वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः २४ · ३२ श्लोकाःSarga 24 · 32 ślokas

श्रीराम और लक्ष्मण का गंगापार होते समय विश्वामित्रजी से जल में उठती हुई तुमुलध्वनि के विषय में प्रश्न करना, विश्वामित्रजी का उन्हें इसका कारण बताना तथा मलद, करूष एवं ताटका वन का परिचय देते हुए इन्हें ताटकावध के लिये आज्ञा प्रदान करना

Crossing the Gaṅgā; the lands of Malada and Karūṣa, and the Tāṭakā forest

गंगा-पार

“गंगा-पार”
॥ १ · २४ · १–१८ ॥

मुनिभिर्वाह्यमाने काष्ठप्लवे महामुनिर्विश्वामित्रो बालौ राजकुमारौ — नीलं रामं गौरं लक्ष्मणं च — विशालां प्रवृद्धां गङ्गां तारयति; मध्यस्रोतसि जलं तुमुलनादेन क्षुभ्यति; मुनिः करमुत्थाप्य पारस्य घोरारण्यं निर्दिशति; जलकणाः, प्रभातदीप्तिः, धीरमुखौ कुमारौ।

मुनियों के खेते हुए काष्ठ-नौका में महामुनि विश्वामित्र दोनों बालक राजकुमारों — नीलवर्ण राम और गौर लक्ष्मण — को विशाल, उमड़ती गंगा के पार ले जा रहे हैं; बीच धारा में जल तुमुल नाद के साथ क्षुब्ध हो उठता है; मुनि हाथ उठाकर उस पार के घोर वन की ओर संकेत करते हैं; जल-कण, प्रातः की दीप्ति, धीर मुखवाले कुमार।

In a wooden boat rowed by sages the great sage Vishvamitra carries the two young princes — blue-complexioned Rama and fair Lakshmana — across the broad surging Ganga; mid-stream the waters rise in a tumultuous churning roar, and the sage lifts a hand to explain, pointing toward a brooding dark forest on the far shore, while the princes gaze ahead with calm courage through the spray.

॥ १ · २४ · १ ॥
ततः प्रभाते विमले कृताह्निकमरिन्दमौ विश्वामित्रं पुरस्कृत्य नद्यास्तीरमुपागतौ

tataḥ prabhāte vimale kṛtāhnikamarindamau ।
viśvāmitraṁ puraskṛtya nadyāstīramupāgatau ॥

तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल में नित्यकर्म से निवृत्त हुए विश्वामित्रजी को आगे करके शत्रुदमन वीर श्रीराम और लक्ष्मण गंगानदी के तट पर आये।

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॥ १ · २४ · २ ॥
ते सर्वे महात्मानो मुनयः संशितव्रताः उपस्थाप्य शुभां नावं विश्वामित्रमथाब्रुवन्

te ca sarve mahātmāno munayaḥ saṁśitavratāḥ ।
upasthāpya śubhāṁ nāvaṁ viśvāmitramathābruvan ॥

उस समय उत्तम व्रत का पालन करनेवाले उन पुण्याश्रमनिवासी महात्मा मुनियों ने एक सुन्दर नाव मँगाकर विश्वामित्रजी से कहा—

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॥ १ · २४ · ३ ॥
आरोहतु भवान् नावं राजपुत्रपुरस्कृतः अरिष्टं गच्छ पन्थानं मा भूत् कालस्य पर्ययः

ārohatu bhavān nāvaṁ rājaputrapuraskṛtaḥ ।
ariṣṭaṁ gaccha panthānaṁ mā bhūt kālasya paryayaḥ ॥

"महर्षे! आप इन राजकुमारों को आगे करके इस नाव पर बैठ जाइये और मार्ग को निर्विघ्नतापूर्वक तै कीजिये, जिससे विलम्ब न हो।"

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॥ १ · २४ · ४ ॥
विश्वामित्रस्तथेत्युक्त्वा तानृषीन् प्रतिपूज्य ततार सहितस्ताभ्यां सरितं सागरंगमाम्

viśvāmitrastathetyuktvā tānṛṣīn pratipūjya ca ।
tatāra sahitastābhyāṁ saritaṁ sāgaraṁgamām ॥

विश्वामित्रजी ने 'बहुत अच्छा' कहकर उन महर्षियों की सराहना की और वे श्रीराम तथा लक्ष्मण के साथ समुद्रगामिनी गंगानदी को पार करने लगे।

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॥ १ · २४ · ५ ॥
तत्र शुश्राव वै शब्दं तोयसंरम्भवर्धितम् मध्यमागम्य तोयस्य तस्य शब्दस्य निश्चयम् ज्ञातुकामो महातेजाः सह रामः कनीयसा

tatra śuśrāva vai śabdaṁ toyasaṁrambhavardhitam ।
madhyamāgamya toyasya tasya śabdasya niścayam ॥
jñātukāmo mahātejāḥ saha rāmaḥ kanīyasā ।

गंगा की बीच धारा में आने पर छोटे भाईसहित महातेजस्वी श्रीराम को दो जलों के टकराने की बड़ी भारी आवाज सुनायी देने लगी। "यह कैसी आवाज है? क्यों तथा कहाँ से आ रही है?" इस बात को निश्चितरूप से जानने की इच्छा उनके भीतर जाग उठी।

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॥ १ · २४ · ६ ॥
अथ रामः सरिन्मध्ये पप्रच्छ मुनिपुंगवम् वारिणो भिद्यमानस्य किमयं तुमुलो ध्वनिः

atha rāmaḥ sarinmadhye papraccha munipuṁgavam ॥
vāriṇo bhidyamānasya kimayaṁ tumulo dhvaniḥ ।

तब श्रीराम ने नदी के मध्यभाग में मुनिवर विश्वामित्र से पूछा — "जल के परस्पर मिलने से यहाँ ऐसी तुमुलध्वनि क्यों हो रही है?"

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॥ १ · २४ · ७ ॥
राघवस्य वचः श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितम् कथयामास धर्मात्मा तस्य शब्दस्य निश्चयम्

rāghavasya vacaḥ śrutvā kautūhalasamanvitam ॥
kathayāmāsa dharmātmā tasya śabdasya niścayam ।

श्रीरामचन्द्रजी के वचन में इस रहस्य को जानने की उत्कण्ठा भरी हुई थी। उसे सुनकर धर्मात्मा विश्वामित्र ने उस महान् शब्द (तुमुलध्वनि) का सुनिश्चित कारण बताते हुए कहा—

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॥ १ · २४ · ८ ॥
कैलासपर्वते राम मनसा निर्मितं परम् ब्रह्मणा नरशार्दूल तेनेदं मानसं सरः

kailāsaparvate rāma manasā nirmitaṁ param ॥
brahmaṇā naraśārdūla tenedaṁ mānasaṁ saraḥ ।

"नरश्रेष्ठ राम! कैलासपर्वत पर एक सुन्दर सरोवर है। उसे ब्रह्माजी ने अपने मानसिक संकल्प से प्रकट किया था। मन के द्वारा प्रकट होने से ही वह उत्तम सरोवर 'मानस' कहलाता है।"

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॥ १ · २४ · ९ ॥
तस्मात् सुस्राव सरसः सायोध्यामुपगूहते सरःप्रवृत्ता सरयूः पुण्या ब्रह्मसरश्च्युता

tasmāt susrāva sarasaḥ sāyodhyāmupagūhate ॥
saraḥpravṛttā sarayūḥ puṇyā brahmasaraścyutā ।

"उस सरोवर से एक नदी निकली है, जो अयोध्यापुरी से सटकर बहती है। ब्रह्मसर से निकलने के कारण वह पवित्र नदी सरयू के नाम से विख्यात है।"

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॥ १ · २४ · १० ॥
तस्यायमतुलः शब्दो जाह्नवीमभिवर्तते वारिसंक्षोभजो राम प्रणामं नियतः कुरु

tasyāyamatulaḥ śabdo jāhnavīmabhivartate ॥
vārisaṁkṣobhajo rāma praṇāmaṁ niyataḥ kuru ।

"उसीका जल गंगाजी में मिल रहा है। दो नदियों के जलों के संघर्ष से ही यह भारी आवाज हो रही है; जिसकी कहीं तुलना नहीं है। राम! तुम अपने मन को संयम में रखकर इस संगम के जल को प्रणाम करो।"

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॥ १ · २४ · ११ ॥
ताभ्यां तु तावुभौ कृत्वा प्रणाममतिधार्मिकौ तीरं दक्षिणमासाद्य जग्मतुर्लघुविक्रमौ

tābhyāṁ tu tāvubhau kṛtvā praṇāmamatidhārmikau ॥
tīraṁ dakṣiṇamāsādya jagmaturlaghuvikramau ।

यह सुनकर उन दोनों अत्यन्त धर्मात्मा भाइयों ने उन दोनों नदियों को प्रणाम किया और गंगा के दक्षिण किनारे पर उतरकर वे दोनों बन्धु जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए चलने लगे।

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॥ १ · २४ · १२ ॥
वनं घोरसंकाशं दृष्ट्वा नरवरात्मजः अविप्रहतमैक्ष्वाकः पप्रच्छ मुनिपुंगवम्

sa vanaṁ ghorasaṁkāśaṁ dṛṣṭvā naravarātmajaḥ ॥
aviprahatamaikṣvākaḥ papraccha munipuṁgavam ।

उस समय इक्ष्वाकुनन्दन राजकुमार श्रीराम ने अपने सामने एक भयङ्कर वन देखा, जिसमें मनुष्यों के आने-जाने का कोई चिह्न नहीं था। उसे देखकर उन्होंने मुनिवर विश्वामित्र से पूछा—

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॥ १ · २४ · १३ ॥
अहो वनमिदं दुर्गं झिल्लिकागणसंयुतम्

aho vanamidaṁ durgaṁ jhillikāgaṇasaṁyutam ॥

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॥ १ · २४ · १४ ॥
भैरवैः श्वापदैः कीर्णं शकुन्तैर्दारुणारवैः नानाप्रकारैः शकुनैर्वाश्यद्भिर्भैरवस्वनैः

bhairavaiḥ śvāpadaiḥ kīrṇaṁ śakuntairdāruṇāravaiḥ ।
nānāprakāraiḥ śakunairvāśyadbhirbhairavasvanaiḥ ॥

॥ १३–१४ ॥

"गुरुदेव! यह वन तो बड़ा ही अद्भुत एवं दुर्गम है। यहाँ चारों ओर झिल्लियों की झनकार सुनायी देती है। भयानक हिंसक जन्तु भरे हुए हैं। भयङ्कर बोली बोलनेवाले पक्षी सब ओर फैले हुए हैं। नाना प्रकार के विहंगम भीषण स्वर में चहचहा रहे हैं।"

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॥ १ · २४ · १५ ॥
सिंहव्याघ्रवराहैश्च वारणैश्चापि शोभितम् धवाश्वकर्णककुभैर्बिल्वतिन्दुकपाटलैः संकीर्णं बदरीभिश्च किं न्विदं दारुणं वनम्

siṁhavyāghravarāhaiśca vāraṇaiścāpi śobhitam ।
dhavāśvakarṇakakubhairbilvatindukapāṭalaiḥ ॥
saṁkīrṇaṁ badarībhiśca kiṁ nvidaṁ dāruṇaṁ vanam ।

"सिंह, व्याघ्र, सुअर और हाथी भी इस जंगल की शोभा बढ़ा रहे हैं। धव (धौरा), अश्वकर्ण (एक प्रकार के शालवृक्ष), ककुभ (अर्जुन), बेल, तिन्दुक (तेन्दू), पाटल (पाड़र) तथा बेर के वृक्षों से भरा हुआ यह भयङ्कर वन क्या है? — इसका क्या नाम है?"

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॥ १ · २४ · १६ ॥
तमुवाच महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः श्रूयतां वत्स काकुत्स्थ यस्यैतद् दारुणं वनम्

tamuvāca mahātejā viśvāmitro mahāmuniḥ ॥
śrūyatāṁ vatsa kākutstha yasyaitad dāruṇaṁ vanam ।

तब महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र ने उनसे कहा — "वत्स! ककुत्स्थनन्दन! यह भयङ्कर वन जिसके अधिकार में रहा है, उसका परिचय सुनो।"

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॥ १ · २४ · १७ ॥
एतौ जनपदौ स्फीतौ पूर्वमास्तां नरोत्तम मलदाश्च करूषाश्च देवनिर्माणनिर्मितौ

etau janapadau sphītau pūrvamāstāṁ narottama ॥
maladāśca karūṣāśca devanirmāṇanirmitau ।

"नरश्रेष्ठ! पूर्वकाल में यहाँ दो समृद्धिशाली जनपद थे — मलद और करूष। ये दोनों देश देवताओं के प्रयत्न से निर्मित हुए थे।"

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॥ १ · २४ · १८ ॥
पुरा वृत्रवधे राम मलेन समभिप्लुतम् क्षुधा चैव सहस्राक्षं ब्रह्महत्या समाविशत्

purā vṛtravadhe rāma malena samabhiplutam ॥
kṣudhā caiva sahasrākṣaṁ brahmahatyā samāviśat ।

"राम! पहले की बात है, वृत्रासुर का वध करने के पश्चात् देवराज इन्द्र मल से लिप्त हो गये। क्षुधा ने भी उन्हें धर दबाया और उनके भीतर ब्रह्महत्या प्रविष्ट हो गयी।"

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॥ १ · २४ · १९ ॥
तमिन्द्रं मलिनं देवा ऋषयश्च तपोधनाः कलशैः स्नापयामासुर्मलं चास्य प्रमोचयन्

tamindraṁ malinaṁ devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ ॥
kalaśaiḥ snāpayāmāsurmalaṁ cāsya pramocayan ।

"तब देवताओं तथा तपोधन ऋषियों ने मलिन इन्द्र को यहाँ गंगाजल से भरे हुए कलशोंद्वारा नहलाया तथा उनके मल (और कारूष — क्षुधा) को छुड़ा दिया।"

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॥ १ · २४ · २० ॥
इह भूम्यां मलं दत्त्वा देवाः कारूषमेव शरीरजं महेन्द्रस्य ततो हर्षं प्रपेदिरे

iha bhūmyāṁ malaṁ dattvā devāḥ kārūṣameva ca ॥
śarīrajaṁ mahendrasya tato harṣaṁ prapedire ।

"इस भूभाग में देवराज इन्द्र के शरीर से उत्पन्न हुए मल और कारूष को देकर देवतालोग बड़े प्रसन्न हुए।"

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॥ १ · २४ · २१ ॥
निर्मलो निष्करूषश्च शुद्ध इन्द्रो यथाभवत्

nirmalo niṣkarūṣaśca śuddha indro yathābhavat ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · २४ · २२ ॥
ततो देशस्य सुप्रीतो वरं प्रादादनुत्तमम् इमौ जनपदौ स्फीतौ ख्यातिं लोके गमिष्यतः मलदाश्च करूषाश्च ममांगमलधारिणौ

tato deśasya suprīto varaṁ prādādanuttamam ।
imau janapadau sphītau khyātiṁ loke gamiṣyataḥ ॥
maladāśca karūṣāśca mamāṁgamaladhāriṇau ।

॥ २१–२२ ॥

"इन्द्र पूर्ववत् निर्मल, निष्करूष (क्षुधाहीन) एवं शुद्ध हो गये। तब उन्होंने प्रसन्न होकर इस देश को यह उत्तम वर प्रदान किया — 'ये दो जनपद लोक में मलद और करूष नाम से विख्यात होंगे। मेरे अंगजनित मल को धारण करनेवाले ये दोनों देश बड़े समृद्धिशाली होंगे'।"

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॥ १ · २४ · २३ ॥
साधु साध्विति तं देवाः पाकशासनमब्रुवन् देशस्य पूजां तां दृष्ट्वा कृतां शक्रेण धीमता

sādhu sādhviti taṁ devāḥ pākaśāsanamabruvan ॥
deśasya pūjāṁ tāṁ dṛṣṭvā kṛtāṁ śakreṇa dhīmatā ।

"बुद्धिमान् इन्द्र के द्वारा की गयी उस देश की वह पूजा देखकर देवताओं ने पाकशासन को बारम्बार साधुवाद दिया।"

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॥ १ · २४ · २४ ॥
एतौ जनपदौ स्फीतौ दीर्घकालमरिन्दम मलदाश्च करूषाश्च मुदिता धनधान्यतः

etau janapadau sphītau dīrghakālamarindama ॥
maladāśca karūṣāśca muditā dhanadhānyataḥ ।

"शत्रुदमन! मलद और करूष — ये दोनों जनपद दीर्घकाल तक समृद्धिशाली, धन-धान्य से सम्पन्न तथा सुखी रहे हैं।"

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॥ १ · २४ · २५ ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य यक्षिणी कामरूपिणी बलं नागसहस्रस्य धारयन्ती तदा ह्यभूत्

kasyacittvatha kālasya yakṣiṇī kāmarūpiṇī ॥
balaṁ nāgasahasrasya dhārayantī tadā hyabhūt ।

"कुछ काल के अनन्तर यहाँ इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एक यक्षिणी आयी, जो अपने शरीर में एक हजार हाथियों का बल धारण करती है।"

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॥ १ · २४ · २६ ॥
ताटका नाम भद्रं ते भार्या सुन्दस्य धीमतः

tāṭakā nāma bhadraṁ te bhāryā sundasya dhīmataḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · २४ · २७ ॥
मारीचो राक्षसः पुत्रो यस्याः शक्रपराक्रमः वृत्तबाहुर्महाशीर्षो विपुलास्यतनुर्महान्

mārīco rākṣasaḥ putro yasyāḥ śakraparākramaḥ ।
vṛttabāhurmahāśīrṣo vipulāsyatanurmahān ॥

॥ २६–२७ ॥

"उसका नाम ताटका है। वह बुद्धिमान् सुन्द नामक दैत्य की पत्नी है। तुम्हारा कल्याण हो। मारीच नामक राक्षस, जो इन्द्र के समान पराक्रमी है, उस ताटका का ही पुत्र है। उसकी भुजाएँ गोल, मस्तक बहुत बड़ा, मुँह फैला हुआ और शरीर विशाल है।"

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॥ १ · २४ · २८ ॥
राक्षसो भैरवाकारो नित्यं त्रासयते प्रजाः इमौ जनपदौ नित्यं विनाशयति राघव मलदांश्च करूषांश्च ताटका दुष्टचारिणी

rākṣaso bhairavākāro nityaṁ trāsayate prajāḥ ।
imau janapadau nityaṁ vināśayati rāghava ॥
maladāṁśca karūṣāṁśca tāṭakā duṣṭacāriṇī ।

"वह भयानक आकारवाला राक्षस यहाँ की प्रजा को सदा ही त्रास पहुँचाता रहता है। रघुनन्दन! वह दुराचारिणी ताटका भी सदा मलद और करूष — इन दोनों जनपदों का विनाश करती रहती है।"

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॥ १ · २४ · २९ ॥
सेयं पन्थानमावृत्य वसत्यध्यर्धयोजने

seyaṁ panthānamāvṛtya vasatyadhyardhayojane ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · २४ · ३० ॥
अत एव गन्तव्यं ताटकाया वनं यतः स्वबाहुबलमाश्रित्य जहीमां दुष्टचारिणीम्

ata eva ca gantavyaṁ tāṭakāyā vanaṁ yataḥ ।
svabāhubalamāśritya jahīmāṁ duṣṭacāriṇīm ॥

॥ २९–३० ॥

"वह यक्षिणी डेढ़ योजन (छः कोस) तक के मार्ग को घेरकर इस वन में रहती है; अतः हमलोगों को जिस ओर ताटका-वन है, उधर ही चलना चाहिये। तुम अपने बाहुबल का सहारा लेकर इस दुराचारिणी को मार डालो।"

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॥ १ · २४ · ३१ ॥
मन्नियोगादिमं देशं कुरु निष्कण्टकं पुनः नहि कश्चिदिमं देशं शक्तो ह्यागन्तुमीदृशम्

manniyogādimaṁ deśaṁ kuru niṣkaṇṭakaṁ punaḥ ।
nahi kaścidimaṁ deśaṁ śakto hyāgantumīdṛśam ॥

"मेरी आज्ञा से इस देश को पुनः निष्कण्टक बना दो। यह देश ऐसा रमणीय है तो भी इस समय कोई यहाँ आ नहीं सकता है।"

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॥ १ · २४ · ३२ ॥
यक्षिण्या घोरया राम उत्सादितमसह्यया एतत्ते सर्वमाख्यातं यथैतद् दारुणं वनम् यक्ष्या चोत्सादितं सर्वमद्यापि निवर्तते

yakṣiṇyā ghorayā rāma utsāditamasahyayā ।
etatte sarvamākhyātaṁ yathaitad dāruṇaṁ vanam ।
yakṣyā cotsāditaṁ sarvamadyāpi na nivartate ॥

"राम! उस असह्य एवं भयानक यक्षिणी ने इस देश को उजाड़ कर डाला है। यह वन ऐसा भयङ्कर क्यों है, यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। उस यक्षिणी ने ही इस सारे देश को उजाड़ दिया है और वह आज भी अपने उस क्रूर कर्म से निवृत्त नहीं हुई है।"

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २४ ॥