वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः १३ · ४१ श्लोकाःSarga 13 · 41 ślokas

राजा का वसिष्ठजी से यज्ञ की तैयारी के लिये अनुरोध, वसिष्ठजी द्वारा इसके लिये सेवकों की नियुक्ति और सुमन्त्र को राजाओं को बुलाने के लिये आदेश, समागत राजाओं का सत्कार तथा पत्नियोंसहित राजा दशरथ का यज्ञ की दीक्षा लेना

Vasiṣṭha directs the preparations; the kings are welcomed; Daśaratha takes the vow

यज्ञ-दीक्षा

“यज्ञ-दीक्षा”
॥ १ · १३ · २४–४१ ॥

विशाले यज्ञभूमौ वृद्धो राजा दशरथः सहधर्मचारिण्या कौसल्यया सह दीक्षां गृह्णाति; श्वेतश्मश्रुर्वसिष्ठः पवित्रजलेन प्रोक्ष्य व्रतसूत्रं बध्नाति; पृष्ठतो महान् यज्ञवेदिर्मण्डपाश्च, आगच्छन्तो नृपाः, मन्त्रघोषका द्विजाः; राज्ञो मुखं संकल्पतेजसा दीप्तम्।

विशाल यज्ञभूमि में वृद्ध राजा दशरथ अपनी पटरानी कौसल्या के साथ दीक्षा ग्रहण कर रहे हैं; श्वेत-श्मश्रुधारी वसिष्ठ पवित्र जल से अभिषेक कर व्रत-सूत्र बाँध रहे हैं; पीछे विशाल यज्ञवेदी और मण्डप, आते हुए अतिथि-राजा, मन्त्र पढ़ते ब्राह्मण; राजा का मुख संकल्प के तेज से दीप्त है।

On the vast sacrificial ground the aged King Dasharatha, beside his chief queen Kausalya, is consecrated for the rite by the white-bearded priest Vasishtha, who sprinkles holy water and binds the vow-thread upon him; the great fire-altar and pavilions rise behind, guest-kings arriving and brahmins chanting, the king's face solemn and radiant with dedication.

॥ १ · १३ · १ ॥
पुनः प्राप्ते वसन्ते तु पूर्णः संवत्सरोऽभवत् प्रसवार्थं गतो यष्टुं हयमेधेन वीर्यवान्

punaḥ prāpte vasante tu pūrṇaḥ saṁvatsaro'bhavat ।
prasavārthaṁ gato yaṣṭuṁ hayamedhena vīryavān ॥

वर्तमान वसन्त ऋतु के बीतने पर जब पुनः दूसरा वसन्त आया, तब तक एक वर्ष का समय पूरा हो गया। उस समय शक्तिशाली राजा दशरथ संतान के लिये अश्वमेध यज्ञ की दीक्षा लेने के निमित्त वसिष्ठजी के समीप गये।

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॥ १ · १३ · २ ॥
अभिवाद्य वसिष्ठं न्यायतः प्रतिपूज्य अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं प्रसवार्थं द्विजोत्तमम्

abhivādya vasiṣṭhaṁ ca nyāyataḥ pratipūjya ca ।
abravīt praśritaṁ vākyaṁ prasavārthaṁ dvijottamam ॥

वसिष्ठजी को प्रणाम करके राजा ने न्यायतः उनका पूजन किया और पुत्र-प्राप्ति का उद्देश्य लेकर उन द्विजश्रेष्ठ मुनि से यह विनययुक्त बात कही।

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॥ १ · १३ · ३ ॥
यज्ञो मे क्रियतां ब्रह्मन् यथोक्तं मुनिपुंगव यथा विघ्नः क्रियते यज्ञांगेषु विधीयताम्

yajño me kriyatāṁ brahman yathoktaṁ munipuṁgava ।
yathā na vighnaḥ kriyate yajñāṁgeṣu vidhīyatām ॥

"ब्रह्मन्! मुनिप्रवर! आप शास्त्रविधि के अनुसार मेरा यज्ञ करावें और यज्ञ के अंगभूत अश्व-संचारण आदि में ब्रह्मराक्षस आदि जिस तरह विघ्न न डाल सकें, वैसा उपाय कीजिये।"

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॥ १ · १३ · ४ ॥
भवान् स्निग्धः सुहृन्मह्यं गुरुश्च परमो महान् वोढव्यो भवता चैव भारो यज्ञस्य चोद्यतः

bhavān snigdhaḥ suhṛnmahyaṁ guruśca paramo mahān ।
voḍhavyo bhavatā caiva bhāro yajñasya codyataḥ ॥

"आपका मुझ पर विशेष स्नेह है, आप मेरे सुहृद् — अकारण हितैषी, गुरु और परम महान् हैं। यह जो यज्ञ का भार उपस्थित हुआ है, इसको आप ही वहन कर सकते हैं।"

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॥ १ · १३ · ५ ॥
तथेति राजानमब्रवीद् द्विजसत्तमः करिष्ये सर्वमेवैतद् भवता यत् समर्थितम्

tatheti ca sa rājānamabravīd dvijasattamaḥ ।
kariṣye sarvamevaitad bhavatā yat samarthitam ॥

तब "बहुत अच्छा" कहकर विप्रवर वसिष्ठ मुनि राजा से इस प्रकार बोले — "नरेश्वर! तुमने जिसके लिये प्रार्थना की है, वह सब मैं करूँगा।"

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॥ १ · १३ · ६ ॥
ततोऽब्रवीद् द्विजान् वृद्धान् यज्ञकर्मसुनिष्ठितान् स्थापत्ये निष्ठितांश्चैव वृद्धान् परमधार्मिकान्

tato'bravīd dvijān vṛddhān yajñakarmasuniṣṭhitān ।
sthāpatye niṣṭhitāṁścaiva vṛddhān paramadhārmikān ॥

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॥ १ · १३ · ७ ॥
कर्मांतिकान् शिल्पकारान् वर्धकीन् खनकानपि गणकान् शिल्पिनश्चैव तथैव नटनर्तकान्

karmāṁtikān śilpakārān vardhakīn khanakānapi ।
gaṇakān śilpinaścaiva tathaiva naṭanartakān ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १३ · ८ ॥
तथा शुचीन् शास्त्रविदः पुरुषान् सुबहुश्रुतान् यज्ञकर्म समीहन्तां भवन्तो राजशासनात्

tathā śucīn śāstravidaḥ puruṣān subahuśrutān ।
yajñakarma samīhantāṁ bhavanto rājaśāsanāt ॥

॥ ६–८ ॥

तदनन्तर वसिष्ठजी ने यज्ञसम्बन्धी कर्मों में निपुण तथा यज्ञविषयक शिल्पकर्म में कुशल, परम धर्मात्मा, बूढ़े ब्राह्मणों, यज्ञकर्म समाप्त होने तक उसमें सेवा करनेवाले सेवकों, शिल्पकारों, बढ़इयों, भूमि खोदनेवालों, ज्योतिषियों, कारीगरों, नटों, नर्तकों, विशुद्ध शास्त्रवेत्ताओं तथा बहुश्रुत पुरुषों को बुलाकर उनसे कहा — "तुमलोग महाराज की आज्ञा से यज्ञकर्म के लिये आवश्यक प्रबन्ध करो।"

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॥ १ · १३ · ९ ॥
इष्टका बहुसाहस्री शीघ्रमानीयतामिति उपकार्याः क्रियन्तां राज्ञो बहुगुणान्विताः

iṣṭakā bahusāhasrī śīghramānīyatāmiti ।
upakāryāḥ kriyantāṁ ca rājño bahuguṇānvitāḥ ॥

"शीघ्र ही कई हजार ईंटें लायी जायँ। राजाओं के ठहरने के लिये उनके योग्य अन्न-पान आदि अनेक उपकरणों से युक्त बहुत-से महल बनाये जायँ।"

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॥ १ · १३ · १० ॥
ब्राह्मणावसथाश्चैव कर्तव्याः शतशः शुभाः भक्ष्यान्नपानैर्बहुभिः समुपेताः सुनिष्ठिताः

brāhmaṇāvasathāścaiva kartavyāḥ śataśaḥ śubhāḥ ।
bhakṣyānnapānairbahubhiḥ samupetāḥ suniṣṭhitāḥ ॥

"ब्राह्मणों के रहने के लिये भी सैकड़ों सुन्दर घर बनाये जाने चाहिये। वे सभी गृह बहुत-से भोजनीय अन्न-पान आदि उपकरणों से युक्त तथा आँधी-पानी आदि के निवारण में समर्थ हों।"

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॥ १ · १३ · ११ ॥
तथा पौरजनस्यापि कर्तव्याश्च सुविस्तराः आगतानां सुदूराच्च पार्थिवानां पृथक् पृथक्

tathā paurajanasyāpi kartavyāśca suvistarāḥ ।
āgatānāṁ sudūrācca pārthivānāṁ pṛthak pṛthak ॥

"इसी तरह पुरवासियों के लिये भी विस्तृत मकान बनने चाहिये। दूर से आये हुए भूपालों के लिये पृथक्-पृथक् महल बनाये जायँ।"

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॥ १ · १३ · १२ ॥
वाजिवारणशालाश्च तथा शय्यागृहाणि भटानां महदावासा वैदेशिकनिवासिनाम्

vājivāraṇaśālāśca tathā śayyāgṛhāṇi ca ।
bhaṭānāṁ mahadāvāsā vaideśikanivāsinām ॥

"घोड़े और हाथियों के लिये भी शालाएँ बनायी जायँ। साधारण लोगों के सोने के लिये भी घरों की व्यवस्था हो। विदेशी सैनिकों के लिये भी बड़ी-बड़ी छावनियाँ बननी चाहिये।"

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॥ १ · १३ · १३ ॥
आवासा बहुभक्ष्या वै सर्वकामैरुपस्थिताः तथा पौरजनस्यापि जनस्य बहुशोभनम् दातव्यमन्नं विधिवत् सत्कृत्य तु लीलया

āvāsā bahubhakṣyā vai sarvakāmairupasthitāḥ ।
tathā paurajanasyāpi janasya bahuśobhanam ॥
dātavyamannaṁ vidhivat satkṛtya na tu līlayā ।

"जो घर बनाये जायँ, उनमें खाने-पीने की प्रचुर सामग्री संचित रहे। उनमें सभी मनोवांछित पदार्थ सुलभ हों तथा नगरवासियों को भी बहुत सुन्दर अन्न भोजन के लिये देना चाहिये। वह भी विधिवत् सत्कारपूर्वक दिया जाय, अवहेलना करके नहीं।"

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॥ १ · १३ · १४ ॥
सर्वे वर्णा यथा पूजां प्राप्नुवन्ति सुसत्कृताः चावज्ञा प्रयोक्तव्या कामक्रोधवशादपि

sarve varṇā yathā pūjāṁ prāpnuvanti susatkṛtāḥ ॥
na cāvajñā prayoktavyā kāmakrodhavaśādapi ।

"ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये, जिससे सभी वर्ण के लोग भलीभाँति सत्कृत हो सम्मान प्राप्त करें। काम और क्रोध के वशीभूत होकर भी किसी का अनादर नहीं करना चाहिये।"

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॥ १ · १३ · १५ ॥
यज्ञकर्मसु ये व्यग्राः पुरुषाः शिल्पिनस्तथा तेषामपि विशेषेण पूजा कार्या यथाक्रमम्

yajñakarmasu ye vyagrāḥ puruṣāḥ śilpinastathā ॥
teṣāmapi viśeṣeṇa pūjā kāryā yathākramam ।

"जो शिल्पी आदि मनुष्य यज्ञकर्म की आवश्यक तैयारी में लगे हों, उनका तो बड़े-छोटे का खयाल रखकर विशेषरूप से समादर करना चाहिये।"

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॥ १ · १३ · १६ ॥
ये स्युः सम्पूजिताः सर्वे वसुभिर्भोजनेन

ye syuḥ sampūjitāḥ sarve vasubhirbhojanena ca ॥

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॥ १ · १३ · १७ ॥
यथा सर्वं सुविहितं किंचित् परिहीयते तथा भवन्तः कुर्वन्तु प्रीतियुक्तेन चेतसा

yathā sarvaṁ suvihitaṁ na kiṁcit parihīyate ।
tathā bhavantaḥ kurvantu prītiyuktena cetasā ॥

॥ १६–१७ ॥

"जो सेवक या कारीगर धन और भोजन आदि के द्वारा सम्मानित किये जाते हैं, वे सब परिश्रमपूर्वक कार्य करते हैं। उनका किया हुआ सारा कार्य सुन्दर ढंग से सम्पन्न होता है। उनका कोई काम बिगड़ने नहीं पाता; अतः तुम सब लोग प्रसन्नचित्त होकर ऐसा ही करो।"

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॥ १ · १३ · १८ ॥
ततः सर्वे समागम्य वसिष्ठमिदमब्रुवन् यथेष्टं तत् सुविहितं किंचित् परिहीयते यथोक्तं तत् करिष्यामो किंचित् परिहास्यते

tataḥ sarve samāgamya vasiṣṭhamidamabruvan ।
yatheṣṭaṁ tat suvihitaṁ na kiṁcit parihīyate ॥
yathoktaṁ tat kariṣyāmo na kiṁcit parihāsyate ।

तब वे सब लोग वसिष्ठजी से मिलकर बोले — "आपको जैसा अभीष्ट है, उसके अनुसार ही करने के लिये अच्छी व्यवस्था की जायगी। कोई भी काम बिगड़ने नहीं पायेगा। आपने जैसा कहा है, हमलोग वैसा ही करेंगे। उसमें कोई त्रुटि नहीं आने देंगे।"

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॥ १ · १३ · १९ ॥
ततः सुमन्त्रमाहूय वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्

tataḥ sumantramāhūya vasiṣṭho vākyamabravīt ॥

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॥ १ · १३ · २० ॥
निमन्त्रयस्व नृपतीन् पृथिव्यां ये धार्मिकाः ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रांश्चैव सहस्रशः

nimantrayasva nṛpatīn pṛthivyāṁ ye ca dhārmikāḥ ।
brāhmaṇān kṣatriyān vaiśyān śūdrāṁścaiva sahasraśaḥ ॥

॥ १९–२० ॥

तदनन्तर वसिष्ठजी ने सुमन्त्र को बुलाकर कहा — "इस पृथ्वी पर जो-जो धार्मिक राजा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और सहस्रों शूद्र हैं, उन सबको इस यज्ञ में आने के लिये निमन्त्रित करो।"

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॥ १ · १३ · २१ ॥
समानयस्व सत्कृत्य सर्वदेशेषु मानवान् मिथिलाधिपतिं शूरं जनकं सत्यवादिनम्

samānayasva satkṛtya sarvadeśeṣu mānavān ।
mithilādhipatiṁ śūraṁ janakaṁ satyavādinam ॥

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॥ १ · १३ · २२ ॥
तमानय महाभागं स्वयमेव सुसत्कृतम् पूर्वं सम्बन्धिनं ज्ञात्वा ततः पूर्वं ब्रवीमि ते

tamānaya mahābhāgaṁ svayameva susatkṛtam ।
pūrvaṁ sambandhinaṁ jñātvā tataḥ pūrvaṁ bravīmi te ॥

॥ २१–२२ ॥

"सब देशों के अच्छे लोगों को सत्कारपूर्वक यहाँ ले आओ। मिथिला के स्वामी शूरवीर महाभाग जनक सत्यवादी नरेश हैं। उनको अपना पुराना सम्बन्धी जानकर तुम स्वयं ही जाकर उन्हें बड़े आदर-सत्कार के साथ यहाँ ले आओ; इसीलिये पहले तुम्हें यह बात बता देता हूँ।"

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॥ १ · १३ · २३ ॥
तथा काशिपतिं स्निग्धं सततं प्रियवादिनम् सद्वृत्तं देवसंकाशं स्वयमेवानयस्व

tathā kāśipatiṁ snigdhaṁ satataṁ priyavādinam ।
sadvṛttaṁ devasaṁkāśaṁ svayamevānayasva ha ॥

"इसी प्रकार काशी के राजा अपने स्नेही मित्र हैं और सदा प्रिय वचन बोलनेवाले हैं। वे सदाचारी तथा देवताओं के तुल्य तेजस्वी हैं; अतः उन्हें भी स्वयं ही जाकर ले आओ।"

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॥ १ · १३ · २४ ॥
तथा केकयराजानं वृद्धं परमधार्मिकम् श्वशुरं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय

tathā kekayarājānaṁ vṛddhaṁ paramadhārmikam ।
śvaśuraṁ rājasiṁhasya saputraṁ tamihānaya ॥

"केकयदेश के बूढ़े राजा बड़े धर्मात्मा हैं, वे राजसिंह महाराज दशरथ के श्वशुर हैं; अतः उन्हें भी पुत्रसहित यहाँ ले आओ।"

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॥ १ · १३ · २५ ॥
अंगेश्वरं महेष्वासं रोमपादं सुसत्कृतम् वयस्यं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय

aṁgeśvaraṁ maheṣvāsaṁ romapādaṁ susatkṛtam ।
vayasyaṁ rājasiṁhasya saputraṁ tamihānaya ॥

"अंगदेश के स्वामी महाधनुर्धर राजा रोमपाद हमारे महाराज के मित्र हैं, अतः उन्हें पुत्रसहित यहाँ सत्कारपूर्वक ले आओ।"

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॥ १ · १३ · २६ ॥
तथा कोसलराजानं भानुमन्तं सुसत्कृतम् मगधाधिपतिं शूरं सर्वशास्त्रविशारदम् प्राप्तिज्ञं परमोदारं सत्कृतं पुरुषर्षभम्

tathā kosalarājānaṁ bhānumantaṁ susatkṛtam ।
magadhādhipatiṁ śūraṁ sarvaśāstraviśāradam ॥
prāptijñaṁ paramodāraṁ satkṛtaṁ puruṣarṣabham ।

"कोशलराज भानुमान् को भी सत्कारपूर्वक ले आओ। मगधदेश के राजा प्राप्तिज्ञ को, जो शूरवीर, सर्वशास्त्रविशारद, परम उदार तथा पुरुषों में श्रेष्ठ हैं, स्वयं जाकर सत्कारपूर्वक बुला ले आओ।"

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॥ १ · १३ · २७ ॥
राज्ञः शासनमादाय चोदयस्व नृपर्षभान् प्राचीनान् सिन्धुसौवीरान् सौराष्ट्रेयांश्च पार्थिवान्

rājñaḥ śāsanamādāya codayasva nṛparṣabhān ।
prācīnān sindhusauvīrān saurāṣṭreyāṁśca pārthivān ॥

"महाराज की आज्ञा लेकर तुम पूर्वदेश के श्रेष्ठ नरेशों को तथा सिन्धु-सौवीर एवं सुराष्ट्र देश के भूपालों को यहाँ आने के लिये निमन्त्रण दो।"

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॥ १ · १३ · २८ ॥
दाक्षिणात्यान् नरेन्द्रांश्च समस्तानानयस्व सन्ति स्निग्धाश्च ये चान्ये राजानः पृथिवीतले

dākṣiṇātyān narendrāṁśca samastānānayasva ha ।
santi snigdhāśca ye cānye rājānaḥ pṛthivītale ॥

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॥ १ · १३ · २९ ॥
तानानय यथा क्षिप्रं सानुगान् सहबान्धवान् एतान् दूतैर्महाभागैरानयस्व नृपाज्ञया

tānānaya yathā kṣipraṁ sānugān sahabāndhavān ।
etān dūtairmahābhāgairānayasva nṛpājñayā ॥

॥ २८–२९ ॥

"दक्षिण भारत के समस्त नरेशों को भी आमन्त्रित करो। इस भूतल पर और भी जो-जो नरेश महाराज के प्रति स्नेह रखते हैं, उन सबको सेवकों और सगे-सम्बन्धियोंसहित यथासम्भव शीघ्र बुला लो। महाराज की आज्ञा से बड़भागी दूतों द्वारा इन सबके पास बुलावा भेज दो।"

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॥ १ · १३ · ३० ॥
वसिष्ठवाक्यं तच्छ्रुत्वा सुमन्त्रस्त्वरितं तदा व्यादिशत् पुरुषांस्तत्र राज्ञामानयने शुभान्

vasiṣṭhavākyaṁ tacchrutvā sumantrastvaritaṁ tadā ।
vyādiśat puruṣāṁstatra rājñāmānayane śubhān ॥

वसिष्ठ का यह वचन सुनकर सुमन्त्र ने तुरंत ही अच्छे पुरुषों को राजाओं की बुलाहट के लिये जाने का आदेश दे दिया।

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॥ १ · १३ · ३१ ॥
स्वयमेव हि धर्मात्मा प्रयातो मुनिशासनात् सुमन्त्रस्त्वरितो भूत्वा समानेतुं महामतिः

svayameva hi dharmātmā prayāto muniśāsanāt ।
sumantrastvarito bhūtvā samānetuṁ mahāmatiḥ ॥

परम बुद्धिमान् धर्मात्मा सुमन्त्र वसिष्ठ मुनि की आज्ञा से खास-खास राजाओं को बुलाने के लिये स्वयं ही गये।

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॥ १ · १३ · ३२ ॥
ते कर्मान्तिकाः सर्वे वसिष्ठाय महर्षये सर्वं निवेदयन्ति स्म यज्ञे यदुपकल्पितम्

te ca karmāntikāḥ sarve vasiṣṭhāya maharṣaye ।
sarvaṁ nivedayanti sma yajñe yadupakalpitam ॥

यज्ञकर्म की व्यवस्था के लिये जो सेवक नियुक्त किये गये थे, उन सबने आकर उस समय तक यज्ञसम्बन्धी जो-जो कार्य सम्पन्न हो गया था, उस सबकी सूचना महर्षि वसिष्ठ को दी।

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॥ १ · १३ · ३३ ॥
ततः प्रीतो द्विजश्रेष्ठस्तान् सर्वान् मुनिरब्रवीत् अवज्ञया दातव्यं कस्यचिल्लीलयापि वा अवज्ञया कृतं हन्याद् दातारं नात्र संशयः

tataḥ prīto dvijaśreṣṭhastān sarvān munirabravīt ।
avajñayā na dātavyaṁ kasyacillīlayāpi vā ॥
avajñayā kṛtaṁ hanyād dātāraṁ nātra saṁśayaḥ ।

यह सुनकर वे द्विजश्रेष्ठ मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन सबसे बोले — "भद्र पुरुषो! किसी को जो कुछ देना हो, उसे अवहेलना या अनादरपूर्वक नहीं देना चाहिये; क्योंकि अनादरपूर्वक दिया हुआ दान दाता को नष्ट कर देता है — इसमें संशय नहीं है।"

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॥ १ · १३ · ३४ ॥
ततः कैश्चिदहोरात्रैरुपयाता महीक्षितः बहूनि रत्नान्यादाय राज्ञो दशरथस्य

tataḥ kaiścidahorātrairupayātā mahīkṣitaḥ ॥
bahūni ratnānyādāya rājño daśarathasya ha ।

तदनन्तर कुछ दिनों के बाद राजा लोग महाराज दशरथ के लिये बहुत-से रत्नों की भेंट लेकर अयोध्या में आये।

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॥ १ · १३ · ३५ ॥
ततो वसिष्ठः सुप्रीतो राजानमिदमब्रवीत्

tato vasiṣṭhaḥ suprīto rājānamidamabravīt ॥

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॥ १ · १३ · ३६ ॥
उपयाता नरव्याघ्र राजानस्तव शासनात् मयापि सत्कृताः सर्वे यथार्हं राजसत्तम

upayātā naravyāghra rājānastava śāsanāt ।
mayāpi satkṛtāḥ sarve yathārhaṁ rājasattama ॥

॥ ३५–३६ ॥

इससे वसिष्ठजी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने राजा से कहा — "पुरुषसिंह! तुम्हारी आज्ञा से राजालोग यहाँ आ गये। नृपश्रेष्ठ! मैंने भी यथायोग्य उन सबका सत्कार किया है।"

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॥ १ · १३ · ३७ ॥
यज्ञियं कृतं सर्वं पुरुषैः सुसमाहितैः निर्यातु भवान् यष्टुं यज्ञायतनमन्तिकात्

yajñiyaṁ ca kṛtaṁ sarvaṁ puruṣaiḥ susamāhitaiḥ ।
niryātu ca bhavān yaṣṭuṁ yajñāyatanamantikāt ॥

"हमारे कार्यकर्ताओं ने पूर्णतः सावधान रहकर यज्ञ के लिये सारी तैयारी की है। अब तुम भी यज्ञ करने के लिये यज्ञमण्डप के समीप चलो।"

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॥ १ · १३ · ३८ ॥
सर्वकामैरुपहृतैरुपेतं वै समन्ततः द्रष्टुमर्हसि राजेन्द्र मनसेव विनिर्मितम्

sarvakāmairupahṛtairupetaṁ vai samantataḥ ।
draṣṭumarhasi rājendra manaseva vinirmitam ॥

"राजेन्द्र! यज्ञमण्डप में सब ओर सभी वाञ्छनीय वस्तुएँ एकत्र कर दी गयी हैं। आप स्वयं चलकर देखें। यह मण्डप इतना शीघ्र तैयार किया गया है, मानो मन के संकल्प से ही बन गया हो।"

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॥ १ · १३ · ३९ ॥
तथा वसिष्ठवचनादृष्यशृंगस्य चोभयोः दिवसे शुभनक्षत्रे निर्यातो जगतीपतिः

tathā vasiṣṭhavacanādṛṣyaśṛṁgasya cobhayoḥ ।
divase śubhanakṣatre niryāto jagatīpatiḥ ॥

मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृंग दोनों के आदेश से शुभ नक्षत्रवाले दिन को राजा दशरथ यज्ञ के लिये राजभवन से निकले।

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॥ १ · १३ · ४० ॥
ततो वसिष्ठप्रमुखाः सर्व एव द्विजोत्तमाः ऋष्यशृंगं पुरस्कृत्य यज्ञकर्मारभंस्तदा

tato vasiṣṭhapramukhāḥ sarva eva dvijottamāḥ ।
ṛṣyaśṛṁgaṁ puraskṛtya yajñakarmārabhaṁstadā ॥

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॥ १ · १३ · ४१ ॥
यज्ञवाटं गताः सर्वे यथाशास्त्रं यथाविधि श्रीमांश्च सह पत्नीभी राजा दीक्षामुपाविशत्

yajñavāṭaṁ gatāḥ sarve yathāśāstraṁ yathāvidhi ।
śrīmāṁśca saha patnībhī rājā dīkṣāmupāviśat ॥

॥ ४०–४१ ॥

तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि सभी श्रेष्ठ द्विजों ने यज्ञमण्डप में जाकर ऋष्यशृंग को आगे करके शास्त्रोक्त विधि के अनुसार यज्ञकर्म का आरम्भ किया। पत्नियोंसहित श्रीमान् अवधनरेश ने यज्ञ की दीक्षा ली।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १३ ॥