वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः २८ · २२ श्लोकाःSarga 28 · 22 ślokas

विश्वामित्र का श्रीराम को अस्त्रों की संहारविधि बताना तथा उन्हें अन्यान्य अस्त्रों का उपदेश करना, श्रीराम का एक आश्रम एवं यज्ञस्थान के विषय में मुनि से प्रश्न

The withdrawal of the astras; Rāma asks about an āśrama and its sacrificial ground

अस्त्र-संहार विद्या

“अस्त्र-संहार विद्या”
॥ १ · २८ · १–१२ ॥

दीप्ते वनाङ्गणे महामुनिर्विश्वामित्रो नीलमेघश्यामाय बालाय रामाय दिव्यास्त्राणां संहारविद्यामुपदिशति — रामस्याज्ञया अस्त्राणि तेजोमयैर्दिव्यपुरुषरूपैः प्रादुर्भवन्ति, अग्निवायुवज्रचिह्नधराः प्रकाशयुवानः प्राञ्जलयः प्रणमन्त आज्ञाकरत्वं प्रतिजानते; अलौकिकप्रभा, राजकुमारस्य प्रशान्तविस्मितं मुखम्।

दीप्त वन-प्रांगण में महामुनि विश्वामित्र नीलमेघश्याम बालक राम को दिव्य अस्त्रों की संहार-विद्या का उपदेश दे रहे हैं — राम की आज्ञा से अस्त्र तेजोमय दिव्य पुरुषों के रूप में प्रकट होते हैं, अग्नि-वायु-वज्र के चिह्न धारण किये प्रकाशमय युवक हाथ जोड़े प्रणाम करते हुए आज्ञाकारिता की प्रतिज्ञा करते हैं; अलौकिक प्रभा, राजकुमार का प्रशान्त-विस्मित मुख।

In a glowing forest clearing the great sage Vishvamitra imparts to the dark-blue prince Rama the secret of recalling the celestial weapons — and at the prince's command the astras appear as radiant divine beings, luminous youths bearing the emblems of fire, wind and thunder, who bow before him with folded hands and pledge obedience, awe and serenity upon the young prince's face.

॥ १ · २८ · १ ॥
प्रतिगृह्य ततोऽस्त्राणि प्रहृष्टवदनः शुचिः गच्छन्नेव काकुत्स्थो विश्वामित्रमथाब्रवीत्

pratigṛhya tato'strāṇi prahṛṣṭavadanaḥ śuciḥ ।
gacchanneva ca kākutstho viśvāmitramathābravīt ॥

उन अस्त्रों को ग्रहण करके परम पवित्र श्रीराम का मुख प्रसन्नता से खिल उठा था। वे चलते-चलते ही विश्वामित्र से बोले—

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॥ १ · २८ · २ ॥
गृहीतास्त्रोऽस्मि भगवन् दुराधर्षः सुरैरपि अस्त्राणां त्वहमिच्छामि संहारान् मुनिपुंगव

gṛhītāstro'smi bhagavan durādharṣaḥ surairapi ।
astrāṇāṁ tvahamicchāmi saṁhārān munipuṁgava ॥

"भगवन्! आपकी कृपा से इन अस्त्रों को ग्रहण करके मैं देवताओं के लिये भी दुर्जय हो गया हूँ। मुनिश्रेष्ठ! अब मैं अस्त्रों की संहारविधि जानना चाहता हूँ।"

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॥ १ · २८ · ३ ॥
एवं ब्रुवति काकुत्स्थे विश्वामित्रो महातपाः संहारान् व्याजहाराथ धृतिमान् सुव्रतः शुचिः

evaṁ bruvati kākutsthe viśvāmitro mahātapāḥ ।
saṁhārān vyājahārātha dhṛtimān suvrataḥ śuciḥ ॥

ककुत्स्थकुलतिलक श्रीराम के ऐसा कहने पर महातपस्वी, धैर्यवान्, उत्तम व्रतधारी और पवित्र विश्वामित्र मुनि ने उन्हें अस्त्रों की संहारविधि का उपदेश दिया।

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॥ १ · २८ · ४ ॥
सत्यवन्तं सत्यकीर्तिं धृष्टं रभसमेव प्रतिहारतरं नाम पराङ्मुखमवाङ्मुखम्

satyavantaṁ satyakīrtiṁ dhṛṣṭaṁ rabhasameva ca ।
pratihārataraṁ nāma parāṅmukhamavāṅmukham ॥

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॥ १ · २८ · ५ ॥
लक्ष्यालक्ष्याविमौ चैव दृढनाभसुनाभकौ दशाक्षशतवक्त्रौ दशशीर्षशतोदरौ

lakṣyālakṣyāvimau caiva dṛḍhanābhasunābhakau ।
daśākṣaśatavaktrau ca daśaśīrṣaśatodarau ॥

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॥ १ · २८ · ६ ॥
पद्मनाभमहानाभौ दुन्दुनाभस्वनाभकौ ज्योतिषं शकुनं चैव नैरास्यविमलावुभौ

padmanābhamahānābhau dundunābhasvanābhakau ।
jyotiṣaṁ śakunaṁ caiva nairāsyavimalāvubhau ॥

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॥ १ · २८ · ७ ॥
यौगंधरविनिद्रौ दैत्यप्रमथनौ तथा शुचिबाहुर्महाबाहुर्निष्कलिर्विरुचस्तथा

yaugaṁdharavinidrau ca daityapramathanau tathā ।
śucibāhurmahābāhurniṣkalirvirucastathā ॥

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॥ १ · २८ · ८ ॥
सार्चिमाली धृतिमाली वृत्तिमान् रुचिरस्तथा पित्र्यः सौमनसश्चैव विधूतमकरावुभौ

sārcimālī dhṛtimālī vṛttimān rucirastathā ।
pitryaḥ saumanasaścaiva vidhūtamakarāvubhau ॥

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॥ १ · २८ · ९ ॥
परवीरं रतिं चैव धनधान्यौ राघव कामरूपं कामरुचिं मोहमावरणं तथा

paravīraṁ ratiṁ caiva dhanadhānyau ca rāghava ।
kāmarūpaṁ kāmaruciṁ mohamāvaraṇaṁ tathā ॥

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॥ १ · २८ · १० ॥
जृम्भकं सर्पनाथं पन्थानवरुणौ तथा कृशाश्वतनयान् राम भास्वरान् कामरूपिणः प्रतीच्छ मम भद्रं ते पात्रभूतोऽसि राघव

jṛmbhakaṁ sarpanāthaṁ ca panthānavaruṇau tathā ।
kṛśāśvatanayān rāma bhāsvarān kāmarūpiṇaḥ ।
pratīccha mama bhadraṁ te pātrabhūto'si rāghava ॥

॥ ४–१० ॥

तदनन्तर वे बोले — "रघुकुलनन्दन राम! तुम्हारा कल्याण हो! तुम अस्त्रविद्या के सुयोग्य पात्र हो; अतः निम्नाङ्कित अस्त्रों को भी ग्रहण करो — सत्यवान्, सत्यकीर्ति, धृष्ट, रभस, प्रतिहारतर, प्राङ्मुख, अवाङ्मुख, लक्ष्य, अलक्ष्य, दृढनाभ, सुनाभ, दशाक्ष, शतवक्त्र, दशशीर्ष, शतोदर, पद्मनाभ, महानाभ, दुन्दुनाभ, स्वनाभ, ज्योतिष, शकुन, नैरास्य, विमल, दैत्यनाशक यौगंधर और विनिद्र, शुचिबाहु, महाबाहु, निष्कलि, विरुच, सार्चिमाली, धृतिमाली, वृत्तिमान्, रुचिर, पित्र्य, सौमनस, विधूत, मकर, परवीर, रति, धन, धान्य, कामरूप, कामरुचि, मोह, आवरण, जृम्भक, सर्पनाथ, पन्थान और वरुण — ये सभी प्रजापति कृशाश्व के पुत्र हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले तथा परम तेजस्वी हैं। तुम इन्हें ग्रहण करो।"

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॥ १ · २८ · ११ ॥
बाढमित्येव काकुत्स्थः प्रहृष्टेनान्तरात्मना दिव्यभास्वरदेहाश्च मूर्तिमन्तः सुखप्रदाः

bāḍhamityeva kākutsthaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā ।
divyabhāsvaradehāśca mūrtimantaḥ sukhapradāḥ ॥

तब 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने प्रसन्न मन से उन अस्त्रों को ग्रहण किया। उन मूर्तिमान् अस्त्रों के शरीर दिव्य तेज से उद्भासित हो रहे थे। वे अस्त्र जगत् को सुख देनेवाले थे।

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॥ १ · २८ · १२ ॥
केचिदंगारसदृशाः केचिद् धूमोपमास्तथा चन्द्रार्कसदृशाः केचित् प्राञ्जलिपुटास्तथा

kecidaṁgārasadṛśāḥ kecid dhūmopamāstathā ।
candrārkasadṛśāḥ kecit prāñjalipuṭāstathā ॥

उनमें से कितने ही अंगारों के समान तेजस्वी थे। कितने ही धूम के समान काले प्रतीत होते थे तथा कुछ अस्त्र सूर्य और चन्द्रमा के समान प्रकाशमान थे। वे सब-के-सब हाथ जोड़कर श्रीराम के समक्ष खड़े हुए।

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॥ १ · २८ · १३ ॥
रामं प्राञ्जलयो भूत्वाब्रुवन् मधुरभाषिणः इमे स्म नरशार्दूल शाधि किं करवाम ते

rāmaṁ prāñjalayo bhūtvābruvan madhurabhāṣiṇaḥ ।
ime sma naraśārdūla śādhi kiṁ karavāma te ॥

उन्होंने अञ्जलि बाँधे मधुर वाणी में श्रीराम से इस प्रकार कहा — "पुरुषसिंह! हमलोग आपके दास हैं। आज्ञा कीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?"

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॥ १ · २८ · १४ ॥
गम्यतामिति तानाह यथेष्टं रघुनन्दनः मानसाः कार्यकालेषु साहाय्यं मे करिष्यथ

gamyatāmiti tānāha yatheṣṭaṁ raghunandanaḥ ।
mānasāḥ kāryakāleṣu sāhāyyaṁ me kariṣyatha ॥

तब रघुकुलनन्दन राम ने उनसे कहा — "इस समय तो आपलोग अपने अभीष्ट स्थान को जायँ; परंतु आवश्यकता के समय मेरे मन में स्थित होकर सदा मेरी सहायता करते रहें।"

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॥ १ · २८ · १५ ॥
अथ ते राममामन्त्र्य कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् एवमस्त्विति काकुत्स्थमुक्त्वा जग्मुर्यथागतम्

atha te rāmamāmantrya kṛtvā cāpi pradakṣiṇam ।
evamastviti kākutsthamuktvā jagmuryathāgatam ॥

तत्पश्चात् वे श्रीराम की परिक्रमा करके उनसे विदा ले उनकी आज्ञा के अनुसार कार्य करने की प्रतिज्ञा करके जैसे आये थे, वैसे चले गये।

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॥ १ · २८ · १६ ॥
तान् राघवो ज्ञात्वा विश्वामित्रं महामुनिम् गच्छन्नेवाथ मधुरं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्

sa ca tān rāghavo jñātvā viśvāmitraṁ mahāmunim ।
gacchannevātha madhuraṁ ślakṣṇaṁ vacanamabravīt ॥

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॥ १ · २८ · १७ ॥
किमेतन्मेघसंकाशं पर्वतस्याविदूरतः वृक्षखण्डमितो भाति परं कौतूहलं हि मे

kimetanmeghasaṁkāśaṁ parvatasyāvidūrataḥ ।
vṛkṣakhaṇḍamito bhāti paraṁ kautūhalaṁ hi me ॥

॥ १६–१७ ॥

इस प्रकार उन अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके चलते-चलते ही महामुनि विश्वामित्र से श्रीरघुनाथजी ने मधुर वाणी में पूछा — "भगवन्! सामनेवाले पर्वत के पास ही जो यह मेघों के घटा के समान सघन वृक्षों से भरा स्थान दिखायी देता है, क्या है? उसके विषय में जानने के लिये मेरे मन में बड़ी उत्कण्ठा हो रही है।"

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॥ १ · २८ · १८ ॥
दर्शनीयं मृगाकीर्णं मनोहरमतीव नानाप्रकारैः शकुनैर्वल्गुभाषैरलंकृतम्

darśanīyaṁ mṛgākīrṇaṁ manoharamatīva ca ।
nānāprakāraiḥ śakunairvalgubhāṣairalaṁkṛtam ॥

"यह दर्शनीय स्थान मृगों के झुंड से भरा हुआ होने के कारण अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता है। नाना प्रकार के पक्षी अपनी मधुर शब्दावली से इस स्थान की शोभा बढ़ाते हैं।"

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॥ १ · २८ · १९ ॥
निःसृताः स्मो मुनिश्रेष्ठ कान्ताराद् रोमहर्षणात् अनया त्ववगच्छामि देशस्य सुखवत्तया

niḥsṛtāḥ smo muniśreṣṭha kāntārād romaharṣaṇāt ।
anayā tvavagacchāmi deśasya sukhavattayā ॥

"मुनिश्रेष्ठ! इस प्रदेश की इस सुखमयी स्थिति से यह जान पड़ता है कि अब हमलोग उस रोमाञ्चकारी दुर्गम ताटकावन से बाहर निकल आये हैं।"

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॥ १ · २८ · २० ॥
सर्वं मे शंस भगवन् कस्याश्रमपदं त्विदम् सम्प्राप्ता यत्र ते पापा ब्रह्मघ्ना दुष्टचारिणः

sarvaṁ me śaṁsa bhagavan kasyāśramapadaṁ tvidam ।
samprāptā yatra te pāpā brahmaghnā duṣṭacāriṇaḥ ॥

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॥ १ · २८ · २१ ॥
तव यज्ञस्य विघ्नाय दुरात्मानो महामुने भगवंस्तस्य को देशः सा यत्र तव याज्ञिकी

tava yajñasya vighnāya durātmāno mahāmune ।
bhagavaṁstasya ko deśaḥ sā yatra tava yājñikī ॥

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॥ १ · २८ · २२ ॥
रक्षितव्या क्रिया ब्रह्मन् मया वध्याश्च राक्षसाः एतत् सर्वं मुनिश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो

rakṣitavyā kriyā brahman mayā vadhyāśca rākṣasāḥ ।
etat sarvaṁ muniśreṣṭha śrotumicchāmyahaṁ prabho ॥

॥ २०–२२ ॥

"भगवन्! मुझे सब कुछ बताइये। यह किसका आश्रम है? भगवन्! महामुने! जहाँ आपकी यज्ञक्रिया हो रही है, जहाँ वे पापी, दुराचारी, ब्रह्महत्यारे, दुरात्मा राक्षस आपके यज्ञ में विघ्न डालने के लिये आया करते हैं और जहाँ मुझे यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों के वध का कार्य करना है, उस आपके आश्रम का कौन-सा देश है? ब्रह्मन्! मुनिश्रेष्ठ प्रभो! यह सब मैं सुनना चाहता हूँ।"

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे अष्टाविंशः सर्गः ॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २८ ॥