वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ३२ · २६ श्लोकाःSarga 32 · 26 ślokas

ब्रह्मपुत्र कुश के चार पुत्रों का वर्णन, शोणभद्र-तटवर्ती प्रदेश को वसु की भूमि बताना, कुशनाभ की सौ कन्याओं का वायु के कोप से 'कुब्जा' होना

The four sons of Kuśa; Kuśanābha’s hundred daughters bent by the Wind-god

वायु का कोप

“वायु का कोप”
॥ १ · ३२ · १६–२३ ॥

उद्याने विहरन्तीः कुशनाभस्य शतं कन्याः वायुदेवः प्रणयं याचते; ताभिः प्रत्याख्यातः कुपितः वायुः तासां सर्वाणि अङ्गानि वक्रीकरोति।

उद्यान में विचरती राजा कुशनाभ की सौ रूपवती कन्याओं को आँधी के रूप में प्रकट वायुदेव ने पत्नी बनने का प्रस्ताव दिया; पिता की अनुमति बिना अस्वीकार करने पर कुपित वायु उनके अंगों को मरोड़ रहा है, जिससे झंझा में बाल-वस्त्र उड़ते हुए वे झुककर कुब्जा हो जाती हैं।

As the hundred lovely daughters of King Kushanabha wander in their garden, the wind-god Vayu, manifest as a storm, demands them as brides; when they refuse without their father's leave, the enraged Vayu twists their limbs, and amid the gale of flying hair and garments they bend, crooked and bowed.

॥ १ · ३२ · १ ॥
ब्रह्मयोनिर्महानासीत् कुशो नाम महातपाः अक्लिष्टव्रतधर्मज्ञः सज्जनप्रतिपूजकः

brahmayonirmahānāsīt kuśo nāma mahātapāḥ ।
akliṣṭavratadharmajñaḥ sajjanapratipūjakaḥ ॥

(विश्वामित्रजी कहते हैं —) श्रीराम! पूर्वकाल में कुश नाम से प्रसिद्ध एक महातपस्वी राजा हो गये हैं। वे साक्षात् ब्रह्माजी के पुत्र थे। उनका प्रत्येक व्रत एवं संकल्प बिना किसी क्लेश या कठिनाई के ही पूर्ण होता था। वे धर्म के ज्ञाता, सत्पुरुषों का आदर करनेवाले और महान् थे।

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॥ १ · ३२ · २ ॥
महात्मा कुलीनायां युक्तायां सुमहाबलान् वैदर्भ्यां जनयामास चतुरः सदृशान् सुतान्

sa mahātmā kulīnāyāṁ yuktāyāṁ sumahābalān ।
vaidarbhyāṁ janayāmāsa caturaḥ sadṛśān sutān ॥

उत्तम कुल में उत्पन्न विदर्भदेश की राजकुमारी उनकी पत्नी थी। उसके गर्भ से उन महात्मा नरेश ने चार पुत्र उत्पन्न किये, जो उन्हींके समान थे।

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॥ १ · ३२ · ३ ॥
कुशाम्बं कुशनाभं असूर्तरजसं वसुम् दीप्तियुक्तान् महोत्साहान् क्षत्रधर्मचिकीर्षया

kuśāmbaṁ kuśanābhaṁ ca asūrtarajasaṁ vasum ।
dīptiyuktān mahotsāhān kṣatradharmacikīrṣayā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ३२ · ४ ॥
तानुवाच कुशः पुत्रान् धर्मिष्ठान् सत्यवादिनः क्रियतां पालनं पुत्रा धर्मं प्राप्स्यथ पुष्कलम्

tānuvāca kuśaḥ putrān dharmiṣṭhān satyavādinaḥ ।
kriyatāṁ pālanaṁ putrā dharmaṁ prāpsyatha puṣkalam ॥

॥ ३–४ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं — कुशाम्ब, कुशनाभ, असूर्तरजस तथा वसु। ये सब-के-सब तेजस्वी तथा महान् उत्साही थे। राजा कुश ने 'प्रजारक्षणरूप' क्षत्रिय-धर्म के पालन की इच्छा से अपने उन धर्मिष्ठ तथा सत्यवादी पुत्रों से कहा — "पुत्रो! प्रजा का पालन करो, इससे तुम्हें धर्म का पूरा-पूरा फल प्राप्त होगा।"

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॥ १ · ३२ · ५ ॥
कुशस्य वचनं श्रुत्वा चत्वारो लोकसत्तमाः निवेशं चक्रिरे सर्वे पुराणां नृवरास्तदा

kuśasya vacanaṁ śrutvā catvāro lokasattamāḥ ।
niveśaṁ cakrire sarve purāṇāṁ nṛvarāstadā ॥

अपने पिता महाराज कुश की यह बात सुनकर उन चारों लोकशिरोमणि नरश्रेष्ठ राजकुमारों ने उस समय अपने-अपने लिये पृथक्-पृथक् नगर निर्माण कराया।

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॥ १ · ३२ · ६ ॥
कुशाम्बस्तु महातेजाः कौशाम्बीमकरोत् पुरीम् कुशनाभस्तु धर्मात्मा पुरं चक्रे महोदयम्

kuśāmbastu mahātejāḥ kauśāmbīmakarot purīm ।
kuśanābhastu dharmātmā puraṁ cakre mahodayam ॥

महातेजस्वी कुशाम्ब ने 'कौशाम्बी' पुरी बसायी (जिसे आजकल 'कोसम' कहते हैं)। धर्मात्मा कुशनाभ ने 'महोदय' नामक नगर का निर्माण कराया।

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॥ १ · ३२ · ७ ॥
असूर्तरजसो नाम धर्मारण्यं महामतिः चक्रे पुरवरं राजा वसुर्नाम गिरिव्रजम्

asūrtarajaso nāma dharmāraṇyaṁ mahāmatiḥ ।
cakre puravaraṁ rājā vasurnāma girivrajam ॥

परम बुद्धिमान् असूर्तरजस ने 'धर्मारण्य' नामक एक श्रेष्ठ नगर बसाया तथा राजा वसु ने 'गिरिव्रज' नगर की स्थापना की।

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॥ १ · ३२ · ८ ॥
एषा वसुमती नाम वसोस्तस्य महात्मनः एते शैलवराः पञ्च प्रकाशन्ते समन्ततः

eṣā vasumatī nāma vasostasya mahātmanaḥ ।
ete śailavarāḥ pañca prakāśante samantataḥ ॥

महात्मा वसु की यह 'गिरिव्रज' नामक राजधानी वसुमती के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसके चारों ओर ये पाँच श्रेष्ठ पर्वत सुशोभित होते हैं।

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॥ १ · ३२ · ९ ॥
सुमागधी नदी रम्या मागधान् विश्रुताऽऽययौ पञ्चानां शैलमुख्यानां मध्ये मालेव शोभते

sumāgadhī nadī ramyā māgadhān viśrutā''yayau ।
pañcānāṁ śailamukhyānāṁ madhye māleva śobhate ॥

यह रमणीय (सोन) नदी दक्षिण-पश्चिम की ओर से बहती हुई मगध देश में आयी है, इसलिये यहाँ 'सुमागधी' के नाम से विख्यात हुई है। यह इन पाँच श्रेष्ठ पर्वतों के बीच में माला की भाँति सुशोभित हो रही है।

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॥ १ · ३२ · १० ॥
सैषा हि मागधी राम वसोस्तस्य महात्मनः पूर्वाभिचरिता राम सुक्षेत्रा सस्यमालिनी

saiṣā hi māgadhī rāma vasostasya mahātmanaḥ ।
pūrvābhicaritā rāma sukṣetrā sasyamālinī ॥

श्रीराम! इस प्रकार 'मागधी' नाम से प्रसिद्ध हुई यह सोन नदी पूर्वोक्त महात्मा वसु से सम्बन्ध रखती है। रघुनन्दन! यह दक्षिण-पश्चिम से आकर पूर्वोत्तर दिशा की ओर प्रवाहित हुई है। इसके दोनों तटों पर सुन्दर क्षेत्र (उपजाऊ खेत) हैं, अतः यह सदा सस्य-मालाओं से अलंकृत (हरी-भरी खेती से सुशोभित) रहती है।

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॥ १ · ३२ · ११ ॥
कुशनाभस्तु राजर्षिः कन्याशतमनुत्तमम् जनयामास धर्मात्मा घृताच्यां रघुनन्दन

kuśanābhastu rājarṣiḥ kanyāśatamanuttamam ।
janayāmāsa dharmātmā ghṛtācyāṁ raghunandana ॥

रघुकुल को आनन्दित करनेवाले श्रीराम! धर्मात्मा राजर्षि कुशनाभ ने घृताची अप्सरा के गर्भ से परम उत्तम सौ कन्याओं को जन्म दिया।

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॥ १ · ३२ · १२ ॥
तास्तु यौवनशालिन्यो रूपवत्यः स्वलंकृताः उद्यानभूमिमागम्य प्रावृषीव शतह्रदाः

tāstu yauvanaśālinyo rūpavatyaḥ svalaṁkṛtāḥ ।
udyānabhūmimāgamya prāvṛṣīva śatahradāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ३२ · १३ ॥
गायन्त्यो नृत्यमानाश्च वादयन्त्यश्च राघव आमोदं परमं जग्मुर्वराभरणभूषिताः

gāyantyo nṛtyamānāśca vādayantyaśca rāghava ।
āmodaṁ paramaṁ jagmurvarābharaṇabhūṣitāḥ ॥

॥ १२–१३ ॥

वे सब-की-सब सुन्दर रूप-लावण्य से सुशोभित थीं। धीरे-धीरे युवावस्था ने आकर उनके सौन्दर्य को और भी बढ़ा दिया। रघुवीर! एक दिन वस्त्र और आभूषणों से विभूषित हो वे सभी राजकन्याएँ उद्यान-भूमि में आकर वर्षाऋतु में प्रकाशित होनेवाली विद्युन्मालाओं की भाँति शोभा पाने लगीं। सुन्दर अलंकारों से अलंकृत हुई वे अंगनाएँ गाती, बजाती और नृत्य करती हुई वहाँ परम आमोद-प्रमोद में मग्न हो गयीं।

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॥ १ · ३२ · १४ ॥
अथ ताश्चारुसर्वांग्यो रूपेणाप्रतिमा भुवि उद्यानभूमिमागम्य तारा इव घनान्तरे

atha tāścārusarvāṁgyo rūpeṇāpratimā bhuvi ।
udyānabhūmimāgamya tārā iva ghanāntare ॥

उनके सभी अंग बड़े मनोहर थे। इस भूतल पर उनके रूप-सौन्दर्य की कहीं भी तुलना नहीं थी। उस उद्यान में आकर वे बादलों की ओट में कुछ-कुछ छिपी हुई तारिकाओं के समान शोभा पा रही थीं।

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॥ १ · ३२ · १५ ॥
ताः सर्वा गुणसम्पन्ना रूपयौवनसंयुताः दृष्ट्वा सर्वात्मको वायुरिदं वचनमब्रवीत्

tāḥ sarvā guṇasampannā rūpayauvanasaṁyutāḥ ।
dṛṣṭvā sarvātmako vāyuridaṁ vacanamabravīt ॥

उस समय उत्तम गुणों से सम्पन्न तथा रूप और यौवन से सुशोभित उन सब राजकन्याओं को देखकर सर्वस्वरूप वायु देवता ने उनसे इस प्रकार कहा—

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॥ १ · ३२ · १६ ॥
अहं वः कामये सर्वा भार्या मम भविष्यथ मानुषस्त्यज्यतां भावो दीर्घमायुरवाप्स्यथ

ahaṁ vaḥ kāmaye sarvā bhāryā mama bhaviṣyatha ।
mānuṣastyajyatāṁ bhāvo dīrghamāyuravāpsyatha ॥

"सुन्दरियो! मैं तुम सब को अपनी प्रेयसी के रूप में प्राप्त करना चाहता हूँ। तुम सब मेरी भार्याएँ बनोगी। अब मनुष्यभाव का त्याग करो और मुझे अंगीकार करके देवांगनाओं की भाँति दीर्घ आयु प्राप्त कर लो।"

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॥ १ · ३२ · १७ ॥
चलं हि यौवनं नित्यं मानुषेषु विशेषतः अक्षय्यं यौवनं प्राप्ता अमर्यश्च भविष्यथ

calaṁ hi yauvanaṁ nityaṁ mānuṣeṣu viśeṣataḥ ।
akṣayyaṁ yauvanaṁ prāptā amaryaśca bhaviṣyatha ॥

"विशेषतः मानव-शरीर में जवानी कभी स्थिर नहीं रहती — प्रतिक्षण क्षीण होती जाती है। मेरे साथ सम्बन्ध हो जाने पर तुमलोग अक्षय यौवन प्राप्त करके अमर हो जाओगी।"

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॥ १ · ३२ · १८ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वायोरक्लिष्टकर्मणः अपहास्य ततो वाक्यं कन्याशतमथाब्रवीत्

tasya tad vacanaṁ śrutvā vāyorakliṣṭakarmaṇaḥ ।
apahāsya tato vākyaṁ kanyāśatamathābravīt ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले वायुदेव का यह कथन सुनकर वे सौ कन्याएँ अवहेलनापूर्वक हँसकर बोलीं—

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॥ १ · ३२ · १९ ॥
अन्तश्चरसि भूतानां सर्वेषां सुरसत्तम प्रभावज्ञाश्च ते सर्वाः किमर्थमवमन्यसे

antaścarasi bhūtānāṁ sarveṣāṁ surasattama ।
prabhāvajñāśca te sarvāḥ kimarthamavamanyase ॥

"सुरश्रेष्ठ! आप प्राणवायु के रूप में समस्त प्राणियों के भीतर विचरते हैं (अतः सबके मन की बातें जानते हैं; आपको यह मालूम होगा कि हमारे मन में आपके प्रति कोई आकर्षण नहीं है)। हम सब बहिनें आपके अनुपम प्रभाव को भी जानती हैं (तो भी हमारा आपके प्रति अनुराग नहीं है); ऐसी दशा में यह अनुचित प्रस्ताव करके आप हमारा अपमान किसलिये कर रहे हैं?"

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॥ १ · ३२ · २० ॥
कुशनाभसुता देव समस्ताः सुरसत्तम स्थानाच्च्यावयितुं देवं रक्षामस्तपो वयम्

kuśanābhasutā deva samastāḥ surasattama ।
sthānāccyāvayituṁ devaṁ rakṣāmastapo vayam ॥

"देव! देवशिरोमणे! हम सब-की-सब राजर्षि कुशनाभ की कन्याएँ हैं। देवता होने पर भी आपको शाप देकर वायुपद से भ्रष्ट कर सकती हैं, किंतु ऐसा करना नहीं चाहतीं; क्योंकि हम अपने तप को सुरक्षित रखती हैं।"

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॥ १ · ३२ · २१ ॥
मा भूत् कालो दुर्मेधः पितरं सत्यवादिनम् अवमन्य स्वधर्मेण स्वयंवरमुपास्महे

mā bhūt sa kālo durmedhaḥ pitaraṁ satyavādinam ।
avamanya svadharmeṇa svayaṁvaramupāsmahe ॥

"दुर्मते! वह समय कभी न आवे, जब कि हम अपने सत्यवादी पिता की अवहेलना करके कामवश या अत्यन्त अधर्मपूर्वक स्वयं ही वर ढूँढ़ने लगें।"

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॥ १ · ३२ · २२ ॥
पिता हि प्रभुरस्माकं दैवतं परमं सः यस्य नो दास्यति पिता नो भर्ता भविष्यति

pitā hi prabhurasmākaṁ daivataṁ paramaṁ ca saḥ ।
yasya no dāsyati pitā sa no bhartā bhaviṣyati ॥

"हमलोगों पर हमारे पिताजी का प्रभुत्व है, वे हमारे लिये सर्वश्रेष्ठ देवता हैं। पिताजी हमें जिसके हाथ में दे देंगे, वही हमारा पति होगा।"

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॥ १ · ३२ · २३ ॥
तासां तु वचनं श्रुत्वा हरिः परमकोपनः प्रविश्य सर्वगात्राणि बभञ्ज भगवान् प्रभुः अरत्निमात्राकृतयो भग्नगात्रा भयार्दिताः

tāsāṁ tu vacanaṁ śrutvā hariḥ paramakopanaḥ ।
praviśya sarvagātrāṇi babhañja bhagavān prabhuḥ ॥
aratnimātrākṛtayo bhagnagātrā bhayārditāḥ ।

उनकी यह बात सुनकर वायुदेव अत्यन्त कुपित हो उठे। उन ऐश्वर्यशाली प्रभु ने उनके भीतर प्रविष्ट हो सब अंगों को मोड़कर टेढ़ा कर दिया। शरीर मुड़ जाने के कारण वे कुबड़ी हो गयीं। उनकी आकृति मुट्ठी बँधे हुए एक हाथ के बराबर हो गयी। वे भय से व्याकुल हो उठीं।

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॥ १ · ३२ · २४ ॥
ताः कन्या वायुना भग्ना विविशुर्नृपतेर्गृहम् प्रविश्य सुसम्भ्रान्ताः सलज्जाः सास्रलोचनाः

tāḥ kanyā vāyunā bhagnā viviśurnṛpatergṛham ।
praviśya ca susambhrāntāḥ salajjāḥ sāsralocanāḥ ॥

वायुदेव के द्वारा कुबड़ी की हुई उन कन्याओं ने राजभवन में प्रवेश किया। प्रवेश करके वे लज्जित और उद्विग्न हो गयीं। उनके नेत्रों से आँसुओं की धाराएँ बहने लगीं।

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॥ १ · ३२ · २५ ॥
ता दयिता भग्नाः कन्याः परमशोभनाः दृष्ट्वा दीनास्तदा राजा सम्भ्रान्त इदमब्रवीत्

sa ca tā dayitā bhagnāḥ kanyāḥ paramaśobhanāḥ ।
dṛṣṭvā dīnāstadā rājā sambhrānta idamabravīt ॥

अपनी परम सुन्दरी प्यारी पुत्रियों को कुब्जता के कारण अत्यन्त दयनीय दशा में पड़ी देख राजा कुशनाभ घबरा गये और इस प्रकार बोले—

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॥ १ · ३२ · २६ ॥
किमिदं कथ्यतां पुत्र्यः को धर्ममवमन्यते कुब्जाः केन कृताः सर्वाश्चेष्टन्त्यो नाभिभाषथ एवं राजा विनिःश्वस्य समाधिं संदधे ततः

kimidaṁ kathyatāṁ putryaḥ ko dharmamavamanyate ।
kubjāḥ kena kṛtāḥ sarvāśceṣṭantyo nābhibhāṣatha ।
evaṁ rājā viniḥśvasya samādhiṁ saṁdadhe tataḥ ॥

"पुत्रियो! यह क्या हुआ? बताओ। कौन प्राणी धर्म की अवहेलना करता है? किसने तुम्हें कुबड़ी बना दिया, जिससे तुम तड़प रही हो, किंतु कुछ बताती नहीं हो।" यों कहकर राजा ने लंबी साँस खींची और उनका उत्तर सुनने के लिये वे सावधान होकर बैठ गये।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३२ ॥