वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ११ · ३१ श्लोकाःSarga 11 · 31 ślokas

सुमन्त्र के कहने से राजा दशरथ का सपरिवार अंगराज के यहाँ जाकर वहाँ से शान्ता और ऋष्यशृंग को अपने घर ले आना

Daśaratha brings Ṛṣyaśṛṅga and Śāntā to his own house

ऋष्यशृंग का स्वागत

“ऋष्यशृंग का स्वागत”
॥ १ · ११ · २०–३१ ॥

अङ्गदेशं गत्वा वृद्धो राजा दशरथस्तरुणं मुनिमृष्यशृंगं प्राञ्जलिर्बहुमानेन प्रतिगृह्णाति; पार्श्वे वधूवस्त्रालंकृता शान्ता तिष्ठति; अङ्गराजः सत्कारैर्विसर्जयति, सुसज्जा गजा यानानि चायोध्यां प्रति प्रतीक्षन्ते; उत्सवपताका मङ्गलमयं स्वागतम्।

अंगदेश जाकर वृद्ध राजा दशरथ तरुण मुनि ऋष्यशृंग को हाथ जोड़े बड़े आदर से ग्रहण कर रहे हैं; पास ही वधू-वस्त्रों और आभूषणों से सजी शान्ता खड़ी हैं; अंगराज उपहारों के साथ विदा कर रहे हैं, सुसज्जित हाथी और रथ अयोध्या ले जाने को प्रतीक्षारत हैं; उत्सव-पताकाएँ, मंगलमय स्वागत।

Having journeyed to Anga, the aged King Dasharatha receives the young sage Rishyashringa with folded hands and great reverence; beside the sage stands his wife, the gentle princess Shanta in bridal silks; the king of Anga sees them off with gifts as richly caparisoned elephants and a royal retinue wait to carry them home to Ayodhya amid festive banners.

॥ १ · ११ · १ ॥
भूय एव हि राजेन्द्र शृणु मे वचनं हितम् यथा देवप्रवरः कथयामास बुद्धिमान्

bhūya eva hi rājendra śṛṇu me vacanaṁ hitam ।
yathā sa devapravaraḥ kathayāmāsa buddhimān ॥

तदनन्तर सुमन्त्र ने फिर कहा — "राजेन्द्र! आप पुनः मुझसे अपने हित की वह बात सुनिये, जिसे देवताओं में श्रेष्ठ बुद्धिमान् सनत्कुमारजी ने ऋषियों को सुनाया था।"

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॥ १ · ११ · २ ॥
इक्ष्वाकूणां कुले जातो भविष्यति सुधार्मिकः नाम्ना दशरथो राजा श्रीमान् सत्यप्रतिश्रवः

ikṣvākūṇāṁ kule jāto bhaviṣyati sudhārmikaḥ ।
nāmnā daśaratho rājā śrīmān satyapratiśravaḥ ॥

"उन्होंने कहा था — इक्ष्वाकुवंश में दशरथ नाम से प्रसिद्ध एक परम धार्मिक सत्यप्रतिज्ञ राजा होंगे।"

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॥ १ · ११ · ३ ॥
अंगराजेन सख्यं तस्य राज्ञो भविष्यति कन्या चास्य महाभागा शान्ता नाम भविष्यति

aṁgarājena sakhyaṁ ca tasya rājño bhaviṣyati ।
kanyā cāsya mahābhāgā śāntā nāma bhaviṣyati ॥

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॥ १ · ११ · ४ ॥
पुत्रस्त्वंगस्य राज्ञस्तु रोमपाद इति श्रुतः तं राजा दशरथो गमिष्यति महायशाः

putrastvaṁgasya rājñastu romapāda iti śrutaḥ ।
taṁ sa rājā daśaratho gamiṣyati mahāyaśāḥ ॥

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॥ १ · ११ · ५ ॥
अनपत्योऽस्मि धर्मात्मन् शान्ताभर्ता मम क्रतुम् आहरेत त्वयाऽऽज्ञप्तः संतानार्थं कुलस्य

anapatyo'smi dharmātman śāntābhartā mama kratum ।
āhareta tvayā''jñaptaḥ saṁtānārthaṁ kulasya ca ॥

॥ ३–५ ॥

"उनकी अंगराज के साथ मित्रता होगी। दशरथ के एक परम सौभाग्यशालिनी कन्या होगी, जिसका नाम होगा 'शान्ता'। अंगदेश के राजकुमार का नाम होगा 'रोमपाद'। महायशस्वी राजा दशरथ उनके पास जायँगे और कहेंगे — 'धर्मात्मन्! मैं संतानहीन हूँ। यदि आप आज्ञा दें तो शान्ता के पति ऋष्यशृंग मुनि चलकर मेरा यज्ञ करा दें। इससे मुझे पुत्र की प्राप्ति होगी और मेरे वंश की रक्षा हो जायगी।'"

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॥ १ · ११ · ६ ॥
श्रुत्वा राज्ञोऽथ तद् वाक्यं मनसा विचिन्त्य प्रदास्यते पुत्रवन्तं शान्ताभर्तारमात्मवान्

śrutvā rājño'tha tad vākyaṁ manasā sa vicintya ca ।
pradāsyate putravantaṁ śāntābhartāramātmavān ॥

"राजा की यह बात सुनकर मन-ही-मन उस पर विचार करके मनस्वी राजा रोमपाद शान्ता के पुत्रवान् पति को उनके साथ भेज देंगे।"

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॥ १ · ११ · ७ ॥
प्रतिगृह्य तं विप्रं राजा विगतज्वरः आहरिष्यति तं यज्ञं प्रहृष्टेनान्तरात्मना

pratigṛhya ca taṁ vipraṁ sa rājā vigatajvaraḥ ।
āhariṣyati taṁ yajñaṁ prahṛṣṭenāntarātmanā ॥

"ब्राह्मण ऋष्यशृंग को पाकर राजा दशरथ की सारी चिन्ता दूर हो जायगी और वे प्रसन्नचित्त होकर उस यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे।"

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॥ १ · ११ · ८ ॥
तं राजा दशरथो यशस्कामः कृताञ्जलिः ऋष्यशृंगं द्विजश्रेष्ठं वरयिष्यति धर्मवित्

taṁ ca rājā daśaratho yaśaskāmaḥ kṛtāñjaliḥ ।
ṛṣyaśṛṁgaṁ dvijaśreṣṭhaṁ varayiṣyati dharmavit ॥

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॥ १ · ११ · ९ ॥
यज्ञार्थं प्रसवार्थं स्वर्गार्थं नरेश्वरः लभते तं कामं द्विजमुख्याद् विशाम्पतिः

yajñārthaṁ prasavārthaṁ ca svargārthaṁ ca nareśvaraḥ ।
labhate ca sa taṁ kāmaṁ dvijamukhyād viśāmpatiḥ ॥

॥ ८–९ ॥

"यश की इच्छा रखनेवाले धर्मज्ञ राजा दशरथ हाथ जोड़कर द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग का यज्ञ, पुत्र और स्वर्ग के लिये वरण करेंगे तथा वे प्रजापालक नरेश उन श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि से अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेंगे।"

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॥ १ · ११ · १० ॥
पुत्राश्चास्य भविष्यन्ति चत्वारोऽमितविक्रमाः वंशप्रतिष्ठानकराः सर्वभूतेषु विश्रुताः

putrāścāsya bhaviṣyanti catvāro'mitavikramāḥ ।
vaṁśapratiṣṭhānakarāḥ sarvabhūteṣu viśrutāḥ ॥

"राजा के चार पुत्र होंगे, जो अप्रमेय पराक्रमी, वंश की मर्यादा बढ़ानेवाले और सर्वत्र विख्यात होंगे।"

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॥ १ · ११ · ११ ॥
एवं देवप्रवरः पूर्वं कथितवान् कथाम् सनत्कुमारो भगवान् पुरा देवयुगे प्रभुः

evaṁ sa devapravaraḥ pūrvaṁ kathitavān kathām ।
sanatkumāro bhagavān purā devayuge prabhuḥ ॥

"महाराज! पहले सत्ययुग में शक्तिशाली देवप्रवर भगवान् सनत्कुमारजी ने ऋषियों के समक्ष ऐसी कथा कही थी।"

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॥ १ · ११ · १२ ॥
त्वं पुरुषशार्दूल समानय सुसत्कृतम् स्वयमेव महाराज गत्वा सबलवाहनः

sa tvaṁ puruṣaśārdūla samānaya susatkṛtam ।
svayameva mahārāja gatvā sabalavāhanaḥ ॥

"पुरुषसिंह महाराज! इसलिये आप स्वयं ही सेना और सवारियों के साथ अंगदेश में जाकर मुनिकुमार ऋष्यशृंग को सत्कारपूर्वक यहाँ ले आइये।"

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॥ १ · ११ · १३ ॥
सुमन्त्रस्य वचः श्रुत्वा हृष्टो दशरथोऽभवत् अनुमान्य वसिष्ठं सूतवाक्यं निशाम्य सान्तःपुरः सहामात्यः प्रययौ यत्र द्विजः

sumantrasya vacaḥ śrutvā hṛṣṭo daśaratho'bhavat ।
anumānya vasiṣṭhaṁ ca sūtavākyaṁ niśāmya ca ॥
sāntaḥpuraḥ sahāmātyaḥ prayayau yatra sa dvijaḥ ।

सुमन्त्र का वचन सुनकर राजा दशरथ को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मुनिवर वसिष्ठजी को भी सुमन्त्र की बातें सुनायीं और उनकी आज्ञा लेकर रनिवास की रानियों तथा मन्त्रियों के साथ अंगदेश के लिये प्रस्थान किया, जहाँ विप्रवर ऋष्यशृंग निवास करते थे।

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॥ १ · ११ · १४ ॥
वनानि सरितश्चैव व्यतिक्रम्य शनैः शनैः अभिचक्राम तं देशं यत्र वै मुनिपुंगवः

vanāni saritaścaiva vyatikramya śanaiḥ śanaiḥ ॥
abhicakrāma taṁ deśaṁ yatra vai munipuṁgavaḥ ।

मार्ग में अनेकानेक वनों और नदियों को पार करके वे धीरे-धीरे उस देश में जा पहुँचे, जहाँ मुनिवर ऋष्यशृंग विराजमान थे।

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॥ १ · ११ · १५ ॥
आसाद्य तं द्विजश्रेष्ठं रोमपादसमीपगम् ऋषिपुत्रं ददर्शाथो दीप्यमानमिवानलम्

āsādya taṁ dvijaśreṣṭhaṁ romapādasamīpagam ॥
ṛṣiputraṁ dadarśātho dīpyamānamivānalam ।

वहाँ पहुँचने पर उन्हें द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग रोमपाद के पास ही बैठे दिखायी दिये। वे ऋषिकुमार प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी जान पड़ते थे।

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॥ १ · ११ · १६ ॥
ततो राजा यथायोग्यं पूजां चक्रे विशेषतः

tato rājā yathāyogyaṁ pūjāṁ cakre viśeṣataḥ ॥

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॥ १ · ११ · १७ ॥
सखित्वात् तस्य वै राज्ञः प्रहृष्टेनान्तरात्मना रोमपादेन चाख्यातमृषिपुत्राय धीमते सख्यं सम्बन्धकं चैव तदा तं प्रत्यपूजयत्

sakhitvāt tasya vai rājñaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā ।
romapādena cākhyātamṛṣiputrāya dhīmate ॥
sakhyaṁ sambandhakaṁ caiva tadā taṁ pratyapūjayat ।

॥ १६–१७ ॥

तदनन्तर राजा रोमपाद ने मित्रता के नाते अत्यन्त प्रसन्न हृदय से महाराज दशरथ का शास्त्रोक्त विधि के अनुसार विशेषरूप से पूजन किया और बुद्धिमान् ऋषिकुमार ऋष्यशृंग को राजा दशरथ के साथ अपनी मित्रता की बात बतायी। उस पर उन्होंने भी राजा का सम्मान किया।

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॥ १ · ११ · १८ ॥
एवं सुसत्कृतस्तेन सहोषित्वा नरर्षभः

evaṁ susatkṛtastena sahoṣitvā nararṣabhaḥ ॥

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॥ १ · ११ · १९ ॥
सप्ताष्टदिवसान् राजा राजानमिदमब्रवीत् शान्ता तव सुता राजन् सह भर्त्रा विशाम्पते मदीयं नगरं यातु कार्यं हि महदुद्यतम्

saptāṣṭadivasān rājā rājānamidamabravīt ।
śāntā tava sutā rājan saha bhartrā viśāmpate ॥
madīyaṁ nagaraṁ yātu kāryaṁ hi mahadudyatam ।

॥ १८–१९ ॥

इस प्रकार भलीभाँति आदर-सत्कार पाकर नरश्रेष्ठ राजा दशरथ रोमपाद के साथ वहाँ सात-आठ दिनों तक रहे। इसके बाद वे अंगराज से बोले — "प्रजापालक नरेश! तुम्हारी पुत्री शान्ता अपने पति के साथ मेरे नगर में पदार्पण करे; क्योंकि वहाँ एक महान् आवश्यक कार्य उपस्थित हुआ है।"

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॥ १ · ११ · २० ॥
तथेति राजा संश्रुत्य गमनं तस्य धीमतः

tatheti rājā saṁśrutya gamanaṁ tasya dhīmataḥ ॥

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॥ १ · ११ · २१ ॥
उवाच वचनं विप्रं गच्छ त्वं सह भार्यया ऋषिपुत्रः प्रतिश्रुत्य तथेत्याह नृपं तदा

uvāca vacanaṁ vipraṁ gaccha tvaṁ saha bhāryayā ।
ṛṣiputraḥ pratiśrutya tathetyāha nṛpaṁ tadā ॥

॥ २०–२१ ॥

राजा रोमपाद ने "बहुत अच्छा" कहकर उन बुद्धिमान् महर्षि का जाना स्वीकार कर लिया और ऋष्यशृंग से कहा — "विप्रवर! आप शान्ता के साथ महाराज दशरथ के यहाँ जाइये।" राजा की आज्ञा पाकर उन ऋषिपुत्र ने "तथास्तु" कहकर राजा दशरथ को अपने चलने की स्वीकृति दे दी।

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॥ १ · ११ · २२ ॥
नृपेणाभ्यनुज्ञातः प्रययौ सह भार्यया तावन्योन्याञ्जलिं कृत्वा स्नेहात् संश्लिष्य चोरसा

sa nṛpeṇābhyanujñātaḥ prayayau saha bhāryayā ।
tāvanyonyāñjaliṁ kṛtvā snehāt saṁśliṣya corasā ॥

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॥ १ · ११ · २३ ॥
ननन्दतुर्दशरथो रोमपादश्च वीर्यवान् ततः सुहृदमापृच्छ्य प्रस्थितो रघुनन्दनः

nanandaturdaśaratho romapādaśca vīryavān ।
tataḥ suhṛdamāpṛcchya prasthito raghunandanaḥ ॥

॥ २२–२३ ॥

राजा रोमपाद की अनुमति ले ऋष्यशृंग ने पत्नी के साथ वहाँ से प्रस्थान किया। उस समय शक्तिशाली राजा रोमपाद और दशरथ ने एक-दूसरे को हाथ जोड़कर स्नेहपूर्वक छाती से लगाया तथा अभिनन्दन किया। फिर मित्र से विदा ले रघुकुलनन्दन दशरथ वहाँ से प्रस्थित हुए।

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॥ १ · ११ · २४ ॥
पौरेषु प्रेषयामास दूतान् वै शीघ्रगामिनः क्रियतां नगरं सर्वं क्षिप्रमेव स्वलंकृतम् धूपितं सिक्तसम्मृष्टं पताकाभिरलंकृतम्

paureṣu preṣayāmāsa dūtān vai śīghragāminaḥ ।
kriyatāṁ nagaraṁ sarvaṁ kṣiprameva svalaṁkṛtam ॥
dhūpitaṁ siktasammṛṣṭaṁ patākābhiralaṁkṛtam ।

उन्होंने पुरवासियों के पास अपने शीघ्रगामी दूत भेजे और कहलाया कि "समस्त नगर को शीघ्र ही सुसज्जित किया जाय। सर्वत्र धूप की सुगन्ध फैले। नगर की सड़कों को झाड़-बुहारकर उन पर पानी का छिड़काव कर दिया जाय तथा सारा नगर ध्वजा-पताकाओं से अलंकृत हो।"

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॥ १ · ११ · २५ ॥
ततः प्रहृष्टाः पौरास्ते श्रुत्वा राजानमागतम् तथा चक्रुश्च तत् सर्वं राज्ञा यत् प्रेषितं तदा

tataḥ prahṛṣṭāḥ paurāste śrutvā rājānamāgatam ॥
tathā cakruśca tat sarvaṁ rājñā yat preṣitaṁ tadā ।

राजा का आगमन सुनकर पुरवासी बड़े प्रसन्न हुए। महाराज ने उनके लिये जो संदेश भेजा था, उसका उन्होंने उस समय पूर्णरूप से पालन किया।

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॥ १ · ११ · २६ ॥
ततः स्वलंकृतं राजा नगरं प्रविवेश शङ्खदुन्दुभिनिर्ह्रादैः पुरस्कृत्वा द्विजर्षभम्

tataḥ svalaṁkṛtaṁ rājā nagaraṁ praviveśa ha ॥
śaṅkhadundubhinirhrādaiḥ puraskṛtvā dvijarṣabham ।

तदनन्तर राजा दशरथ ने शङ्ख और दुन्दुभि आदि वाद्यों की ध्वनि के साथ विप्रवर ऋष्यशृंग को आगे करके अपने सजे-सजाये नगर में प्रवेश किया।

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॥ १ · ११ · २७ ॥
ततः प्रमुदिताः सर्वे दृष्ट्वा वै नागरा द्विजम्

tataḥ pramuditāḥ sarve dṛṣṭvā vai nāgarā dvijam ॥

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॥ १ · ११ · २८ ॥
प्रवेश्यमानं सत्कृत्य नरेन्द्रेणेन्द्रकर्मणा यथा दिवि सुरेन्द्रेण सहस्राक्षेण काश्यपम्

praveśyamānaṁ satkṛtya narendreṇendrakarmaṇā ।
yathā divi surendreṇa sahasrākṣeṇa kāśyapam ॥

॥ २७–२८ ॥

उन द्विजकुमार का दर्शन करके सभी नगरनिवासी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने इन्द्र के समान पराक्रमी नरेन्द्र दशरथ के साथ पुरी में प्रवेश करते हुए ऋष्यशृंग का उसी प्रकार सत्कार किया, जैसे देवताओं ने स्वर्ग में सहस्राक्ष इन्द्र के साथ प्रवेश करते हुए कश्यपनन्दन वामनजी का समादर किया था।

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॥ १ · ११ · २९ ॥
अन्तःपुरं प्रवेश्यैनं पूजां कृत्वा शास्त्रतः कृतकृत्यं तदात्मानं मेने तस्योपवाहनात्

antaḥpuraṁ praveśyainaṁ pūjāṁ kṛtvā ca śāstrataḥ ।
kṛtakṛtyaṁ tadātmānaṁ mene tasyopavāhanāt ॥

ऋषि को अन्तःपुर में ले जाकर राजा ने शास्त्रविधि के अनुसार उनका पूजन किया और उनके निकट आ जाने से अपने को कृतकृत्य माना।

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॥ १ · ११ · ३० ॥
अन्तःपुराणि सर्वाणि शान्तां दृष्ट्वा तथागताम् सह भर्त्रा विशालाक्षीं प्रीत्यानन्दमुपागमन्

antaḥpurāṇi sarvāṇi śāntāṁ dṛṣṭvā tathāgatām ।
saha bhartrā viśālākṣīṁ prītyānandamupāgaman ॥

विशाललोचना शान्ता को इस प्रकार अपने पति के साथ उपस्थित देख अन्तःपुर की सभी रानियों को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे आनन्दमग्न हो गयीं।

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॥ १ · ११ · ३१ ॥
पूज्यमाना तु ताभिः सा राज्ञा चैव विशेषतः उवास तत्र सुखिता कंचित् कालं सहद्विजा

pūjyamānā tu tābhiḥ sā rājñā caiva viśeṣataḥ ।
uvāsa tatra sukhitā kaṁcit kālaṁ sahadvijā ॥

शान्ता भी उन रानियों से तथा विशेषतः महाराज दशरथ के द्वारा आदर-सत्कार पाकर वहाँ कुछ काल तक अपने पति ऋष्यशृंग के साथ बड़े सुख से रही।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११ ॥