वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ६४ · २० श्लोकाःSarga 64 · 20 ślokas

विश्वामित्रका रम्भाको शाप देकर पुनः घोर तपस्याके लिये दीक्षा लेना

रम्भा-शाप

“रम्भा-शाप”
॥ १ · ६४ · ११–१५ ॥

इन्द्रप्रेषितां तपोविघ्नकारिणीं रम्भां ज्ञात्वा क्रुद्धः विश्वामित्रः हस्तमुद्यम्य 'दशसहस्रवर्षाणि शिला भव' इति शपति; सा तत्क्षणादेव पाषाणप्रतिमां गच्छन्ती दृश्यते।

इन्द्र की भेजी, तपस्या में विघ्न डालने आयी रम्भा को पहचानकर क्रोध से भरे विश्वामित्र हाथ उठाकर शाप दे रहे हैं — 'दस हजार वर्ष तक पत्थर की प्रतिमा बनकर खड़ी रह!' और वह अप्सरा वहीं तत्काल शिला में बदलती हुई दिखायी देती है।

Recognizing Rambha, sent by Indra to wreck his penance, the wrathful Vishvamitra raises his hand and curses her — for ten thousand years stand here as a stone image — and the apsara is seen turning to rock on the spot.

॥ १ · ६४ · १ ॥
सुरकार्यमिदं रम्भे कर्तव्यं सुमहत्‌ त्वया। लोभनं कौशिकस्येह काममोहसमन्वितम्‌॥

surakāryamidaṁ rambhe kartavyaṁ sumahat‌ tvayā।
lobhanaṁ kauśikasyeha kāmamohasamanvitam‌॥

(इन्द्र बोले—) रम्भे! देवताओं का एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है। इसे तुम्हें ही पूरा करना है। तू महर्षि विश्वामित्र को इस प्रकार लुभा, जिससे वे काम और मोह के वशीभूत हो जायँ॥ १॥

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॥ १ · ६४ · २ ॥
तथोक्ता साप्सरा राम सहस्राक्षेण धीमता। ब्रीडिता प्राञ्जलिर्वाक्यं प्रत्युवाच सुरेश्वरम्‌॥

tathoktā sāpsarā rāma sahasrākṣeṇa dhīmatā।
brīḍitā prāñjalirvākyaṁ pratyuvāca sureśvaram‌॥

श्रीराम! बुद्धिमान्‌ इन्द्र के ऐसा कहने पर वह अप्सरा लज्जित हो हाथ जोड़कर देवेश्वर इन्द्र से बोली-॥ २॥

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॥ १ · ६४ · ३ ॥
अयं सुरपते घोरो विश्वामित्रो महामुनिः। क्रोधमुत्स्रक्ष्यते घोरं मयि देव संशयः॥

ayaṁ surapate ghoro viśvāmitro mahāmuniḥ।
krodhamutsrakṣyate ghoraṁ mayi deva na saṁśayaḥ॥

'सुरपते! ये महामुनि विश्वामित्र बड़े भयंकर हैं। देव! इसमें संदेह नहीं कि ये मुझपर भयानक क्रोध का प्रयोग करेंगे॥ ३॥

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॥ १ · ६४ · ४ ॥
ततो हि मे भयं देव प्रसादं कर्तुमर्हसि। एवमुक्तस्तया राम सभयं भीतया तदा॥

tato hi me bhayaṁ deva prasādaṁ kartumarhasi।
evamuktastayā rāma sabhayaṁ bhītayā tadā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६४ · ५ ॥
मा भैषी रम्भे भद्रं ते कुरुष्व मम शासनम्‌॥

mā bhaiṣī rambhe bhadraṁ te kuruṣva mama śāsanam‌॥

॥ ४–५ ॥

'अतः देवेश्वर! मुझे उनसे बड़ा डर लगता है, आप मुझपर कृपा करें।' श्रीराम! डरी हुई रम्भा के इस प्रकार भयपूर्वक कहने पर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हाथ जोड़कर खड़ी और थर-थर काँपती हुई रम्भा से इस प्रकार बोले-'रम्भे! तू भय न कर, तेरा भला हो, तू मेरी आज्ञा मान ले॥ ४-५॥

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॥ १ · ६४ · ६ ॥
कोकिलो हृदयग्राही माधवे रुचिरद्रुमे। अहं कन्दर्पसहितः स्थास्यामि तव पार्श्वतः॥

kokilo hṛdayagrāhī mādhave ruciradrume।
ahaṁ kandarpasahitaḥ sthāsyāmi tava pārśvataḥ॥

'वैशाख मास में जब कि प्रत्येक वृक्ष नवपल्लवों से परम सुन्दर शोभा धारण कर लेता है, अपनी मधुर काकली से सबके हृदय को खींचनेवाले कोकिल और कामदेव के साथ मैं भी तेरे पास रहूँगा॥ ६॥

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॥ १ · ६४ · ७ ॥
त्वं हि रूपं बहुगुणं कृत्वा परमभास्वरम्‌। तमृषिं कौशिकं भद्रे भेदयस्व तपस्विनम्‌॥

tvaṁ hi rūpaṁ bahuguṇaṁ kṛtvā paramabhāsvaram‌।
tamṛṣiṁ kauśikaṁ bhadre bhedayasva tapasvinam‌॥

'भद्रे! तू अपने परम कान्तिमान्‌ रूप को हावभाव आदि विविध गुणों से सम्पन्न करके उसके द्वारा विश्वामित्र मुनि को तपस्या से विचलित कर दे'॥ ७॥

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॥ १ · ६४ · ८ ॥
सा श्रुत्वा वचनं तस्य कृत्वा रूपमनुत्तमम्‌। लोभयामास ललिता विश्वामित्रं शुचिस्मिता॥

sā śrutvā vacanaṁ tasya kṛtvā rūpamanuttamam‌।
lobhayāmāsa lalitā viśvāmitraṁ śucismitā॥

देवराज का यह वचन सुनकर उस मधुर मुसकानवाली सुन्दरी अप्सरा ने परम उत्तम रूप बनाकर विश्वामित्र को लुभाना आरम्भ किया॥ ८॥

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॥ १ · ६४ · ९ ॥
कोकिलस्य तु शुश्राव वल्गु व्याहरतः स्वनम्‌। सम्प्रहृष्टेन मनसा चैनामन्ववैक्षत॥

kokilasya tu śuśrāva valgu vyāharataḥ svanam‌।
samprahṛṣṭena manasā sa caināmanvavaikṣata॥

विश्वामित्र ने मीठी बोली बोलनेवाले कोकिल की मधुर काकली सुनी। उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर जब उस ओर दृष्टिपात किया, तब सामने रम्भा खड़ी दिखायी दी॥ ९॥

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॥ १ · ६४ · १० ॥
अथ तस्य शब्देन गीतेनाप्रतिमेन च। दर्शनेन रम्भाया मुनिः संदेहमागतः॥

atha tasya ca śabdena gītenāpratimena ca।
darśanena ca rambhāyā muniḥ saṁdehamāgataḥ॥

कोकिल के कलरव, रम्भा के अनुपम गीत और अप्रत्याशित दर्शन से मुनि के मन में संदेह हो गया॥ १०॥

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॥ १ · ६४ · ११ ॥
सहस्राक्षस्य तत्सर्वं विज्ञाय मुनिपुंगवः। रम्भां क्रोधसमाविष्टः शशाप कुशिकात्मजः॥

sahasrākṣasya tatsarvaṁ vijñāya munipuṁgavaḥ।
rambhāṁ krodhasamāviṣṭaḥ śaśāpa kuśikātmajaḥ॥

देवराज का वह सारा कुचक्र उनकी समझ में आ गया। फिर तो मुनिवर विश्वामित्र ने क्रोध में भरकर रम्भा को शाप देते हुए कहा--॥ ११॥

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॥ १ · ६४ · १२ ॥
यन्मां लोभयसे रम्भे कामक्रोधजयैषिणम्‌। दशवर्षसहस्राणि शैली स्थास्यसि दुर्भगे॥

yanmāṁ lobhayase rambhe kāmakrodhajayaiṣiṇam‌।
daśavarṣasahasrāṇi śailī sthāsyasi durbhage॥

'दुर्भगे रम्भे! मैं काम और क्रोध पर विजय पाना चाहता हूँ और तू आकर मुझे लुभाती है। अतः इस अपराध के कारण तू दस हजार वर्षों तक पत्थर की प्रतिमा बनकर खड़ी रहेगी॥ १२॥

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॥ १ · ६४ · १३ ॥
ब्राह्मणः सुमहातेजास्तपोबलसमन्वितः। उद्धरिष्यति रम्भे त्वां मत्क्रोधकलुषीकृताम्‌॥

brāhmaṇaḥ sumahātejāstapobalasamanvitaḥ।
uddhariṣyati rambhe tvāṁ matkrodhakaluṣīkṛtām‌॥

'रम्भे! शाप का समय पूरा हो जाने के बाद एक महान्‌ तेजस्वी और तपोबलसम्पन्न ब्राह्मण (ब्रह्माजी के पुत्र वसिष्ठ) मेरे क्रोध से कलुषित तेरा उद्धार करेंगे'॥ १३॥

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॥ १ · ६४ · १४ ॥
एवमुक्त्वा महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः। अशक्नुवन्‌ धारयितुं कोपं संतापमात्मनः॥

evamuktvā mahātejā viśvāmitro mahāmuniḥ।
aśaknuvan‌ dhārayituṁ kopaṁ saṁtāpamātmanaḥ॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र अपना क्रोध न रोक सकने के कारण मन-ही-मन संतप्त हो उठे॥ १४॥

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॥ १ · ६४ · १५ ॥
तस्य शापेन महता रम्भा शैली तदाभवत्‌। वचः श्रुत्वा कन्दर्पो महर्षेः निर्गतः॥

tasya śāpena mahatā rambhā śailī tadābhavat‌।
vacaḥ śrutvā ca kandarpo maharṣeḥ sa ca nirgataḥ॥

मुनि के उस महाशाप से रम्भा तत्काल पत्थर की प्रतिमा बन गयी। महर्षि का वह शापयुक्त वचन सुनकर कन्दर्प और इन्द्र वहाँ से खिसक गये॥ १५॥

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॥ १ · ६४ · १६ ॥
कोपेन महातेजास्तपोऽपहरणे कृते। इन्द्रियैरजिते राम लेभे शान्तिमात्मनः॥

kopena ca mahātejāstapo'paharaṇe kṛte।
indriyairajite rāma na lebhe śāntimātmanaḥ॥

श्रीराम! क्रोध से तपस्या का क्षय हो गया और इन्द्रियाँ अभी तक काबू में न आ सकीं, यह विचारकर उन महातेजस्वी मुनि के चित्त को शान्ति नहीं मिलती थी॥ १६॥

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॥ १ · ६४ · १७ ॥
बभूवास्य मनश्चिन्ता तपोऽपहरणे कृते। नैवं क्रोधं गमिष्यामि वक्ष्ये कथंचन॥

babhūvāsya manaścintā tapo'paharaṇe kṛte।
naivaṁ krodhaṁ gamiṣyāmi na ca vakṣye kathaṁcana॥

तपस्या का अपहरण हो जाने पर उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि 'अब से न तो क्रोध करूँगा और न किसी भी अवस्था में मुँह से कुछ बोलूँगा॥ १७॥

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॥ १ · ६४ · १८ ॥
अथवा नोच्छ्वसिष्यामि संवत्सरशतान्यपि। अहं हि शोषयिष्यामि आत्मानं विजितेन्द्रियः॥

athavā nocchvasiṣyāmi saṁvatsaraśatānyapi।
ahaṁ hi śoṣayiṣyāmi ātmānaṁ vijitendriyaḥ॥

'अथवा सौ वर्षों तक मैं श्वास भी न लूँगा। इन्द्रियों को जीतकर इस शरीर को सुखा डालूँगा॥ १८॥

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॥ १ · ६४ · १९ ॥
तावद्‌ यावद्धि मे प्राप्तं ब्राह्मण्यं तपसार्जितम्‌। अनुच्छ्वसन्नभुञ्जानस्तिष्ठेयं शाश्वतीः समाः॥

tāvad‌ yāvaddhi me prāptaṁ brāhmaṇyaṁ tapasārjitam‌।
anucchvasannabhuñjānastiṣṭheyaṁ śāśvatīḥ samāḥ॥

'जबतक अपनी तपस्या से उपार्जित ब्राह्मणत्व मुझे प्राप्त न होगा, तबतक चाहे अनन्त वर्ष बीत जायँ, मैं बिना खाये-पीये खड़ा रहूँगा और साँस तक न लूँगा॥ १९॥

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॥ १ · ६४ · २० ॥
नहि मे तप्यमानस्य क्षयं यास्यन्ति मूर्तयः। एवं वर्षसहस्रस्य दीक्षां मुनिपुंगवः। चकाराप्रतिमां लोके प्रतिज्ञां रघुनन्दन॥

nahi me tapyamānasya kṣayaṁ yāsyanti mūrtayaḥ।
evaṁ varṣasahasrasya dīkṣāṁ sa munipuṁgavaḥ।
cakārāpratimāṁ loke pratijñāṁ raghunandana॥

'तपस्या करते समय मेरे शरीर के अवयव कदापि नष्ट नहीं होंगे।' रघुनन्दन! ऐसा निश्चय करके मुनिवर विश्वामित्र ने पुनः एक हजार वर्षों तक तपस्या करने के लिये दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसकी संसार में कहीं तुलना नहीं है॥ २०॥

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥ ६४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६४ ॥