॥

ekāhnā rājaputrīṇāṁ catasṛṇāṁ mahāmune।
pāṇīn‌ gṛhṇantu catvāro rājaputrā mahābalāḥ॥

'महामुने! ये चारों महाबली राजकुमार एक ही दिन हमारी चारों राजकुमारियोंका पाणिग्रहण करें॥ १२॥

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॥ १ · ७२ · १३ ॥
उत्तरे दिवसे ब्रह्मन्‌ फल्गुनीभ्यां मनीषिणः। वैवाहिकं प्रशंसन्ति भगो यत्र प्रजापतिः॥

uttare divase brahman‌ phalgunībhyāṁ manīṣiṇaḥ।
vaivāhikaṁ praśaṁsanti bhago yatra prajāpatiḥ॥

'ब्रह्मन्‌! अगले दो दिन फाल्गुनी नामक नक्षत्रसे युक्त हैं। इनमें (पहले दिन तो पूर्वा फाल्गुनी है और) दूसरे दिन (अर्थात्‌ परसों) उत्तरा फाल्गुनी नामक नक्षत्र होगा, जिसके देवता प्रजापति भग (तथा अर्यमा) हैं। मनीषी पुरुष उस नक्षत्रमें वैवाहिक कार्य करना बहुत उत्तम बताते हैं'॥ १३॥

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॥ १ · ७२ · १४ ॥
एवमुक्त्वा वचः सौम्यं प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः। तमापृष्ट्वा उभौ मुनिवरौ राजा जनको वाक्यमब्रवीत्‌॥

evamuktvā vacaḥ saumyaṁ pratyutthāya kṛtāñjaliḥ।
tamāpṛṣṭvā ubhau munivarau rājā janako vākyamabravīt‌॥

इस प्रकार सौम्य (मनोहर) वचन कहकर राजा जनक उठकर खड़े हो गये और उन दोनों मुनिवरोंसे हाथ जोड़कर बोले-॥ १४॥

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॥ १ · ७२ · १५ ॥
परो धर्मः कृतो मह्यं शिष्योऽस्मि भवतोस्तथा। इमान्यासनमुख्यानि आस्यतां मुनिपुंगवौ॥

paro dharmaḥ kṛto mahyaṁ śiṣyo'smi bhavatostathā।
imānyāsanamukhyāni āsyatāṁ munipuṁgavau॥

'आपलोगोंने कन्याओंका विवाह निश्चित करके मेरे लिये महान्‌ धर्मका सम्पादन कर दिया; मैं आप दोनोंका शिष्य हूँ। मुनिवरो! इन श्रेष्ठ आसनोंपर आप दोनों विराजमान हों॥ १५॥

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॥ १ · ७२ · १६ ॥
यथा दशरथस्येयं तथायोध्या पुरी मम। प्रभुत्वे नास्ति संदेहो यथार्ह कर्तुमर्हथ॥

yathā daśarathasyeyaṁ tathāyodhyā purī mama।
prabhutve nāsti saṁdeho yathārha kartumarhatha॥

'आपके लिये जैसी राजा दशरथकी अयोध्या है, वैसी ही यह मेरी मिथिलापुरी भी है। आपका इसपर पूरा अधिकार है, इसमें संदेह नहीं; अतः आप हमें यथायोग्य आज्ञा प्रदान करते रहें'॥ १६॥

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॥ १ · ७२ · १७ ॥
तथा ब्रुवति वैदेहे जनके रघुनन्दनः। राजा दशरथो हृष्टः प्रत्युवाच महीपतिम्‌॥

tathā bruvati vaidehe janake raghunandanaḥ।
rājā daśaratho hṛṣṭaḥ pratyuvāca mahīpatim‌॥

विदेहराज जनकके ऐसा कहनेपर रघुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले राजा दशरथने प्रसन्न होकर उन मिथिलानरेशको इस प्रकार उत्तर दिया-॥ १७॥

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॥ १ · ७२ · १८ ॥
युवामसंख्येयगुणौ भ्रातरौ मिथिलेश्वरौ। ऋषयो राजसङ्घाश्च भवद्भयामभिपूजिताः॥

yuvāmasaṁkhyeyaguṇau bhrātarau mithileśvarau।
ṛṣayo rājasaṅghāśca bhavadbhayāmabhipūjitāḥ॥

'मिथिलेश्वर! आप दोनों भाइयोंके गुण असंख्य हैं; आपलोगोंने ऋषियों तथा राजसमूहोंका भलीभाँति सत्कार किया है॥ १८॥

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॥ १ · ७२ · १९ ॥
स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गमिष्यामः स्वमालयम्‌। श्राद्धकर्माणि विधिवद्विधास्य इति चाब्रवीत्‌॥

svasti prāpnuhi bhadraṁ te gamiṣyāmaḥ svamālayam‌।
śrāddhakarmāṇi vidhivadvidhāsya iti cābravīt‌॥

'आपका कल्याण हो, आप मंगलके भागी हों। अब हम अपने विश्रामस्थानको जायँगे। वहाँ जाकर मैं विधिपूर्वक नान्दीमुखश्राद्धका कार्य सम्पन्न करूँगा।' यह बात भी राजा दशरथने कही॥ १९॥

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॥ १ · ७२ · २० ॥
तमापृष्ट्वा नरपतिं राजा दशरथस्तदा। मुनीन्द्रौ तौ पुरस्कृत्य जगामाशु महायशाः॥

tamāpṛṣṭvā narapatiṁ rājā daśarathastadā।
munīndrau tau puraskṛtya jagāmāśu mahāyaśāḥ॥

तदनन्तर मिथिलानरेशकी अनुमति ले महायशस्वी राजा दशरथ मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र और वसिष्ठको आगे करके तुरंत अपने आवासस्थानपर चले गये॥ २०॥

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॥ १ · ७२ · २१ ॥
गत्वा निलयं राजा श्राद्धं कृत्वा विधानतः। प्रभाते काल्यमुत्थाय चक्रे गोदानमुत्तमम्‌॥

sa gatvā nilayaṁ rājā śrāddhaṁ kṛtvā vidhānataḥ।
prabhāte kālyamutthāya cakre godānamuttamam‌॥

डेरेपर जाकर राजा दशरथने (अपराह्णकालमें) विधिपूर्वक आभ्युदयिक श्राद्ध सम्पन्न किया। तत्पश्चात्‌ (रात बीतनेपर) प्रातःकाल उठकर राजाने तत्कालोचित उत्तम गोदान-कर्म किया॥ २१॥

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॥ १ · ७२ · २२ ॥
गवां शतसहस्रं ब्राह्मणेभ्यो नराधिपः। एकैकशो ददौ राजा पुत्रानुद्दिश्य धर्मतः॥

gavāṁ śatasahasraṁ ca brāhmaṇebhyo narādhipaḥ।
ekaikaśo dadau rājā putrānuddiśya dharmataḥ॥

राजा दशरथने अपने एक-एक पुत्रके मंगलके लिये धर्मानुसार एक-एक लाख गौएँ ब्राह्मणोंको दान कीं॥ २२॥

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॥ १ · ७२ · २३ ॥
सुवर्णशृङ्ग्यः सम्पन्नाः सवत्साः कांस्यदोहनाः। गवां शतसहस्राणि चत्वारि पुरुषर्षभः॥

suvarṇaśṛṅgyaḥ sampannāḥ savatsāḥ kāṁsyadohanāḥ।
gavāṁ śatasahasrāṇi catvāri puruṣarṣabhaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ७२ · २४ ॥
वित्तमन्यच्च सुबहु द्विजेभ्यो रघुनन्दनः। ददौ गोदानमुद्दिश्य पुत्राणां पुत्रवत्सलः॥

vittamanyacca subahu dvijebhyo raghunandanaḥ।
dadau godānamuddiśya putrāṇāṁ putravatsalaḥ॥

॥ २३–२४ ॥

उन सबके सींग सोनेसे मढ़े हुए थे। उन सबके साथ बछड़े और काँसेके दुग्धपात्र थे। इस प्रकार पुत्रवत्सल रघुकुलनन्दन पुरुषशिरोमणि राजा दशरथने चार लाख गौओंका दान किया तथा और भी बहुत-सा धन पुत्रोंके लिये गोदानके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको दिया॥ २३-२४॥

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॥ १ · ७२ · २५ ॥
सुतैः कृतगोदानैर्वृतः सन्नृपतिस्तदा। लोकपालैरिवाभाति वृत्तः सौम्यः प्रजापतिः॥

sa sutaiḥ kṛtagodānairvṛtaḥ sannṛpatistadā।
lokapālairivābhāti vṛttaḥ saumyaḥ prajāpatiḥ॥

गोदान-कर्म सम्पन्न करके आये हुए पुत्रोंसे घिरे हुए राजा दशरथ उस समय लोकपालोंसे घिरकर बैठे हुए शान्तस्वभाव प्रजापति ब्रह्माके समान शोभा पा रहे थे॥ २५॥

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ॥ ७२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७२ ॥