राजा कुशनाभद्वारा कन्याओं के धैर्य एवं क्षमाशीलता की प्रशंसा, ब्रह्मदत्त की उत्पत्ति तथा उनके साथ कुशनाभ की कन्याओं का विवाह
Kuśanābha praises his daughters’ forbearance; Brahmadatta weds them
“ब्रह्मदत्त-विवाह”
॥ १ · ३३ · २२–२३ ॥
अग्निसाक्षिकं ब्रह्मदत्तः कुशनाभस्य शतं कन्याः क्रमेण पाणौ गृह्णाति; तत्स्पर्शमात्रेण ताः कुब्जत्वदोषात् मुक्ताः नीरोगाः शोभन्ते।
अग्नि को साक्षी बनाकर राजकुमार ब्रह्मदत्त कुशनाभ की सौ कन्याओं का क्रमशः पाणिग्रहण कर रहे हैं; उनके हाथों के स्पर्श मात्र से कन्याएँ कुब्जता के दोष से मुक्त हो नीरोग और परम शोभा से सम्पन्न हो उठी हैं, और चारों ओर जन हर्ष से हाथ उठाकर आशीर्वाद देते हैं।
Before the sacred fire, Prince Brahmadatta takes the hundred daughters of Kushanabha in marriage one by one; at the mere touch of his hand the maidens are freed of their crookedness, restored to health and radiant beauty, while all around the assembly raises its hands in joyful blessing.
tasya tad vacanaṁ śrutvā kuśanābhasya dhīmataḥ ।
śirobhiścaraṇau spṛṣṭvā kanyāśatamabhāṣata ॥
बुद्धिमान् महाराज कुशनाभ का वह वचन सुनकर उन सौ कन्याओं ने उनके चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—
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vāyuḥ sarvātmako rājan pradharṣayitumicchati ।
aśubhaṁ mārgamāsthāya na dharmaṁ pratyavekṣate ॥
"राजन्! सर्वत्र संचार करनेवाले वायुदेव अशुभ मार्ग का अवलम्बन करके हम पर बलात्कार करना चाहते थे। धर्म पर उनकी दृष्टि नहीं थी।"
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pitṛmatyaḥ sma bhadraṁ te svacchande na vayaṁ sthitāḥ ।
pitaraṁ no vṛṇīṣva tvaṁ yadi no dāsyate tava ॥
"हमने उनसे कहा — 'देव! आपका कल्याण हो, हमारे पिता विद्यमान हैं; हम स्वच्छन्द नहीं हैं। आप पिताजी के पास जाकर हमारा वरण कीजिये। यदि वे हमें आपको सौंप देंगे तो हम आपकी हो जायँगी'।"
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tena pāpānubandhena vacanaṁ na pratīcchatā ।
evaṁ bruvantyaḥ sarvāḥ sma vāyunābhihatā bhṛśam ॥
"परंतु उनका मन तो पाप से बँधा हुआ था। उन्होंने हमारी बात नहीं मानी। हम सब बहिनें ये ही धर्मसंगत बातें कह रही थीं, तो भी उन्होंने हमें गहरी चोट पहुँचायी — बिना अपराध के ही हमें पीड़ा दी।"
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tāsāṁ tu vacanaṁ śrutvā rājā paramadhārmikaḥ ।
pratyuvāca mahātejāḥ kanyāśatamanuttamam ॥
उनकी बात सुनकर परम धर्मात्मा महातेजस्वी राजा ने उन अपनी परम उत्तम सौ कन्याओं को इस प्रकार उत्तर दिया—
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kṣāntaṁ kṣamāvatāṁ putryaḥ kartavyaṁ sumahat kṛtam ।
aikamatyamupāgamya kulaṁ cāvekṣitaṁ mama ॥
"पुत्रियो! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है। यह तुमलोगों के द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है। तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुल की मर्यादा पर ही दृष्टि रखी है — कामभाव को अपने मन में स्थान नहीं दिया है — यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है।"
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alaṁkāro hi nārīṇāṁ kṣamā tu puruṣasya vā ।
duṣkaraṁ tacca vai kṣāntaṁ tridaśeṣu viśeṣataḥ ॥
yādṛśī vaḥ kṣamā putryaḥ sarvāsāmaviśeṣataḥ ।
"स्त्री हो या पुरुष, उसके लिये क्षमा ही आभूषण है। पुत्रियो! तुम सब लोगों में समानरूप से जैसी क्षमा या सहिष्णुता है, वह विशेषतः देवताओं के लिये भी दुष्कर ही है।"
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kṣamā dānaṁ kṣamā satyaṁ kṣamā yajñāśca putrikāḥ ॥
kṣamā yaśaḥ kṣamā dharmaḥ kṣamāyāṁ viṣṭhitaṁ jagat ।
"पुत्रियो! क्षमा दान है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है और क्षमा धर्म है, क्षमा पर भी यह सम्पूर्ण जगत् टिका हुआ है।"
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visṛjya kanyāḥ kākutstha rājā tridaśavikramaḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
mantrajño mantrayāmāsa pradānaṁ saha mantribhiḥ ।
deśe kāle ca kartavye sadṛśe pratipādanam ॥
ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम! देवतुल्य पराक्रमी राजा कुशनाभ ने कन्याओं से ऐसा कहकर उन्हें अन्तःपुर में जाने की आज्ञा दे दी और मन्त्रणा के तत्त्व को जाननेवाले उन नरेश ने स्वयं मन्त्रियों के साथ बैठकर कन्याओं के विवाह के विषय में विचार आरम्भ किया। विचारणीय विषय यह था कि 'किस देश में किस समय और किस सुपात्र वर के साथ उनका विवाह किया जाय?'
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etasminneva kāle tu cūlī nāma mahādyutiḥ ।
ūrdhvaretāḥ śubhācāro brāhmaṁ tapa upāgamat ॥
उन्हीं दिनों चूली नाम से प्रसिद्ध एक महातेजस्वी, सदाचारी एवं ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) मुनि वेदोक्त तप का अनुष्ठान कर रहे थे (अथवा ब्रह्मचिन्तनरूप तपस्या में संलग्न थे)।
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tapasyantamṛṣiṁ tatra gandharvī paryupāsate ।
somadā nāma bhadraṁ te ūrmilātanayā tadā ॥
श्रीराम! तुम्हारा भला हो, उस समय एक गन्धर्वकुमारी वहाँ रहकर उन तपस्वी मुनि की उपासना (अनुग्रह की इच्छा से सेवा) करती थी। उसका नाम था सोमदा। वह ऊर्मिला की पुत्री थी।
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sā ca taṁ praṇatā bhūtvā śuśrūṣaṇaparāyaṇā ।
uvāsa kāle dharmiṣṭhā tasyāstuṣṭo'bhavad guruḥ ॥
वह प्रतिदिन मुनि को प्रणाम करके उनकी सेवा में लगी रहती थी तथा धर्म में स्थित रहकर समय-समय पर सेवा के लिये उपस्थित होती थी; इससे उसके ऊपर वे गौरवशाली मुनि बहुत संतुष्ट हुए।
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sa ca tāṁ kālayogena provāca raghunandana ।
parituṣṭo'smi bhadraṁ te kiṁ karomi tava priyam ॥
रघुनन्दन! शुभ समय आने पर चूली ने उस गन्धर्वकन्या से कहा — "शुभे! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य सिद्ध करूँ।"
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parituṣṭaṁ muniṁ jñātvā gandharvī madhurasvaram ।
uvāca paramaprītā vākyajñā vākyakovidam ॥
मुनि को संतुष्ट जानकर गन्धर्व-कन्या बहुत प्रसन्न हुई। वह बोलने की कला जानती थी; उसने वाणी के मर्मज्ञ मुनि से मधुर स्वर में इस प्रकार कहा—
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lakṣmyā samudito brāhmyā brahmabhūto mahātapāḥ ।
brāhmeṇa tapasā yuktaṁ putramicchāmi dhārmikam ॥
"महर्षे! आप ब्राह्मी सम्पत्ति (ब्रह्मतेज) से सम्पन्न होकर ब्रह्मरूप हो गये हैं, अतएव आप महान् तपस्वी हैं। मैं आपसे ब्राह्म तप (ब्रह्म-ज्ञान एवं वेदोक्त तप) से युक्त धर्मात्मा पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ।"
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apatiścāsmi bhadraṁ te bhāryā cāsmi na kasyacit ।
brāhmeṇopagatāyāśca dātumarhasi me sutam ॥
"मुने! आपका भला हो। मेरे कोई पति नहीं है। मैं न तो किसी की पत्नी हुई हूँ और न आगे होऊँगी। आपकी सेवा में आयी हूँ; आप अपने ब्राह्म बल (तपःशक्ति) से मुझे पुत्र प्रदान करें।"
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tasyāḥ prasanno brahmarṣirdadau brāhmamanuttamam ।
brahmadatta iti khyātaṁ mānasaṁ cūlinaḥ sutam ॥
उस गन्धर्वकन्या की सेवा से संतुष्ट हुए ब्रह्मर्षि चूली ने उसे परम उत्तम ब्राह्म तप से सम्पन्न पुत्र प्रदान किया। वह उनके मानसिक संकल्प से प्रकट हुआ मानस पुत्र था। उसका नाम 'ब्रह्मदत्त' हुआ।
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sa rājā brahmadattastu purīmadhyavasat tadā ।
kāmpilyāṁ parayā lakṣmyā devarājo yathā divam ॥
(कुशनाभ के यहाँ जब कन्याओं के विवाह का विचार चल रहा था) उस समय राजा ब्रह्मदत्त उत्तम लक्ष्मी से सम्पन्न हो 'काम्पिल्या' नामक नगरी में उसी तरह निवास करते थे, जैसे स्वर्ग की अमरावतीपुरी में देवराज इन्द्र।
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sa buddhiṁ kṛtavān rājā kuśanābhaḥ sudhārmikaḥ ।
brahmadattāya kākutstha dātuṁ kanyāśataṁ tadā ॥
ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! तब परम धर्मात्मा राजा कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त के साथ अपनी सौ कन्याओं को ब्याह देने का निश्चय किया।
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tamāhūya mahātejā brahmadattaṁ mahīpatiḥ ।
dadau kanyāśataṁ rājā suprītenāntarātmanā ॥
महातेजस्वी भूपाल राजा कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त को बुलाकर अत्यन्त प्रसन्न चित्त से उन्हें अपनी सौ कन्याएँ सौंप दीं।
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yathākramaṁ tadā pāṇiṁ jagrāha raghunandana ।
brahmadatto mahīpālastāsāṁ devapatiryathā ॥
रघुनन्दन! उस समय देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी पृथ्वीपति ब्रह्मदत्त ने क्रमशः उन सभी कन्याओं का पाणिग्रहण किया।
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spṛṣṭamātre tadā pāṇau vikubjā vigatajvarāḥ ।
yuktāḥ paramayā lakṣmyā babhau kanyāśataṁ tadā ॥
विवाहकाल में उन कन्याओं के हाथों का ब्रह्मदत्त के हाथ से स्पर्श होते ही वे सब-की-सब कन्याएँ कुब्जत्वदोष से रहित, नीरोग तथा उत्तम शोभा से सम्पन्न प्रतीत होने लगीं।
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sa dṛṣṭvā vāyunā muktāḥ kuśanābho mahīpatiḥ ।
babhūva paramaprīto harṣaṁ lebhe punaḥ punaḥ ॥
वातरोग के रूप में आये हुए वायुदेव ने उन कन्याओं को छोड़ दिया — यह देख पृथ्वीपति राजा कुशनाभ बड़े प्रसन्न हुए और बारम्बार हर्ष का अनुभव करने लगे।
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kṛtodvāhaṁ tu rājānaṁ brahmadattaṁ mahīpatim ।
sadāraṁ preṣayāmāsa sopādhyāyagaṇaṁ tadā ॥
भूपाल राजा ब्रह्मदत्त का विवाह-कार्य सम्पन्न हो जाने पर महाराज कुशनाभ ने उन्हें पत्नियों तथा पुरोहितोंसहित आदरपूर्वक विदा किया।
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somadāpi sutaṁ dṛṣṭvā putrasya sadṛśīṁ kriyām ।
yathānyāyaṁ ca gandharvī snuṣāstāḥ pratyanandata ।
spṛṣṭvā spṛṣṭvā ca tāḥ kanyāḥ kuśanābhaṁ praśasya ca ॥
गन्धर्वी सोमदा ने अपने पुत्र को तथा उसके योग्य विवाह-सम्बन्ध को देखकर अपनी उन पुत्रवधुओं का यथोचितरूप से अभिनन्दन किया। उसने एक-एक करके उन सभी राजकन्याओं को हृदय से लगाया और महाराज कुशनाभ की सराहना करके वहाँ से प्रस्थान किया।
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३३ ॥