वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ४५ · ४५ श्लोकाःSarga 45 · 45 ślokas

देवताओं और दैत्योंद्वारा क्षीर-समुद्र-मन्थन, भगवान् रुद्रद्वारा हालाहल विषका पान, भगवान् विष्णुके सहयोगसे मन्दराचलका पातालसे उद्धार और उसके द्वारा मन्थन, धन्वन्तरि, अप्सरा, वारुणी, उच्चैःश्रवा, कौस्तुभ तथा अमृतकी उत्पत्ति और देवासुर-संग्राममें दैत्योंका संहार

समुद्र-मन्थन

“समुद्र-मन्थन”
॥ १ · ४५ · १८–३१ ॥

मन्दराचलं मथानीं कृत्वा वासुकिं रज्जुं विधाय देवाः दानवाश्च क्षीरसागरं मथ्नन्ति, अधः कूर्मरूपी विष्णुः पर्वतं धारयति, ऊर्ध्वे श्रीः कमले विराजते।

मन्दराचल को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर एक ओर देवता और दूसरी ओर असुर क्षीर-सागर को मथ रहे हैं; नीचे कच्छप-रूप में भगवान् विष्णु पर्वत को अपनी पीठ पर थामे हैं और ऊपर शिखर पर नीलवर्ण श्रीहरि विराजते हैं, कमल पर लक्ष्मी प्रकट होती हैं।

With Mandara mountain as the churning-staff and the serpent Vasuki as the rope, gods on one side and asuras on the other churn the Ocean of Milk; below, Vishnu as the tortoise bears the mountain on his back, while atop the peak the blue Lord presides and Lakshmi rises upon her lotus.

॥ १ · ४५ · १ ॥
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा राघवः सहलक्ष्मणः विस्मयं परमं गत्वा विश्वामित्रमथाब्रवीत्

viśvāmitravacaḥ śrutvā rāghavaḥ sahalakṣmaṇaḥ ।
vismayaṁ paramaṁ gatvā viśvāmitramathābravīt ॥

विश्वामित्रजी की बातें सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी को बड़ा विस्मय हुआ। वे मुनि से इस प्रकार बोले—

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॥ १ · ४५ · २ ॥
अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् कथितं परमं त्वया गंगावतरणं पुण्यं सागरस्यापि पूरणम्

atyadbhutamidaṁ brahman kathitaṁ paramaṁ tvayā ।
gaṁgāvataraṇaṁ puṇyaṁ sāgarasyāpi pūraṇam ॥

"ब्रह्मन्! आपने गंगाजी के स्वर्ग से उतरने और समुद्र के भरने की यह बड़ी उत्तम और अत्यन्त अद्भुत कथा सुनायी।"

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॥ १ · ४५ · ३ ॥
क्षणभूतेव नौ रात्रिः संवृत्तेयं परंतप इमां चिन्तयतोः सर्वां निखिलेन कथां तव

kṣaṇabhūteva nau rātriḥ saṁvṛtteyaṁ paraṁtapa ।
imāṁ cintayatoḥ sarvāṁ nikhilena kathāṁ tava ॥

"काम-क्रोधादि शत्रुओं को संताप देनेवाले महर्षे! आपकी कही हुई इस सम्पूर्ण कथा का पूर्णरूप से विचार करते हुए हम दोनों भाइयों की यह रात्रि एक क्षण के समान बीत गयी है।"

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॥ १ · ४५ · ४ ॥
तस्य सा शर्वरी सर्वा मम सौमित्रिणा सह जगाम चिन्तयानस्य विश्वामित्र कथां शुभाम्

tasya sā śarvarī sarvā mama saumitriṇā saha ।
jagāma cintayānasya viśvāmitra kathāṁ śubhām ॥

"विश्वामित्रजी! लक्ष्मण के साथ इस शुभ कथा पर विचार करते हुए ही मेरी यह सारी रात बीती है।"

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॥ १ · ४५ · ५ ॥
ततः प्रभाते विमले विश्वामित्रं तपोधनम् उवाच राघवो वाक्यं कृताह्निकमरिंदमः

tataḥ prabhāte vimale viśvāmitraṁ tapodhanam ।
uvāca rāghavo vākyaṁ kṛtāhnikamariṁdamaḥ ॥

तत्पश्चात् निर्मल प्रभात में उपस्थित होनेपर तपोधन विश्वामित्रजी जब नित्यकर्म से निवृत्त हो चुके, तब शत्रुदमन श्रीरामचन्द्रजी ने उनके पास जाकर कहा—

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॥ १ · ४५ · ६ ॥
गता भगवती रात्रिः श्रोतव्यं परमं श्रुतम् तराम सरितां श्रेष्ठां पुण्यां त्रिपथगां नदीम्

gatā bhagavatī rātriḥ śrotavyaṁ paramaṁ śrutam ।
tarāma saritāṁ śreṣṭhāṁ puṇyāṁ tripathagāṁ nadīm ॥

"मुने! यह पूजनीया रात्रि चली गयी। सुनने योग्य सर्वोत्तम कथा मैंने सुन ली। अब हमलोग सरिताओं में श्रेष्ठ पुण्यसलिला त्रिपथगामिनी नदी गंगाजी के उस पार चलें।"

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॥ १ · ४५ · ७ ॥
नौरेषा हि सुखास्तीर्णा ऋषीणां पुण्यकर्मणाम् भगवन्तमिह प्राप्तं ज्ञात्वा त्वरितमागता

naureṣā hi sukhāstīrṇā ṛṣīṇāṁ puṇyakarmaṇām ।
bhagavantamiha prāptaṁ jñātvā tvaritamāgatā ॥

"सदा पुण्यकर्म में तत्पर रहनेवाले ऋषियों की यह नाव उपस्थित है। इसपर सुखद आसन बिछा है। आप परमपूज्य महर्षि को यहाँ उपस्थित जानकर ऋषियों की भेजी हुई नाव बड़ी तीव्र गति से यहाँ आयी है।"

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॥ १ · ४५ · ८ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः संतारं कारयामास सर्षिसंघस्य कौशिकः

tasya tad vacanaṁ śrutvā rāghavasya mahātmanaḥ ।
saṁtāraṁ kārayāmāsa sarṣisaṁghasya kauśikaḥ ॥

महात्मा रघुनन्दन का यह वचन सुनकर विश्वामित्रजी ने पहले ऋषियोंसहित श्रीराम-लक्ष्मण को पार कराया।

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॥ १ · ४५ · ९ ॥
उत्तरं तीरमासाद्य सम्पूज्यर्षिगणं ततः गंगाकूले निविष्टास्ते विशालां ददृशुः पुरीम्

uttaraṁ tīramāsādya sampūjyarṣigaṇaṁ tataḥ ।
gaṁgākūle niviṣṭāste viśālāṁ dadṛśuḥ purīm ॥

तत्पश्चात् स्वयं भी उत्तर तट पर पहुँचकर उन्होंने वहाँ रहनेवाले ऋषियों का सत्कार किया। फिर सब लोग गंगाजी के किनारे ठहरकर विशाला नामक पुरी की शोभा देखने लगे।

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॥ १ · ४५ · १० ॥
ततो मुनिवरस्तूर्णं जगाम सहराघवः विशालां नगरीं रम्यां दिव्यां स्वर्गोपमां तदा

tato munivarastūrṇaṁ jagāma saharāghavaḥ ।
viśālāṁ nagarīṁ ramyāṁ divyāṁ svargopamāṁ tadā ॥

तदनन्तर श्रीराम-लक्ष्मण को साथ ले मुनिवर विश्वामित्र तुरंत उस दिव्य एवं रमणीय नगरी विशाला की ओर चल दिये, जो अपनी सुन्दर शोभा से स्वर्ग के समान जान पड़ती थी।

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॥ १ · ४५ · ११ ॥
अथ रामो महाप्राज्ञो विश्वामित्रं महामुनिम् पप्रच्छ प्राञ्जलिर्भूत्वा विशालामुत्तमां पुरीम्

atha rāmo mahāprājño viśvāmitraṁ mahāmunim ।
papraccha prāñjalirbhūtvā viśālāmuttamāṁ purīm ॥

उस समय परम बुद्धिमान् श्रीराम ने हाथ जोड़कर उस उत्तम पुरी के विषय में महामुनि विश्वामित्र से पूछा—

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॥ १ · ४५ · १२ ॥
कतमो राजवंशोऽयं विशालायां महामुने श्रोतुमिच्छामि भद्रं ते परं कौतूहलं हि मे

katamo rājavaṁśo'yaṁ viśālāyāṁ mahāmune ।
śrotumicchāmi bhadraṁ te paraṁ kautūhalaṁ hi me ॥

"महामुने! आपका कल्याण हो। मैं यह सुनना चाहता हूँ कि विशाला में कौन-सा राजवंश राज्य कर रहा है? इसके लिये मुझे बड़ी उत्कण्ठा है।"

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॥ १ · ४५ · १३ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रामस्य मुनिपुंगवः आख्यातुं तत्समारेभे विशालायाः पुरातनम्

tasya tad vacanaṁ śrutvā rāmasya munipuṁgavaḥ ।
ākhyātuṁ tatsamārebhe viśālāyāḥ purātanam ॥

श्रीराम का यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने विशाला पुरी के प्राचीन इतिहास का वर्णन आरम्भ किया—

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॥ १ · ४५ · १४ ॥
श्रूयतां राम शक्रस्य कथां कथयतः श्रुताम् अस्मिन् देशे हि यद् वृत्तं शृणु तत्त्वेन राघव

śrūyatāṁ rāma śakrasya kathāṁ kathayataḥ śrutām ।
asmin deśe hi yad vṛttaṁ śṛṇu tattvena rāghava ॥

"रघुकुलनन्दन श्रीराम! मैंने इन्द्र के मुख से विशाला-पुरी के वैभव का प्रतिपादन करनेवाली जो कथा सुनी है, उसे बता रहा हूँ, सुनो। इस देश में जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे यथार्थरूप से श्रवण करो।"

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॥ १ · ४५ · १५ ॥
पूर्वं कृतयुगे राम दितेः पुत्रा महाबलाः अदितेश्च महाभागा वीर्यवन्तः सुधार्मिकाः

pūrvaṁ kṛtayuge rāma diteḥ putrā mahābalāḥ ।
aditeśca mahābhāgā vīryavantaḥ sudhārmikāḥ ॥

"श्रीराम! पहले सत्ययुग में दिति के पुत्र दैत्य बड़े बलवान् थे और अदिति के भी धर्मात्मा पुत्र महाभाग देवता भी बड़े शक्तिशाली थे।"

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॥ १ · ४५ · १६ ॥
ततस्तेषां नरव्याघ्र बुद्धिरासीन्महात्मनाम् अमरा विजराश्चैव कथं स्यामो निरामयाः

tatasteṣāṁ naravyāghra buddhirāsīnmahātmanām ।
amarā vijarāścaiva kathaṁ syāmo nirāmayāḥ ॥

"पुरुषसिंह! उन महामना दैत्यों और देवताओं के मन में यह विचार हुआ कि हम कैसे अजर-अमर और नीरोग हों?"

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॥ १ · ४५ · १७ ॥
तेषां चिन्तयतां तत्र बुद्धिरासीद् विपश्चिताम् क्षीरोदमथनं कृत्वा रसं प्राप्स्याम तत्र वै

teṣāṁ cintayatāṁ tatra buddhirāsīd vipaścitām ।
kṣīrodamathanaṁ kṛtvā rasaṁ prāpsyāma tatra vai ॥

"इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन विचारशील देवताओं और दैत्यों की बुद्धि में यह बात आयी कि हमलोग यदि क्षीरसागर का मन्थन करें तो उसमें निश्चय ही अमृतमय रस प्राप्त कर लेंगे।"

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॥ १ · ४५ · १८ ॥
ततो निश्चित्य मथनं योक्त्रं कृत्वा वासुकिम् मन्थानं मन्दरं कृत्वा ममन्थुरमितौजसः

tato niścitya mathanaṁ yoktraṁ kṛtvā ca vāsukim ।
manthānaṁ mandaraṁ kṛtvā mamanthuramitaujasaḥ ॥

"समुद्र-मन्थन का निश्चय करके उन अमिततेजस्वी देवताओं और दैत्यों ने वासुकि नाग को रस्सी और मन्दराचल को मथानी बनाकर क्षीर-सागर को मथना आरम्भ किया।"

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॥ १ · ४५ · १९ ॥
अथ वर्षसहस्रेण योक्त्रसर्पशिरांसि वमन्तोऽतिविषं तत्र ददंशुर्दशनैः शिलाः

atha varṣasahasreṇa yoktrasarpaśirāṁsi ca ।
vamanto'tiviṣaṁ tatra dadaṁśurdaśanaiḥ śilāḥ ॥

"तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर रस्सी बने हुए सर्प के बहुसंख्यक मुख अत्यन्त विष उगलते हुए वहाँ मन्दराचल की शिलाओं को अपने दाँतों से डँसने लगे।"

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॥ १ · ४५ · २० ॥
उत्पपाताग्निसंकाशं हालाहलमहाविषम् तेन दग्धं जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम्

utpapātāgnisaṁkāśaṁ hālāhalamahāviṣam ।
tena dagdhaṁ jagat sarvaṁ sadevāsuramānuṣam ॥

"अतः उस समय वहाँ अग्नि के समान दाहक हालाहल नामक महाभयंकर विष ऊपर को उठा। उसने देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् को दग्ध करना आरम्भ किया।"

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॥ १ · ४५ · २१ ॥
अथ देवा महादेवं शंकरं शरणार्थिनः जग्मुः पशुपतिं रुद्रं त्राहि त्राहीति तुष्टुवुः

atha devā mahādevaṁ śaṁkaraṁ śaraṇārthinaḥ ।
jagmuḥ paśupatiṁ rudraṁ trāhi trāhīti tuṣṭuvuḥ ॥

"यह देख देवतालोग शरणार्थी होकर सबका कल्याण करनेवाले महान् देवता पशुपति रुद्र की शरण में गये और त्राहि-त्राहि की पुकार लगाकर उनकी स्तुति करने लगे।"

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॥ १ · ४५ · २२ ॥
एवमुक्तस्ततो देवैर्देवदेवेश्वरः प्रभुः प्रादुरासीत् ततोऽत्रैव शंखचक्रधरो हरिः

evamuktastato devairdevadeveśvaraḥ prabhuḥ ।
prādurāsīt tato'traiva śaṁkhacakradharo hariḥ ॥

"देवताओं के इस प्रकार पुकारनेपर देवदेवेश्वर भगवान् शिव वहाँ प्रकट हुए। फिर वहीं शंख-चक्रधारी भगवान् श्रीहरि भी उपस्थित हो गये।"

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॥ १ · ४५ · २३ ॥
उवाचैनं स्मितं कृत्वा रुद्रं शूलधरं हरिः दैवतैर्मथ्यमाने तु यत्पूर्वं समुपस्थितम्

uvācainaṁ smitaṁ kṛtvā rudraṁ śūladharaṁ hariḥ ।
daivatairmathyamāne tu yatpūrvaṁ samupasthitam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४५ · २४ ॥
तत् त्वदीयं सुरश्रेष्ठ सुराणामग्रतो हि यत् अग्रपूजामिह स्थित्वा गृहाणेदं विषं प्रभो

tat tvadīyaṁ suraśreṣṭha surāṇāmagrato hi yat ।
agrapūjāmiha sthitvā gṛhāṇedaṁ viṣaṁ prabho ॥

॥ २३–२४ ॥

श्रीहरि ने त्रिशूलधारी भगवान् रुद्र से मुसकराकर कहा—"सुरश्रेष्ठ! देवताओं के समुद्रमन्थन करनेपर जो वस्तु सबसे पहले प्राप्त हुई है, वह आपका भाग है; क्योंकि आप सब देवताओं में अग्रगण्य हैं। प्रभो! अग्रपूजा के रूप में प्राप्त हुए इस विष को आप यहीं खड़े होकर ग्रहण करें।"

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॥ १ · ४५ · २५ ॥
इत्युक्त्वा सुरश्रेष्ठस्तत्रैवान्तरधीयत देवानां भयं दृष्ट्वा श्रुत्वा वाक्यं तु शार्ङ्गिणः

ityuktvā ca suraśreṣṭhastatraivāntaradhīyata ।
devānāṁ bhayaṁ dṛṣṭvā śrutvā vākyaṁ tu śārṅgiṇaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४५ · २६ ॥
हालाहलं विषं घोरं संजग्राहामृतोपमम् देवान् विसृज्य देवेशो जगाम भगवान् हरः

hālāhalaṁ viṣaṁ ghoraṁ saṁjagrāhāmṛtopamam ।
devān visṛjya deveśo jagāma bhagavān haraḥ ॥

॥ २५–२६ ॥

ऐसा कहकर देवशिरोमणि विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। देवताओं का भय देखकर और भगवान् विष्णु की पूर्वोक्त बात सुनकर देवेश्वर भगवान् रुद्र ने उस घोर हालाहल विष को अमृत के समान मानकर अपने कण्ठ में धारण कर लिया तथा देवताओं को विदा करके वे अपने स्थान को चले गये।

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॥ १ · ४५ · २७ ॥
ततो देवासुराः सर्वे ममन्थू रघुनन्दन प्रविवेशाथ पातालं मन्थानः पर्वतोत्तमः

tato devāsurāḥ sarve mamanthū raghunandana ।
praviveśātha pātālaṁ manthānaḥ parvatottamaḥ ॥

"रघुनन्दन! तत्पश्चात् देवता और असुर सब मिलकर क्षीरसागर का मन्थन करने लगे। उस समय मथानी बना हुआ उत्तम पर्वत मन्दर पाताल में घुस गया।"

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॥ १ · ४५ · २८ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वास्तुष्टुवुर्मधुसूदनम् त्वं गतिः सर्वभूतानां विशेषेण दिवौकसाम्

tato devāḥ sagandharvāstuṣṭuvurmadhusūdanam ।
tvaṁ gatiḥ sarvabhūtānāṁ viśeṣeṇa divaukasām ॥

"तब देवता और गन्धर्व भगवान् मधुसूदन की स्तुति करने लगे—'महाबाहो! आप ही सम्पूर्ण प्राणियों की गति हैं। विशेषतः देवताओं के अवलम्बन तो आप ही हैं। आप हमारी रक्षा करें और इस पर्वत को उठावें।'"

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॥ १ · ४५ · २९ ॥
पालयास्मान् महाबाहो गिरिमुद्धर्तुमर्हसि इति श्रुत्वा हृषीकेशः कामदं रूपमास्थितः

pālayāsmān mahābāho girimuddhartumarhasi ।
iti śrutvā hṛṣīkeśaḥ kāmadaṁ rūpamāsthitaḥ ॥

यह सुनकर भगवान् हृषीकेश ने कच्छप का रूप धारण कर लिया और उस पर्वत को अपनी पीठ पर रखकर वे श्रीहरि वहीं समुद्र के भीतर सो गये।

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॥ १ · ४५ · ३० ॥
पर्वतं पृष्ठतः कृत्वा शिश्ये तत्रोदधौ हरिः पर्वताग्रं तु लोकात्मा हस्तेनाक्रम्य केशवः

parvataṁ pṛṣṭhataḥ kṛtvā śiśye tatrodadhau hariḥ ।
parvatāgraṁ tu lokātmā hastenākramya keśavaḥ ॥

फिर विश्वात्मा पुरुषोत्तम भगवान् केशव उस पर्वतशिखर को हाथ से पकड़कर देवताओं के बीच में खड़े हो स्वयं भी समुद्र का मन्थन करने लगे।

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॥ १ · ४५ · ३१ ॥
देवानां मध्यतः स्थित्वा ममन्थ पुरुषोत्तमः अथ वर्षसहस्रेण आयुर्वेदमयः पुमान्

devānāṁ madhyataḥ sthitvā mamantha puruṣottamaḥ ।
atha varṣasahasreṇa āyurvedamayaḥ pumān ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४५ · ३२ ॥
उदतिष्ठत् सुधर्मात्मा सदण्डः सकमण्डलुः पूर्वं धन्वन्तरिर्नाम अप्सराश्च सुवर्चसः

udatiṣṭhat sudharmātmā sadaṇḍaḥ sakamaṇḍaluḥ ।
pūrvaṁ dhanvantarirnāma apsarāśca suvarcasaḥ ॥

॥ ३१–३२ ॥

तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर उस क्षीरसागर से एक आयुर्वेदमय धर्मात्मा पुरुष प्रकट हुए, जिनके एक हाथ में दण्ड और दूसरे में कमण्डलु था। उनका नाम धन्वन्तरि था। उनके प्राकट्य के बाद सागर से सुन्दर कान्तिवाली बहुत-सी अप्सराएँ प्रकट हुईं।

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॥ १ · ४५ · ३३ ॥
अप्सु निर्मथनादेव रसात् तस्माद् वरस्त्रियः उत्पेतुर्मनुजश्रेष्ठ तस्मादप्सरसोऽभवन्

apsu nirmathanādeva rasāt tasmād varastriyaḥ ।
utpeturmanujaśreṣṭha tasmādapsaraso'bhavan ॥

"नरश्रेष्ठ! मन्थन करनेसे ही अप् (जल) में उसके रस से वे सुन्दरी स्त्रियाँ उत्पन्न हुई थीं, इसलिये अप्सरा कहलायीं।"

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॥ १ · ४५ · ३४ ॥
षष्टिः कोट्योऽभवंस्तासामप्सराणां सुवर्चसाम् असंख्येयास्तु काकुत्स्थ यास्तासां परिचारिकाः

ṣaṣṭiḥ koṭyo'bhavaṁstāsāmapsarāṇāṁ suvarcasām ।
asaṁkhyeyāstu kākutstha yāstāsāṁ paricārikāḥ ॥

"काकुत्स्थ! उन सुन्दर कान्तिवाली अप्सराओं की संख्या साठ करोड़ थी और जो उनकी परिचारिकाएँ थीं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। वे सब असंख्य थीं।"

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॥ १ · ४५ · ३५ ॥
ताः स्म प्रतिगृह्णन्ति सर्वे ते देवदानवाः अप्रतिग्रहणादेव ता वै साधारणाः स्मृताः

na tāḥ sma pratigṛhṇanti sarve te devadānavāḥ ।
apratigrahaṇādeva tā vai sādhāraṇāḥ smṛtāḥ ॥

"उन अप्सराओं को समस्त देवता और दानव कोई भी अपनी 'पत्नी' रूप से ग्रहण न कर सके, इसलिये वे साधारणा (सामान्या) मानी गयीं।"

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॥ १ · ४५ · ३६ ॥
वरुणस्य ततः कन्या वारुणी रघुनन्दन उत्पपात महाभागा मार्गमाणा परिग्रहम्

varuṇasya tataḥ kanyā vāruṇī raghunandana ।
utpapāta mahābhāgā mārgamāṇā parigraham ॥

"रघुनन्दन! तदनन्तर वरुण की कन्या वारुणी, जो सुरा की अभिमानिनी देवी थी, प्रकट हुई और अपनेको स्वीकार करनेवाले पुरुष की खोज करने लगी।"

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॥ १ · ४५ · ३७ ॥
दितेः पुत्रा तां राम जगृहुर्वरुणात्मजाम् अदितेस्तु सुता वीर जगृहुस्तामनिन्दिताम्

diteḥ putrā na tāṁ rāma jagṛhurvaruṇātmajām ।
aditestu sutā vīra jagṛhustāmaninditām ॥

"वीर श्रीराम! दैत्यों ने उस वरुणकन्या सुरा को नहीं ग्रहण किया, परंतु अदिति के पुत्रों ने इस अनिन्द्य सुन्दरी को ग्रहण कर लिया।"

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॥ १ · ४५ · ३८ ॥
असुरास्तेन दैतेयाः सुरास्तेनादितेः सुताः हृष्टाः प्रमुदिताश्चासन् वारुणीग्रहणात् सुराः

asurāstena daiteyāḥ surāstenāditeḥ sutāḥ ।
hṛṣṭāḥ pramuditāścāsan vāruṇīgrahaṇāt surāḥ ॥

"सुरा से रहित होने के कारण ही दैत्य 'असुर' कहलाये और सुरा-सेवन के कारण ही अदिति के पुत्रों की 'सुर' संज्ञा हुई। वारुणी को ग्रहण करने से देवतालोग हर्ष से उत्फुल्ल एवं आनन्दमग्न हो गये।"

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॥ १ · ४५ · ३९ ॥
उच्चैःश्रवा हयश्रेष्ठो मणिरत्नं कौस्तुभम् उदतिष्ठन्नरश्रेष्ठ तथैवामृतमुत्तमम्

uccaiḥśravā hayaśreṣṭho maṇiratnaṁ ca kaustubham ।
udatiṣṭhannaraśreṣṭha tathaivāmṛtamuttamam ॥

"नरश्रेष्ठ! तदनन्तर घोड़ों में उत्तम उच्चैःश्रवा, मणिरत्न कौस्तुभ तथा परम उत्तम अमृत का प्राकट्य हुआ।"

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॥ १ · ४५ · ४० ॥
अथ तस्य कृते राम महानासीत् कुलक्षयः अदितेस्तु ततः पुत्रा दितिपुत्रानयोधयन्

atha tasya kṛte rāma mahānāsīt kulakṣayaḥ ।
aditestu tataḥ putrā ditiputrānayodhayan ॥

"श्रीराम! उस अमृत के लिये देवताओं और असुरों के कुल का महान् संहार हुआ। अदिति के पुत्र दिति के पुत्रों के साथ युद्ध करने लगे।"

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॥ १ · ४५ · ४१ ॥
एकतामगमन् सर्वे असुरा राक्षसैः सह युद्धमासीन्महाघोरं वीर त्रैलोक्यमोहनम्

ekatāmagaman sarve asurā rākṣasaiḥ saha ।
yuddhamāsīnmahāghoraṁ vīra trailokyamohanam ॥

"समस्त असुर राक्षसों के साथ मिलकर एक हो गये। वीर! देवताओं के साथ उनका महाघोर संग्राम होने लगा, जो तीनों लोकों को मोह में डालनेवाला था।"

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॥ १ · ४५ · ४२ ॥
यदा क्षयं गतं सर्वं तदा विष्णुर्महाबलः अमृतं सोऽहरत् तूर्णं मायामास्थाय मोहिनीम्

yadā kṣayaṁ gataṁ sarvaṁ tadā viṣṇurmahābalaḥ ।
amṛtaṁ so'harat tūrṇaṁ māyāmāsthāya mohinīm ॥

"जब देवताओं और असुरों का वह सारा समूह क्षीण हो चला, तब महाबली भगवान् विष्णु ने मोहिनी माया का आश्रय लेकर तुरंत ही अमृत का अपहरण कर लिया।"

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॥ १ · ४५ · ४३ ॥
ये गताभिमुखं विष्णुमक्षरं पुरुषोत्तमम् सम्पिष्टास्ते तदा युद्धे विष्णुना प्रभविष्णुना

ye gatābhimukhaṁ viṣṇumakṣaraṁ puruṣottamam ।
sampiṣṭāste tadā yuddhe viṣṇunā prabhaviṣṇunā ॥

"जो दैत्य बलपूर्वक अमृत छीन लाने के लिये अविनाशी पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु के सामने गये, उन्हें प्रभावशाली भगवान् विष्णु ने उस समय युद्ध में पीस डाला।"

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॥ १ · ४५ · ४४ ॥
अदितेरात्मजा वीरा दितेः पुत्रान् निजघ्निरे अस्मिन् घोरे महायुद्धे दैतेयादित्ययोर्भृशम्

aditerātmajā vīrā diteḥ putrān nijaghnire ।
asmin ghore mahāyuddhe daiteyādityayorbhṛśam ॥

"देवताओं और दैत्यों के उस घोर महायुद्ध में अदिति के वीर पुत्रों ने दिति के पुत्रों का विशेष संहार किया।"

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॥ १ · ४५ · ४५ ॥
निहत्य दितिपुत्रांस्तु राज्यं प्राप्य पुरंदरः शशास मुदितो लोकान् सर्षिसंघान् सचारणान्

nihatya ditiputrāṁstu rājyaṁ prāpya puraṁdaraḥ ।
śaśāsa mudito lokān sarṣisaṁghān sacāraṇān ॥

"दैत्यों का वध करने के पश्चात् त्रिलोकी का राज्य पाकर देवराज इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और ऋषियों तथा चारणोंसहित समस्त लोकों का शासन करने लगे।"

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४५ ॥