वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ३३ · २६ श्लोकाःSarga 33 · 26 ślokas

राजा कुशनाभद्वारा कन्याओं के धैर्य एवं क्षमाशीलता की प्रशंसा, ब्रह्मदत्त की उत्पत्ति तथा उनके साथ कुशनाभ की कन्याओं का विवाह

Kuśanābha praises his daughters’ forbearance; Brahmadatta weds them

ब्रह्मदत्त-विवाह

“ब्रह्मदत्त-विवाह”
॥ १ · ३३ · २२–२३ ॥

अग्निसाक्षिकं ब्रह्मदत्तः कुशनाभस्य शतं कन्याः क्रमेण पाणौ गृह्णाति; तत्स्पर्शमात्रेण ताः कुब्जत्वदोषात् मुक्ताः नीरोगाः शोभन्ते।

अग्नि को साक्षी बनाकर राजकुमार ब्रह्मदत्त कुशनाभ की सौ कन्याओं का क्रमशः पाणिग्रहण कर रहे हैं; उनके हाथों के स्पर्श मात्र से कन्याएँ कुब्जता के दोष से मुक्त हो नीरोग और परम शोभा से सम्पन्न हो उठी हैं, और चारों ओर जन हर्ष से हाथ उठाकर आशीर्वाद देते हैं।

Before the sacred fire, Prince Brahmadatta takes the hundred daughters of Kushanabha in marriage one by one; at the mere touch of his hand the maidens are freed of their crookedness, restored to health and radiant beauty, while all around the assembly raises its hands in joyful blessing.

॥ १ · ३३ · १ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कुशनाभस्य धीमतः शिरोभिश्चरणौ स्पृष्ट्वा कन्याशतमभाषत

tasya tad vacanaṁ śrutvā kuśanābhasya dhīmataḥ ।
śirobhiścaraṇau spṛṣṭvā kanyāśatamabhāṣata ॥

बुद्धिमान् महाराज कुशनाभ का वह वचन सुनकर उन सौ कन्याओं ने उनके चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · २ ॥
वायुः सर्वात्मको राजन् प्रधर्षयितुमिच्छति अशुभं मार्गमास्थाय धर्मं प्रत्यवेक्षते

vāyuḥ sarvātmako rājan pradharṣayitumicchati ।
aśubhaṁ mārgamāsthāya na dharmaṁ pratyavekṣate ॥

"राजन्! सर्वत्र संचार करनेवाले वायुदेव अशुभ मार्ग का अवलम्बन करके हम पर बलात्कार करना चाहते थे। धर्म पर उनकी दृष्टि नहीं थी।"

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · ३ ॥
पितृमत्यः स्म भद्रं ते स्वच्छन्दे वयं स्थिताः पितरं नो वृणीष्व त्वं यदि नो दास्यते तव

pitṛmatyaḥ sma bhadraṁ te svacchande na vayaṁ sthitāḥ ।
pitaraṁ no vṛṇīṣva tvaṁ yadi no dāsyate tava ॥

"हमने उनसे कहा — 'देव! आपका कल्याण हो, हमारे पिता विद्यमान हैं; हम स्वच्छन्द नहीं हैं। आप पिताजी के पास जाकर हमारा वरण कीजिये। यदि वे हमें आपको सौंप देंगे तो हम आपकी हो जायँगी'।"

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · ४ ॥
तेन पापानुबन्धेन वचनं प्रतीच्छता एवं ब्रुवन्त्यः सर्वाः स्म वायुनाभिहता भृशम्

tena pāpānubandhena vacanaṁ na pratīcchatā ।
evaṁ bruvantyaḥ sarvāḥ sma vāyunābhihatā bhṛśam ॥

"परंतु उनका मन तो पाप से बँधा हुआ था। उन्होंने हमारी बात नहीं मानी। हम सब बहिनें ये ही धर्मसंगत बातें कह रही थीं, तो भी उन्होंने हमें गहरी चोट पहुँचायी — बिना अपराध के ही हमें पीड़ा दी।"

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · ५ ॥
तासां तु वचनं श्रुत्वा राजा परमधार्मिकः प्रत्युवाच महातेजाः कन्याशतमनुत्तमम्

tāsāṁ tu vacanaṁ śrutvā rājā paramadhārmikaḥ ।
pratyuvāca mahātejāḥ kanyāśatamanuttamam ॥

उनकी बात सुनकर परम धर्मात्मा महातेजस्वी राजा ने उन अपनी परम उत्तम सौ कन्याओं को इस प्रकार उत्तर दिया—

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · ६ ॥
क्षान्तं क्षमावतां पुत्र्यः कर्तव्यं सुमहत् कृतम् ऐकमत्यमुपागम्य कुलं चावेक्षितं मम

kṣāntaṁ kṣamāvatāṁ putryaḥ kartavyaṁ sumahat kṛtam ।
aikamatyamupāgamya kulaṁ cāvekṣitaṁ mama ॥

"पुत्रियो! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है। यह तुमलोगों के द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है। तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुल की मर्यादा पर ही दृष्टि रखी है — कामभाव को अपने मन में स्थान नहीं दिया है — यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है।"

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · ७ ॥
अलंकारो हि नारीणां क्षमा तु पुरुषस्य वा दुष्करं तच्च वै क्षान्तं त्रिदशेषु विशेषतः यादृशी वः क्षमा पुत्र्यः सर्वासामविशेषतः

alaṁkāro hi nārīṇāṁ kṣamā tu puruṣasya vā ।
duṣkaraṁ tacca vai kṣāntaṁ tridaśeṣu viśeṣataḥ ॥
yādṛśī vaḥ kṣamā putryaḥ sarvāsāmaviśeṣataḥ ।

"स्त्री हो या पुरुष, उसके लिये क्षमा ही आभूषण है। पुत्रियो! तुम सब लोगों में समानरूप से जैसी क्षमा या सहिष्णुता है, वह विशेषतः देवताओं के लिये भी दुष्कर ही है।"

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · ८ ॥
क्षमा दानं क्षमा सत्यं क्षमा यज्ञाश्च पुत्रिकाः क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमायां विष्ठितं जगत्

kṣamā dānaṁ kṣamā satyaṁ kṣamā yajñāśca putrikāḥ ॥
kṣamā yaśaḥ kṣamā dharmaḥ kṣamāyāṁ viṣṭhitaṁ jagat ।

"पुत्रियो! क्षमा दान है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है और क्षमा धर्म है, क्षमा पर भी यह सम्पूर्ण जगत् टिका हुआ है।"

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · ९ ॥
विसृज्य कन्याः काकुत्स्थ राजा त्रिदशविक्रमः

visṛjya kanyāḥ kākutstha rājā tridaśavikramaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ३३ · १० ॥
मन्त्रज्ञो मन्त्रयामास प्रदानं सह मन्त्रिभिः देशे काले कर्तव्ये सदृशे प्रतिपादनम्

mantrajño mantrayāmāsa pradānaṁ saha mantribhiḥ ।
deśe kāle ca kartavye sadṛśe pratipādanam ॥

॥ ९–१० ॥

ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम! देवतुल्य पराक्रमी राजा कुशनाभ ने कन्याओं से ऐसा कहकर उन्हें अन्तःपुर में जाने की आज्ञा दे दी और मन्त्रणा के तत्त्व को जाननेवाले उन नरेश ने स्वयं मन्त्रियों के साथ बैठकर कन्याओं के विवाह के विषय में विचार आरम्भ किया। विचारणीय विषय यह था कि 'किस देश में किस समय और किस सुपात्र वर के साथ उनका विवाह किया जाय?'

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · ११ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु चूली नाम महाद्युतिः ऊर्ध्वरेताः शुभाचारो ब्राह्मं तप उपागमत्

etasminneva kāle tu cūlī nāma mahādyutiḥ ।
ūrdhvaretāḥ śubhācāro brāhmaṁ tapa upāgamat ॥

उन्हीं दिनों चूली नाम से प्रसिद्ध एक महातेजस्वी, सदाचारी एवं ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) मुनि वेदोक्त तप का अनुष्ठान कर रहे थे (अथवा ब्रह्मचिन्तनरूप तपस्या में संलग्न थे)।

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · १२ ॥
तपस्यन्तमृषिं तत्र गन्धर्वी पर्युपासते सोमदा नाम भद्रं ते ऊर्मिलातनया तदा

tapasyantamṛṣiṁ tatra gandharvī paryupāsate ।
somadā nāma bhadraṁ te ūrmilātanayā tadā ॥

श्रीराम! तुम्हारा भला हो, उस समय एक गन्धर्वकुमारी वहाँ रहकर उन तपस्वी मुनि की उपासना (अनुग्रह की इच्छा से सेवा) करती थी। उसका नाम था सोमदा। वह ऊर्मिला की पुत्री थी।

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · १३ ॥
सा तं प्रणता भूत्वा शुश्रूषणपरायणा उवास काले धर्मिष्ठा तस्यास्तुष्टोऽभवद् गुरुः

sā ca taṁ praṇatā bhūtvā śuśrūṣaṇaparāyaṇā ।
uvāsa kāle dharmiṣṭhā tasyāstuṣṭo'bhavad guruḥ ॥

वह प्रतिदिन मुनि को प्रणाम करके उनकी सेवा में लगी रहती थी तथा धर्म में स्थित रहकर समय-समय पर सेवा के लिये उपस्थित होती थी; इससे उसके ऊपर वे गौरवशाली मुनि बहुत संतुष्ट हुए।

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · १४ ॥
तां कालयोगेन प्रोवाच रघुनन्दन परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते किं करोमि तव प्रियम्

sa ca tāṁ kālayogena provāca raghunandana ।
parituṣṭo'smi bhadraṁ te kiṁ karomi tava priyam ॥

रघुनन्दन! शुभ समय आने पर चूली ने उस गन्धर्वकन्या से कहा — "शुभे! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य सिद्ध करूँ।"

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · १५ ॥
परितुष्टं मुनिं ज्ञात्वा गन्धर्वी मधुरस्वरम् उवाच परमप्रीता वाक्यज्ञा वाक्यकोविदम्

parituṣṭaṁ muniṁ jñātvā gandharvī madhurasvaram ।
uvāca paramaprītā vākyajñā vākyakovidam ॥

मुनि को संतुष्ट जानकर गन्धर्व-कन्या बहुत प्रसन्न हुई। वह बोलने की कला जानती थी; उसने वाणी के मर्मज्ञ मुनि से मधुर स्वर में इस प्रकार कहा—

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · १६ ॥
लक्ष्म्या समुदितो ब्राह्म्या ब्रह्मभूतो महातपाः ब्राह्मेण तपसा युक्तं पुत्रमिच्छामि धार्मिकम्

lakṣmyā samudito brāhmyā brahmabhūto mahātapāḥ ।
brāhmeṇa tapasā yuktaṁ putramicchāmi dhārmikam ॥

"महर्षे! आप ब्राह्मी सम्पत्ति (ब्रह्मतेज) से सम्पन्न होकर ब्रह्मरूप हो गये हैं, अतएव आप महान् तपस्वी हैं। मैं आपसे ब्राह्म तप (ब्रह्म-ज्ञान एवं वेदोक्त तप) से युक्त धर्मात्मा पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ।"

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · १७ ॥
अपतिश्चास्मि भद्रं ते भार्या चास्मि कस्यचित् ब्राह्मेणोपगतायाश्च दातुमर्हसि मे सुतम्

apatiścāsmi bhadraṁ te bhāryā cāsmi na kasyacit ।
brāhmeṇopagatāyāśca dātumarhasi me sutam ॥

"मुने! आपका भला हो। मेरे कोई पति नहीं है। मैं न तो किसी की पत्नी हुई हूँ और न आगे होऊँगी। आपकी सेवा में आयी हूँ; आप अपने ब्राह्म बल (तपःशक्ति) से मुझे पुत्र प्रदान करें।"

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · १८ ॥
तस्याः प्रसन्नो ब्रह्मर्षिर्ददौ ब्राह्ममनुत्तमम् ब्रह्मदत्त इति ख्यातं मानसं चूलिनः सुतम्

tasyāḥ prasanno brahmarṣirdadau brāhmamanuttamam ।
brahmadatta iti khyātaṁ mānasaṁ cūlinaḥ sutam ॥

उस गन्धर्वकन्या की सेवा से संतुष्ट हुए ब्रह्मर्षि चूली ने उसे परम उत्तम ब्राह्म तप से सम्पन्न पुत्र प्रदान किया। वह उनके मानसिक संकल्प से प्रकट हुआ मानस पुत्र था। उसका नाम 'ब्रह्मदत्त' हुआ।

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · १९ ॥
राजा ब्रह्मदत्तस्तु पुरीमध्यवसत् तदा काम्पिल्यां परया लक्ष्म्या देवराजो यथा दिवम्

sa rājā brahmadattastu purīmadhyavasat tadā ।
kāmpilyāṁ parayā lakṣmyā devarājo yathā divam ॥

(कुशनाभ के यहाँ जब कन्याओं के विवाह का विचार चल रहा था) उस समय राजा ब्रह्मदत्त उत्तम लक्ष्मी से सम्पन्न हो 'काम्पिल्या' नामक नगरी में उसी तरह निवास करते थे, जैसे स्वर्ग की अमरावतीपुरी में देवराज इन्द्र।

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · २० ॥
बुद्धिं कृतवान् राजा कुशनाभः सुधार्मिकः ब्रह्मदत्ताय काकुत्स्थ दातुं कन्याशतं तदा

sa buddhiṁ kṛtavān rājā kuśanābhaḥ sudhārmikaḥ ।
brahmadattāya kākutstha dātuṁ kanyāśataṁ tadā ॥

ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! तब परम धर्मात्मा राजा कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त के साथ अपनी सौ कन्याओं को ब्याह देने का निश्चय किया।

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · २१ ॥
तमाहूय महातेजा ब्रह्मदत्तं महीपतिः ददौ कन्याशतं राजा सुप्रीतेनान्तरात्मना

tamāhūya mahātejā brahmadattaṁ mahīpatiḥ ।
dadau kanyāśataṁ rājā suprītenāntarātmanā ॥

महातेजस्वी भूपाल राजा कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त को बुलाकर अत्यन्त प्रसन्न चित्त से उन्हें अपनी सौ कन्याएँ सौंप दीं।

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · २२ ॥
यथाक्रमं तदा पाणिं जग्राह रघुनन्दन ब्रह्मदत्तो महीपालस्तासां देवपतिर्यथा

yathākramaṁ tadā pāṇiṁ jagrāha raghunandana ।
brahmadatto mahīpālastāsāṁ devapatiryathā ॥

रघुनन्दन! उस समय देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी पृथ्वीपति ब्रह्मदत्त ने क्रमशः उन सभी कन्याओं का पाणिग्रहण किया।

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · २३ ॥
स्पृष्टमात्रे तदा पाणौ विकुब्जा विगतज्वराः युक्ताः परमया लक्ष्म्या बभौ कन्याशतं तदा

spṛṣṭamātre tadā pāṇau vikubjā vigatajvarāḥ ।
yuktāḥ paramayā lakṣmyā babhau kanyāśataṁ tadā ॥

विवाहकाल में उन कन्याओं के हाथों का ब्रह्मदत्त के हाथ से स्पर्श होते ही वे सब-की-सब कन्याएँ कुब्जत्वदोष से रहित, नीरोग तथा उत्तम शोभा से सम्पन्न प्रतीत होने लगीं।

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · २४ ॥
दृष्ट्वा वायुना मुक्ताः कुशनाभो महीपतिः बभूव परमप्रीतो हर्षं लेभे पुनः पुनः

sa dṛṣṭvā vāyunā muktāḥ kuśanābho mahīpatiḥ ।
babhūva paramaprīto harṣaṁ lebhe punaḥ punaḥ ॥

वातरोग के रूप में आये हुए वायुदेव ने उन कन्याओं को छोड़ दिया — यह देख पृथ्वीपति राजा कुशनाभ बड़े प्रसन्न हुए और बारम्बार हर्ष का अनुभव करने लगे।

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · २५ ॥
कृतोद्वाहं तु राजानं ब्रह्मदत्तं महीपतिम् सदारं प्रेषयामास सोपाध्यायगणं तदा

kṛtodvāhaṁ tu rājānaṁ brahmadattaṁ mahīpatim ।
sadāraṁ preṣayāmāsa sopādhyāyagaṇaṁ tadā ॥

भूपाल राजा ब्रह्मदत्त का विवाह-कार्य सम्पन्न हो जाने पर महाराज कुशनाभ ने उन्हें पत्नियों तथा पुरोहितोंसहित आदरपूर्वक विदा किया।

English translation coming soon.

॥ १ · ३३ · २६ ॥
सोमदापि सुतं दृष्ट्वा पुत्रस्य सदृशीं क्रियाम् यथान्यायं गन्धर्वी स्नुषास्ताः प्रत्यनन्दत स्पृष्ट्वा स्पृष्ट्वा ताः कन्याः कुशनाभं प्रशस्य

somadāpi sutaṁ dṛṣṭvā putrasya sadṛśīṁ kriyām ।
yathānyāyaṁ ca gandharvī snuṣāstāḥ pratyanandata ।
spṛṣṭvā spṛṣṭvā ca tāḥ kanyāḥ kuśanābhaṁ praśasya ca ॥

गन्धर्वी सोमदा ने अपने पुत्र को तथा उसके योग्य विवाह-सम्बन्ध को देखकर अपनी उन पुत्रवधुओं का यथोचितरूप से अभिनन्दन किया। उसने एक-एक करके उन सभी राजकन्याओं को हृदय से लगाया और महाराज कुशनाभ की सराहना करके वहाँ से प्रस्थान किया।

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३३ ॥