वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ३५ · २४ श्लोकाःSarga 35 · 24 ślokas

शोणभद्र पार करके विश्वामित्र आदि का गंगाजी के तट पर पहुँचकर वहाँ रात्रिवास करना तथा श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्रजी का उन्हें गंगाजी की उत्पत्ति की कथा सुनाना

Across the Śoṇa to the Gaṅgā’s bank; the tale of Gaṅgā’s origin begins

गंगा-तट दर्शन

“गंगा-तट दर्शन”
॥ १ · ३५ · ७–१२ ॥

हंससारससेविताया भागीरथ्याः तटं प्राप्य विश्वामित्रः हस्तं प्रसार्य रामाय गङ्गां दर्शयति; रामः पृच्छति — कथम् इयं त्रिपथगा समुद्रं प्राप।

हंसों और सारसों से सेवित पुण्यसलिला भागीरथी के तट पर पहुँचकर विश्वामित्र हाथ फैलाकर श्रीराम को गंगाजी का दर्शन करा रहे हैं; धनुषधारी श्यामवर्ण श्रीराम लक्ष्मण के साथ खड़े होकर पूछ रहे हैं कि तीन मार्गों से बहनेवाली ये गंगा किस प्रकार तीनों लोकों में घूमकर समुद्र में जा मिलीं।

Reaching the bank of the holy Bhagirathi, alive with swans and cranes, Vishvamitra stretches out his hand to show Rama the Ganga; the dark-hued, bow-bearing Rama stands with Lakshmana and asks how this three-pathed river, wandering through the three worlds, came at last to the sea.

॥ १ · ३५ · १ ॥
उपास्य रात्रिशेषं तु शोणाकूले महर्षिभिः निशायां सुप्रभातायां विश्वामित्रोऽभ्यभाषत

upāsya rātriśeṣaṁ tu śoṇākūle maharṣibhiḥ ।
niśāyāṁ suprabhātāyāṁ viśvāmitro'bhyabhāṣata ॥

महर्षियोंसहित विश्वामित्र ने रात्रि के शेषभाग में शोणभद्र के तट पर शयन किया। जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब वे श्रीरामचन्द्रजी से इस प्रकार बोले—

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॥ १ · ३५ · २ ॥
सुप्रभाता निशा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते गमनायाभिरोचय

suprabhātā niśā rāma pūrvā saṁdhyā pravartate ।
uttiṣṭhottiṣṭha bhadraṁ te gamanāyābhirocaya ॥

"श्रीराम! रात बीत गयी। सबेरा हो गया। तुम्हारा कल्याण हो, उठो, उठो और चलने की तैयारी करो।"

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॥ १ · ३५ · ३ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कृतपूर्वाह्णिकक्रियः गमनं रोचयामास वाक्यं चेदमुवाच

tacchrutvā vacanaṁ tasya kṛtapūrvāhṇikakriyaḥ ।
gamanaṁ rocayāmāsa vākyaṁ cedamuvāca ha ॥

मुनि की बात सुनकर पूर्वाह्णकाल का नित्यनियम पूर्ण करके श्रीराम चलने को तैयार हो गये और इस प्रकार बोले—

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॥ १ · ३५ · ४ ॥
अयं शोणः शुभजलोऽगाधः पुलिनमण्डितः कतरेण पथा ब्रह्मन् संतरिष्यामहे वयम्

ayaṁ śoṇaḥ śubhajalo'gādhaḥ pulinamaṇḍitaḥ ।
katareṇa pathā brahman saṁtariṣyāmahe vayam ॥

"ब्रह्मन्! शुभ जल से परिपूर्ण तथा अपने तटों से सुशोभित होनेवाला यह शोणभद्र तो अथाह जान पड़ता है। हमलोग किस मार्ग से चलकर इसे पार करेंगे?"

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॥ १ · ३५ · ५ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम् एष पन्था मयोद्दिष्टो येन यान्ति महर्षयः

evamuktastu rāmeṇa viśvāmitro'bravīdidam ।
eṣa panthā mayoddiṣṭo yena yānti maharṣayaḥ ॥

श्रीराम के ऐसा कहने पर विश्वामित्र बोले — "जिस मार्ग से महर्षिगण शोणभद्र को पार करते हैं, उसका मैंने पहले से ही निश्चय कर रखा है, वह मार्ग यह है।"

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॥ १ · ३५ · ६ ॥
एवमुक्ता महर्षयो विश्वामित्रेण धीमता पश्यन्तस्ते प्रयाता वै वनानि विविधानि

evamuktā maharṣayo viśvāmitreṇa dhīmatā ।
paśyantaste prayātā vai vanāni vividhāni ca ॥

बुद्धिमान् विश्वामित्र के ऐसा कहने पर वे महर्षि नाना प्रकार के वनों की शोभा देखते हुए वहाँ से प्रस्थित हुए।

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॥ १ · ३५ · ७ ॥
ते गत्वा दूरमध्वानं गतेऽर्धदिवसे तदा जाह्नवीं सरितां श्रेष्ठां ददृशुर्मुनिसेविताम्

te gatvā dūramadhvānaṁ gate'rdhadivase tadā ।
jāhnavīṁ saritāṁ śreṣṭhāṁ dadṛśurmunisevitām ॥

बहुत दूर का मार्ग तै कर लेने पर दोपहर होते-होते उन सब लोगों ने मुनिजनसेवित, सरिताओं में श्रेष्ठ गंगाजी के तट पर पहुँचकर उनका दर्शन किया।

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॥ १ · ३५ · ८ ॥
तां दृष्ट्वा पुण्यसलिलां हंससारससेविताम् बभूवुर्मुनयः सर्वे मुदिताः सहराघवाः

tāṁ dṛṣṭvā puṇyasalilāṁ haṁsasārasasevitām ।
babhūvurmunayaḥ sarve muditāḥ saharāghavāḥ ॥

हंसों तथा सारसों से सेवित पुण्यसलिला भागीरथी का दर्शन करके श्रीरामचन्द्रजी के साथ समस्त मुनि बहुत प्रसन्न हुए।

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॥ १ · ३५ · ९ ॥
तस्यास्तीरे तदा सर्वे चक्रुर्वासपरिग्रहम् ततः स्नात्वा यथान्यायं संतर्प्य पितृदेवताः

tasyāstīre tadā sarve cakrurvāsaparigraham ।
tataḥ snātvā yathānyāyaṁ saṁtarpya pitṛdevatāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ३५ · १० ॥
हुत्वा चैवाग्निहोत्राणि प्राश्य चामृतवद्धविः विविशुर्जाह्नवीतीरे शुभा मुदितमानसाः विश्वामित्रं महात्मानं परिवार्य समन्ततः

hutvā caivāgnihotrāṇi prāśya cāmṛtavaddhaviḥ ।
viviśurjāhnavītīre śubhā muditamānasāḥ ॥
viśvāmitraṁ mahātmānaṁ parivārya samantataḥ ।

॥ ९–१० ॥

उस समय सबने गंगाजी के तट पर डेरा डाला। फिर विधिवत् स्नान करके देवताओं और पितरों का तर्पण किया। उसके बाद अग्निहोत्र करके अमृत के समान मीठे हविष्य का भोजन किया। तदनन्तर वे सभी कल्याणकारी महर्षि प्रसन्नचित्त हो महात्मा विश्वामित्र को चारों ओर से घेरकर गंगाजी के तट पर बैठ गये।

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॥ १ · ३५ · ११ ॥
विष्ठिताश्च यथान्यायं राघवौ यथार्हतः सम्प्रहृष्टमना रामो विश्वामित्रमथाब्रवीत्

viṣṭhitāśca yathānyāyaṁ rāghavau ca yathārhataḥ ।
samprahṛṣṭamanā rāmo viśvāmitramathābravīt ॥

जब वे सब मुनि स्थिरभाव से विराजमान हो गये और श्रीराम तथा लक्ष्मण भी यथायोग्य स्थान पर बैठ गये, तब श्रीराम ने प्रसन्नचित्त होकर विश्वामित्रजी से पूछा—

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॥ १ · ३५ · १२ ॥
भगवन् श्रोतुमिच्छामि गंगां त्रिपथगां नदीम् त्रैलोक्यं कथमाक्रम्य गता नदनदीपतिम्

bhagavan śrotumicchāmi gaṁgāṁ tripathagāṁ nadīm ।
trailokyaṁ kathamākramya gatā nadanadīpatim ॥

"भगवन्! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि तीन मार्गों से प्रवाहित होनेवाली नदी ये गंगाजी किस प्रकार तीनों लोकों में घूमकर नदों और नदियों के स्वामी समुद्र में जा मिली हैं?"

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॥ १ · ३५ · १३ ॥
चोदितो रामवाक्येन विश्वामित्रो महामुनिः वृद्धिं जन्म गंगाया वक्तुमेवोपचक्रमे

codito rāmavākyena viśvāmitro mahāmuniḥ ।
vṛddhiṁ janma ca gaṁgāyā vaktumevopacakrame ॥

श्रीराम के इस प्रश्नद्वारा प्रेरित हो महामुनि विश्वामित्र ने गंगाजी की उत्पत्ति और वृद्धि की कथा कहना आरम्भ किया—

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॥ १ · ३५ · १४ ॥
शैलेन्द्रो हिमवान् राम धातूनामाकरो महान् तस्य कन्याद्वयं राम रूपेणाप्रतिमं भुवि

śailendro himavān rāma dhātūnāmākaro mahān ।
tasya kanyādvayaṁ rāma rūpeṇāpratimaṁ bhuvi ॥

"श्रीराम! हिमवान् नामक एक पर्वत है, जो समस्त पर्वतों का राजा तथा सब प्रकार के धातुओं का बहुत बड़ा खजाना है। हिमवान् की दो कन्याएँ हैं, जिनके सुन्दर रूप की इस भूतल पर कहीं तुलना नहीं है।"

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॥ १ · ३५ · १५ ॥
या मेरुदुहिता राम तयोर्माता सुमध्यमा नाम्ना मेना मनोज्ञा वै पत्नी हिमवतः प्रिया

yā meruduhitā rāma tayormātā sumadhyamā ।
nāmnā menā manojñā vai patnī himavataḥ priyā ॥

"मेरु पर्वत की मनोहारिणी पुत्री मेना हिमवान् की प्यारी पत्नी है। सुन्दर कटिप्रदेशवाली मेना ही उन दोनों कन्याओं की जननी हैं।"

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॥ १ · ३५ · १६ ॥
तस्यां गंगेयमभवज्ज्येष्ठा हिमवतः सुता उमा नाम द्वितीयाभूत् कन्या तस्यैव राघव

tasyāṁ gaṁgeyamabhavajjyeṣṭhā himavataḥ sutā ।
umā nāma dvitīyābhūt kanyā tasyaiva rāghava ॥

"रघुनन्दन! मेना के गर्भ से जो पहली कन्या उत्पन्न हुई, वही ये गंगाजी हैं। ये हिमवान् की ज्येष्ठ पुत्री हैं। हिमवान् की ही दूसरी कन्या, जो मेना के गर्भ से उत्पन्न हुई, उमा नाम से प्रसिद्ध हैं।"

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॥ १ · ३५ · १७ ॥
अथ ज्येष्ठां सुराः सर्वे देवकार्यचिकीर्षया शैलेन्द्रं वरयामासुर्गंगां त्रिपथगां नदीम्

atha jyeṣṭhāṁ surāḥ sarve devakāryacikīrṣayā ।
śailendraṁ varayāmāsurgaṁgāṁ tripathagāṁ nadīm ॥

"कुछ काल के पश्चात् सब देवताओं ने देवकार्य की सिद्धि के लिये ज्येष्ठ कन्या गंगाजी को, जो आगे चलकर स्वर्ग से त्रिपथगा नदी के रूप में अवतीर्ण हुईं, गिरिराज हिमालय से माँगा।"

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॥ १ · ३५ · १८ ॥
ददौ धर्मेण हिमवांस्तनयां लोकपावनीम् स्वच्छन्दपथगां गंगां त्रैलोक्यहितकाम्यया

dadau dharmeṇa himavāṁstanayāṁ lokapāvanīm ।
svacchandapathagāṁ gaṁgāṁ trailokyahitakāmyayā ॥

"हिमवान् ने त्रिभुवन का हित करने की इच्छा से स्वच्छन्द पथ पर विचरनेवाली अपनी लोकपावनी पुत्री गंगा को धर्मपूर्वक उन्हें दे दिया।"

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॥ १ · ३५ · १९ ॥
प्रतिगृह्य त्रिलोकार्थं त्रिलोकहितकांक्षिणः गंगामादाय तेऽगच्छन् कृतार्थेनान्तरात्मना

pratigṛhya trilokārthaṁ trilokahitakāṁkṣiṇaḥ ।
gaṁgāmādāya te'gacchan kṛtārthenāntarātmanā ॥

"तीनों लोकों के हित की इच्छावाले देवता त्रिभुवन की भलाई के लिये ही गंगाजी को लेकर मन-ही-मन कृतार्थता का अनुभव करते हुए चले गये।"

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॥ १ · ३५ · २० ॥
या चान्या शैलदुहिता कन्याऽऽसीद् रघुनन्दन उग्रं सुव्रतमास्थाय तपस्तेपे तपोधना

yā cānyā śailaduhitā kanyā''sīd raghunandana ।
ugraṁ suvratamāsthāya tapastepe tapodhanā ॥

"रघुनन्दन! गिरिराज की जो दूसरी कन्या उमा थीं, वे उत्तम एवं कठोर व्रत का पालन करती हुई घोर तपस्या में लग गयीं। उन्होंने तपोमय धन का संचय किया।"

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॥ १ · ३५ · २१ ॥
उग्रेण तपसा युक्तां ददौ शैलवरः सुताम् रुद्रायाप्रतिरूपाय उमां लोकनमस्कृताम्

ugreṇa tapasā yuktāṁ dadau śailavaraḥ sutām ।
rudrāyāpratirūpāya umāṁ lokanamaskṛtām ॥

"गिरिराज ने उग्र तपस्या में संलग्न हुई अपनी वह विश्ववन्दिता पुत्री उमा अनुपम प्रभावशाली भगवान् रुद्र को ब्याह दी।"

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॥ १ · ३५ · २२ ॥
एते ते शैलराजस्य सुते लोकनमस्कृते गंगा सरितां श्रेष्ठा उमादेवी राघव

ete te śailarājasya sute lokanamaskṛte ।
gaṁgā ca saritāṁ śreṣṭhā umādevī ca rāghava ॥

"रघुनन्दन! इस प्रकार सरिताओं में श्रेष्ठ गंगा तथा भगवती उमा — ये दोनों गिरिराज हिमालय की कन्याएँ हैं। सारा संसार इनके चरणों में मस्तक झुकाता है।"

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॥ १ · ३५ · २३ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा त्रिपथगामिनी खं गता प्रथमं तात गतिं गतिमतां वर

etat te sarvamākhyātaṁ yathā tripathagāminī ।
khaṁ gatā prathamaṁ tāta gatiṁ gatimatāṁ vara ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ३५ · २४ ॥
सैषा सुरनदी रम्या शैलेन्द्रतनया तदा सुरलोकं समारूढा विपापा जलवाहिनी

saiṣā suranadī ramyā śailendratanayā tadā ।
suralokaṁ samārūḍhā vipāpā jalavāhinī ॥

॥ २३–२४ ॥

"गतिशीलों में श्रेष्ठ तात श्रीराम! गंगाजी की उत्पत्ति के विषय में ये सारी बातें मैंने तुम्हें बता दीं। ये त्रिपथगामिनी कैसे हुईं? यह भी सुन लो। पहले तो ये आकाशमार्ग में गयी थीं। तत्पश्चात् ये गिरिराजकुमारी गंगा रमणीया देवनदी के रूप में देवलोक में आरूढ़ हुई थीं। फिर जलरूप में प्रवाहित हो लोगों के पाप दूर करती हुई रसातल में पहुँची थीं।"

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३५ ॥