राजा जनकका विश्वामित्र और राम-लक्ष्मणका सत्कार करके उन्हें अपने यहाँ रखे हुए धनुषका परिचय देना और धनुष चढ़ा देनेपर श्रीरामके साथ उनके ब्याहका निश्चय प्रकट करना
“शिव-धनुष का परिचय”
॥ १ · ६६ · ५–१७ ॥
जनको विश्वामित्रं रामं च देवदेवस्य शाङ्करं धनूरत्नं दर्शयन् तस्य पुण्यां कथां वर्णयति।
श्वेत-स्वर्ण वस्त्रों में सजे राजा जनक हाथ बढ़ाकर पहियोंवाली लोह-संदूक में रखे शिव के विशाल धनुष का वृत्तान्त सुना रहे हैं; उनके पास भगवे वस्त्रधारी विश्वामित्र और मुकुट-बंध पहने धनुर्धारी श्रीराम उस देवाधिदेव के धनुष-रत्न को निहार रहे हैं।
Robed in white and gold, King Janak extends his hand to recount the tale of Shiva's mighty bow resting in its wheeled iron casket; beside him the orange-clad Vishvamitra and the bow-bearing Ram, crowned with a diadem-band, gaze upon the jewel-bow of the God of gods.
tataḥ prabhāte vimale kṛtakarmā narādhipaḥ।
viśvāmitraṁ mahātmānamājuhāva sarāghavam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
tamarcayitvā dharmātmā śāstradṛṣṭena karmaṇā।
rāghavau ca mahātmānau tadā vākyamuvāca ha॥
तदनन्तर दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल आने पर धर्मात्मा राजा जनक ने अपना नित्य नियम पूरा करके श्रीराम और लक्ष्मणसहित महात्मा विश्वामित्रजी को बुलाया और शास्त्रीय विधि के अनुसार मुनि तथा उन दोनों महामनस्वी राजकुमारों का पूजन करके इस प्रकार कहा-
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bhagavan svāgataṁ te'stu kiṁ karomi tavānagha।
bhavānājñāpayatu māmājñāpyo bhavatā hyaham॥
‘ भगवन्! आपका स्वागत है। निष्पाप महर्षे! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; क्योंकि मैं आपका आज्ञापालक हूँ’
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evamuktaḥ sa dharmātmā janakena mahātmanā।
pratyuvāca muniśreṣṭho vākyaṁ vākyaviśāradaḥ॥
महात्मा जनक के ऐसा कहने पर बोलने में कुशल धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने उनसे यह बात कही
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putrau daśarathasyemau kṣatriyau lokaviśrutau।
draṣṭukāmau dhanuḥśreṣṭhaṁ yadetattvayi tiṣṭhati॥
“महाराज! राजा दशरथ के ये दोनों पुत्र विश्वविख्यात क्षत्रिय वीर हैं और आपके यहाँ जो यह श्रेष्ठ धनुष रखा है, उसे देखने की इच्छा रखते हैं
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etad darśaya bhadraṁ te kṛtakāmau nṛpātmajau।
darśanādasya dhanuṣo yatheṣṭaṁ pratiyāsyataḥ॥
“आपका कल्याण हो, वह धनुष इन्हें दिखा दीजिये। इससे इनकी इच्छा पूरी हो जायगी। फिर ये दोनों राजकुमार उस धनुष के दर्शनमात्र से संतुष्ट हो इच्छानुसार अपनी राजधानी को लौट जायंगे’
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evamuktastu janakaḥ pratyuvāca mahāmunim।
śrūyatāmasya dhanuṣo yadarthamiha tiṣṭhati॥
मुनि के ऐसा कहने पर राजा जनक महामुनि विश्वामित्र से बोले-‘मुनिवर! इस धनुष का वृत्तान्त सुनिये। जिस उद्देश्य से यह धनुष यहाँ रखा गया, वह सब बताता हूँ
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devarāta iti khyāto nimerjyeṣṭho mahīpatiḥ।
nyāso'yaṁ tasya bhagavan haste datto mahātmanaḥ॥
“भगवन्! निमि के ज्येष्ठ पुत्र राजा देवरात के नाम से विख्यात थे। उन्हीं महात्मा के हाथ में यह धनुष धरोहर के रूप में दिया गया था
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dakṣayajñavadhe pūrvaṁ dhanurāyamya vīryavān।
vidhvaṁsya tridaśān roṣātsalīlamidamabravīt॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
yasmād bhāgārthino bhāgaṁ nākalpayata me surāḥ।
varāṁgāni mahārhāṇi dhanuṣā śātayāmi vaḥ॥
“कहते हैं, पूर्वकाल में दक्षयज्ञ-विध्वंस के समय परम पराक्रमी भगवान् शङ्कर ने खेल-खेल में ही रोषपूर्वक इस धनुष को उठाकर यज्ञ-विध्वंस के पश्चात् देवताओं से कहा--’ देवगण! मैं यज्ञ में भाग प्राप्त करना चाहता था, किंतु तुमलोगों ने नहीं दिया। इसलिये इस धनुष से मैं तुम सब लोगों के परम पूजनीय श्रेष्ठ अंग-मस्तक काट डालूँगा’
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tato vimanasaḥ sarve devā vai munipuṁgava।
prasādayanta deveśaṁ teṣāṁ prīto'bhavad bhavaḥ॥
“मुनिश्रेष्ठ! यह सुनकर सम्पूर्ण देवता उदास हो गये और स्तुति के द्वारा देवाधिदेव महादेवजी को प्रसन्न करने लगे। अन्त में उन पर भगवान् शिव प्रसन्न हो गये
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pratiyuktastu sarveṣāṁ dadau teṣāṁ mahātmanām।
tadetad devadevasya dhanūratnaṁ mahātmanaḥ॥
“प्रसन्न होकर उन्होंने उनसब महामनस्वी देवताओं को यह धनुष अर्पण कर दिया। वही यह देवाधिदेव महात्मा भगवान् शङ्कर का धनुष-रत्न है, जो मेरे पूर्वज महाराज देवरात के पास धरोहर के रूप में रखा गया था
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nyāsabhūtaṁ tadā nyastamasmākaṁ pūrvaje vibhau।
atha me kṛṣataḥ kṣetraṁ lāṁgalādutthitā tataḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
kṣetraṁ śodhayatā labdhā nāmnā sīteti viśrutā।
bhūtalādutthitā sā tu vyavardhata mamātmajā॥
“एक दिन मैं यज्ञ के लिये भूमिशोधन करते समय खेत में हल चला रहा था। उसी समय हल के अग्रभाग से जोती गयी भूमि (हराई या सीता) से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हलद्वारा खींची गयी रेखा) से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम सीता रखा गया। पृथ्वी से प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमशः बढ़कर सयानी हुई
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vīryaśulketi me kanyā sthāpiteyamayonijā।
bhūtalādutthitā tāṁ tu vardhamānāṁ mamātmajām॥
“अपनी इस अयोनिजा कन्या के विषय में मैंने यह निश्चय किया कि जो अपने पराक्रम से इस धनुष को चढ़ा देगा, उसीके साथ मैं इसका ब्याह करूँगा। इस तरह इसे वीर्यशुल्का (पराक्रमरूप शुल्कवाली) बनाकर अपने घर में रख छोड़ा है। मुनिश्रेष्ठ! भूतल से प्रकट होकर दिनों-दिन बढ़नेवाली मेरी पुत्री सीता को कई राजाओं ने यहाँ आकर माँगा
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varayāmāsurāgatya rājāno munipuṁgava।
teṣāṁ varayatāṁ kanyāṁ sarveṣāṁ pṛthivīkṣitām॥
“परंतु भगवन्! कन्या का वरण करनेवाले उन सभी राजाओं को मैंने यह बता दिया कि मेरी कन्या वीर्यशुल्का है। (उचित पराक्रम प्रकट करने पर ही कोई पुरुष उसके साथ विवाह करने का अधिकारी हो सकता है।) यही कारण है कि मैंने आजतक किसीको अपनी कन्या नहीं दी
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vīryaśulketi bhagavan na dadāmi sutāmaham।
tataḥ sarve nṛpatayaḥ sametya munipuṁgava॥
“मुनिपुंगव! तब सभी राजा मिलकर मिथिला में आये और पूछने लगे कि राजकुमारी सीता को प्राप्त करने के लिये कौन-सा पराक्रम निश्चित किया गया है॥
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mithilāmapyupāgamya vīryaṁ jijñāsavastadā।
teṣāṁ jijñāsamānānāṁ śaivaṁ dhanurupāhṛtam॥
“मैंने पराक्रम की जिज्ञासा करनेवाले उन राजाओं के सामने यह शिवजी का धनुष रख दिया; परंतु वे लोग इसे उठाने या हिलाने में भी समर्थ न हो सके
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na śekurgrahaṇe tasya dhanuṣastolane'pi vā।
teṣāṁ vīryavatāṁ vīryamalpaṁ jñātvā mahāmune॥
“महामुने! उन पराक्रमी नरेशों की शक्ति बहुत थोड़ी जानकर मैंने उन्हें कन्या देने से इनकार कर दिया। तपोधन! इसके बाद जो घटना घटी, उसे भी आप सुन लीजिये
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pratyākhyātā nṛpatayastannibodha tapodhana।
tataḥ paramakopena rājāno munipuṁgava॥
“मुनिप्रवर! मेरे इनकार करने पर ये सब राजा अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने पराक्रम के विषय में संशयापन्न हो मिथिला को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये
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arundhan mithilāṁ sarve vīryasaṁdehamāgatāḥ।
ātmānamavadhūtaṁ me vijñāya nṛpapuṁgavāḥ॥
“मेरे द्वारा अपना तिरस्कार हुआ मानकर उन श्रेष्ठ नरेशों ने अत्यन्त रुष्ट हो मिथिलापुरी को सब ओर से पीड़ा देना प्रारम्भ कर दिया
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roṣeṇa mahatāviṣṭāḥ pīḍayan mithilāṁ purīm।
tataḥ saṁvatsare pūrṇe kṣayaṁ yātāni sarvaśaḥ॥
“मुनिश्रेष्ठ! पूरे एक वर्षतक वे घेरा डाले रहे। इस बीच में युद्ध के सारे साधन क्षीण हो गये। इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ
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sādhanāni muniśreṣṭha tato'haṁ bhṛśaduḥkhitaḥ।
tato devagaṇān sarvāṁstapasāhaṁ prasādayam॥
“तब मैंने तपस्या के द्वारा समस्त देवताओं को प्रसन्न करने की चेष्टा की। देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे चतुरंगिणी सेना प्रदान की
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daduśca paramaprītāścaturaṁgabalaṁ surāḥ।
tato bhagnā nṛpatayo hanyamānā diśo yayuḥ॥
“फिर तो हमारे सैनिकों की मार खाकर वे सभी पापाचारी राजा, जो बलहीन थे अथवा जिनके बलवान् होने में संदेह था, मन्त्रियोंसहित भागकर विभिन्न दिशाओं में चले गये
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avīryā vīryasaṁdigdhāḥ sāmātyāḥ pāpakāriṇaḥ।
tadetanmuniśārdūla dhanuḥ paramabhāsvaram॥
“मुनिश्रेष्ठ! यही वह परम प्रकाशमान धनुष है। उत्तम व्रत का पालन करनेवाले महर्षे! मैं उसे श्रीराम और लक्ष्मण को भी दिखाऊँगा
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rāmalakṣmaṇayoścāpi darśayiṣyāmi suvrata।
yadyasya dhanuṣo rāmaḥ kuryādāropaṇaṁ mune।
sutāmayonijāṁ sītāṁ dadyāṁ dāśaratheraham॥
“मुने! यदि श्रीराम इस धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ा दें तो मैं अपनी अयोनिजा कन्या सीता को इन दशरथकुमार के हाथ में दे दूँ’
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छियासठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६६ ॥