वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ४६ · २३ श्लोकाःSarga 46 · 23 ślokas

पुत्रवधसे दुःखी दितिका कश्यपजीसे इन्द्रहन्ता पुत्रकी प्राप्तिके उद्देश्यसे तपके लिये आज्ञा लेकर कुशप्लवमें तप करना, इन्द्रद्वारा उनकी परिचर्या तथा उन्हें अपवित्र अवस्थामें पाकर इन्द्रका उनके गर्भके सात टुकड़े कर डालना

दिति का वरदान

“दिति का वरदान”
॥ १ · ४६ · ४–७ ॥

आश्रमाग्नेः समीपे बद्धाञ्जलिः दितिः पुत्रशोकविह्वला पतिं काश्यपं प्रार्थयते, स च हस्तम् उद्यम्य 'एवम् अस्तु' इति वरं ददाति।

आश्रम की अग्नि के पास हाथ जोड़े बैठीं, पुत्रशोक से व्याकुल दिति अपने पति महर्षि कश्यप से इन्द्रहन्ता पुत्र का वर माँग रही हैं, और प्रभामण्डल से घिरे कश्यप हाथ उठाकर 'ऐसा ही हो' कहते हुए उन्हें वरदान दे रहे हैं।

Beside the hermitage fire, palms joined and grieving for her slain sons, Diti entreats her husband the sage Kashyapa for a son who could slay Indra, while the radiant-haloed Kashyapa raises his hand in blessing, granting the boon with the words 'so be it.'

॥ १ · ४६ · १ ॥
हतेषु तेषु पुत्रेषु दितिः परमदुःखिता मारीचं कश्यपं नाम भर्तारमिदमब्रवीत्

hateṣu teṣu putreṣu ditiḥ paramaduḥkhitā ।
mārīcaṁ kaśyapaṁ nāma bhartāramidamabravīt ॥

अपने उन पुत्रों के मारे जाने पर दिति को बड़ा दुःख हुआ। वे अपने पति मरीचिनन्दन कश्यप के पास जाकर बोलीं—

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॥ १ · ४६ · २ ॥
हतपुत्रास्मि भगवंस्तव पुत्रैर्महाबलैः शक्रहन्तारमिच्छामि पुत्रं दीर्घतपोर्जितम्

hataputrāsmi bhagavaṁstava putrairmahābalaiḥ ।
śakrahantāramicchāmi putraṁ dīrghataporjitam ॥

"भगवन्! आपके महाबली पुत्र देवताओं ने मेरे पुत्रों को मार डाला; अतः मैं दीर्घकाल की तपस्या से उपार्जित एक ऐसा पुत्र चाहती हूँ जो इन्द्र का वध करने में समर्थ हो।"

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॥ १ · ४६ · ३ ॥
साहं तपश्चरिष्यामि गर्भं मे दातुमर्हसि ईश्वरं शक्रहन्तारं त्वमनुज्ञातुमर्हसि

sāhaṁ tapaścariṣyāmi garbhaṁ me dātumarhasi ।
īśvaraṁ śakrahantāraṁ tvamanujñātumarhasi ॥

"मैं तपस्या करूँगी, आप इसके लिये मुझे आज्ञा दें और मेरे गर्भ में ऐसा पुत्र प्रदान करें, जो सब कुछ करने में समर्थ तथा इन्द्र का वध करनेवाला हो।"

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॥ १ · ४६ · ४ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा मारीचः कश्यपस्तदा प्रत्युवाच महातेजा दितिं परमदुःखिताम्

tasyāstad vacanaṁ śrutvā mārīcaḥ kaśyapastadā ।
pratyuvāca mahātejā ditiṁ paramaduḥkhitām ॥

उसकी यह बात सुनकर महातेजस्वी मरीचिनन्दन कश्यप ने उस परम दुःखिनी दिति को इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ १ · ४६ · ५ ॥
एवं भवतु भद्रं ते शुचिर्भव तपोधने जनयिष्यसि पुत्रं त्वं शक्रहन्तारमाहवे

evaṁ bhavatu bhadraṁ te śucirbhava tapodhane ।
janayiṣyasi putraṁ tvaṁ śakrahantāramāhave ॥

"तपोधने! ऐसा ही हो। तुम शौचाचार का पालन करो। तुम्हारा भला हो। तुम ऐसे पुत्र को जन्म दोगी, जो युद्ध में इन्द्र को मार सके।"

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॥ १ · ४६ · ६ ॥
पूर्णे वर्षसहस्रे तु शुचिर्यदि भविष्यसि पुत्रं त्रैलोक्यहन्तारं मत्तस्त्वं जनयिष्यसि

pūrṇe varṣasahasre tu śuciryadi bhaviṣyasi ।
putraṁ trailokyahantāraṁ mattastvaṁ janayiṣyasi ॥

"यदि पूरे एक हजार वर्ष तक पवित्रतापूर्वक रह सकोगी तो तुम मुझसे त्रिलोकीनाथ इन्द्र का वध करने में समर्थ पुत्र प्राप्त कर लोगी।"

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॥ १ · ४६ · ७ ॥
एवमुक्त्वा महातेजाः पाणिना सम्ममार्ज ताम् तामालभ्य ततः स्वस्ति इत्युक्त्वा तपसे ययौ

evamuktvā mahātejāḥ pāṇinā sammamārja tām ।
tāmālabhya tataḥ svasti ityuktvā tapase yayau ॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी कश्यप ने दिति के शरीर पर हाथ फेरा। फिर उनका स्पर्श करके कहा—"तुम्हारा कल्याण हो।" ऐसा कहकर वे तपस्या के लिये चले गये।

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॥ १ · ४६ · ८ ॥
गते तस्मिन् नरश्रेष्ठ दितिः परमहर्षिता कुशप्लवं समासाद्य तपस्तेपे सुदारुणम्

gate tasmin naraśreṣṭha ditiḥ paramaharṣitā ।
kuśaplavaṁ samāsādya tapastepe sudāruṇam ॥

नरश्रेष्ठ! उनके चले जाने पर दिति अत्यन्त हर्ष और उत्साह में भरकर कुशप्लव नामक तपोवन में आयीं और अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगीं।

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॥ १ · ४६ · ९ ॥
तपस्तस्यां हि कुर्वत्यां परिचर्यां चकार सहस्राक्षो नरश्रेष्ठ परया गुणसम्पदा

tapastasyāṁ hi kurvatyāṁ paricaryāṁ cakāra ha ।
sahasrākṣo naraśreṣṭha parayā guṇasampadā ॥

पुरुषप्रवर श्रीराम! दिति के तपस्या करते समय सहस्रलोचन इन्द्र विनय आदि उत्तम गुणसम्पत्ति से युक्त हो उनकी सेवा-टहल करने लगे।

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॥ १ · ४६ · १० ॥
अग्निं कुशान् काष्ठमपः फलं मूलं तथैव न्यवेदयत् सहस्राक्षो यच्चान्यदपि काङ्क्षितम्

agniṁ kuśān kāṣṭhamapaḥ phalaṁ mūlaṁ tathaiva ca ।
nyavedayat sahasrākṣo yaccānyadapi kāṅkṣitam ॥

सहस्राक्ष इन्द्र अपनी मौसी दिति के लिये अग्नि, कुशा, काष्ठ, जल, फल, मूल तथा अन्यान्य अभिलषित वस्तुओं को ला-लाकर देते थे।

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॥ १ · ४६ · ११ ॥
गात्रसंवाहनैश्चैव श्रमापनयनैस्तथा शक्रः सर्वेषु कालेषु दितिं परिचचार

gātrasaṁvāhanaiścaiva śramāpanayanaistathā ।
śakraḥ sarveṣu kāleṣu ditiṁ paricacāra ha ॥

इन्द्र मौसी की शारीरिक सेवाएँ करते, उनके पैर दबाकर उनकी थकावट मिटाते तथा ऐसी ही अन्य आवश्यक सेवाओंद्वारा वे हर समय दिति की परिचर्या करते थे।

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॥ १ · ४६ · १२ ॥
पूर्णे वर्षसहस्रे सा दशोने रघुनन्दन दितिः परमसंहृष्टा सहस्राक्षमथाब्रवीत्

pūrṇe varṣasahasre sā daśone raghunandana ।
ditiḥ paramasaṁhṛṣṭā sahasrākṣamathābravīt ॥

रघुनन्दन! जब सहस्र वर्ष पूर्ण होने में कुल दस वर्ष बाकी रह गये, तब एक दिन दिति ने अत्यन्त हर्ष में भरकर सहस्रलोचन इन्द्र से कहा—

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॥ १ · ४६ · १३ ॥
तपश्चरन्त्या वर्षाणि दश वीर्यवतां वर अवशिष्टानि भद्रं ते भ्रातरं द्रक्ष्यसे ततः

tapaścarantyā varṣāṇi daśa vīryavatāṁ vara ।
avaśiṣṭāni bhadraṁ te bhrātaraṁ drakṣyase tataḥ ॥

"बलवानों में श्रेष्ठ वीर! अब मेरी तपस्या के केवल दस वर्ष और शेष रह गये हैं। तुम्हारा भला हो। दस वर्ष बाद तुम अपने होनेवाले भाई को देख सकोगे।"

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॥ १ · ४६ · १४ ॥
यमहं त्वत्कृते पुत्र तमाधास्ये जयोत्सुकम् त्रैलोक्यविजयं पुत्र सह भोक्ष्यसि विज्वरः

yamahaṁ tvatkṛte putra tamādhāsye jayotsukam ।
trailokyavijayaṁ putra saha bhokṣyasi vijvaraḥ ॥

"बेटा! मैंने तुम्हारे विनाश के लिये जिस पुत्र की याचना की थी, वह जब तुम्हें जीतने के लिये उत्सुक होगा, उस समय मैं उसे शान्त कर दूँगी—तुम्हारे प्रति उसे वैर-भाव से रहित तथा भ्रातृ-स्नेह से युक्त बना दूँगी। फिर तुम उसके साथ रहकर उसीके द्वारा की हुई त्रिभुवन-विजय का सुख निश्चिन्त होकर भोगना।"

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॥ १ · ४६ · १५ ॥
याचितेन सुरश्रेष्ठ पित्रा तव महात्मना वरो वर्षसहस्रान्ते मम दत्तः सुतं प्रति

yācitena suraśreṣṭha pitrā tava mahātmanā ।
varo varṣasahasrānte mama dattaḥ sutaṁ prati ॥

"सुरश्रेष्ठ! मेरे प्रार्थना करने पर तुम्हारे महात्मा पिता ने एक हजार वर्ष के बाद पुत्र होने का मुझे वर दिया है।"

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॥ १ · ४६ · १६ ॥
इत्युक्त्वा दितिस्तत्र प्राप्ते मध्यं दिनेश्वरे निद्रयापहता देवी पादौ कृत्वाथ शीर्षतः

ityuktvā ca ditistatra prāpte madhyaṁ dineśvare ।
nidrayāpahatā devī pādau kṛtvātha śīrṣataḥ ॥

ऐसा कहकर दिति नींद से अचेत हो गयीं। उस समय सूर्यदेव आकाश के मध्य भाग में आ गये थे—दोपहर का समय हो गया था। देवी दिति आसन पर बैठी-बैठी झपकी लेने लगीं। सिर झुक गया और केश पैरों से जा लगे। इस प्रकार निद्रावस्था में उन्होंने पैरों को सिर से लगा लिया।

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॥ १ · ४६ · १७ ॥
दृष्ट्वा तामशुचिं शक्रः पादयोः कृतमूर्धजाम् शिरःस्थाने कृतौ पादौ जहास मुमोद

dṛṣṭvā tāmaśuciṁ śakraḥ pādayoḥ kṛtamūrdhajām ।
śiraḥsthāne kṛtau pādau jahāsa ca mumoda ca ॥

उन्होंने अपने केशों को पैरों पर डाल रखा था। सिर को टिकाने के लिये दोनों पैरों को ही आधार बना लिया था। यह देख दिति को अपवित्र हुई जान इन्द्र हँसे और बड़े प्रसन्न हुए।

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॥ १ · ४६ · १८ ॥
तस्याः शरीरविवरं प्रविवेश पुरंदरः गर्भे सप्तधा राम चिच्छेद परमात्मवान्

tasyāḥ śarīravivaraṁ praviveśa puraṁdaraḥ ।
garbhe ca saptadhā rāma ciccheda paramātmavān ॥

श्रीराम! फिर तो सतत सावधान रहनेवाले इन्द्र माता दिति के उदर में प्रविष्ट हो गये और उसमें स्थित हुए गर्भ के उन्होंने सात टुकड़े कर डाले।

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॥ १ · ४६ · १९ ॥
भिद्यमानस्ततो गर्भो वज्रेण शतपर्वणा रुरोद सुस्वरं राम ततो दितिरबुध्यत

bhidyamānastato garbho vajreṇa śataparvaṇā ।
ruroda susvaraṁ rāma tato ditirabudhyata ॥

श्रीराम! उनके द्वारा सौ पर्वों वाले वज्र से विदीर्ण किये जाते समय वह गर्भस्थ बालक जोर-जोर से रोने लगा। इससे दिति की निद्रा टूट गयी—वे जागकर उठ बैठीं।

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॥ १ · ४६ · २० ॥
मा रुदो मा रुदश्चेति गर्भं शक्रोऽभ्यभाषत बिभेद महातेजा रुदन्तमपि वासवः

mā rudo mā rudaśceti garbhaṁ śakro'bhyabhāṣata ।
bibheda ca mahātejā rudantamapi vāsavaḥ ॥

तब इन्द्र ने उस रोते हुए गर्भ से कहा—"भाई! मत रो, मत रो" परंतु महातेजस्वी इन्द्र ने रोते रहने पर भी उस गर्भ के टुकड़े कर ही डाले।

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॥ १ · ४६ · २१ ॥
हन्तव्यं हन्तव्यमित्येव दितिरब्रवीत् निष्पपात ततः शक्रो मातुर्वचनगौरवात्

na hantavyaṁ na hantavyamityeva ditirabravīt ।
niṣpapāta tataḥ śakro māturvacanagauravāt ॥

उस समय दिति ने कहा—"इन्द्र! बच्चे को न मारो, न मारो।" माता के वचन का गौरव मानकर इन्द्र सहसा उदर से निकल आये।

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॥ १ · ४६ · २२ ॥
प्राञ्जलिर्वज्रसहितो दितिं शक्रोऽभ्यभाषत अशुचिर्देवि सुप्तासि पादयोः कृतमूर्धजा

prāñjalirvajrasahito ditiṁ śakro'bhyabhāṣata ।
aśucirdevi suptāsi pādayoḥ kṛtamūrdhajā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४६ · २३ ॥
तदन्तरमहं लब्ध्वा शक्रहन्तारमाहवे अभिनदं सप्तधा देवि तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि

tadantaramahaṁ labdhvā śakrahantāramāhave ।
abhinadaṁ saptadhā devi tanme tvaṁ kṣantumarhasi ॥

॥ २२–२३ ॥

फिर वज्रसहित इन्द्र ने हाथ जोड़कर दिति से कहा—"देवि! तुम्हारे सिर के बाल पैरों से लगे थे। इस प्रकार तुम अपवित्र अवस्था में सोयी थीं। यही छिद्र पाकर मैंने इस 'इन्द्रहन्ता' बालक के सात टुकड़े कर डाले हैं। इसलिये माँ! तुम मेरे इस अपराध को क्षमा करो।"

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४६ ॥