वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ६५ · ४० श्लोकाःSarga 65 · 40 ślokas

विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना

ब्रह्मर्षित्व-प्राप्ति

“ब्रह्मर्षित्व-प्राप्ति”
॥ १ · ६५ · १९–२६ ॥

घोरतपसा तुष्टाः पितामहप्रमुखाः देवाः कौशिकं ब्रह्मर्षित्वेन वरयन्ति, वसिष्ठश्च 'एवमस्तु' इति सख्यं करोति।

कठोर तप में लीन भगवे वस्त्रधारी विश्वामित्र ध्यानमग्न बैठे हैं और ऊपर तेज से दीप्त पितामह ब्रह्मा उन्हें ब्राह्मणत्व का मुकुट-सा वरदान सौंप रहे हैं; चारों ओर शिव तथा देवगण हाथ जोड़े खड़े हैं और मुनि की उग्र तपस्या से संतुष्ट होकर उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित कर रहे हैं।

Sunk in fierce austerity, the orange-robed Vishvamitra sits in deep meditation while above him the radiant Grandsire Brahma bestows the crown of brahminhood upon him; Shiva and the gathered gods stand around with folded palms, satisfied by his terrible penance and proclaiming him at last a Brahmarshi.

॥ १ · ६५ · १ ॥
अथ हैमवतीं राम दिशं त्यक्त्वा महामुनिः। पूर्वां दिशमनुप्राप्य तपस्तेपे सुदारुणम्‌॥

atha haimavatīṁ rāma diśaṁ tyaktvā mahāmuniḥ।
pūrvāṁ diśamanuprāpya tapastepe sudāruṇam‌॥

(शतानन्दजी कहते हैं--) श्रीराम! पूर्वोक्त प्रतिज्ञा के अनन्तर महामुनि विश्वामित्र उत्तर दिशा को त्यागकर पूर्व दिशा में चले गये और वहीं रहकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥ १॥

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॥ १ · ६५ · २ ॥
मौनं वर्षसहस्रस्य कृत्वा व्रतमनुत्तमम्‌। चकाराप्रतिमं राम तपः परमदुष्करम्‌॥

maunaṁ varṣasahasrasya kṛtvā vratamanuttamam‌।
cakārāpratimaṁ rāma tapaḥ paramaduṣkaram‌॥

रघुनन्दन! एक सहस्र वर्ष तक परम उत्तम मौन-व्रत धारण करके वे परम दुष्कर तपस्या में लगे रहे। उनके उस तप की कहीं तुलना न थी॥ २॥

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॥ १ · ६५ · ३ ॥
पूर्णे वर्षसहस्रे तु काष्ठभूतं महामुनिम्‌। विघ्नैर्बहुभिराधूतं क्रोधो नान्तरमाविशत्‌॥

pūrṇe varṣasahasre tu kāṣṭhabhūtaṁ mahāmunim‌।
vighnairbahubhirādhūtaṁ krodho nāntaramāviśat‌॥

एक हजार वर्ष पूर्ण होने तक वे महामुनि काष्ठ की भाँति निश्चेष्ट बने रहे। बीच-बीच में उनपर बहुत-से विघ्नों का आक्रमण हुआ, परंतु क्रोध उनके भीतर नहीं घुसने पाया॥ ३॥

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॥ १ · ६५ · ४ ॥
कृत्वा निश्चयं राम तप आतिष्ठताव्ययम्‌। तस्य वर्षसहस्रस्य व्रते पूर्णे महाव्रतः॥

sa kṛtvā niścayaṁ rāma tapa ātiṣṭhatāvyayam‌।
tasya varṣasahasrasya vrate pūrṇe mahāvrataḥ॥

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॥ १ · ६५ · ५ ॥
भोक्तुमारब्धवानन्नं तस्मिन्‌ काले रघूत्तम। इन्द्रो द्विजातिर्भूत्वा तं सिद्धमन्नमयाचत॥

bhoktumārabdhavānannaṁ tasmin‌ kāle raghūttama।
indro dvijātirbhūtvā taṁ siddhamannamayācata॥

॥ ४–५ ॥

श्रीराम! अपने निश्चय पर अटल रहकर उन्होंने अक्षय तप का अनुष्ठान किया। उनका एक सहस्र वर्षों का व्रत पूर्ण होने पर वे महान्‌ व्रतधारी महर्षि व्रत समाप्त करके अन्न ग्रहण करने को उद्यत हुए। रघुकुलभूषण! इसी समय इन्द्र ने ब्राह्मण के वेष में आकर उनसे तैयार अन्न की याचना की॥ ४-५॥

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॥ १ · ६५ · ६ ॥
तस्मै दत्त्वा तदा सिद्धं सर्वं विप्राय निश्चितः। निःशेषितेऽन्ने भगवानभुक्त्वैव महातपाः॥

tasmai dattvā tadā siddhaṁ sarvaṁ viprāya niścitaḥ।
niḥśeṣite'nne bhagavānabhuktvaiva mahātapāḥ॥

तब उन्होंने वह सारा तैयार किया हुआ भोजन उस ब्राह्मण को देने का निश्चय करके दे डाला। उस अन्न में से कुछ भी शेष नहीं बचा। इसलिये वे महातपस्वी भगवान्‌ विश्वामित्र बिना खाये-पीये ही रह गये॥ ६॥

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॥ १ · ६५ · ७ ॥
किंचिदवदद्‌ विप्रं मौनव्रतमुपास्थितः। तथैवासीत्‌ पुनर्मौनमनुच्छ्वासं चकार ह॥

na kiṁcidavadad‌ vipraṁ maunavratamupāsthitaḥ।
tathaivāsīt‌ punarmaunamanucchvāsaṁ cakāra ha॥

फिर भी उन्होंने उस ब्राह्मण से कुछ कहा नहीं। अपने मौन-व्रत का यथार्थरूप से पालन किया। इसके बाद पुनः पहले की ही भाँति श्वासोच्छ्वास से रहित मौन-व्रत का अनुष्ठान आरम्भ किया॥ ७॥

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॥ १ · ६५ · ८ ॥
अथ वर्षसहस्रं नोच्छ्वसन्‌ मुनिपुंगवः। तस्यानुच्छ्वसमानस्य मूर्ध्नि धूमो व्यजायत॥

atha varṣasahasraṁ ca nocchvasan‌ munipuṁgavaḥ।
tasyānucchvasamānasya mūrdhni dhūmo vyajāyata॥

पूरे एक हजार वर्ष तक उन मुनिश्रेष्ठ ने साँस तक नहीं ली। इस तरह साँस न लेने के कारण उनके मस्तक से धुआँ उठने लगा॥ ८॥

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॥ १ · ६५ · ९ ॥
त्रैलोक्यं येन सम्भ्रान्तमातापितमिवाभवत्‌। ततो देवर्षिगन्धर्वाः पन्नगोरगराक्षसाः॥

trailokyaṁ yena sambhrāntamātāpitamivābhavat‌।
tato devarṣigandharvāḥ pannagoragarākṣasāḥ॥

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॥ १ · ६५ · १० ॥
मोहितास्तपसा तस्य तेजसा मन्दरश्मयः। कश्मलोपहताः सर्वे पितामहमथाब्रुवन्‌॥

mohitāstapasā tasya tejasā mandaraśmayaḥ।
kaśmalopahatāḥ sarve pitāmahamathābruvan‌॥

॥ ९–१० ॥

उससे तीनों लोकों के प्राणी घबरा उठे, सभी संतप्त-से होने लगे। उस समय देवता, ऋषि, गन्धर्व, नाग, सर्प और राक्षस सब मुनि की तपस्या से मोहित हो गये। उनके तेज से सबकी कान्ति फीकी पड़ गयी। वे सब-के-सब दुःख से व्याकुल हो पितामह ब्रह्माजी से बोले-॥ ९-१०॥

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॥ १ · ६५ · ११ ॥
बहुभिः कारणैर्देव विश्वामित्रो महामुनिः। लोभितः क्रोधितश्चैव तपसा चाभिवर्धते॥

bahubhiḥ kāraṇairdeva viśvāmitro mahāmuniḥ।
lobhitaḥ krodhitaścaiva tapasā cābhivardhate॥

'देव! अनेक प्रकार के निमित्तों द्वारा महामुनि विश्वामित्र को लोभ और क्रोध दिलाने की चेष्टा की गयी; किंतु वे अपनी तपस्या के प्रभाव से निरन्तर आगे बढ़ते जा रहे हैं॥ ११॥

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॥ १ · ६५ · १२ ॥
नह्यस्य वृजिनं किंचिद्‌ दृश्यते सूक्ष्ममप्युत। दीयते यदि त्वस्य मनसा यदभीप्सितम्‌॥

nahyasya vṛjinaṁ kiṁcid‌ dṛśyate sūkṣmamapyuta।
na dīyate yadi tvasya manasā yadabhīpsitam‌॥

'हमें उनमें कोई छोटा-सा भी दोष नहीं दिखायी देता। यदि इन्हें इनकी मनचाही वस्तु नहीं दी गयी तो

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॥ १ · ६५ · १३ ॥
विनाशयति त्रैलोक्यं तपसा सचराचरम्‌। व्याकुलाश्च दिशः सर्वा किंचित्‌ प्रकाशते॥

vināśayati trailokyaṁ tapasā sacarācaram‌।
vyākulāśca diśaḥ sarvā na ca kiṁcit‌ prakāśate॥

ये अपनी तपस्या से चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकों का नाश कर डालेंगे। इस समय सारी दिशाएँ धूम से आच्छादित हो गयी हैं, कहीं कुछ भी सूझता नहीं है॥ १३॥

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॥ १ · ६५ · १४ ॥
सागराः क्षुभिताः सर्वे विशीर्यन्ते पर्वताः। प्रकम्पते वसुधा वायुर्वातीह संकुलः॥

sāgarāḥ kṣubhitāḥ sarve viśīryante ca parvatāḥ।
prakampate ca vasudhā vāyurvātīha saṁkulaḥ॥

'समुद्र क्षुब्ध हो उठे हैं, सारे पर्वत विदीर्ण हुए जाते हैं, धरती डगमग हो रही है और प्रचण्ड आँधी चलने लगी है॥ १४॥

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॥ १ · ६५ · १५ ॥
ब्रह्मन्‌ प्रतिजानीमो नास्तिको जायते जनः। सम्मूढमिव त्रैलोक्यं सम्प्रक्षुभितमानसम्‌॥

brahman‌ na pratijānīmo nāstiko jāyate janaḥ।
sammūḍhamiva trailokyaṁ samprakṣubhitamānasam‌॥

'ब्रह्मन्‌! हमें इस उपद्रव के निवारण का कोई उपाय नहीं समझ में आता है। सब लोग नास्तिक की भाँति कर्मानुष्ठान से शून्य हो रहे हैं। तीनों लोकों के प्राणियों का मन क्षुब्ध हो गया है। सभी किंकर्तव्यविमूढ़-से हो रहे हैं॥ १५॥

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॥ १ · ६५ · १६ ॥
भास्करो निष्प्रभश्चैव महर्षेस्तस्य तेजसा। बुद्धिं कुरुते यावन्नाशे देव महामुनिः॥ तावत्‌ प्रसादो भगवन्नग्निरूपो महाद्युतिः।

bhāskaro niṣprabhaścaiva maharṣestasya tejasā।
buddhiṁ na kurute yāvannāśe deva mahāmuniḥ॥
tāvat‌ prasādo bhagavannagnirūpo mahādyutiḥ।

'महर्षि विश्वामित्र के तेज से सूर्य की प्रभा फीकी पड़ गयी है। भगवन्‌! ये महाकान्तिमान्‌ मुनि अग्निस्वरूप हो रहे हैं। देव! महामुनि विश्वामित्र जबतक जगत्के विनाश का विचार नहीं करते तबतक ही इन्हें प्रसन्न कर लेना चाहिये॥ १६½॥

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॥ १ · ६५ · १७ ॥
कालाग्निना यथा पूर्वं त्रैलोक्यं दह्यतेऽखिलम्‌॥ देवराज्यं चिकीर्षेत दीयतामस्य यन्मनः।

kālāgninā yathā pūrvaṁ trailokyaṁ dahyate'khilam‌॥
devarājyaṁ cikīrṣeta dīyatāmasya yanmanaḥ।

'जैसे पूर्वकाल में प्रलयकालिक अग्नि ने सम्पूर्ण त्रिलोकी को दग्ध कर डाला था, उसी प्रकार ये भी सबको जलाकर भस्म कर देंगे। यदि ये देवताओं का राज्य प्राप्त करना चाहें तो वह भी इन्हें दे दिया जाय। इनके मन में जो भी अभिलाषा हो, उसे पूर्ण किया जाय'॥ १७॥

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॥ १ · ६५ · १८ ॥
ततः सुरगणाः सर्वे पितामहपुरोगमाः॥ विश्वामित्रं महात्मानं वाक्यं मधुरमब्रुवन्‌।

tataḥ suragaṇāḥ sarve pitāmahapurogamāḥ॥
viśvāmitraṁ mahātmānaṁ vākyaṁ madhuramabruvan‌।

तदनन्तर ब्रह्मा आदि सब देवता महात्मा विश्वामित्र के पास जाकर मधुर वाणी में बोले-॥ १८½॥

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॥ १ · ६५ · १९ ॥
ब्रह्मर्षे स्वागतं तेऽस्तु तपसा स्म सुतोषिताः॥ ब्राह्मण्यं तपसोग्रेण प्रासवानसि कौशिक।

brahmarṣe svāgataṁ te'stu tapasā sma sutoṣitāḥ॥
brāhmaṇyaṁ tapasogreṇa prāsavānasi kauśika।

'ब्रह्मर्षे! तुम्हारा स्वागत है, हम तुम्हारी तपस्या से बहुत संतुष्ट हुए हैं। कुशिकनन्दन! तुमने अपनी उग्र तपस्या से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया॥ १९½॥

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॥ १ · ६५ · २० ॥
दीर्घमायुश्च ते ब्रह्मन्‌ ददामि समरुद्गणः॥ स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गच्छ सौम्य यथासुखम्‌।

dīrghamāyuśca te brahman‌ dadāmi samarudgaṇaḥ॥
svasti prāpnuhi bhadraṁ te gaccha saumya yathāsukham‌।

'ब्रह्मन्‌! मरुद्गणोंसहित मैं तुम्हें दीर्घायु प्रदान करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। सौम्य! तुम मंगल के भागी बनो और तुम्हारी जहाँ इच्छा हो वहाँ सुखपूर्वक जाओ'॥ २०½॥

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॥ १ · ६५ · २१ ॥
पितामहवचः श्रुत्वा सर्वेषां त्रिदिवौकसाम्‌॥ कृत्वा प्रणामं मुदितो व्याजहार महामुनिः।

pitāmahavacaḥ śrutvā sarveṣāṁ tridivaukasām‌॥
kṛtvā praṇāmaṁ mudito vyājahāra mahāmuniḥ।

पितामह ब्रह्माजी की यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र ने अत्यन्त प्रसन्न होकर सम्पूर्ण देवताओं को प्रणाम किया और कहा-॥ २१½॥

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॥ १ · ६५ · २२ ॥
ब्राह्मण्यं यदि मे प्राप्तं दीर्घमायुस्तथैव च॥

brāhmaṇyaṁ yadi me prāptaṁ dīrghamāyustathaiva ca॥

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॥ १ · ६५ · २३ ॥
ॐकारोऽथ वषट्कारो वेदाश्च वरयन्तु माम्‌। क्षत्रवेदविदां श्रेष्ठो ब्रह्मवेदविदामपि॥

oṁkāro'tha vaṣaṭkāro vedāśca varayantu mām‌।
kṣatravedavidāṁ śreṣṭho brahmavedavidāmapi॥

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॥ १ · ६५ · २४ ॥
ब्रह्मपुत्रो वसिष्ठो मामेवं वदतु देवताः। यद्येवं परमः कामः कृतो यान्तु सुरर्षभाः॥

brahmaputro vasiṣṭho māmevaṁ vadatu devatāḥ।
yadyevaṁ paramaḥ kāmaḥ kṛto yāntu surarṣabhāḥ॥

॥ २२–२४ ॥

'देवगण! यदि मुझे (आपकी कृपा से) ब्राह्मणत्व मिल गया और दीर्घ आयु की भी प्राप्ति हो गयी तो ॐकार, वषट्कार और चारों वेद स्वयं आकर मेरा वरण करें। इसके सिवा जो क्षत्रिय-वेद (धनुर्वेद आदि) तथा ब्रह्मवेद (ऋक्‌ आदि चारों वेद) के ज्ञाताओं में भी सबसे श्रेष्ठ हैं, वे ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ स्वयं आकर मुझ से ऐसा कहें (कि तुम ब्राह्मण हो गये), यदि ऐसा हो जाय तो मैं समझूँगा कि मेरा उत्तम मनोरथ पूर्ण हो गया। उस अवस्था में आप सभी श्रेष्ठ देवगण यहाँ से जा सकते हैं'॥ २२--२४॥

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॥ १ · ६५ · २५ ॥
ततः प्रसादितो देवैर्वसिष्ठो जपतां वरः। सख्यं चकार ब्रह्मर्षिरेवमस्त्विति चाब्रवीत्‌॥

tataḥ prasādito devairvasiṣṭho japatāṁ varaḥ।
sakhyaṁ cakāra brahmarṣirevamastviti cābravīt‌॥

तब देवताओं ने मन्त्रजप करनेवालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनि को प्रसन्न किया। इसके बाद ब्रह्मर्षि वसिष्ठ ने 'एवमस्तु' कहकर विश्वामित्र का ब्रह्मर्षि होना स्वीकार कर लिया और उनके साथ मित्रता स्थापित कर ली॥ २५॥

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॥ १ · ६५ · २६ ॥
ब्रह्मर्षित्वं संदेहः सर्वं सम्पद्यते तव। इत्युक्त्वा देवताश्चापि सर्वा जग्मुर्यथागतम्‌॥

brahmarṣitvaṁ na saṁdehaḥ sarvaṁ sampadyate tava।
ityuktvā devatāścāpi sarvā jagmuryathāgatam‌॥

'मुने! तुम ब्रह्मर्षि हो गये, इसमें संदेह नहीं है। तुम्हारा सब ब्राह्मणोचित संस्कार सम्पन्न हो गया।' ऐसा कहकर सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे वैसे लौट गये॥ २६॥

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॥ १ · ६५ · २७ ॥
विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा लब्ध्वा ब्राह्मण्यमुत्तमम्‌। पूजयामास ब्रह्मर्षिं वसिष्ठं जपतां वरम्‌॥

viśvāmitro'pi dharmātmā labdhvā brāhmaṇyamuttamam‌।
pūjayāmāsa brahmarṣiṁ vasiṣṭhaṁ japatāṁ varam‌॥

इस प्रकार उत्तम ब्राह्मणत्व प्राप्त करके धर्मात्मा विश्वामित्रजी ने भी मन्त्र-जप करनेवालों में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ का पूजन किया॥ २७॥

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॥ १ · ६५ · २८ ॥
कृतकामो महाँ सर्वां चचार तपसि स्थितः। एवं त्वनेन ब्राह्मण्यं प्राप्तं राम महात्मना॥

kṛtakāmo mahām̐ sarvāṁ cacāra tapasi sthitaḥ।
evaṁ tvanena brāhmaṇyaṁ prāptaṁ rāma mahātmanā॥

इस तरह अपना मनोरथ सफल करके तपस्या में लगे रहकर ही ये सम्पूर्ण पृथ्वी पर विचरने लगे। श्रीराम! इस प्रकार कठोर तपस्या करके इन महात्मा ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया॥ २८॥

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॥ १ · ६५ · २९ ॥
एष राम मुनिश्रेष्ठ एष विग्रहवांस्तपः। एष धर्मः परो नित्यं वीर्यस्यैष परायणम्‌॥

eṣa rāma muniśreṣṭha eṣa vigrahavāṁstapaḥ।
eṣa dharmaḥ paro nityaṁ vīryasyaiṣa parāyaṇam‌॥

रघुनन्दन! ये विश्वामित्रजी समस्त मुनियों में श्रेष्ठ हैं, ये तपस्या के मूर्तिमान्‌ स्वरूप हैं, उत्तम धर्म के साक्षात्‌ विग्रह हैं और पराक्रम की परम निधि हैं॥ २९॥

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॥ १ · ६५ · ३० ॥
एवमुक्त्वा महातेजा विरराम द्विजोत्तमः। शतानन्दवचः श्रुत्वा रामलक्ष्मणसंनिधौ॥ जनकः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच कुशिकात्मजम्‌।

evamuktvā mahātejā virarāma dvijottamaḥ।
śatānandavacaḥ śrutvā rāmalakṣmaṇasaṁnidhau॥
janakaḥ prāñjalirvākyamuvāca kuśikātmajam‌।

ऐसा कहकर महातेजस्वी विप्रवर शतानन्दजी चुप हो गये। शतानन्दजी के मुख से यह कथा सुनकर महाराज जनक ने श्रीराम और लक्ष्मण के समीप विश्वामित्रजी से हाथ जोड़कर कहा-॥ ३०½॥

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॥ १ · ६५ · ३१ ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगव॥

dhanyo'smyanugṛhīto'smi yasya me munipuṁgava॥

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॥ १ · ६५ · ३२ ॥
यज्ञं काकुत्स्थसहितः प्रासवानसि कौशिक। पावितोऽहं त्वया ब्रह्मन्‌ दर्शनेन महामुने॥

yajñaṁ kākutsthasahitaḥ prāsavānasi kauśika।
pāvito'haṁ tvayā brahman‌ darśanena mahāmune॥

॥ ३१–३२ ॥

'मुनिप्रवर कौशिक! आप ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण के साथ मेरे यज्ञ में पधारे, इससे मैं धन्य हो गया। आपने मुझपर बड़ी कृपा की। महामुने! ब्रह्मन्‌! आपने दर्शन देकर मुझे पवित्र कर दिया॥ ३१-३२॥

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॥ १ · ६५ · ३३ ॥
गुणा बहुविधाः प्रासास्तव संदर्शनान्मया। विस्तरेण वै ब्रह्मन्‌ कीर्त्यमानं महत्तपः॥

guṇā bahuvidhāḥ prāsāstava saṁdarśanānmayā।
vistareṇa ca vai brahman‌ kīrtyamānaṁ mahattapaḥ॥

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॥ १ · ६५ · ३४ ॥
श्रुतं मया महातेजो रामेण महात्मना। सदस्यैः प्राप्य सदः श्रुतास्ते बहवो गुणाः॥

śrutaṁ mayā mahātejo rāmeṇa ca mahātmanā।
sadasyaiḥ prāpya ca sadaḥ śrutāste bahavo guṇāḥ॥

॥ ३३–३४ ॥

'आप के दर्शन से मुझे बड़ा लाभ हुआ, अनेक प्रकार के गुण उपलब्ध हुए। ब्रह्मन्‌! आज इस सभा में आकर मैंने महात्मा राम तथा अन्य सदस्यों के साथ आपके महान्‌ तेज (प्रभाव) का वर्णन सुना है, बहुत-से गुण सुने हैं। ब्रह्मन्‌! शतानन्दजी ने आपके महान्‌ तप का वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है॥ ३३-३४॥

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॥ १ · ६५ · ३५ ॥
अप्रमेयं तपस्तुभ्यमप्रमेयं ते बलम्‌। अप्रमेया गुणाश्चैव नित्यं ते कुशिकात्मज॥

aprameyaṁ tapastubhyamaprameyaṁ ca te balam‌।
aprameyā guṇāścaiva nityaṁ te kuśikātmaja॥

'कुशिकनन्दन! आपकी तपस्या अप्रमेय है, आपका बल अनन्त है तथा आपके गुण भी सदा ही माप और संख्या से परे हैं॥ ३५॥

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॥ १ · ६५ · ३६ ॥
तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे विभो। कर्मकालो मुनिश्रेष्ठ लम्बते रविमण्डलम्‌॥

tṛptirāścaryabhūtānāṁ kathānāṁ nāsti me vibho।
karmakālo muniśreṣṭha lambate ravimaṇḍalam‌॥

'प्रभो! आपकी आश्चर्यमयी कथाओं के श्रवण से मुझे तृप्ति नहीं होती है; किंतु मुनिश्रेष्ठ! यज्ञ का समय हो गया है, सूर्यदेव ढलने लगे हैं॥ ३६॥

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॥ १ · ६५ · ३७ ॥
श्वः प्रभाते महातेजो द्रष्टुमर्हसि मां पुनः। स्वागतं जपतां श्रेष्ठ मामनुज्ञातुमर्हसि॥

śvaḥ prabhāte mahātejo draṣṭumarhasi māṁ punaḥ।
svāgataṁ japatāṁ śreṣṭha māmanujñātumarhasi॥

'जप करनेवालों में श्रेष्ठ महातेजस्वी मुने! आपका स्वागत है। कल प्रातःकाल फिर मुझे दर्शन दें, इस समय मुझे जाने की आज्ञा प्रदान करें'॥ ३७॥

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॥ १ · ६५ · ३८ ॥
एवमुक्तो मुनिवरः प्रशस्य पुरुषर्षभम्‌। विससर्जाशु जनकं प्रीतं प्रीतमनास्तदा॥

evamukto munivaraḥ praśasya puruṣarṣabham‌।
visasarjāśu janakaṁ prītaṁ prītamanāstadā॥

राजा के ऐसा कहने पर मुनिवर विश्वामित्रजी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रीतियुक्त नरश्रेष्ठ राजा जनक की प्रशंसा करके शीघ्र ही उन्हें विदा कर दिया॥ ३८॥

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॥ १ · ६५ · ३९ ॥
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं वैदेहो मिथिलाधिपः। प्रदक्षिणं चकाराशु सोपाध्यायः सबान्धवः॥

evamuktvā muniśreṣṭhaṁ vaideho mithilādhipaḥ।
pradakṣiṇaṁ cakārāśu sopādhyāyaḥ sabāndhavaḥ॥

उस समय मिथिलापति विदेहराज जनक ने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र से पूर्वोक्त बात कहकर अपने उपाध्याय और बन्धु-बान्धवों के साथ उनकी शीघ्र ही परिक्रमा की। फिर वहाँ से वे चल दिये॥ ३९॥

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॥ १ · ६५ · ४० ॥
विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा सहरामः सलक्ष्मणः। स्ववासमभिचक्राम पूज्यमानो महात्मभिः॥

viśvāmitro'pi dharmātmā saharāmaḥ salakṣmaṇaḥ।
svavāsamabhicakrāma pūjyamāno mahātmabhiḥ॥

तत्पश्चात्‌ धर्मात्मा विश्वामित्र भी महात्माओं से पूजित होकर श्रीराम और लक्ष्मण के साथ अपने विश्राम-स्थान पर लौट आये॥ ४०॥

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥ ६५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६५ ॥