वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ६६ · २६ श्लोकाःSarga 66 · 26 ślokas

राजा जनकका विश्वामित्र और राम-लक्ष्मणका सत्कार करके उन्हें अपने यहाँ रखे हुए धनुषका परिचय देना और धनुष चढ़ा देनेपर श्रीरामके साथ उनके ब्याहका निश्चय प्रकट करना

शिव-धनुष का परिचय

“शिव-धनुष का परिचय”
॥ १ · ६६ · ५–१७ ॥

जनको विश्वामित्रं रामं च देवदेवस्य शाङ्करं धनूरत्नं दर्शयन् तस्य पुण्यां कथां वर्णयति।

श्वेत-स्वर्ण वस्त्रों में सजे राजा जनक हाथ बढ़ाकर पहियोंवाली लोह-संदूक में रखे शिव के विशाल धनुष का वृत्तान्त सुना रहे हैं; उनके पास भगवे वस्त्रधारी विश्वामित्र और मुकुट-बंध पहने धनुर्धारी श्रीराम उस देवाधिदेव के धनुष-रत्न को निहार रहे हैं।

Robed in white and gold, King Janaka extends his hand to recount the tale of Shiva's mighty bow resting in its wheeled iron casket; beside him the orange-clad Vishvamitra and the bow-bearing Rama, crowned with a diadem-band, gaze upon the jewel-bow of the God of gods.

॥ १ · ६६ · १ ॥
ततः प्रभाते विमले कृतकर्मा नराधिपः। विश्वामित्रं महात्मानमाजुहाव सराघवम्‌॥

tataḥ prabhāte vimale kṛtakarmā narādhipaḥ।
viśvāmitraṁ mahātmānamājuhāva sarāghavam‌॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६६ · २ ॥
तमर्चयित्वा धर्मात्मा शास्त्रदृष्टेन कर्मणा। राघवौ महात्मानौ तदा वाक्यमुवाच ह॥

tamarcayitvā dharmātmā śāstradṛṣṭena karmaṇā।
rāghavau ca mahātmānau tadā vākyamuvāca ha॥

॥ १–२ ॥

तदनन्तर दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल आनेपर धर्मात्मा राजा जनकने अपना नित्य नियम पूरा करके श्रीराम और लक्ष्मणसहित महात्मा विश्वामित्रजीको बुलाया और शास्त्रीय विधिके अनुसार मुनि तथा उन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंका पूजन करके इस प्रकार कहा-॥ १-२॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · ३ ॥
भगवन्‌ स्वागतं तेऽस्तु किं करोमि तवानघ। भवानाज्ञापयतु मामाज्ञाप्यो भवता ह्यहम्‌॥

bhagavan‌ svāgataṁ te'stu kiṁ karomi tavānagha।
bhavānājñāpayatu māmājñāpyo bhavatā hyaham‌॥

' भगवन्‌! आपका स्वागत है। निष्पाप महर्षे! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; क्योंकि मैं आपका आज्ञापालक हूँ'॥ ३॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · ४ ॥
एवमुक्तः धर्मात्मा जनकेन महात्मना। प्रत्युवाच मुनिश्रेष्ठो वाक्यं वाक्यविशारदः॥

evamuktaḥ sa dharmātmā janakena mahātmanā।
pratyuvāca muniśreṣṭho vākyaṁ vākyaviśāradaḥ॥

महात्मा जनकके ऐसा कहनेपर बोलनेमें कुशल धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रने उनसे यह बात कही ॥ ४॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · ५ ॥
पुत्रौ दशरथस्येमौ क्षत्रियौ लोकविश्रुतौ। द्रष्टुकामौ धनुःश्रेष्ठं यदेतत्त्वयि तिष्ठति॥

putrau daśarathasyemau kṣatriyau lokaviśrutau।
draṣṭukāmau dhanuḥśreṣṭhaṁ yadetattvayi tiṣṭhati॥

“महाराज! राजा दशरथके ये दोनों पुत्र विश्वविख्यात क्षत्रिय वीर हैं और आपके यहाँ जो यह श्रेष्ठ धनुष रखा है, उसे देखनेकी इच्छा रखते हैं॥५॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · ६ ॥
एतद्‌ दर्शय भद्रं ते कृतकामौ नृपात्मजौ। दर्शनादस्य धनुषो यथेष्टं प्रतियास्यतः॥

etad‌ darśaya bhadraṁ te kṛtakāmau nṛpātmajau।
darśanādasya dhanuṣo yatheṣṭaṁ pratiyāsyataḥ॥

“आपका कल्याण हो, वह धनुष इन्हें दिखा दीजिये। इससे इनकी इच्छा पूरी हो जायगी। फिर ये दोनों राजकुमार उस धनुषके दर्शनमात्रसे संतुष्ट हो इच्छानुसार अपनी राजधानीको लौट जायंगे'॥ ६॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · ७ ॥
एवमुक्तस्तु जनकः प्रत्युवाच महामुनिम्‌। श्रूयतामस्य धनुषो यदर्थमिह तिष्ठति॥

evamuktastu janakaḥ pratyuvāca mahāmunim‌।
śrūyatāmasya dhanuṣo yadarthamiha tiṣṭhati॥

मुनिके ऐसा कहनेपर राजा जनक महामुनि विश्वामित्रसे बोले-'मुनिवर! इस धनुषका वृत्तान्त सुनिये। जिस उद्देश्यसे यह धनुष यहाँ रखा गया, वह सब बताता हूँ॥७॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · ८ ॥
देवरात इति ख्यातो निमेर्ज्येष्ठो महीपतिः। न्यासोऽयं तस्य भगवन्‌ हस्ते दत्तो महात्मनः॥

devarāta iti khyāto nimerjyeṣṭho mahīpatiḥ।
nyāso'yaṁ tasya bhagavan‌ haste datto mahātmanaḥ॥

“भगवन्‌! निमिके ज्येष्ठ पुत्र राजा देवरातके नामसे विख्यात थे। उन्हीं महात्माके हाथमें यह धनुष धरोहरके रूपमें दिया गया था॥८॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · ९ ॥
दक्षयज्ञवधे पूर्वं धनुरायम्य वीर्यवान्‌। विध्वंस्य त्रिदशान्‌ रोषात्‌सलीलमिदमब्रवीत्‌॥

dakṣayajñavadhe pūrvaṁ dhanurāyamya vīryavān‌।
vidhvaṁsya tridaśān‌ roṣāt‌salīlamidamabravīt‌॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६६ · १० ॥
यस्माद्‌ भागार्थिनो भागं नाकल्पयत मे सुराः। वरांगानि महार्हाणि धनुषा शातयामि वः॥

yasmād‌ bhāgārthino bhāgaṁ nākalpayata me surāḥ।
varāṁgāni mahārhāṇi dhanuṣā śātayāmi vaḥ॥

॥ ९–१० ॥

“कहते हैं, पूर्वकालमें दक्षयज्ञ-विध्वंसके समय परम पराक्रमी भगवान्‌ शङ्करने खेल-खेलमें ही रोषपूर्वक इस धनुषको उठाकर यज्ञ-विध्वंसके पश्चात्‌ देवताओंसे कहा--' देवगण! मैं यज्ञमें भाग प्राप्त करना चाहता था, किंतु तुमलोगोंने नहीं दिया। इसलिये इस धनुषसे मैं तुम सब लोगोंके परम पूजनीय श्रेष्ठ अंग-मस्तक काट डालूँगा'॥ ९-१०॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · ११ ॥
ततो विमनसः सर्वे देवा वै मुनिपुंगव। प्रसादयन्त देवेशं तेषां प्रीतोऽभवद्‌ भवः॥

tato vimanasaḥ sarve devā vai munipuṁgava।
prasādayanta deveśaṁ teṣāṁ prīto'bhavad‌ bhavaḥ॥

“मुनिश्रेष्ठ! यह सुनकर सम्पूर्ण देवता उदास हो गये और स्तुतिके द्वारा देवाधिदेव महादेवजीको प्रसन्न करने लगे। अन्तमें उनपर भगवान्‌ शिव प्रसन्न हो गये॥ ११॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · १२ ॥
प्रतियुक्तस्तु सर्वेषां ददौ तेषां महात्मनाम्‌। तदेतद्‌ देवदेवस्य धनूरत्नं महात्मनः॥

pratiyuktastu sarveṣāṁ dadau teṣāṁ mahātmanām‌।
tadetad‌ devadevasya dhanūratnaṁ mahātmanaḥ॥

“प्रसन्न होकर उन्होंने उनसब महामनस्वी देवताओंको यह धनुष अर्पण कर दिया। वही यह देवाधिदेव महात्मा भगवान्‌ शङ्करका धनुष-रत्न है, जो मेरे पूर्वज महाराज देवरातके पास धरोहरके रूपमें रखा गया था॥ १२½॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · १३ ॥
न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्वजे विभौ। अथ मे कृषतः क्षेत्रं लांगलादुत्थिता ततः॥

nyāsabhūtaṁ tadā nyastamasmākaṁ pūrvaje vibhau।
atha me kṛṣataḥ kṣetraṁ lāṁgalādutthitā tataḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६६ · १४ ॥
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता। भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा॥

kṣetraṁ śodhayatā labdhā nāmnā sīteti viśrutā।
bhūtalādutthitā sā tu vyavardhata mamātmajā॥

॥ १३–१४ ॥

“एक दिन मैं यज्ञके लिये भूमिशोधन करते समय खेतमें हल चला रहा था। उसी समय हलके अग्रभागसे जोती गयी भूमि (हराई या सीता) से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हलद्वारा खींची गयी रेखा) से उत्पन्न होनेके कारण उसका नाम सीता रखा गया। पृथ्वीसे प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमशः बढ़कर सयानी हुई॥ १३-१४॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · १५ ॥
वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा। भूतलादुत्थिता तां तु वर्धमानां ममात्मजाम्‌॥

vīryaśulketi me kanyā sthāpiteyamayonijā।
bhūtalādutthitā tāṁ tu vardhamānāṁ mamātmajām‌॥

“अपनी इस अयोनिजा कन्याके विषयमें मैंने यह निश्चय किया कि जो अपने पराक्रमसे इस धनुषको चढ़ा देगा, उसीके साथ मैं इसका ब्याह करूँगा। इस तरह इसे वीर्यशुल्का (पराक्रमरूप शुल्कवाली) बनाकर अपने घरमें रख छोड़ा है। मुनिश्रेष्ठ! भूतलसे प्रकट होकर दिनों-दिन बढ़नेवाली मेरी पुत्री सीताको कई राजाओंने यहाँ आकर माँगा॥ १५½ ॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · १६ ॥
वरयामासुरागत्य राजानो मुनिपुंगव। तेषां वरयतां कन्यां सर्वेषां पृथिवीक्षिताम्‌॥

varayāmāsurāgatya rājāno munipuṁgava।
teṣāṁ varayatāṁ kanyāṁ sarveṣāṁ pṛthivīkṣitām‌॥

“परंतु भगवन्‌! कन्याका वरण करनेवाले उन सभी राजाओंको मैंने यह बता दिया कि मेरी कन्या वीर्यशुल्का है। (उचित पराक्रम प्रकट करनेपर ही कोई पुरुष उसके साथ विवाह करनेका अधिकारी हो सकता है।) यही कारण है कि मैंने आजतक किसीको अपनी कन्या नहीं दी॥ १६½॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · १७ ॥
वीर्यशुल्केति भगवन्‌ ददामि सुतामहम्‌। ततः सर्वे नृपतयः समेत्य मुनिपुंगव॥

vīryaśulketi bhagavan‌ na dadāmi sutāmaham‌।
tataḥ sarve nṛpatayaḥ sametya munipuṁgava॥

“मुनिपुंगव! तब सभी राजा मिलकर मिथिलामें आये और पूछने लगे कि राजकुमारी सीताको प्राप्त करनेके लिये कौन-सा पराक्रम निश्चित किया गया है॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · १८ ॥
मिथिलामप्युपागम्य वीर्यं जिज्ञासवस्तदा। तेषां जिज्ञासमानानां शैवं धनुरुपाहृतम्‌॥

mithilāmapyupāgamya vīryaṁ jijñāsavastadā।
teṣāṁ jijñāsamānānāṁ śaivaṁ dhanurupāhṛtam‌॥

“मैंने पराक्रमकी जिज्ञासा करनेवाले उन राजाओंके सामने यह शिवजीका धनुष रख दिया; परंतु वे लोग इसे उठाने या हिलानेमें भी समर्थ न हो सके॥ १८½॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · १९ ॥
शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेऽपि वा। तेषां वीर्यवतां वीर्यमल्पं ज्ञात्वा महामुने॥

na śekurgrahaṇe tasya dhanuṣastolane'pi vā।
teṣāṁ vīryavatāṁ vīryamalpaṁ jñātvā mahāmune॥

“महामुने! उन पराक्रमी नरेशोंकी शक्ति बहुत थोड़ी जानकर मैंने उन्हें कन्या देनेसे इनकार कर दिया। तपोधन! इसके बाद जो घटना घटी, उसे भी आप सुन लीजिये॥ १९½ ॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · २० ॥
प्रत्याख्याता नृपतयस्तन्निबोध तपोधन। ततः परमकोपेन राजानो मुनिपुंगव॥

pratyākhyātā nṛpatayastannibodha tapodhana।
tataḥ paramakopena rājāno munipuṁgava॥

“मुनिप्रवर! मेरे इनकार करनेपर ये सब राजा अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने पराक्रमके विषयमें संशयापन्न हो मिथिलाको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये॥ २०½॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · २१ ॥
अरुन्धन्‌ मिथिलां सर्वे वीर्यसंदेहमागताः। आत्मानमवधूतं मे विज्ञाय नृपपुंगवाः॥

arundhan‌ mithilāṁ sarve vīryasaṁdehamāgatāḥ।
ātmānamavadhūtaṁ me vijñāya nṛpapuṁgavāḥ॥

“मेरे द्वारा अपना तिरस्कार हुआ मानकर उन श्रेष्ठ नरेशोंने अत्यन्त रुष्ट हो मिथिलापुरीको सब ओरसे पीड़ा देना प्रारम्भ कर दिया॥ २१½ ॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · २२ ॥
रोषेण महताविष्टाः पीडयन्‌ मिथिलां पुरीम्‌। ततः संवत्सरे पूर्णे क्षयं यातानि सर्वशः॥

roṣeṇa mahatāviṣṭāḥ pīḍayan‌ mithilāṁ purīm‌।
tataḥ saṁvatsare pūrṇe kṣayaṁ yātāni sarvaśaḥ॥

“मुनिश्रेष्ठ! पूरे एक वर्षतक वे घेरा डाले रहे। इस बीचमें युद्धके सारे साधन क्षीण हो गये। इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ॥ २२½॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · २३ ॥
साधनानि मुनिश्रेष्ठ ततोऽहं भृशदुःखितः। ततो देवगणान्‌ सर्वांस्तपसाहं प्रसादयम्‌॥

sādhanāni muniśreṣṭha tato'haṁ bhṛśaduḥkhitaḥ।
tato devagaṇān‌ sarvāṁstapasāhaṁ prasādayam‌॥

“तब मैंने तपस्याके द्वारा समस्त देवताओंको प्रसन्न करनेकी चेष्टा की। देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे चतुरंगिणी सेना प्रदान की॥ २३½॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · २४ ॥
ददुश्च परमप्रीताश्चतुरंगबलं सुराः। ततो भग्ना नृपतयो हन्यमाना दिशो ययुः॥

daduśca paramaprītāścaturaṁgabalaṁ surāḥ।
tato bhagnā nṛpatayo hanyamānā diśo yayuḥ॥

“फिर तो हमारे सैनिकोंकी मार खाकर वे सभी पापाचारी राजा, जो बलहीन थे अथवा जिनके बलवान्‌ होनेमें संदेह था, मन्त्रियोंसहित भागकर विभिन्न दिशाओंमें चले गये॥ २४½ ॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · २५ ॥
अवीर्या वीर्यसंदिग्धाः सामात्याः पापकारिणः। तदेतन्मुनिशादूल धनुः परमभास्वरम्‌॥

avīryā vīryasaṁdigdhāḥ sāmātyāḥ pāpakāriṇaḥ।
tadetanmuniśādūla dhanuḥ paramabhāsvaram‌॥

“मुनिश्रेष्ठ! यही वह परम प्रकाशमान धनुष है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं उसे श्रीराम और लक्ष्मणको भी दिखाऊँगा॥ २५½ ॥

English translation coming soon.

॥ १ · ६६ · २६ ॥
रामलक्ष्मणयोश्चापि दर्शयिष्यामि सुव्रत। यद्यस्य धनुषो रामः कुर्यादारोपणं मुने। सुतामयोनिजां सीतां दद्यां दाशरथेरहम्‌॥

rāmalakṣmaṇayoścāpi darśayiṣyāmi suvrata।
yadyasya dhanuṣo rāmaḥ kuryādāropaṇaṁ mune।
sutāmayonijāṁ sītāṁ dadyāṁ dāśaratheraham‌॥

“मुने! यदि श्रीराम इस धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ा दें तो मैं अपनी अयोनिजा कन्या सीताको इन दशरथकुमारके हाथमें दे दूँ'॥ २६॥

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥ ६६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छियासठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६६ ॥