वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः १२ · २२ श्लोकाःSarga 12 · 22 ślokas

राजा का ऋषियों से यज्ञ कराने के लिये प्रस्ताव, ऋषियों का राजा को और राजा का मन्त्रियों को यज्ञ की आवश्यक तैयारी करने के लिये आदेश देना

The king proposes the sacrifice; sages and ministers are set to prepare it

यज्ञ का प्रस्ताव

“यज्ञ का प्रस्ताव”
॥ १ · १२ · १–१२ ॥

सरय्वा उत्तरतटे यज्ञारम्भाय वृद्धो राजा दशरथस्तरुणो मुनिर्ऋष्यशृंगः श्वेतश्मश्रुः पुरोहितो वसिष्ठश्च गाढं मन्त्रयन्ते; पुरतः पत्रपञ्जिका यज्ञपात्राणि च, आज्ञां प्रतीक्षमाणाः सेवकाः; पवित्रकर्मणः शान्तप्रदोषः।

सरयू के उत्तर तट पर यज्ञ आरम्भ करने के लिये वृद्ध राजा दशरथ, तरुण मुनि ऋष्यशृंग और श्वेत-श्मश्रुधारी पुरोहित वसिष्ठ गम्भीरता से मन्त्रणा कर रहे हैं; सामने ताड़पत्र-पंजिका और यज्ञ-पात्र, आज्ञा की प्रतीक्षा करते सेवक; एक पवित्र अनुष्ठान की शान्त बेला।

On the northern bank of the Sarayu the aged king, the young sage Rishyashringa and the white-bearded family priest Vasishtha bend together over their sacred plan to begin the horse-sacrifice; a palm-leaf almanac and ritual vessels before them, attendants awaiting orders — the calm, purposeful threshold of a holy undertaking.

॥ १ · १२ · १ ॥
ततः काले बहुतिथे कस्मिंश्चित् सुमनोहरे वसन्ते समनुप्राप्ते राज्ञो यष्टुं मनोऽभवत्

tataḥ kāle bahutithe kasmiṁścit sumanohare ।
vasante samanuprāpte rājño yaṣṭuṁ mano'bhavat ॥

तदनन्तर बहुत समय बीत जाने के पश्चात् कोई परम मनोहर — दोषरहित समय प्राप्त हुआ। उस समय वसन्त ऋतु का आरम्भ हुआ था। राजा दशरथ ने इसी शुभ समय में यज्ञ आरम्भ करने का विचार किया।

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॥ १ · १२ · २ ॥
ततः प्रणम्य शिरसा तं विप्रं देववर्णिनम् यज्ञाय वरयामास संतानार्थं कुलस्य

tataḥ praṇamya śirasā taṁ vipraṁ devavarṇinam ।
yajñāya varayāmāsa saṁtānārthaṁ kulasya ca ॥

तत्पश्चात् उन्होंने देवोपम कान्तिवाले विप्रवर ऋष्यशृंग को मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और वंशपरम्परा की रक्षा के लिये पुत्र-प्राप्ति के निमित्त यज्ञ कराने के उद्देश्य से उनका वरण किया।

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॥ १ · १२ · ३ ॥
तथेति राजानमुवाच वसुधाधिपम् सम्भाराः सम्भ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम् सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्

tatheti ca sa rājānamuvāca vasudhādhipam ।
sambhārāḥ sambhriyantāṁ te turagaśca vimucyatām ॥
sarayvāścottare tīre yajñabhūmirvidhīyatām ।

ऋष्यशृंग ने "बहुत अच्छा" कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन पृथ्वीपति नरेश से कहा — "राजन्! यज्ञ की सामग्री एकत्र कराइये। भूमण्डल में भ्रमण के लिये आपका यज्ञसम्बन्धी अश्व छोड़ा जाय और सरयू के उत्तर तट पर यज्ञभूमि का निर्माण किया जाय।"

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॥ १ · १२ · ४ ॥
ततोऽब्रवीन्नृपो वाक्यं ब्राह्मणान् वेदपारगान्

tato'bravīnnṛpo vākyaṁ brāhmaṇān vedapāragān ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १२ · ५ ॥
सुमन्त्रावाहय क्षिप्रमृत्विजो ब्रह्मवादिनः सुयज्ञं वामदेवं जाबालिमथ काश्यपम् पुरोहितं वसिष्ठं ये चान्ये द्विजसत्तमाः

sumantrāvāhaya kṣipramṛtvijo brahmavādinaḥ ।
suyajñaṁ vāmadevaṁ ca jābālimatha kāśyapam ॥
purohitaṁ vasiṣṭhaṁ ca ye cānye dvijasattamāḥ ।

॥ ४–५ ॥

तब राजा ने कहा — "सुमन्त्र! तुम शीघ्र ही वेदविद्या के पारंगत ब्राह्मणों तथा ब्रह्मवादी ऋत्विजों को बुला ले आओ। सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, पुरोहित वसिष्ठ तथा अन्य जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उन सबको बुलाओ।"

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॥ १ · १२ · ६ ॥
ततः सुमन्त्रस्त्वरितं गत्वा त्वरितविक्रमः समानयत् तान् सर्वान् समस्तान् वेदपारगान्

tataḥ sumantrastvaritaṁ gatvā tvaritavikramaḥ ॥
samānayat sa tān sarvān samastān vedapāragān ।

तब शीघ्रगामी सुमन्त्र तुरंत जाकर वेदविद्या के पारगामी उन समस्त ब्राह्मणों को बुला लाये।

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॥ १ · १२ · ७ ॥
तान् पूजयित्वा धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा धर्मार्थसहितं युक्तं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्

tān pūjayitvā dharmātmā rājā daśarathastadā ॥
dharmārthasahitaṁ yuktaṁ ślakṣṇaṁ vacanamabravīt ।

धर्मात्मा राजा दशरथ ने उन सबका पूजन किया और उनसे धर्म तथा अर्थ से युक्त मधुर वचन कहा।

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॥ १ · १२ · ८ ॥
मम तातप्यमानस्य पुत्रार्थं नास्ति वै सुखम् पुत्रार्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम

mama tātapyamānasya putrārthaṁ nāsti vai sukham ॥
putrārthaṁ hayamedhena yakṣyāmīti matirmama ।

"महर्षियो! मैं पुत्र के लिये निरन्तर संतप्त रहता हूँ। उसके बिना इस राज्य आदि से भी मुझे सुख नहीं मिलता है। अतः मैंने यह विचार किया है कि पुत्र के लिये अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करूँ।"

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॥ १ · १२ · ९ ॥
तदहं यष्टुमिच्छामि हयमेधेन कर्मणा ऋषिपुत्रप्रभावेण कामान् प्राप्स्यामि चाप्यहम्

tadahaṁ yaṣṭumicchāmi hayamedhena karmaṇā ॥
ṛṣiputraprabhāveṇa kāmān prāpsyāmi cāpyaham ।

"इसी संकल्प के अनुसार मैं अश्वमेध यज्ञ का आरम्भ करना चाहता हूँ। मुझे विश्वास है कि ऋषिपुत्र ऋष्यशृंग के प्रभाव से मैं अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लूँगा।"

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॥ १ · १२ · १० ॥
ततः साध्विति तद्वाक्यं ब्राह्मणाः प्रत्यपूजयन् वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे पार्थिवस्य मुखाच्च्युतम्

tataḥ sādhviti tadvākyaṁ brāhmaṇāḥ pratyapūjayan ॥
vasiṣṭhapramukhāḥ sarve pārthivasya mukhāccyutam ।

राजा दशरथ के मुख से निकले हुए इस वचन की वसिष्ठ आदि सब ब्राह्मणों ने "साधु-साधु" कहकर बड़ी सराहना की।

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॥ १ · १२ · ११ ॥
ऋष्यशृंगपुरोगाश्च प्रत्यूचुर्नृपतिं तदा

ṛṣyaśṛṁgapurogāśca pratyūcurnṛpatiṁ tadā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १२ · १२ ॥
सम्भाराः सम्भ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम् सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्

sambhārāḥ sambhriyantāṁ te turagaśca vimucyatām ।
sarayvāścottare tīre yajñabhūmirvidhīyatām ॥

॥ ११–१२ ॥

इसके बाद ऋष्यशृंग आदि सब महर्षियों ने उस समय राजा दशरथ से पुनः यह बात कही — "महाराज! यज्ञसामग्री का संग्रह किया जाय, यज्ञसम्बन्धी अश्व छोड़ा जाय तथा सरयू के उत्तर तट पर यज्ञभूमि का निर्माण किया जाय।"

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॥ १ · १२ · १३ ॥
सर्वथा प्राप्स्यसे पुत्रांश्चतुरोऽमितविक्रमान् यस्य ते धार्मिकी बुद्धिरियं पुत्रार्थमागता

sarvathā prāpsyase putrāṁścaturo'mitavikramān ।
yasya te dhārmikī buddhiriyaṁ putrārthamāgatā ॥

"तुम यज्ञ द्वारा सर्वथा चार अमित पराक्रमी पुत्र प्राप्त करोगे; क्योंकि पुत्र के लिये तुम्हारे मन में ऐसे धार्मिक विचार का उदय हुआ है।"

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॥ १ · १२ · १४ ॥
ततः प्रीतोऽभवद् राजा श्रुत्वा तु द्विजभाषितम् अमात्यानब्रवीद् राजा हर्षेणेदं शुभाक्षरम्

tataḥ prīto'bhavad rājā śrutvā tu dvijabhāṣitam ।
amātyānabravīd rājā harṣeṇedaṁ śubhākṣaram ॥

ब्राह्मणों की यह बात सुनकर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने बड़े हर्ष के साथ अपने मन्त्रियों से यह शुभ अक्षरोंवाली बात कही।

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॥ १ · १२ · १५ ॥
गुरूणां वचनाच्छीघ्रं सम्भाराः सम्भ्रियन्तु मे समर्थाधिष्ठितश्चाश्वः सोपाध्यायो विमुच्यताम्

gurūṇāṁ vacanācchīghraṁ sambhārāḥ sambhriyantu me ।
samarthādhiṣṭhitaścāśvaḥ sopādhyāyo vimucyatām ॥

"गुरुजनों की आज्ञा के अनुसार तुमलोग शीघ्र ही मेरे लिये यज्ञ की सामग्री जुटा दो। शक्तिशाली वीरों के संरक्षण में यज्ञिय अश्व छोड़ा जाय और उसके साथ प्रधान ऋत्विज् भी रहें।"

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॥ १ · १२ · १६ ॥
सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम् शान्तयश्चाभिवर्धन्तां यथाकल्पं यथाविधि

sarayvāścottare tīre yajñabhūmirvidhīyatām ।
śāntayaścābhivardhantāṁ yathākalpaṁ yathāvidhi ॥

"सरयू के उत्तर तट पर यज्ञभूमि का निर्माण हो, शास्त्रोक्त विधि के अनुसार क्रमशः शान्तिकर्म — पुण्याहवाचन आदि का विस्तारपूर्वक अनुष्ठान किया जाय, जिससे विघ्नों का निवारण हो।"

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॥ १ · १२ · १७ ॥
शक्यः कर्तुमयं यज्ञः सर्वेणापि महीक्षिता नापराधो भवेत् कष्टो यद्यस्मिन् क्रतुसत्तमे

śakyaḥ kartumayaṁ yajñaḥ sarveṇāpi mahīkṣitā ।
nāparādho bhavet kaṣṭo yadyasmin kratusattame ॥

"यदि इस श्रेष्ठ यज्ञ में कष्टप्रद अपराध बन जाने का भय न हो तो सभी राजा इसका सम्पादन कर सकते हैं।"

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॥ १ · १२ · १८ ॥
छिद्रं हि मृगयन्तेऽत्र विद्वांसो ब्रह्मराक्षसाः विधिहीनस्य यज्ञस्य सद्यः कर्ता विनश्यति

chidraṁ hi mṛgayante'tra vidvāṁso brahmarākṣasāḥ ।
vidhihīnasya yajñasya sadyaḥ kartā vinaśyati ॥

"परंतु ऐसा होना कठिन है; क्योंकि ये विद्वान् ब्रह्म-राक्षस यज्ञ में विघ्न डालने के लिये छिद्र ढूँढ़ा करते हैं। विधिहीन यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाला यजमान तत्काल नष्ट हो जाता है।"

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॥ १ · १२ · १९ ॥
तद् यथा विधिपूर्वं मे क्रतुरेष समाप्यते तथा विधानं क्रियतां समर्थाः करणेष्विह

tad yathā vidhipūrvaṁ me kratureṣa samāpyate ।
tathā vidhānaṁ kriyatāṁ samarthāḥ karaṇeṣviha ॥

"अतः मेरा यह यज्ञ जिस तरह विधिपूर्वक सम्पूर्ण हो सके वैसा उपाय किया जाय। तुम सब लोग ऐसे साधन प्रस्तुत करने में समर्थ हो।"

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॥ १ · १२ · २० ॥
तथेति ततः सर्वे मन्त्रिणः प्रत्यपूजयन् पार्थिवेन्द्रस्य तद् वाक्यं यथाज्ञप्तमकुर्वत

tatheti ca tataḥ sarve mantriṇaḥ pratyapūjayan ।
pārthivendrasya tad vākyaṁ yathājñaptamakurvata ॥

तब "बहुत अच्छा" कहकर सभी मन्त्रियों ने राजराजेश्वर दशरथ के इस कथन का आदर किया और उनकी आज्ञा के अनुसार सारी व्यवस्था की।

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॥ १ · १२ · २१ ॥
ततो द्विजास्ते धर्मज्ञमस्तुवन् पार्थिवर्षभम् अनुज्ञातास्ततः सर्वे पुनर्जग्मुर्यथागतम्

tato dvijāste dharmajñamastuvan pārthivarṣabham ।
anujñātāstataḥ sarve punarjagmuryathāgatam ॥

तत्पश्चात् उन ब्राह्मणों ने भी धर्मज्ञ नृपश्रेष्ठ दशरथ की प्रशंसा की और उनकी आज्ञा पाकर सब जैसे आये थे, वैसे ही फिर चले गये।

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॥ १ · १२ · २२ ॥
गतेषु तेषु विप्रेषु मन्त्रिणस्तान् नराधिपः विसर्जयित्वा स्वं वेश्म प्रविवेश महामतिः

gateṣu teṣu vipreṣu mantriṇastān narādhipaḥ ।
visarjayitvā svaṁ veśma praviveśa mahāmatiḥ ॥

उन ब्राह्मणों के चले जाने पर मन्त्रियों को भी विदा करके वे महाबुद्धिमान् नरेश अपने महल में गये।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२ ॥