वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ६७ · २७ श्लोकाःSarga 67 · 27 ślokas

श्रीरामके द्वारा धनुर्भंग तथा राजा जनकका विश्‍वामित्रकी आज्ञासे राजा दशरथको बुलानेके लिये मन्त्रियोंको भेजना

धनुर्भंग

“धनुर्भंग”
॥ १ · ६७ · १६–१८ ॥

रामो लीलया शैवं धनुराकृष्य मध्ये भनक्ति, वज्रनिर्घोषेण सर्वे विस्मिताः, सीता मालां धारयन्ती तिष्ठति।

मुकुट-बंध धारण किये श्यामवर्ण श्रीराम ने शिव के दिव्य धनुष को कान तक खींचकर बीच से तोड़ डाला है और चारों ओर तेज की चिनगारियाँ बिखर रही हैं; एक ओर विश्वामित्र और राजा जनक खड़े हैं तो दूसरी ओर वरमाला लिये सीता विस्मय और स्नेह से उन्हें देख रही हैं।

Crowned with his diadem-band, the dark-hued Rama has drawn Shiva's divine bow to his ear and snapped it in two, sparks of light bursting all around; on one side stand Vishvamitra and King Janaka, while on the other Sita, bridal garland in hand, watches him in wonder and love.

॥ १ · ६७ · १ ॥
जनकस्य वचः श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनिः। धनुर्दर्शय रामाय इति होवाच पार्थिवम्‌॥

janakasya vacaḥ śrutvā viśvāmitro mahāmuniḥ।
dhanurdarśaya rāmāya iti hovāca pārthivam‌॥

जनक की यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र बोले-'राजन्‌! आप श्रीराम को अपना धनुष दिखाइये'॥ १॥

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॥ १ · ६७ · २ ॥
ततः राजा जनकः सचिवान्‌ व्यादिदेश ह। धनुरानीयतां दिव्यं गन्धमाल्यानुलेपितम्‌॥

tataḥ sa rājā janakaḥ sacivān‌ vyādideśa ha।
dhanurānīyatāṁ divyaṁ gandhamālyānulepitam‌॥

तब राजा जनक ने मन्त्रियों को आज्ञा दी-'चन्दन और मालाओंसे सुशोभित वह दिव्य धनुष यहाँ ले आओ'॥ २॥

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॥ १ · ६७ · ३ ॥
जनकेन समादिष्टाः सचिवाः प्राविशन्‌ पुरम्‌। तद्धनुः पुरतः कृत्वा निर्जग्मुरमितौजसः॥

janakena samādiṣṭāḥ sacivāḥ prāviśan‌ puram‌।
taddhanuḥ purataḥ kṛtvā nirjagmuramitaujasaḥ॥

राजा जनक की आज्ञा पाकर वे अमित तेजस्वी मन्त्री नगर में गये और उस धनुष को आगे करके पुरीसे बाहर निकले॥ ३॥

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॥ १ · ६७ · ४ ॥
नृणां शतानि पञ्चाशद्‌ व्यायतानां महात्मनाम्‌। मञ्जूषामष्टचक्रां तां समूहुस्ते कथंचन॥

nṛṇāṁ śatāni pañcāśad‌ vyāyatānāṁ mahātmanām‌।
mañjūṣāmaṣṭacakrāṁ tāṁ samūhuste kathaṁcana॥

वह धनुष आठ पहियोंवाली लोहे की बहुत बड़ी संदूक में रखा गया था। उसे मोटे-ताजे पाँच हजार महामनस्वी वीर किसी तरह ठेलकर वहाँतक ला सके॥ ४॥

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॥ १ · ६७ · ५ ॥
तामादाय सुमञ्जूषामायसीं यत्र तद्धनुः। सुरोपमं ते जनकमूचुर्नृपतिमन्त्रिणः॥

tāmādāya sumañjūṣāmāyasīṁ yatra taddhanuḥ।
suropamaṁ te janakamūcurnṛpatimantriṇaḥ॥

लोहे की वह संदूक, जिसमें धनुष रखा गया था, लाकर उन मन्त्रियों ने देवोपम राजा जनकसे कहा--॥ ५॥

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॥ १ · ६७ · ६ ॥
इदं धनुर्वरं राजन्‌ पूजितं सर्वराजभिः। मिथिलाधिप राजेन्द्र दर्शनीयं यदीच्छसि॥

idaṁ dhanurvaraṁ rājan‌ pūjitaṁ sarvarājabhiḥ।
mithilādhipa rājendra darśanīyaṁ yadīcchasi॥

'राजन्‌! मिथिलापते! राजेन्द्र! यह समस्त राजाओंद्वारा सम्मानित श्रेष्ठ धनुष है। यदि आप इन दोनों राजकुमारों को दिखाना चाहते हैं तो दिखाइये'॥ ६॥

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॥ १ · ६७ · ७ ॥
तेषां नृपो वचः श्रुत्वा कृताञ्जलिरभाषत। विश्वामित्रं महात्मानं तावुभौ रामलक्ष्मणौ॥

teṣāṁ nṛpo vacaḥ śrutvā kṛtāñjalirabhāṣata।
viśvāmitraṁ mahātmānaṁ tāvubhau rāmalakṣmaṇau॥

उनकी बात सुनकर राजा जनक ने हाथ जोड़कर महात्मा विश्वामित्र तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा-॥ ७॥

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॥ १ · ६७ · ८ ॥
इदं धनुर्वरं ब्रह्मन्‌ जनकैरभिपूजितम्‌। राजभिश्च महावीर्यैरशक्तैः पूरितं तदा॥

idaṁ dhanurvaraṁ brahman‌ janakairabhipūjitam‌।
rājabhiśca mahāvīryairaśaktaiḥ pūritaṁ tadā॥

'ब्रह्मन्‌। यही वह श्रेष्ठ धनुष है, जिसका जनकवंशी नरेशों ने सदा ही पूजन किया है तथा जो इसे उठाने में समर्थ न हो सके, उन महापराक्रमी नरेशों ने भी इसका पूर्वकाल में सम्मान किया है॥ ८॥

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॥ १ · ६७ · ९ ॥
नैतत्‌ सुरगणाः सर्वे सासुरा राक्षसाः। गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः॥

naitat‌ suragaṇāḥ sarve sāsurā na ca rākṣasāḥ।
gandharvayakṣapravarāḥ sakinnaramahoragāḥ॥

'इसे समस्त देवता, असुर, राक्षस, गन्धर्व, बड़े-बड़े यक्ष, किन्नर और महानाग भी नहीं चढ़ा सके हैं॥ ९॥

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॥ १ · ६७ · १० ॥
क्व गतिर्मानुषाणां धनुषोऽस्य प्रपूरणे। आरोपणे समायोगे वेपने तोलने तथा॥

kva gatirmānuṣāṇāṁ ca dhanuṣo'sya prapūraṇe।
āropaṇe samāyoge vepane tolane tathā॥

'फिर इस धनुष को खींचने, चढ़ाने, इसपर बाण संधान करने, इसको प्रत्यञ्चापर टङ्कार देने तथा इसे उठाकर इधर-उधर हिलाने में मनुष्यों की कहाँ शक्ति है?॥ १०॥

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॥ १ · ६७ · ११ ॥
तदेतद्‌ धनुषां श्रेष्ठमानीतं मुनिपुंगव। दर्शयैतन्महाभाग अनयो राजपुत्रयोः॥

tadetad‌ dhanuṣāṁ śreṣṭhamānītaṁ munipuṁgava।
darśayaitanmahābhāga anayo rājaputrayoḥ॥

'मुनिप्रवर! यह श्रेष्ठ धनुष यहाँ लाया गया है। महाभाग! आप इसे इन दोनों राजकुमारों को दिखाइये'॥ ११॥

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॥ १ · ६७ · १२ ॥
विश्वामित्रः सरामस्तु श्रुत्वा जनकभाषितम्‌। वत्स राम धनुः पश्य इति राघवमब्रवीत्‌॥

viśvāmitraḥ sarāmastu śrutvā janakabhāṣitam‌।
vatsa rāma dhanuḥ paśya iti rāghavamabravīt‌॥

श्रीरामसहित विश्वामित्र ने जनक का वह कथन सुनकर रघुनन्दनसे कहा-'वत्स राम! इस धनुष को देखो'॥ १२॥

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॥ १ · ६७ · १३ ॥
महर्षेर्वचनाद्‌ रामो यत्र तिष्ठति तद्धनुः। मञ्जूषां तामपावृत्य दृष्ट्वा धनुरथाब्रवीत्‌॥

maharṣervacanād‌ rāmo yatra tiṣṭhati taddhanuḥ।
mañjūṣāṁ tāmapāvṛtya dṛṣṭvā dhanurathābravīt‌॥

महर्षि की आज्ञासे श्रीराम ने जिसमें वह धनुष था उस संदूक को खोलकर उस धनुष को देखा और कहा-॥ १३॥

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॥ १ · ६७ · १४ ॥
इदं धनुर्वरं दिव्यं संस्पृशामीह पाणिना। यत्नवांश्च भविष्यामि तोलने पूरणेऽपि वा॥

idaṁ dhanurvaraṁ divyaṁ saṁspṛśāmīha pāṇinā।
yatnavāṁśca bhaviṣyāmi tolane pūraṇe'pi vā॥

'अच्छा अब मैं इस दिव्य एवं श्रेष्ठ धनुष में हाथ लगाता हूँ। मैं इसे उठाने और चढ़ाने का भी प्रयत्न करूँगा'॥ १४॥

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॥ १ · ६७ · १५ ॥
बाढमित्यब्रवीद्‌ राजा मुनिश्च समभाषत। लीलया धनुर्मध्ये जग्राह वचनान्मुनेः॥

bāḍhamityabravīd‌ rājā muniśca samabhāṣata।
līlayā sa dhanurmadhye jagrāha vacanānmuneḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६७ · १६ ॥
पश्यतां नृसहस्राणां बहूनां रघुनन्दनः। आरोपयत्‌ धर्मात्मा सलीलमिव तद्धनुः॥

paśyatāṁ nṛsahasrāṇāṁ bahūnāṁ raghunandanaḥ।
āropayat‌ sa dharmātmā salīlamiva taddhanuḥ॥

॥ १५–१६ ॥

तब राजा और मुनि ने एक स्वरसे कहा--'हाँ, ऐसा ही करो।' मुनि की आज्ञासे रघुकुलनन्दन धर्मात्मा श्रीराम ने उस धनुष को बीचसे पकड़कर लीलापूर्वक उठा लिया और खेल-सा करते हुए उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी। उस समय कई हजार मनुष्यों की दृष्टि उनपर लगी थी॥ १५-१६॥

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॥ १ · ६७ · १७ ॥
आरोपयित्वा मौर्वीं पूरयामास तद्धनुः। तद्‌ बभञ्ज धनुर्मध्ये नरश्रेष्ठो महायशाः॥

āropayitvā maurvīṁ ca pūrayāmāsa taddhanuḥ।
tad‌ babhañja dhanurmadhye naraśreṣṭho mahāyaśāḥ॥

प्रत्यञ्चा चढ़ाकर महायशस्वी नरश्रेष्ठ श्रीराम ने ज्यों ही उस धनुष को कानतक खींचा त्यों ही वह बीचसे ही टूट गया॥ १७॥

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॥ १ · ६७ · १८ ॥
तस्य शब्दो महानासीन्निर्घातसमनिःस्वनः। भूमिकम्पश्च सुमहान्‌ पर्वतस्येव दीर्यतः॥

tasya śabdo mahānāsīnnirghātasamaniḥsvanaḥ।
bhūmikampaśca sumahān‌ parvatasyeva dīryataḥ॥

टूटते समय उससे वज्रपात के समान बड़ी भारी आवाज हुई। ऐसा जान पड़ा मानो पर्वत फट पड़ा हो! उस समय महान्‌ भूकम्प आ गया॥ १८॥

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॥ १ · ६७ · १९ ॥
निपेतुश्च नराः सर्वे तेन शब्देन मोहिताः। वर्जयित्वा मुनिवरं राजानं तौ राघवौ॥

nipetuśca narāḥ sarve tena śabdena mohitāḥ।
varjayitvā munivaraṁ rājānaṁ tau ca rāghavau॥

मुनिवर विश्वामित्र, राजा जनक तथा रघुकुलभूषण दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को छोड़कर शेष जितने लोग वहाँ खड़े थे, वे सब धनुष टूटने के उस भयंकर शब्दसे मूर्च्छित होकर गिर पड़े॥ १९॥

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॥ १ · ६७ · २० ॥
प्रत्याश्वस्ते जने तस्मिन्‌ राजा विगतसाध्वसः। उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं वाक्यज्ञो मुनिपुंगवम्‌॥

pratyāśvaste jane tasmin‌ rājā vigatasādhvasaḥ।
uvāca prāñjalirvākyaṁ vākyajño munipuṁgavam‌॥

थोड़ी देर में जब सबको चेत हुआ, तब निर्भय हुए राजा जनक ने, जो बोलने में कुशल और वाक्य के मर्म को समझनेवाले थे, हाथ जोड़कर मुनिवर विश्वामित्रसे कहा-॥ २०॥

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॥ १ · ६७ · २१ ॥
भगवन्‌ दृष्टवीर्यो मे रामो दशरथात्मजः। अत्यद्भुतमचिन्त्यं अतर्कितमिदं मया॥

bhagavan‌ dṛṣṭavīryo me rāmo daśarathātmajaḥ।
atyadbhutamacintyaṁ ca atarkitamidaṁ mayā॥

'भगवन्‌! मैंने दशरथनन्दन श्रीराम का पराक्रम आज अपनी आँखों देख लिया। महादेवजी के धनुष को चढ़ाना-यह अत्यन्त अद्भुत, अचिन्त्य और अतर्कित घटना है॥ २१॥

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॥ १ · ६७ · २२ ॥
जनकानां कुले कीर्तिमाहरिष्यति मे सुता। सीता भर्तारमासाद्य रामं दशरथात्मजम्‌॥

janakānāṁ kule kīrtimāhariṣyati me sutā।
sītā bhartāramāsādya rāmaṁ daśarathātmajam‌॥

'मेरी पुत्री सीता दशरथकुमार श्रीराम को पतिरूप में प्राप्त करके जनकवंश की कीर्ति का विस्तार करेगी॥ २२॥

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॥ १ · ६७ · २३ ॥
मम सत्या प्रतिज्ञा सा वीर्यशुल्केति कौशिक। सीता प्राणैर्बहुमता देया रामाय मे सुता॥

mama satyā pratijñā sā vīryaśulketi kauśika।
sītā prāṇairbahumatā deyā rāmāya me sutā॥

'कुशिकनन्दन! मैंने सीता को वीर्यशुल्का (पराक्रमरूपी शुल्कसे ही प्राप्त होनेवाली) बताकर जो प्रतिज्ञा की थी, वह आज सत्य एवं सफल हो गयी। सीता मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर है। अपनी यह पुत्री मैं श्रीराम को समर्पित करूँगा॥ २३॥

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॥ १ · ६७ · २४ ॥
भवतोऽनुमते ब्रह्मन्‌ शीघ्रं गच्छन्तु मन्त्रिणः। मम कौशिक भद्रं ते अयोध्यां त्वरिता रथैः॥

bhavato'numate brahman‌ śīghraṁ gacchantu mantriṇaḥ।
mama kauśika bhadraṁ te ayodhyāṁ tvaritā rathaiḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६७ · २५ ॥
राजानं प्रश्रितैर्वाक्यैरानयन्तु पुरं मम। प्रदानं वीर्यशुल्कायाः कथयन्तु सर्वशः॥

rājānaṁ praśritairvākyairānayantu puraṁ mama।
pradānaṁ vīryaśulkāyāḥ kathayantu ca sarvaśaḥ॥

॥ २४–२५ ॥

'ब्रह्मन्‌! कुशिकनन्दन! आपका कल्याण हो। यदि आपकी आज्ञा हो तो मेरे मन्त्री रथपर सवार होकर बड़ी उतावली के साथ शीघ्र ही अयोध्या को जायँ और विनययुक्त वचनोंद्वारा महाराज दशरथ को मेरे नगर में लिवा लायें। साथ ही यहाँ का सब समाचार बताकर यह निवेदन करें कि जिसके लिये पराक्रम का ही शुल्क नियत किया गया था, उस जनककुमारी सीता का विवाह श्रीरामचन्द्रजी के साथ होने जा रहा है॥ २४-२५॥

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॥ १ · ६७ · २६ ॥
मुनिगुप्ती काकुत्स्थौ कथयन्तु नृपाय वै। प्रीतियुक्तं तु राजानमानयन्तु सुशीघ्रगाः॥

muniguptī ca kākutsthau kathayantu nṛpāya vai।
prītiyuktaṁ tu rājānamānayantu suśīghragāḥ॥

'ये लोग महाराज दशरथसे यह भी कह दें कि आपके दोनों पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्रजी के द्वारा सुरक्षित हो मिथिला में पहुँच गये हैं। इस प्रकार प्रीतियुक्त हुए राजा दशरथ को ये शीघ्रगामी सचिव जल्दी यहाँ बुला लायें'॥ २६॥

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॥ १ · ६७ · २७ ॥
कौशिकस्तु तथेत्याह राजा चाभाष्य मन्त्रिणः। अयोध्यां प्रेषयामास धर्मात्मा कृतशासनान्‌। यथावृत्तं समाख्यातुमानेतुं नृपं तथा॥

kauśikastu tathetyāha rājā cābhāṣya mantriṇaḥ।
ayodhyāṁ preṣayāmāsa dharmātmā kṛtaśāsanān‌।
yathāvṛttaṁ samākhyātumānetuṁ ca nṛpaṁ tathā॥

विश्वामित्र ने 'तथास्तु' कहकर राजा की बात का समर्थन किया। तब धर्मात्मा राजा जनक ने अपनी आज्ञा का पालन करनेवाले मन्त्रियों को समझा-बुझाकर यहाँ का ठीक-ठीक समाचार महाराज दशरथ को बताने और उन्हें मिथिलापुरी में ले आने के लिये भेज दिया॥ २७॥

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥ ६७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६७ ॥