वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः २३ · २२ श्लोकाःSarga 23 · 22 ślokas

विश्वामित्रसहित श्रीराम और लक्ष्मण का सरयू-गंगासंगम के समीप पुण्य आश्रम में रात को ठहरना

Night at the holy āśrama by the Sarayū-Gaṅgā confluence

संगम-तट की पुण्य रात्रि

“संगम-तट की पुण्य रात्रि”
॥ १ · २३ · १–१४ ॥

सरयूगङ्गासङ्गमे शान्ते वनाश्रमे महामुनिर्विश्वामित्रः प्रज्वलिताग्नेः समीपे बालौ राजकुमारौ बोधयति — नीलमेघश्यामं रामं गौरं लक्ष्मणं च, यौ भक्त्या निश्चलौ शृण्वतः; द्विनद्योः श्यामसङ्गमस्तारकाकीर्णाकाशे दीप्यते, खद्योता निस्तब्धं जलं च।

सरयू-गंगा के संगम पर शान्त वनाश्रम में महामुनि विश्वामित्र प्रज्वलित अग्नि के पास दोनों बालक राजकुमारों — नीलमेघश्याम राम और गौरवर्ण लक्ष्मण — को उपदेश दे रहे हैं, जो भक्ति से निश्चल होकर सुन रहे हैं; दोनों नदियों का श्याम संगम तारों से भरे आकाश के नीचे चमक रहा है, जुगनू और निस्तब्ध जल।

At a peaceful hermitage where the Sarayu meets the Ganga, the great sage Vishvamitra sits by a glowing sacred fire teaching the two young princes — the dusky blue-complexioned Rama and his fair brother Lakshmana — who listen in rapt devotion; the dark confluence shines beneath a vast starlit sky, fireflies and still water keeping the hush of a sacred evening.

॥ १ · २३ · १ ॥
प्रभातायां तु शर्वर्यां विश्वामित्रो महामुनिः अभ्यभाषत काकुत्स्थौ शयानौ पर्णसंस्तरे

prabhātāyāṁ tu śarvaryāṁ viśvāmitro mahāmuniḥ ।
abhyabhāṣata kākutsthau śayānau parṇasaṁstare ॥

जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब महामुनि विश्वामित्र ने तिनकों और पत्तों के बिछौने पर सोये हुए उन दोनों ककुत्स्थवंशी राजकुमारों से कहा—

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॥ १ · २३ · २ ॥
कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम्

kausalyā suprajā rāma pūrvā saṁdhyā pravartate ।
uttiṣṭha naraśārdūla kartavyaṁ daivamāhnikam ॥

"नरश्रेष्ठ राम! तुम्हारे-जैसे पुत्र को पाकर महारानी कौसल्या सुपुत्रजननी कही जाती हैं। यह देखो, प्रातःकाल की संध्या का समय हो रहा है; उठो और प्रतिदिन किये जानेवाले देवसम्बन्धी कार्यों को पूर्ण करो।"

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॥ १ · २३ · ३ ॥
तस्यर्षेः परमोदारं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ स्नात्वा कृतोदकौ वीरौ जेपतुः परमं जपम्

tasyarṣeḥ paramodāraṁ vacaḥ śrutvā narottamau ।
snātvā kṛtodakau vīrau jepatuḥ paramaṁ japam ॥

महर्षि का यह परम उदार वचन सुनकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों ने स्नान करके देवताओं का तर्पण किया और फिर वे परम उत्तम जपनीय मन्त्र गायत्री का जप करने लगे।

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॥ १ · २३ · ४ ॥
कृताह्निकौ महावीर्यौ विश्वामित्रं तपोधनम् अभिवाद्यातिसंहृष्टौ गमनायाभितस्थतुः

kṛtāhnikau mahāvīryau viśvāmitraṁ tapodhanam ।
abhivādyātisaṁhṛṣṭau gamanāyābhitasthatuḥ ॥

नित्यकर्म समाप्त करके महापराक्रमी श्रीराम और लक्ष्मण अत्यन्त प्रसन्न हो तपोधन विश्वामित्र को प्रणाम करके वहाँ से आगे जाने को उद्यत हो गये।

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॥ १ · २३ · ५ ॥
तौ प्रयान्तौ महावीर्यौ दिव्यां त्रिपथगां नदीम् ददृशाते ततस्तत्र सरय्वाः संगमे शुभे

tau prayāntau mahāvīryau divyāṁ tripathagāṁ nadīm ।
dadṛśāte tatastatra sarayvāḥ saṁgame śubhe ॥

जाते-जाते उन महाबली राजकुमारों ने गंगा और सरयू के शुभ संगम पर पहुँचकर वहाँ दिव्य त्रिपथगा नदी गंगाजी का दर्शन किया।

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॥ १ · २३ · ६ ॥
तत्राश्रमपदं पुण्यमृषीणां भावितात्मनाम् बहुवर्षसहस्राणि तप्यतां परमं तपः

tatrāśramapadaṁ puṇyamṛṣīṇāṁ bhāvitātmanām ।
bahuvarṣasahasrāṇi tapyatāṁ paramaṁ tapaḥ ॥

संगम के पास ही शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षियों का एक पवित्र आश्रम था, जहाँ वे कई हजार वर्षों से तीव्र तपस्या करते थे।

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॥ १ · २३ · ७ ॥
तं दृष्ट्वा परमप्रीतौ राघवौ पुण्यमाश्रमम् ऊचतुस्तं महात्मानं विश्वामित्रमिदं वचः

taṁ dṛṣṭvā paramaprītau rāghavau puṇyamāśramam ।
ūcatustaṁ mahātmānaṁ viśvāmitramidaṁ vacaḥ ॥

उस पवित्र आश्रम को देखकर रघुकुलरत्न श्रीराम और लक्ष्मण बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने महात्मा विश्वामित्र से यह बात कही—

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॥ १ · २३ · ८ ॥
कस्यायमाश्रमः पुण्यः को न्वस्मिन् वसते पुमान् भगवञ्छ्रोतुमिच्छावः परं कौतूहलं हि नौ

kasyāyamāśramaḥ puṇyaḥ ko nvasmin vasate pumān ।
bhagavañchrotumicchāvaḥ paraṁ kautūhalaṁ hi nau ॥

"भगवन्! यह किसका पवित्र आश्रम है? और इसमें कौन पुरुष निवास करता है? यह हम दोनों सुनना चाहते हैं। इसके लिये हमारे मन में बड़ी उत्कण्ठा है।"

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॥ १ · २३ · ९ ॥
तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा प्रहस्य मुनिपुंगवः अब्रवीच्छ्रूयतां राम यस्यायं पूर्व आश्रमः

tayostad vacanaṁ śrutvā prahasya munipuṁgavaḥ ।
abravīcchrūyatāṁ rāma yasyāyaṁ pūrva āśramaḥ ॥

उन दोनों का यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र हँसते हुए बोले — "राम! यह आश्रम पहले जिसके अधिकार में रहा है, उसका परिचय देता हूँ, सुनो।"

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॥ १ · २३ · १० ॥
कन्दर्पो मूर्तिमानासीत् काम इत्युच्यते बुधैः तपस्यन्तमिह स्थाणुं नियमेन समाहितम्

kandarpo mūrtimānāsīt kāma ityucyate budhaiḥ ।
tapasyantamiha sthāṇuṁ niyamena samāhitam ॥

"विद्वान् पुरुष जिसे काम कहते हैं, वह कन्दर्प पूर्वकाल में मूर्तिमान् था — शरीर धारण करके विचरता था। उन दिनों भगवान् स्थाणु (शिव) इसी आश्रम में चित्त को एकाग्र करके नियमपूर्वक तपस्या करते थे।"

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॥ १ · २३ · ११ ॥
कृतोद्वाहं तु देवेशं गच्छन्तं समरुद्गणम् धर्षयामास दुर्मेधा हुंकृतश्च महात्मना

kṛtodvāhaṁ tu deveśaṁ gacchantaṁ samarudgaṇam ।
dharṣayāmāsa durmedhā huṁkṛtaśca mahātmanā ॥

"एक दिन समाधि से उठकर देवेश्वर शिव मरुद्गणों के साथ कहीं जा रहे थे। उसी समय दुर्बुद्धि काम ने उन पर आक्रमण किया। यह देख महात्मा शिव ने हुंकार करके उसे रोका।"

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॥ १ · २३ · १२ ॥
अवध्यातश्च रुद्रेण चक्षुषा रघुनन्दन व्यशीर्यन्त शरीरात् स्वात् सर्वगात्राणि दुर्मतेः

avadhyātaśca rudreṇa cakṣuṣā raghunandana ।
vyaśīryanta śarīrāt svāt sarvagātrāṇi durmateḥ ॥

"रघुनन्दन! भगवान् रुद्र ने रोषभरी दृष्टि से अवहेलना-पूर्वक उसकी ओर देखा; फिर तो उस दुर्बुद्धि के सारे अंग उसके शरीर से जीर्ण-शीर्ण होकर गिर गये।"

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॥ १ · २३ · १३ ॥
तत्र गात्रं हतं तस्य निर्दग्धस्य महात्मनः अशरीरः कृतः कामः क्रोधाद् देवेश्वरेण

tatra gātraṁ hataṁ tasya nirdagdhasya mahātmanaḥ ।
aśarīraḥ kṛtaḥ kāmaḥ krodhād deveśvareṇa ha ॥

"वहाँ दग्ध हुए महात्मा कन्दर्प का शरीर नष्ट हो गया। देवेश्वर रुद्र ने अपने क्रोध से काम को अंगहीन कर दिया।"

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॥ १ · २३ · १४ ॥
अनंग इति विख्यातस्तदाप्रभृति राघव चांगविषयः श्रीमान् यत्रांगं मुमोच

anaṁga iti vikhyātastadāprabhṛti rāghava ।
sa cāṁgaviṣayaḥ śrīmān yatrāṁgaṁ sa mumoca ha ॥

"राम! तभी से वह 'अनंग' नाम से विख्यात हुआ। शोभाशाली कन्दर्प ने जहाँ अपना अंग छोड़ा था, वह प्रदेश अंगदेश के नाम से विख्यात हुआ।"

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॥ १ · २३ · १५ ॥
तस्यायमाश्रमः पुण्यस्तस्येमे मुनयः पुरा शिष्या धर्मपरा वीर तेषां पापं विद्यते

tasyāyamāśramaḥ puṇyastasyeme munayaḥ purā ।
śiṣyā dharmaparā vīra teṣāṁ pāpaṁ na vidyate ॥

"यह उन्हीं महादेवजी का पुण्य आश्रम है। वीर! ये मुनिलोग पूर्वकाल में उन्हीं स्थाणु के धर्मपरायण शिष्य थे। इनका सारा पाप नष्ट हो गया है।"

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॥ १ · २३ · १६ ॥
इहाद्य रजनीं राम वसेम शुभदर्शन पुण्ययोः सरितोर्मध्ये श्वस्तरिष्यामहे वयम्

ihādya rajanīṁ rāma vasema śubhadarśana ।
puṇyayoḥ saritormadhye śvastariṣyāmahe vayam ॥

"शुभदर्शन राम! आज की रात में हमलोग यहाँ इन पुण्यसलिला सरिताओं के बीच में निवास करें। कल सबेरे इन्हें पार करेंगे।"

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॥ १ · २३ · १७ ॥
अभिगच्छामहे सर्वे शुचयः पुण्यमाश्रमम् इह वासः परोऽस्माकं सुखं वत्स्यामहे निशाम् स्नाताश्च कृतजप्याश्च हुतहव्या नरोत्तम

abhigacchāmahe sarve śucayaḥ puṇyamāśramam ।
iha vāsaḥ paro'smākaṁ sukhaṁ vatsyāmahe niśām ॥
snātāśca kṛtajapyāśca hutahavyā narottama ।

"हम सब लोग पवित्र होकर इस पुण्य आश्रम में चलें। यहाँ रहना हमारे लिये बहुत उत्तम होगा। नरश्रेष्ठ! यहाँ स्नान करके जप और हवन करने के बाद हम रात में बड़े सुख से रहेंगे।"

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॥ १ · २३ · १८ ॥
तेषां संवदतां तत्र तपोदीर्घेण चक्षुषा विज्ञाय परमप्रीता मुनयो हर्षमागमन्

teṣāṁ saṁvadatāṁ tatra tapodīrgheṇa cakṣuṣā ॥
vijñāya paramaprītā munayo harṣamāgaman ।

वे लोग वहाँ इस प्रकार आपस में बातचीत कर ही रहे थे कि उस आश्रम में निवास करनेवाले मुनि तपस्याद्वारा प्राप्त हुई दूर दृष्टि से उनका आगमन जानकर मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उनके हृदय में हर्षजनित उल्लास छा गया।

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॥ १ · २३ · १९ ॥
अर्घ्यं पाद्यं तथाऽऽतिथ्यं निवेद्य कुशिकात्मजे रामलक्ष्मणयोः पश्चादकुर्वन्नतिथिक्रियाम्

arghyaṁ pādyaṁ tathā''tithyaṁ nivedya kuśikātmaje ॥
rāmalakṣmaṇayoḥ paścādakurvannatithikriyām ।

उन्होंने विश्वामित्रजी को अर्घ्य, पाद्य और अतिथि-सत्कार की सामग्री अर्पित करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण का भी आतिथ्य किया।

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॥ १ · २३ · २० ॥
सत्कारं समनुप्राप्य कथाभिरभिरञ्जयन् यथार्हमजपन् संध्यामृषयस्ते समाहिताः

satkāraṁ samanuprāpya kathābhirabhirañjayan ॥
yathārhamajapan saṁdhyāmṛṣayaste samāhitāḥ ।

यथोचित सत्कार करके उन मुनियों ने इन अतिथियों का भाँति-भाँति की कथा-वार्ताओंद्वारा मनोरञ्जन किया। फिर उन महर्षियों ने एकाग्रचित्त होकर यथावत् संध्यावन्दन एवं जप किया।

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॥ १ · २३ · २१ ॥
तत्र वासिभिरानीता मुनिभिः सुव्रतैः सह न्यवसन् सुसुखं तत्र कामाश्रमपदे तथा

tatra vāsibhirānītā munibhiḥ suvrataiḥ saha ॥
nyavasan susukhaṁ tatra kāmāśramapade tathā ।

तदनन्तर वहाँ रहनेवाले मुनियों ने अन्य उत्तम व्रतधारी मुनियों के साथ विश्वामित्र आदि को शयन के लिये उपयुक्त स्थानों में पहुँचा दिया। सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति करनेवाले उस पुण्य आश्रम में उन विश्वामित्र आदि ने बड़े सुख से निवास किया।

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॥ १ · २३ · २२ ॥
कथाभिरभिरामाभिरभिरामौ नृपात्मजौ रमयामास धर्मात्मा कौशिको मुनिपुंगवः

kathābhirabhirāmābhirabhirāmau nṛpātmajau ।
ramayāmāsa dharmātmā kauśiko munipuṁgavaḥ ॥

धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने उन मनोहर राजकुमारों का सुन्दर कथाओंद्वारा मनोरञ्जन किया।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २३ ॥