वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ३४ · २३ श्लोकाःSarga 34 · 23 ślokas

गाधि की उत्पत्ति, कौशिकी की प्रशंसा, विश्वामित्रजी का कथा बंद करके आधी रात का वर्णन करते हुए सबको सोने की आज्ञा देकर शयन करना

The birth of Gādhi; praise of the Kauśikī; the midnight rest

अर्धरात्रि की कथा

“अर्धरात्रि की कथा”
॥ १ · ३४ · १४–१७ ॥

अर्धरात्रौ शोणतटे अग्निसमीपे विश्वामित्रः स्वकुलस्य कथां समाप्य रामलक्ष्मणौ निद्रार्थम् आदिशति; नक्षत्रचन्द्रोपशोभिते नभसि सर्वं शान्तम्।

अर्धरात्रि में शोणभद्र के तट पर जलती अग्नि के पास महर्षि विश्वामित्र अपने कुल और कौशिकी नदी की कथा समाप्त कर श्रीराम तथा लक्ष्मण को कुछ देर सोने का आदेश दे रहे हैं; नक्षत्रों से भरे आकाश में चन्द्रमा उदित है और नदी के जल पर चाँदनी झलमलाती है।

At midnight on the bank of the Shona, beside the glowing fire, the sage Vishvamitra finishes the tale of his lineage and the river Kaushiki and bids Rama and Lakshmana take some sleep; a crescent moon rises in the star-filled sky and its light shimmers upon the quiet river.

॥ १ · ३४ · १ ॥
कृतोद्वाहे गते तस्मिन् ब्रह्मदत्ते राघव अपुत्रः पुत्रलाभाय पौत्रीमिष्टिमकल्पयत्

kṛtodvāhe gate tasmin brahmadatte ca rāghava ।
aputraḥ putralābhāya pautrīmiṣṭimakalpayat ॥

रघुनन्दन! विवाह करके जब राजा ब्रह्मदत्त चले गये, तब पुत्रहीन महाराज कुशनाभ ने श्रेष्ठ पुत्र की प्राप्ति के लिये पुत्रेष्टि यज्ञ का अनुष्ठान किया।

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॥ १ · ३४ · २ ॥
इष्ट्यां तु वर्तमानायां कुशनाभं महीपतिम् उवाच परमोदारः कुशो ब्रह्मसुतस्तदा

iṣṭyāṁ tu vartamānāyāṁ kuśanābhaṁ mahīpatim ।
uvāca paramodāraḥ kuśo brahmasutastadā ॥

उस यज्ञ के होते समय परम उदार ब्रह्मकुमार महाराज कुश ने कुशनाभ से कहा—

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॥ १ · ३४ · ३ ॥
पुत्रस्ते सदृशः पुत्र भविष्यति सुधार्मिकः गाधिं प्राप्स्यसि तेन त्वं कीर्तिं लोके शाश्वतीम्

putraste sadṛśaḥ putra bhaviṣyati sudhārmikaḥ ।
gādhiṁ prāpsyasi tena tvaṁ kīrtiṁ loke ca śāśvatīm ॥

"बेटा! तुम्हें अपने समान ही परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त होगा। तुम 'गाधि' नामक पुत्र प्राप्त करोगे और उसके द्वारा तुम्हें संसार में अक्षय कीर्ति उपलब्ध होगी।"

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॥ १ · ३४ · ४ ॥
एवमुक्त्वा कुशो राम कुशनाभं महीपतिम् जगामाकाशमाविश्य ब्रह्मलोकं सनातनम्

evamuktvā kuśo rāma kuśanābhaṁ mahīpatim ।
jagāmākāśamāviśya brahmalokaṁ sanātanam ॥

श्रीराम! पृथ्वीपति कुशनाभ से ऐसा कहकर राजर्षि कुश आकाश में प्रविष्ट हो सनातन ब्रह्मलोक को चले गये।

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॥ १ · ३४ · ५ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य कुशनाभस्य धीमतः जज्ञे परमधर्मिष्ठो गाधिरित्येव नामतः

kasyacit tvatha kālasya kuśanābhasya dhīmataḥ ।
jajñe paramadharmiṣṭho gādhirityeva nāmataḥ ॥

कुछ काल के पश्चात् बुद्धिमान् राजा कुशनाभ के यहाँ परम धर्मात्मा 'गाधि' नामक पुत्र का जन्म हुआ।

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॥ १ · ३४ · ६ ॥
पिता मम काकुत्स्थ गाधिः परमधार्मिकः कुशवंशप्रसूतोऽस्मि कौशिको रघुनन्दन

sa pitā mama kākutstha gādhiḥ paramadhārmikaḥ ।
kuśavaṁśaprasūto'smi kauśiko raghunandana ॥

ककुत्स्थकुलभूषण रघुनन्दन! वे परम धर्मात्मा राजा गाधि मेरे पिता थे। मैं कुश के कुल में उत्पन्न होने के कारण 'कौशिक' कहलाता हूँ।

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॥ १ · ३४ · ७ ॥
पूर्वजा भगिनी चापि मम राघव सुव्रता नाम्ना सत्यवती नाम ऋचीके प्रतिपादिता

pūrvajā bhaginī cāpi mama rāghava suvratā ।
nāmnā satyavatī nāma ṛcīke pratipāditā ॥

राघव! मेरे एक ज्येष्ठ बहिन भी थी, जो उत्तम व्रत का पालन करनेवाली थी। उसका नाम सत्यवती था। वह ऋचीक मुनि को ब्याही गयी थी।

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॥ १ · ३४ · ८ ॥
सशरीरा गता स्वर्गं भर्तारमनुवर्तिनी कौशिकी परमोदारा प्रवृत्ता महानदी

saśarīrā gatā svargaṁ bhartāramanuvartinī ।
kauśikī paramodārā pravṛttā ca mahānadī ॥

अपने पति का अनुसरण करनेवाली सत्यवती शरीरसहित स्वर्गलोक को चली गयी थी। वही परम उदार महानदी कौशिकी के रूप में भी प्रकट होकर इस भूतल पर प्रवाहित होती है।

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॥ १ · ३४ · ९ ॥
दिव्या पुण्योदका रम्या हिमवन्तमुपाश्रिता लोकस्य हितकार्यार्थं प्रवृत्ता भगिनी मम

divyā puṇyodakā ramyā himavantamupāśritā ।
lokasya hitakāryārthaṁ pravṛttā bhaginī mama ॥

मेरी वह बहिन जगत् के हित के लिये हिमालय का आश्रय लेकर नदीरूप में प्रवाहित हुई। वह पुण्यसलिला दिव्य नदी बड़ी रमणीय है।

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॥ १ · ३४ · १० ॥
ततोऽहं हिमवत्पार्श्वे वसामि नियतः सुखम् भगिन्यां स्नेहसंयुक्तः कौशिक्यां रघुनन्दन

tato'haṁ himavatpārśve vasāmi niyataḥ sukham ।
bhaginyāṁ snehasaṁyuktaḥ kauśikyāṁ raghunandana ॥

रघुनन्दन! मेरा अपनी बहिन कौशिकी के प्रति बहुत स्नेह है; अतः मैं हिमालय के निकट उसीके तट पर नियमपूर्वक बड़े सुख से निवास करता हूँ।

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॥ १ · ३४ · ११ ॥
सा तु सत्यवती पुण्या सत्ये धर्मे प्रतिष्ठिता पतिव्रता महाभागा कौशिकी सरितां वरा

sā tu satyavatī puṇyā satye dharme pratiṣṭhitā ।
pativratā mahābhāgā kauśikī saritāṁ varā ॥

पुण्यमयी सत्यवती सत्य धर्म में प्रतिष्ठित है। वह परम सौभाग्यशालिनी पतिव्रता देवी यहाँ सरिताओं में श्रेष्ठ कौशिकी के रूप में विद्यमान है।

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॥ १ · ३४ · १२ ॥
अहं हि नियमाद् राम हित्वा तां समुपागतः सिद्धाश्रममनुप्राप्तः सिद्धोऽस्मि तव तेजसा

ahaṁ hi niyamād rāma hitvā tāṁ samupāgataḥ ।
siddhāśramamanuprāptaḥ siddho'smi tava tejasā ॥

श्रीराम! मैं यज्ञसम्बन्धी नियम की सिद्धि के लिये ही अपनी बहिन का सांनिध्य छोड़कर सिद्धाश्रम (बक्सर) में आया था। अब तुम्हारे तेज से मुझे वह सिद्धि प्राप्त हो गयी है।

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॥ १ · ३४ · १३ ॥
एषा राम ममोत्पत्तिः स्वस्य वंशस्य कीर्तिता देशस्य महाबाहो यन्मां त्वं परिपृच्छसि

eṣā rāma mamotpattiḥ svasya vaṁśasya kīrtitā ।
deśasya ca mahābāho yanmāṁ tvaṁ paripṛcchasi ॥

महाबाहु श्रीराम! तुमने मुझसे जो पूछा था, उसके उत्तर में मैंने तुम्हें शोणभद्रतटवर्ती देश का परिचय देते हुए यह अपनी तथा अपने कुल की उत्पत्ति बतायी है।

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॥ १ · ३४ · १४ ॥
गतोऽर्धरात्रः काकुत्स्थ कथाः कथयतो मम निद्रामभ्येहि भद्रं ते मा भूद् विघ्नोऽध्वनीह नः

gato'rdharātraḥ kākutstha kathāḥ kathayato mama ।
nidrāmabhyehi bhadraṁ te mā bhūd vighno'dhvanīha naḥ ॥

ककुत्स्थ! मेरे यह बातें कहते-कहते आधी रात बीत गयी। अब थोड़ी देर नींद ले लो। तुम्हारा कल्याण हो। मैं चाहता हूँ कि अधिक जागरण के कारण हमारी यात्रा में विघ्न न पड़े।

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॥ १ · ३४ · १५ ॥
निष्पन्दास्तरवः सर्वे निलीना मृगपक्षिणः नैशेन तमसा व्याप्ता दिशश्च रघुनन्दन

niṣpandāstaravaḥ sarve nilīnā mṛgapakṣiṇaḥ ।
naiśena tamasā vyāptā diśaśca raghunandana ॥

सारे वृक्ष निष्कम्प जान पड़ते हैं — इनका एक पत्ता भी नहीं हिलता है। पशु-पक्षी अपने-अपने वासस्थान में छिपकर बसेरे लेते हैं। रघुनन्दन! रात्रि के अन्धकार से सम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं।

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॥ १ · ३४ · १६ ॥
शनैर्विसृज्यते संध्या नभो नेत्रैरिवावृतम् नक्षत्रतारागहनं ज्योतिर्भिरवभासते

śanairvisṛjyate saṁdhyā nabho netrairivāvṛtam ।
nakṣatratārāgahanaṁ jyotirbhiravabhāsate ॥

धीरे-धीरे संध्या दूर चली गयी। नक्षत्रों तथा ताराओं से भरा हुआ आकाश (सहस्राक्ष इन्द्र की भाँति) सहस्रों ज्योतिर्मय नेत्रों से व्याप्त-सा होकर प्रकाशित हो रहा है।

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॥ १ · ३४ · १७ ॥
उत्तिष्ठते शीतांशुः शशी लोकतमोनुदः ह्लादयन् प्राणिनां लोके मनांसि प्रभया स्वया

uttiṣṭhate ca śītāṁśuḥ śaśī lokatamonudaḥ ।
hlādayan prāṇināṁ loke manāṁsi prabhayā svayā ॥

सम्पूर्ण लोक का अन्धकार दूर करनेवाले शीतरश्मि चन्द्रमा अपनी प्रभा से जगत् के प्राणियों के मन को आह्लाद प्रदान करते हुए उदित हो रहे हैं।

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॥ १ · ३४ · १८ ॥
नैशानि सर्वभूतानि प्रचरन्ति ततस्ततः यक्षराक्षससङ्घाश्च रौद्राश्च पिशिताशनाः

naiśāni sarvabhūtāni pracaranti tatastataḥ ।
yakṣarākṣasasaṅghāśca raudrāśca piśitāśanāḥ ॥

रात में विचरनेवाले समस्त प्राणी — यक्ष-राक्षसों के समुदाय तथा भयंकर पिशाच इधर-उधर विचर रहे हैं।

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॥ १ · ३४ · १९ ॥
एवमुक्त्वा महातेजा विरराम महामुनिः साधु साध्विति ते सर्वे मुनयो ह्यभ्यपूजयन्

evamuktvā mahātejā virarāma mahāmuniḥ ।
sādhu sādhviti te sarve munayo hyabhyapūjayan ॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये। उस समय सभी मुनियों ने साधुवाद देकर विश्वामित्रजी की भूरि-भूरि प्रशंसा की—

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॥ १ · ३४ · २० ॥
कुशिकानामयं वंशो महान् धर्मपरः सदा ब्रह्मोपमा महात्मानः कुशवंश्या नरोत्तमाः

kuśikānāmayaṁ vaṁśo mahān dharmaparaḥ sadā ।
brahmopamā mahātmānaḥ kuśavaṁśyā narottamāḥ ॥

"कुशपुत्रों का यह वंश सदा ही महान् धर्मपरायण रहा है। कुशवंशी महात्मा श्रेष्ठ मानव ब्रह्माजी के समान तेजस्वी हुए हैं।"

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॥ १ · ३४ · २१ ॥
विशेषेण भवानेव विश्वामित्र महायशः कौशिकी सरितां श्रेष्ठा कुलोद्योतकरी तव

viśeṣeṇa bhavāneva viśvāmitra mahāyaśaḥ ।
kauśikī saritāṁ śreṣṭhā kulodyotakarī tava ॥

"महायशस्वी विश्वामित्रजी! अपने वंश में सबसे बड़े महात्मा आप ही हैं तथा सरिताओं में श्रेष्ठ कौशिकी भी आपके कुल की कीर्ति को प्रकाशित करनेवाली है।"

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॥ १ · ३४ · २२ ॥
मुदितैर्मुनिशार्दूलैः प्रशस्तः कुशिकात्मजः निद्रामुपागमच्छ्रीमानस्तंगत इवांशुमान्

muditairmuniśārdūlaiḥ praśastaḥ kuśikātmajaḥ ।
nidrāmupāgamacchrīmānastaṁgata ivāṁśumān ॥

इस प्रकार आनन्दमग्न हुए उन मुनिवरोंद्वारा प्रशंसित श्रीमान् कौशिक मुनि अस्त हुए सूर्य की भाँति नींद लेने लगे।

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॥ १ · ३४ · २३ ॥
रामोऽपि सहसौमित्रिः किंचिदागतविस्मयः प्रशस्य मुनिशार्दूलं निद्रां समुपसेवते

rāmo'pi sahasaumitriḥ kiṁcidāgatavismayaḥ ।
praśasya muniśārdūlaṁ nidrāṁ samupasevate ॥

वह कथा सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीराम को भी कुछ विस्मय हो आया। वे भी मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र की सराहना करके नींद लेने लगे।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३४ ॥