वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ३० · २६ श्लोकाःSarga 30 · 26 ślokas

श्रीरामद्वारा विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों का संहार

Rāma guards the sacrifice and destroys the rākṣasas

यज्ञ-रक्षा — मारीच-निक्षेप

“यज्ञ-रक्षा — मारीच-निक्षेप”
॥ १ · ३० · १५–१९ ॥

सिद्धाश्रमे यज्ञवेदीं रक्षन् रामो मानवास्त्रं मुमोच। तेन शतयोजनं क्षिप्तो मारीचः सागरे पपात; अग्निरविचलो जज्वाल, मुनिश्च मौनव्रती निश्चलः।

सिद्धाश्रम की यज्ञवेदी अविचल जल रही है, मौनव्रती विश्वामित्र नेत्र मूँदे बैठे हैं — और सोलह वर्ष के राम के धनुष से छूटा मानवास्त्र धूमकेतु-सा आकाश चीरता हुआ मारीच को सौ योजन दूर समुद्र में फेंक रहा है। पास ही लक्ष्मण धनुष ताने पहरे पर हैं; रक्त बरसाते बादल फटकर लौट रहे हैं।

The altar of Siddhashrama burns on, untrembling; the vowed-silent sage sits with closed eyes — while the Manavastra, loosed from sixteen-year-old Rama's bow, tears across the sky like a comet, flinging Maricha a hundred yojanas into the distant sea. Lakshmana keeps guard with drawn bow as the blood-raining clouds break and retreat.

॥ १ · ३० · १ ॥
अथ तौ देशकालज्ञौ राजपुत्रावरिंदमौ देशे काले वाक्यज्ञावब्रूतां कौशिकं वचः

atha tau deśakālajñau rājaputrāvariṁdamau ।
deśe kāle ca vākyajñāvabrūtāṁ kauśikaṁ vacaḥ ॥

तदनन्तर देश और काल को जाननेवाले शत्रुदमन राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण जो देश और काल के अनुसार बोलने योग्य वचन के मर्मज्ञ थे, कौशिक मुनि से इस प्रकार बोले—

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॥ १ · ३० · २ ॥
भगवञ्छ्रोतुमिच्छावो यस्मिन् काले निशाचरौ संरक्षणीयौ तौ ब्रूहि नातिवर्तेत तत्क्षणम्

bhagavañchrotumicchāvo yasmin kāle niśācarau ।
saṁrakṣaṇīyau tau brūhi nātivarteta tatkṣaṇam ॥

"भगवन्! अब हम दोनों यह सुनना चाहते हैं कि किस समय उन दोनों निशाचरों का आक्रमण होता है? जब कि हमें उन दोनों को यज्ञभूमि में आने से रोकना है। कहीं ऐसा न हो, असावधानी में ही वह समय हाथ से निकल जाय; अतः उसे बता दीजिये।"

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॥ १ · ३० · ३ ॥
एवं ब्रुवाणौ काकुत्स्थौ त्वरमाणौ युयुत्सया सर्वे ते मुनयः प्रीताः प्रशशंसुर्नृपात्मजौ

evaṁ bruvāṇau kākutsthau tvaramāṇau yuyutsayā ।
sarve te munayaḥ prītāḥ praśaśaṁsurnṛpātmajau ॥

ऐसी बात कहकर युद्ध की इच्छा से उतावले हुए उन दोनों ककुत्स्थवंशी राजकुमारों की ओर देखकर वे सब मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन दोनों बन्धुओं की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।

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॥ १ · ३० · ४ ॥
अद्यप्रभृति षड्रात्रं रक्षतं राघवौ युवाम् दीक्षां गतो ह्येष मुनिर्मौनित्वं गमिष्यति

adyaprabhṛti ṣaḍrātraṁ rakṣataṁ rāghavau yuvām ।
dīkṣāṁ gato hyeṣa munirmaunitvaṁ ca gamiṣyati ॥

वे बोले — "ये मुनिवर विश्वामित्रजी यज्ञ की दीक्षा ले चुके हैं; अतः अब मौन रहेंगे। आप दोनों रघुवंशी वीर सावधान होकर आज से छः रातों तक इनके यज्ञ की रक्षा करते रहें।"

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॥ १ · ३० · ५ ॥
तौ तु तद्वचनं श्रुत्वा राजपुत्रौ यशस्विनौ अनिद्रं षडहोरात्रं तपोवनमरक्षताम्

tau tu tadvacanaṁ śrutvā rājaputrau yaśasvinau ।
anidraṁ ṣaḍahorātraṁ tapovanamarakṣatām ॥

मुनियों का यह वचन सुनकर वे दोनों यशस्वी राजकुमार लगातार छः दिन और छः रात तक उस तपोवन की रक्षा करते रहे; इस बीच में उन्होंने नींद भी नहीं ली।

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॥ १ · ३० · ६ ॥
उपासांचक्रतुर्वीरौ यत्तौ परमधन्विनौ ररक्षतुर्मुनिवरं विश्वामित्रमरिंदमौ

upāsāṁcakraturvīrau yattau paramadhanvinau ।
rarakṣaturmunivaraṁ viśvāmitramariṁdamau ॥

शत्रुओं का दमन करनेवाले वे परम धनुर्धर वीर सतत सावधान रहकर मुनिवर विश्वामित्र के पास खड़े हो उनकी (और उनके यज्ञ की) रक्षा में लगे रहे।

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॥ १ · ३० · ७ ॥
अथ काले गते तस्मिन् षष्ठेऽहनि तदागते सौमित्रिमब्रवीद् रामो यत्तो भव समाहितः

atha kāle gate tasmin ṣaṣṭhe'hani tadāgate ।
saumitrimabravīd rāmo yatto bhava samāhitaḥ ॥

इस प्रकार कुछ काल बीत जाने पर जब छठा दिन आया, तब श्रीराम ने सुमित्राकुमार लक्ष्मण से कहा — "सुमित्रानन्दन! तुम अपने चित्त को एकाग्र करके सावधान हो जाओ।"

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॥ १ · ३० · ८ ॥
रामस्यैवं ब्रुवाणस्य त्वरितस्य युयुत्सया प्रजज्वाल ततो वेदिः सोपाध्यायपुरोहिता

rāmasyaivaṁ bruvāṇasya tvaritasya yuyutsayā ।
prajajvāla tato vediḥ sopādhyāyapurohitā ॥

युद्ध की इच्छा से शीघ्रता करते हुए श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि उपाध्याय (ब्रह्मा), पुरोहित (उपद्रष्टा) तथा अन्यान्य ऋत्विजों से घिरी हुई यज्ञ की वेदी सहसा प्रज्वलित हो उठी (वेदी का यह जलना राक्षसों के आगमन का सूचक उत्पात था)।

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॥ १ · ३० · ९ ॥
सदर्भचमसस्रुक्का ससमित्कुसुमोच्चया विश्वामित्रेण सहिता वेदिर्जज्वाल सर्त्विजा

sadarbhacamasasrukkā sasamitkusumoccayā ।
viśvāmitreṇa sahitā vedirjajvāla sartvijā ॥

इसके बाद कुश, चमस, स्रुक्, समिधा और फूलों के ढेर से सुशोभित होनेवाली विश्वामित्र तथा ऋत्विजोंसहित जो यज्ञ की वेदी थी, उस पर आहवनीय अग्नि प्रज्वलित हुई (अग्नि का यह प्रज्वलन यज्ञ के उद्देश्य से हुआ था)।

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॥ १ · ३० · १० ॥
मन्त्रवच्च यथान्यायं यज्ञोऽसौ सम्प्रवर्तते आकाशे महान् शब्दः प्रादुरासीद् भयानकः

mantravacca yathānyāyaṁ yajño'sau sampravartate ।
ākāśe ca mahān śabdaḥ prādurāsīd bhayānakaḥ ॥

फिर तो शास्त्रीय विधि के अनुसार वेद-मन्त्रों के उच्चारणपूर्वक उस यज्ञ का कार्य आरम्भ हुआ। इसी समय आकाश में बड़े जोर का शब्द हुआ, जो बड़ा ही भयानक था।

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॥ १ · ३० · ११ ॥
आवार्य गगनं मेघो यथा प्रावृषि दृश्यते तथा मायां विकुर्वाणौ राक्षसावभ्यधावताम्

āvārya gaganaṁ megho yathā prāvṛṣi dṛśyate ।
tathā māyāṁ vikurvāṇau rākṣasāvabhyadhāvatām ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ३० · १२ ॥
मारीचश्च सुबाहुश्च तयोरनुचरास्तथा आगम्य भीमसंकाशा रुधिरौघानवासृजन्

mārīcaśca subāhuśca tayoranucarāstathā ।
āgamya bhīmasaṁkāśā rudhiraughānavāsṛjan ॥

॥ ११–१२ ॥

जैसे वर्षाकाल में मेघों की घटा सारे आकाश को घेरकर छायी हुई दिखायी देती है, उसी प्रकार मारीच और सुबाहु नामक राक्षस सब ओर अपनी माया फैलाते हुए यज्ञमण्डप की ओर दौड़े आ रहे थे। उनके अनुचर भी साथ थे। उन भयंकर राक्षसों ने वहाँ आकर रक्त की धाराएँ बरसाना आरम्भ कर दिया।

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॥ १ · ३० · १३ ॥
तां तेन रुधिरौघेण वेदीं वीक्ष्य समुक्षिताम् सहसाभिद्रुतो रामस्तानपश्यत् ततो दिवि

tāṁ tena rudhiraugheṇa vedīṁ vīkṣya samukṣitām ।
sahasābhidruto rāmastānapaśyat tato divi ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ३० · १४ ॥
तावापतन्तौ सहसा दृष्ट्वा राजीवलोचनः लक्ष्मणं त्वभिसम्प्रेक्ष्य रामो वचनमब्रवीत्

tāvāpatantau sahasā dṛṣṭvā rājīvalocanaḥ ।
lakṣmaṇaṁ tvabhisamprekṣya rāmo vacanamabravīt ॥

॥ १३–१४ ॥

रक्त के उस प्रवाह से यज्ञ-वेदी के आस-पास की भूमि को भीगी हुई देख श्रीरामचन्द्रजी सहसा उधर दौड़े और इधर-उधर दृष्टि डालने पर उन्होंने उन राक्षसों को आकाश में स्थित देखा। मारीच और सुबाहु को सहसा आते देख कमलनयन श्रीराम ने लक्ष्मण की ओर देखकर कहा—

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॥ १ · ३० · १५ ॥
पश्य लक्ष्मण दुर्वृत्तान् राक्षसान् पिशिताशनान् मानवास्त्रसमाधूताननिलेन यथा घनान् करिष्यामि संदेहो नोत्सहे हन्तुमीदृशान्

paśya lakṣmaṇa durvṛttān rākṣasān piśitāśanān ।
mānavāstrasamādhūtānanilena yathā ghanān ॥
kariṣyāmi na saṁdeho notsahe hantumīdṛśān ।

"लक्ष्मण! वह देखो, मांसभक्षण करनेवाले दुराचारी राक्षस आ पहुँचे। मैं मानवास्त्र से इन सबको उसी प्रकार मार भगाऊँगा, जैसे वायु के वेग से बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। मेरे इस कथन में तनिक भी संदेह नहीं है। ऐसे कायरों को मैं मारना नहीं चाहता।"

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॥ १ · ३० · १६ ॥
इत्युक्त्वा वचनं रामश्चापे संधाय वेगवान्

ityuktvā vacanaṁ rāmaścāpe saṁdhāya vegavān ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ३० · १७ ॥
मानवं परमोदारमस्त्रं परमभास्वरम् चिक्षेप परमक्रुद्धो मारीचोरसि राघवः

mānavaṁ paramodāramastraṁ paramabhāsvaram ।
cikṣepa paramakruddho mārīcorasi rāghavaḥ ॥

॥ १६–१७ ॥

ऐसा कहकर वेगशाली श्रीराम ने अपने धनुष पर परम उदार मानवास्त्र का संधान किया। वह अस्त्र अत्यन्त तेजस्वी था। श्रीराम ने बड़े रोष में भरकर मारीच की छाती में उस बाण का प्रहार किया।

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॥ १ · ३० · १८ ॥
तेन परमास्त्रेण मानवेन समाहतः सम्पूर्णं योजनशतं क्षिप्तः सागरसम्प्लवे

sa tena paramāstreṇa mānavena samāhataḥ ।
sampūrṇaṁ yojanaśataṁ kṣiptaḥ sāgarasamplave ॥

उस उत्तम मानवास्त्र का गहरा आघात लगने से मारीच पूरे सौ योजन की दूरी पर समुद्र के जल में जा गिरा।

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॥ १ · ३० · १९ ॥
विचेतनं विघूर्णन्तं शीतेषुबलपीडितम् निरस्तं दृश्य मारीचं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्

vicetanaṁ vighūrṇantaṁ śīteṣubalapīḍitam ।
nirastaṁ dṛśya mārīcaṁ rāmo lakṣmaṇamabravīt ॥

शीतेषु नामक मानवास्त्र से पीड़ित हो मारीच अचेत-सा होकर चक्कर काटता हुआ दूर चला जा रहा है। यह देख श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—

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॥ १ · ३० · २० ॥
पश्य लक्ष्मण शीतेषुं मानवं मनुसंहितम् मोहयित्वा नयत्येनं प्राणैर्वियुज्यते

paśya lakṣmaṇa śīteṣuṁ mānavaṁ manusaṁhitam ।
mohayitvā nayatyenaṁ na ca prāṇairviyujyate ॥

"लक्ष्मण! देखो, मनु के द्वारा प्रयुक्त शीतेषु नामक मानवास्त्र इस राक्षस को मूर्छित करके दूर लिये जा रहा है, किंतु उसके प्राण नहीं ले रहा है।"

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॥ १ · ३० · २१ ॥
इमानपि वधिष्यामि निर्घृणान् दुष्टचारिणः राक्षसान् पापकर्मस्थान् यज्ञघ्नान् रुधिराशनान्

imānapi vadhiṣyāmi nirghṛṇān duṣṭacāriṇaḥ ।
rākṣasān pāpakarmasthān yajñaghnān rudhirāśanān ॥

"अब यज्ञ में विघ्न डालनेवाले इन दूसरे निर्दय, दुराचारी, पापकर्मी एवं रक्तभोजी राक्षसों को भी मार गिराता हूँ।"

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॥ १ · ३० · २२ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं चाशु लाघवं दर्शयन्निव विगृह्य सुमहच्चास्त्रमाग्नेयं रघुनन्दनः

ityuktvā lakṣmaṇaṁ cāśu lāghavaṁ darśayanniva ।
vigṛhya sumahaccāstramāgneyaṁ raghunandanaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ३० · २३ ॥
सुबाहूरसि चिक्षेप विद्धः प्रापतद् भुवि शेषान् वायव्यमादाय निजघान महायशाः राघवः परमोदारो मुनीनां मुदमावहन्

subāhūrasi cikṣepa sa viddhaḥ prāpatad bhuvi ।
śeṣān vāyavyamādāya nijaghāna mahāyaśāḥ ।
rāghavaḥ paramodāro munīnāṁ mudamāvahan ॥

॥ २२–२३ ॥

लक्ष्मण से ऐसा कहकर श्रीराम ने अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए-से शीघ्र ही महान् आग्नेयास्त्र का संधान करके उसे सुबाहु की छाती पर चलाया। उसकी चोट लगते ही वह मरकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। फिर महायशस्वी परम उदार रघुवीर ने वायव्यास्त्र लेकर शेष निशाचरों का भी संहार कर डाला और मुनियों को परम आनन्द प्रदान किया।

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॥ १ · ३० · २४ ॥
हत्वा राक्षसान् सर्वान् यज्ञघ्नान् रघुनन्दनः ऋषिभिः पूजितस्तत्र यथेन्द्रो विजये पुरा

sa hatvā rākṣasān sarvān yajñaghnān raghunandanaḥ ।
ṛṣibhiḥ pūjitastatra yathendro vijaye purā ॥

इस प्रकार यज्ञ में विघ्न डालनेवाले समस्त राक्षसों का वध करके श्रीराम वहाँ ऋषियोंद्वारा उसी प्रकार सम्मानित हुए जैसे पूर्वकाल में देवराज इन्द्र असुरों पर विजय पाकर महर्षियोंद्वारा पूजित हुए थे।

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॥ १ · ३० · २५ ॥
अथ यज्ञे समाप्ते तु विश्वामित्रो महामुनिः निरीतिका दिशो दृष्ट्वा काकुत्स्थमिदमब्रवीत्

atha yajñe samāpte tu viśvāmitro mahāmuniḥ ।
nirītikā diśo dṛṣṭvā kākutsthamidamabravīt ॥

यज्ञ समाप्त होने पर महामुनि विश्वामित्र ने सम्पूर्ण दिशाओं को विघ्न-बाधाओं से रहित देख श्रीरामचन्द्रजी से कहा—

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॥ १ · ३० · २६ ॥
कृतार्थोऽस्मि महाबाहो कृतं गुरुवचस्त्वया सिद्धाश्रममिदं सत्यं कृतं वीर महायशः हि रामं प्रशस्यैवं ताभ्यां संध्यामुपागमत्

kṛtārtho'smi mahābāho kṛtaṁ guruvacastvayā ।
siddhāśramamidaṁ satyaṁ kṛtaṁ vīra mahāyaśaḥ ।
sa hi rāmaṁ praśasyaivaṁ tābhyāṁ saṁdhyāmupāgamat ॥

"महाबाहो! मैं तुम्हें पाकर कृतार्थ हो गया। तुमने गुरु की आज्ञा का पूर्णरूप से पालन किया। महायशस्वी वीर! तुमने इस सिद्धाश्रम का नाम सार्थक कर दिया।" इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की प्रशंसा करके मुनि ने उन दोनों भाइयों के साथ संध्योपासना की।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिंशः सर्गः ॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३० ॥