वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः २ · ४३ श्लोकाःSarga 2 · 43 ślokas

रामायणकाव्य का उपक्रम — तमसा के तट पर क्रौञ्चवध से संतप्त हुए महर्षि वाल्मीकि के शोक का श्लोक-रूप में प्रकट होना तथा ब्रह्माजी का उन्हें रामचरित्रमय काव्य के निर्माण का आदेश देना

The krauñca’s death on the Tamasā — grief becomes the first śloka, and Brahmā commands the poem

क्रौञ्चवध — जहाँ कविता का जन्म हुआ

“क्रौञ्चवध — जहाँ कविता का जन्म हुआ”
॥ १ · २ · ९–१५ ॥

तमसातीरे अरुणोदये निषादशरेण हतं क्रौञ्चं भूमौ पतितं दृष्ट्वा शोकसंतप्तो महर्षिर्वाल्मीकिः करमुद्यम्य तिष्ठति। पार्श्वे क्रौञ्ची करुणं क्रोशति, वृक्षान्तरे च निषादो लज्जितो निरीक्षते।

तमसा के तट पर सूर्योदय की सुनहरी आभा में महर्षि वाल्मीकि शोक से स्तब्ध खड़े हैं — उनका उठा हुआ हाथ उस शाप का साक्षी है जो श्लोक बन गया। चरणों के पास बाण से बिंधा क्रौंच रक्तरंजित पड़ा है; उसकी संगिनी पंख फैलाए आकाश की ओर करुण क्रंदन कर रही है। पीछे साल वृक्षों की छाया में धनुष लिए निषाद लज्जित-सा देख रहा है, और नदी भोर का सोना दूर तक बहा ले जा रही है।

On the bank of the Tamasa, in the gold of dawn, the sage Valmiki stands frozen in grief — his raised hand the witness of the curse that became the first verse. At his feet lies the krauncha, pierced by the hunter's arrow, blood on its white feathers; its mate cries skyward with outspread wings. Half-hidden among the sal trees the hunter looks on, bow lowered, already ashamed, while the river carries the morning's gold into the distance.

॥ १ · २ · १ ॥
नारदस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वा वाक्यविशारदः पूजयामास धर्मात्मा सहशिष्यो महामुनिम्

nāradasya tu tad vākyaṁ śrutvā vākyaviśāradaḥ ।
pūjayāmāsa dharmātmā sahaśiṣyo mahāmunim ॥

देवर्षि नारदजी के उपर्युक्त वचन सुनकर वाणीविशारद धर्मात्मा ऋषि वाल्मीकिजी ने अपने शिष्योंसहित उन महामुनि का पूजन किया।

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॥ १ · २ · २ ॥
यथावत् पूजितस्तेन देवर्षिर्नारदस्तथा आपृच्छ्यैवाभ्यनुज्ञातः जगाम विहायसम्

yathāvat pūjitastena devarṣirnāradastathā ।
āpṛcchyaivābhyanujñātaḥ sa jagāma vihāyasam ॥

वाल्मीकिजी से यथावत् सम्मानित हो देवर्षि नारदजी ने जाने के लिये उनसे आज्ञा माँगी और उनसे अनुमति मिल जाने पर वे आकाशमार्ग से चले गये।

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॥ १ · २ · ३ ॥
मुहूर्तं गते तस्मिन् देवलोकं मुनिस्तदा जगाम तमसातीरं जाह्नव्यास्त्वविदूरतः

sa muhūrtaṁ gate tasmin devalokaṁ munistadā ।
jagāma tamasātīraṁ jāhnavyāstvavidūrataḥ ॥

उनके देवलोक पधारने के दो ही घड़ी बाद वाल्मीकिजी तमसा नदी के तट पर गये, जो गंगाजी से अधिक दूर नहीं था।

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॥ १ · २ · ४ ॥
तु तीरं समासाद्य तमसाया मुनिस्तदा शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम्

sa tu tīraṁ samāsādya tamasāyā munistadā ।
śiṣyamāha sthitaṁ pārśve dṛṣṭvā tīrthamakardamam ॥

तमसा के तट पर पहुँचकर वहाँ के घाट को कीचड़ से रहित देख मुनि ने अपने पास खड़े हुए शिष्य से कहा—

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॥ १ · २ · ५ ॥
अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यमनो यथा

akardamamidaṁ tīrthaṁ bharadvāja niśāmaya ।
ramaṇīyaṁ prasannāmbu sanmanuṣyamano yathā ॥

भरद्वाज! देखो, यहाँ का घाट बड़ा सुन्दर है। इसमें कीचड़ का नाम नहीं है। यहाँ का जल वैसा ही स्वच्छ है, जैसा सत्पुरुष का मन होता है।

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॥ १ · २ · ६ ॥
न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम इदमेवावगाहिष्ये तमसातीर्थमुत्तमम्

nyasyatāṁ kalaśastāta dīyatāṁ valkalaṁ mama ।
idamevāvagāhiṣye tamasātīrthamuttamam ॥

तात! यहीं कलश रख दो और मुझे मेरा वल्कल दो। मैं तमसा के इसी उत्तम तीर्थ में स्नान करूँगा।

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॥ १ · २ · ७ ॥
एवमुक्तो भरद्वाजो वाल्मीकेन महात्मना प्रायच्छत मुनेस्तस्य वल्कलं नियतो गुरोः

evamukto bharadvājo vālmīkena mahātmanā ।
prāyacchata munestasya valkalaṁ niyato guroḥ ॥

महात्मा वाल्मीकि के ऐसा कहने पर नियमपरायण शिष्य भरद्वाज ने अपने गुरु मुनिवर वाल्मीकि को वल्कलवस्त्र दिया।

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॥ १ · २ · ८ ॥
शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रियः विचचार पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम्

sa śiṣyahastādādāya valkalaṁ niyatendriyaḥ ।
vicacāra ha paśyaṁstat sarvato vipulaṁ vanam ॥

शिष्य के हाथ से वल्कल लेकर वे जितेन्द्रिय मुनि वहाँ के विशाल वन की शोभा देखते हुए सब ओर विचरने लगे।

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॥ १ · २ · ९ ॥
तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम् ददर्श भगवांस्तत्र क्रौञ्चयोश्चारुनिःस्वनम्

tasyābhyāśe tu mithunaṁ carantamanapāyinam ।
dadarśa bhagavāṁstatra krauñcayoścāruniḥsvanam ॥

उनके पास ही क्रौञ्च पक्षियों का एक जोड़ा, जो कभी एक-दूसरे से अलग नहीं होता था, विचर रहा था। वे दोनों पक्षी बड़ी मधुर बोली बोलते थे। भगवान् वाल्मीकि ने पक्षियों के उस जोड़े को वहाँ देखा।

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॥ १ · २ · १० ॥
तस्मात् तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चयः जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यतः

tasmāt tu mithunādekaṁ pumāṁsaṁ pāpaniścayaḥ ।
jaghāna vairanilayo niṣādastasya paśyataḥ ॥

उसी समय पापपूर्ण विचार रखनेवाले एक निषाद ने, जो समस्त जन्तुओं का अकारण वैरी था, वहाँ आकर पक्षियों के उस जोड़े में से एक — नर पक्षी को मुनि के देखते-देखते बाण से मार डाला।

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॥ १ · २ · ११ ॥
तं शोणितपरीताङ्गं चेष्टमानं महीतले भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम्

taṁ śoṇitaparītāṅgaṁ ceṣṭamānaṁ mahītale ।
bhāryā tu nihataṁ dṛṣṭvā rurāva karuṇāṁ giram ॥

वह पक्षी खून से लथपथ होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और पंख फड़फड़ाता हुआ तड़पने लगा। अपने पति की हत्या हुई देख उसकी भार्या क्रौञ्ची करुणाजनक स्वर में चीत्कार कर उठी।

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॥ १ · २ · १२ ॥
वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्रिणा सहितेन वै

viyuktā patinā tena dvijena sahacāriṇā ।
tāmraśīrṣeṇa mattena patriṇā sahitena vai ॥

उत्तम पंखों से युक्त वह पक्षी सदा अपनी भार्या के साथ-साथ विचरता था। उसके मस्तक का रंग ताँबे के समान लाल था और वह काम से मतवाला हो गया था। ऐसे पति से वियुक्त होकर क्रौञ्ची बड़े दुःख से रो रही थी।

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॥ १ · २ · १३ ॥
तथाविधं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत

tathāvidhaṁ dvijaṁ dṛṣṭvā niṣādena nipātitam ।
ṛṣerdharmātmanastasya kāruṇyaṁ samapadyata ॥

निषाद ने जिसे मार गिराया था, उस नर पक्षी की वह दुर्दशा देख उन धर्मात्मा ऋषि को बड़ी दया आयी।

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॥ १ · २ · १४ ॥
ततः करुणवेदित्वादधर्मोऽयमिति द्विजः निशाम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत्

tataḥ karuṇaveditvādadharmo'yamiti dvijaḥ ।
niśāmya rudatīṁ krauñcīmidaṁ vacanamabravīt ॥

स्वभावतः करुणा का अनुभव करनेवाले ब्रह्मर्षि ने "यह अधर्म हुआ है" ऐसा निश्चय करके रोती हुई क्रौञ्ची की ओर देखते हुए निषाद से इस प्रकार कहा—

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॥ १ · २ · १५ ॥
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्

mā niṣāda pratiṣṭhāṁ tvamagamaḥ śāśvatīḥ samāḥ ।
yatkrauñcamithunādekamavadhīḥ kāmamohitam ॥

tap a glowing wordचमकते शब्द छुएँ

निषाद! तुझे नित्य-निरन्तर — कभी भी शान्ति न मिले; क्योंकि तूने इस क्रौञ्च के जोड़े में से एक को, जो काम से मोहित हो रहा था, बिना किसी अपराध के ही हत्या कर डाली।

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॥ १ · २ · १६ ॥
तस्येत्थं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्षतः शोकार्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतं मया

tasyetthaṁ bruvataścintā babhūva hṛdi vīkṣataḥ ।
śokārtenāsya śakuneḥ kimidaṁ vyāhṛtaṁ mayā ॥

ऐसा कहकर जब उन्होंने इस पर विचार किया, तब उनके मन में यह चिन्ता हुई कि "अहो! इस पक्षी के शोक से पीड़ित होकर मैंने यह क्या कह डाला।"

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॥ १ · २ · १७ ॥
चिन्तयन् महाप्राज्ञश्चकार मतिमान् मतिम् शिष्यं चैवाब्रवीद् वाक्यमिदं मुनिपुंगवः

cintayan sa mahāprājñaścakāra matimān matim ।
śiṣyaṁ caivābravīd vākyamidaṁ sa munipuṁgavaḥ ॥

यही सोचते हुए महाज्ञानी और परम बुद्धिमान् मुनिवर वाल्मीकि एक निश्चय पर पहुँच गये और अपने शिष्य से इस प्रकार बोले—

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॥ १ · २ · १८ ॥
पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा

pādabaddho'kṣarasamastantrīlayasamanvitaḥ ।
śokārtasya pravṛtto me śloko bhavatu nānyathā ॥

तात! शोक से पीड़ित हुए मेरे मुख से जो वाक्य निकल पड़ा है, यह चार चरणों में आबद्ध है। इसके प्रत्येक चरण में बराबर-बराबर (यानी आठ-आठ) अक्षर हैं तथा इसे वीणा के लय में गाया भी जा सकता है; अतः मेरा यह वचन श्लोकरूप (अर्थात् श्लोक नामक छन्द में आबद्ध काव्यरूप या यशःस्वरूप) होना चाहिये, अन्यथा नहीं।

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॥ १ · २ · १९ ॥
शिष्यस्तु तस्य ब्रुवतो मुनेर्वाक्यमनुत्तमम् प्रतिजग्राह संतुष्टस्तस्य तुष्टोऽभवन्मुनिः

śiṣyastu tasya bruvato munervākyamanuttamam ।
pratijagrāha saṁtuṣṭastasya tuṣṭo'bhavanmuniḥ ॥

मुनि की यह उत्तम बात सुनकर उनके शिष्य भरद्वाज को बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने उनका समर्थन करते हुए कहा — "हाँ, आपका यह वाक्य श्लोकरूप ही होना चाहिये।" शिष्य के इस कथन से मुनि को विशेष संतोष हुआ।

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॥ १ · २ · २० ॥
सोऽभिषेकं ततः कृत्वा तीर्थे तस्मिन् यथाविधि तमेव चिन्तयन्नर्थमुपावर्तत वै मुनिः

so'bhiṣekaṁ tataḥ kṛtvā tīrthe tasmin yathāvidhi ।
tameva cintayannarthamupāvartata vai muniḥ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने उत्तम तीर्थ में विधिपूर्वक स्नान किया और उसी विषय का विचार करते हुए वे आश्रम की ओर लौट पड़े।

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॥ १ · २ · २१ ॥
भरद्वाजस्ततः शिष्यो विनीतः श्रुतवान् गुरोः कलशं पूर्णमादाय पृष्ठतोऽनुजगाम

bharadvājastataḥ śiṣyo vinītaḥ śrutavān guroḥ ।
kalaśaṁ pūrṇamādāya pṛṣṭhato'nujagāma ha ॥

फिर उनका विनीत एवं शास्त्रज्ञ शिष्य भरद्वाज भी वह जल से भरा हुआ कलश लेकर गुरुजी के पीछे-पीछे चला।

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॥ १ · २ · २२ ॥
प्रविश्याश्रमपदं शिष्येण सह धर्मवित् उपविष्टः कथाश्चान्याश्चकार ध्यानमास्थितः

sa praviśyāśramapadaṁ śiṣyeṇa saha dharmavit ।
upaviṣṭaḥ kathāścānyāścakāra dhyānamāsthitaḥ ॥

शिष्य के साथ आश्रम में पहुँचकर धर्मज्ञ ऋषि वाल्मीकिजी आसन पर बैठे और दूसरी-दूसरी बातें करने लगे; परंतु उनका ध्यान उस श्लोक की ओर ही लगा था।

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॥ १ · २ · २३ ॥
आजगाम ततो ब्रह्मा लोककर्ता स्वयं प्रभुः चतुर्मुखो महातेजा द्रष्टुं तं मुनिपुंगवम्

ājagāma tato brahmā lokakartā svayaṁ prabhuḥ ।
caturmukho mahātejā draṣṭuṁ taṁ munipuṁgavam ॥

इतने ही में अखिल विश्व की सृष्टि करनेवाले, सर्वसमर्थ, महातेजस्वी चतुर्मुख ब्रह्माजी मुनिवर वाल्मीकि से मिलने के लिये स्वयं उनके आश्रम पर आये।

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॥ १ · २ · २४ ॥
वाल्मीकिरथ तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय वाग्यतः प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा तस्थौ परमविस्मितः

vālmīkiratha taṁ dṛṣṭvā sahasotthāya vāgyataḥ ।
prāñjaliḥ prayato bhūtvā tasthau paramavismitaḥ ॥

उन्हें देखते ही महर्षि वाल्मीकि सहसा उठकर खड़े हो गये। वे मन और इन्द्रियों को वश में रखकर अत्यन्त विस्मित हो हाथ जोड़े चुपचाप कुछ काल तक खड़े ही रह गये, कुछ बोल न सके।

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॥ १ · २ · २५ ॥
पूजयामास तं देवं पाद्यार्घ्यासनवन्दनैः प्रणम्य विधिवच्चैनं पृष्ट्वा चैव निरामयम्

pūjayāmāsa taṁ devaṁ pādyārghyāsanavandanaiḥ ।
praṇamya vidhivaccainaṁ pṛṣṭvā caiva nirāmayam ॥

तत्पश्चात् उन्होंने पाद्य, अर्घ्य, आसन और स्तुति आदि के द्वारा भगवान् ब्रह्माजी का पूजन किया और उनके चरणों में विधिवत् प्रणाम करके उनसे कुशल-समाचार पूछा।

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॥ १ · २ · २६ ॥
अथोपविश्य भगवानासने परमार्चिते वाल्मीकये ऋषये संदिदेशासनं ततः

athopaviśya bhagavānāsane paramārcite ।
vālmīkaye ca ṛṣaye saṁdideśāsanaṁ tataḥ ॥

भगवान् ब्रह्मा ने एक परम उत्तम आसन पर विराजमान होकर वाल्मीकि मुनि को भी आसन-ग्रहण करने की आज्ञा दी।

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॥ १ · २ · २७ ॥
ब्रह्मणा समनुज्ञातः सोऽप्युपाविशदासने उपविष्टे तदा तस्मिन् साक्षाल्लोकपितामहे

brahmaṇā samanujñātaḥ so'pyupāviśadāsane ।
upaviṣṭe tadā tasmin sākṣāllokapitāmahe ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · २ · २८ ॥
तद्गतेनैव मनसा वाल्मीकिर्ध्यानमास्थितः पापात्मना कृतं कष्टं वैरग्रहणबुद्धिना यत् तादृशं चारुरवं क्रौञ्चं हन्यादकारणात्

tadgatenaiva manasā vālmīkirdhyānamāsthitaḥ ।
pāpātmanā kṛtaṁ kaṣṭaṁ vairagrahaṇabuddhinā ॥
yat tādṛśaṁ cāruravaṁ krauñcaṁ hanyādakāraṇāt ।

॥ २७–२८ ॥

ब्रह्माजी की आज्ञा पाकर वे भी आसन पर बैठे। उस समय साक्षात् लोकपितामह ब्रह्माजी सामने बैठे हुए थे तो भी वाल्मीकि का मन उस क्रौञ्च पक्षीवाली घटना की ओर ही लगा था। वे उसी के विषय में सोचने लगे — "ओह! जिसकी बुद्धि वैरभाव को ग्रहण करने में ही लगी रहती है, उस पापात्मा व्याध ने बिना किसी अपराध के ही वैसे मनोहर कलरव करनेवाले क्रौञ्च पक्षी के प्राण ले लिये।"

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॥ १ · २ · २९ ॥
शोचन्नेव पुनः क्रौञ्चीमुपश्लोकमिमं जगौ पुनरन्तर्गतमना भूत्वा शोकपरायणः

śocanneva punaḥ krauñcīmupaślokamimaṁ jagau ॥
punarantargatamanā bhūtvā śokaparāyaṇaḥ ।

यही सोचते-सोचते उन्होंने क्रौञ्ची के आर्तनाद को सुनकर दया करके जो श्लोक कहा था, उसी को फिर ब्रह्माजी के सामने दुहराया। उसे दुहराते ही फिर उनके मन में अपने दिये हुए शाप के अनौचित्य का ध्यान आया। तब वे शोक और चिन्ता में डूब गये।

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॥ १ · २ · ३० ॥
तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन् मुनिपुंगवम्

tamuvāca tato brahmā prahasan munipuṁgavam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · २ · ३१ ॥
श्लोक एवास्त्वयं बद्धो नात्र कार्या विचारणा मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती

śloka evāstvayaṁ baddho nātra kāryā vicāraṇā ।
macchandādeva te brahman pravṛtteyaṁ sarasvatī ॥

॥ ३०–३१ ॥

ब्रह्माजी उनकी मनःस्थिति को समझकर हँसने लगे और मुनिवर वाल्मीकि से इस प्रकार बोले — "ब्रह्मन्! तुम्हारे मुँह से निकला हुआ यह छन्दोबद्ध वाक्य श्लोकरूप ही होगा। इस विषय में तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरे संकल्प अथवा प्रेरणा से ही तुम्हारे मुँह से ऐसी वाणी निकली है।"

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॥ १ · २ · ३२ ॥
रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमतः वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम्

rāmasya caritaṁ kṛtsnaṁ kuru tvamṛṣisattama ।
dharmātmano bhagavato loke rāmasya dhīmataḥ ॥
vṛttaṁ kathaya dhīrasya yathā te nāradācchrutam ।

मुनिश्रेष्ठ! तुम श्रीराम के सम्पूर्ण चरित्र का वर्णन करो। परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम संसार में सबसे बड़े धर्मात्मा और धीर पुरुष हैं। तुमने नारदजी के मुँह से जैसा सुना है, उसी के अनुसार उनके चरित्र का चित्रण करो।

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॥ १ · २ · ३३ ॥
रहस्यं प्रकाशं यद् वृत्तं तस्य धीमतः

rahasyaṁ ca prakāśaṁ ca yad vṛttaṁ tasya dhīmataḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · २ · ३४ ॥
रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां सर्वशः वैदेह्याश्चैव यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति

rāmasya sahasaumitre rākṣasānāṁ ca sarvaśaḥ ।
vaidehyāścaiva yad vṛttaṁ prakāśaṁ yadi vā rahaḥ ॥
taccāpyaviditaṁ sarvaṁ viditaṁ te bhaviṣyati ।

॥ ३३–३४ ॥

बुद्धिमान् श्रीराम का जो गुप्त या प्रकट वृत्तान्त है तथा लक्ष्मण, सीता और राक्षसों के जो सम्पूर्ण गुप्त या प्रकट चरित्र हैं, वे सब अज्ञात होने पर भी तुम्हें ज्ञात हो जायँगे।

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॥ १ · २ · ३५ ॥
ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम्

na te vāganṛtā kāvye kācidatra bhaviṣyati ॥
kuru rāmakathāṁ puṇyāṁ ślokabaddhāṁ manoramām ।

इस काव्य में अंकित तुम्हारी कोई भी बात झूठी नहीं होगी; इसलिये तुम श्रीरामचन्द्रजी की परम पवित्र एवं मनोरम कथा को श्लोकबद्ध करके लिखो।

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॥ १ · २ · ३६ ॥
यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति

yāvat sthāsyanti girayaḥ saritaśca mahītale ॥
tāvad rāmāyaṇakathā lokeṣu pracariṣyati ।

इस पृथ्वी पर जब तक नदियों और पर्वतों की सत्ता रहेगी, तब तक संसार में रामायणकथा का प्रचार होता रहेगा।

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॥ १ · २ · ३७ ॥
यावद् रामस्य कथा त्वत्कृता प्रचरिष्यति तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मल्लोकेषु निवत्स्यसि

yāvad rāmasya ca kathā tvatkṛtā pracariṣyati ॥
tāvadūrdhvamadhaśca tvaṁ mallokeṣu nivatsyasi ।

जब तक तुम्हारी बनायी हुई श्रीरामकथा का लोक में प्रचार रहेगा, तब तक तुम इच्छानुसार ऊपर-नीचे तथा मेरे लोकों में निवास करोगे।

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॥ १ · २ · ३८ ॥
इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत ततः सशिष्यो भगवान् मुनिर्विस्मयमाययौ

ityuktvā bhagavān brahmā tatraivāntaradhīyata ।
tataḥ saśiṣyo bhagavān munirvismayamāyayau ॥

ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके वहीं अन्तर्धान होने से शिष्योंसहित भगवान् वाल्मीकि मुनि को बड़ा विस्मय हुआ।

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॥ १ · २ · ३९ ॥
तस्य शिष्यास्ततः सर्वे जगुः श्लोकमिमं पुनः मुहुर्मुहुः प्रीयमाणाः प्राहुश्च भृशविस्मिताः

tasya śiṣyāstataḥ sarve jaguḥ ślokamimaṁ punaḥ ।
muhurmuhuḥ prīyamāṇāḥ prāhuśca bhṛśavismitāḥ ॥

तदनन्तर उनके सभी शिष्य अत्यन्त प्रसन्न होकर बार-बार इस श्लोक का गान करने लगे तथा परम विस्मित हो परस्पर इस प्रकार कहने लगे—

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॥ १ · २ · ४० ॥
समाक्षरैश्चतुर्भिर्यः पादैर्गीतो महर्षिणा सोऽनुव्याहरणाद् भूयः शोकः श्लोकत्वमागतः

samākṣaraiścaturbhiryaḥ pādairgīto maharṣiṇā ।
so'nuvyāharaṇād bhūyaḥ śokaḥ ślokatvamāgataḥ ॥

हमारे गुरुदेव महर्षि ने क्रौञ्च पक्षी के दुःख से दुःखी होकर जिस समान अक्षरोंवाले चार चरणों से युक्त वाक्य का गान किया था, वह था तो उनके हृदय का शोक; किंतु उनकी वाणी द्वारा उच्चरित होकर श्लोकरूप हो गया।

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॥ १ · २ · ४१ ॥
तस्य बुद्धिरियं जाता महर्षेर्भावितात्मनः कृत्स्नं रामायणं काव्यमीदृशैः करवाण्यहम्

tasya buddhiriyaṁ jātā maharṣerbhāvitātmanaḥ ।
kṛtsnaṁ rāmāyaṇaṁ kāvyamīdṛśaiḥ karavāṇyaham ॥

इधर शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि वाल्मीकि के मन में यह विचार हुआ कि मैं ऐसे ही श्लोकों में सम्पूर्ण रामायणकाव्य की रचना करूँ।

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॥ १ · २ · ४२ ॥
उदारवृत्तार्थपदैर्मनोरमैस्तदास्य रामस्य चकार कीर्तिमान् समाक्षरैः श्लोकशतैर्यशस्विनो यशस्करं काव्यमुदारदर्शनः

udāravṛttārthapadairmanoramaistadāsya rāmasya cakāra kīrtimān ।
samākṣaraiḥ ślokaśatairyaśasvino yaśaskaraṁ kāvyamudāradarśanaḥ ॥

यह सोचकर उदार दृष्टिवाले उन यशस्वी महर्षि ने भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के चरित्र को लेकर हजारों श्लोकों से युक्त महाकाव्य की रचना की, जो उनके यश को बढ़ानेवाला है। इसमें श्रीराम के उदार चरित्रों का प्रतिपादन करनेवाले मनोहर पदों का प्रयोग किया गया है।

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॥ १ · २ · ४३ ॥
तदुपगतसमाससंधियोगं सममधुरोपनतार्थवाक्यबद्धम् रघुवरचरितं मुनिप्रणीतं दशशिरसश्च वधं निशामयध्वम्

tadupagatasamāsasaṁdhiyogaṁ samamadhuropanatārthavākyabaddham ।
raghuvaracaritaṁ munipraṇītaṁ daśaśirasaśca vadhaṁ niśāmayadhvam ॥

महर्षि वाल्मीकि के बनाये हुए इस काव्य में तत्पुरुष आदि समासों, दीर्घ-गुण आदि संधियों और प्रकृति-प्रत्यय के सम्बन्ध का यथायोग्य निर्वाह हुआ है। इसकी रचना में समता (पतत्-प्रकर्ष आदि दोषों का अभाव) है, पदों में माधुर्य है और अर्थ में प्रसाद-गुण की अधिकता है। भावुकजनो! इस प्रकार शास्त्रीय पद्धति के अनुकूल बने हुए इस रघुवर-चरित और रावण-वध के प्रसंगों का ध्यान देकर श्रवण करो।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में दूसरा सर्ग पूरा हुआ ॥ २ ॥