वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ४७ · २२ श्लोकाःSarga 47 · 22 ślokas

दितिका अपने पुत्रोंको मरुद्गण बनाकर देवलोकमें रखनेके लिये इन्द्रसे अनुरोध, इन्द्रद्वारा उसकी स्वीकृति, दितिके तपोवनमें ही इक्ष्वाकु-पुत्र विशालद्वारा विशाला नगरीका निर्माण तथा वहाँके तत्कालीन राजा सुमतिद्वारा विश्वामित्र मुनिका सत्कार

मरुद्गण का जन्म

“मरुद्गण का जन्म”
॥ १ · ४७ · ४–८ ॥

निद्रावशां दितिं प्रति विद्युद्गर्भे मेघमध्ये वज्रधरः सहस्राक्षः इन्द्रः तिष्ठति, गर्भखण्डेभ्यः जाताः सप्तगुणिताः मरुतः दिव्यबालकरूपेण ज्योतिर्मयाः उड्डीयन्ते।

विद्युत्-भरे मेघों के बीच वज्र उठाये, मुकुटधारी सहस्राक्ष इन्द्र खड़े हैं, और नीचे शयन करती दिति के उदर से प्रकट हुए उनके पुत्र — दिव्य बालक रूप में मरुद्गण — स्वर्ण-प्रभा में लिपटे चारों ओर उड़ रहे हैं, जिन्हें इन्द्र 'मा रुदः' कहकर देवरूप प्रदान करते हैं।

Amid lightning-shot clouds the crowned, thousand-eyed Indra stands with vajra raised, while from the womb of the sleeping Diti below spring her sons as luminous divine children — the Maruts — drifting on golden radiance, whom Indra makes into gods with the words 'weep not.'

॥ १ · ४७ · १ ॥
सप्तधा तु कृते गर्भे दितिः परमदुःखिता सहस्राक्षं दुराधर्षं वाक्यं सानुनयाब्रवीत्

saptadhā tu kṛte garbhe ditiḥ paramaduḥkhitā ।
sahasrākṣaṁ durādharṣaṁ vākyaṁ sānunayābravīt ॥

इन्द्रद्वारा अपने गर्भ के सात टुकड़े कर दिये जाने पर देवी दिति को बड़ा दुःख हुआ। वे दुर्धर्ष वीर सहस्राक्ष इन्द्र से अनुनयपूर्वक बोलीं—

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॥ १ · ४७ · २ ॥
ममापराधाद् गर्भोऽयं सप्तधा शकलीकृतः नापराधो हि देवेश तवात्र बलसूदन

mamāparādhād garbho'yaṁ saptadhā śakalīkṛtaḥ ।
nāparādho hi deveśa tavātra balasūdana ॥

"देवेश! बलसूदन! मेरे ही अपराध से इस गर्भ के सात टुकड़े हुए हैं। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है।"

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॥ १ · ४७ · ३ ॥
प्रियं त्वत्कृतमिच्छामि मम गर्भविपर्यये मरूतां सप्त सप्तानां स्थानपाला भवन्तु ते

priyaṁ tvatkṛtamicchāmi mama garbhaviparyaye ।
marūtāṁ sapta saptānāṁ sthānapālā bhavantu te ॥

"इस गर्भ को नष्ट करने के निमित्त तुमने जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, वह तुम्हारे और मेरे लिये भी जिस तरह प्रिय हो जाय—जैसे भी उसका परिणाम तुम्हारे और मेरे लिये सुखद हो जाय, वैसा उपाय मैं करना चाहती हूँ। मेरे गर्भ के वे सातों खण्ड सात व्यक्ति होकर सातों मरुद्गणों के स्थानों का पालन करनेवाले हो जायँ।"

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॥ १ · ४७ · ४ ॥
वातस्कन्धा इमे सप्त चरन्तु दिवि पुत्रक मारुता इति विख्याता दिव्यरूपा ममात्मजाः

vātaskandhā ime sapta carantu divi putraka ।
mārutā iti vikhyātā divyarūpā mamātmajāḥ ॥

"बेटा! ये मेरे दिव्य रूपधारी पुत्र 'मारुत' नाम से प्रसिद्ध होकर आकाश में जो सुविख्यात सात वातस्कन्ध हैं, उनमें विचरें।"

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॥ १ · ४७ · ५ ॥
ब्रह्मलोकं चरत्वेक इन्द्रलोकं तथापरः दिव्यवायुरिति ख्यातस्तृतीयोऽपि महायशाः

brahmalokaṁ caratveka indralokaṁ tathāparaḥ ।
divyavāyuriti khyātastṛtīyo'pi mahāyaśāḥ ॥

"(ऊपर जो सात मरुत् बताये गये हैं, वे सात-सात के गण हैं। इस प्रकार उनचास मरुत् समझने चाहिये। इनमें से) जो प्रथम गण है, वह ब्रह्मलोक में विचरे, दूसरा इन्द्रलोक में विचरण करे तथा तीसरा महायशस्वी मरुद्गण दिव्य वायु के नाम से विख्यात हो अन्तरिक्ष में बहा करे।"

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॥ १ · ४७ · ६ ॥
चत्वारस्तु सुरश्रेष्ठ दिशो वै तव शासनात् संचरिष्यन्ति भद्रं ते कालेन हि ममात्मजाः

catvārastu suraśreṣṭha diśo vai tava śāsanāt ।
saṁcariṣyanti bhadraṁ te kālena hi mamātmajāḥ ॥

"सुरश्रेष्ठ! तुम्हारा कल्याण हो। मेरे शेष चार पुत्रों के गण तुम्हारी आज्ञा से समयानुसार सम्पूर्ण दिशाओं में संचार करेंगे। तुम्हारे ही रखे हुए नाम से (तुमने जो 'मा रुदः' कहकर उन्हें रोने से मना किया था, उसी 'मा रुदः'—इस वाक्य से) वे सब-के-सब मारुत कहलायेंगे। मारुत नाम से ही उनकी प्रसिद्धि होगी।"

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॥ १ · ४७ · ७ ॥
त्वत्कृतेनैव नाम्ना वै मारुता इति विश्रुताः तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा सहस्राक्षः पुरंदरः

tvatkṛtenaiva nāmnā vai mārutā iti viśrutāḥ ।
tasyāstad vacanaṁ śrutvā sahasrākṣaḥ puraṁdaraḥ ॥

दिति का वह वचन सुनकर बल दैत्य को मारनेवाले सहस्राक्ष इन्द्र ने हाथ जोड़कर यह बात कही—

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॥ १ · ४७ · ८ ॥
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यमितीदं बलसूदनः सर्वमेतद् यथोक्तं ते भविष्यति संशयः

uvāca prāñjalirvākyamitīdaṁ balasūdanaḥ ।
sarvametad yathoktaṁ te bhaviṣyati na saṁśayaḥ ॥

"मा! तुम्हारा कल्याण हो। तुमने जैसा कहा है, वह सब वैसा ही होगा; इसमें संशय नहीं है। तुम्हारे ये पुत्र देवरूप होकर विचरेंगे।"

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॥ १ · ४७ · ९ ॥
विचरिष्यन्ति भद्रं ते देवरूपास्तवात्मजाः एवं तौ निश्चयं कृत्वा मातापुत्रौ तपोवने

vicariṣyanti bhadraṁ te devarūpāstavātmajāḥ ।
evaṁ tau niścayaṁ kṛtvā mātāputrau tapovane ॥

श्रीराम! उस तपोवन में ऐसा निश्चय करके वे दोनों माता-पुत्र—दिति और इन्द्र कृतकृत्य हो स्वर्गलोक को चले गये—ऐसा हमने सुन रखा है।

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॥ १ · ४७ · १० ॥
जग्मतुस्त्रिदिवं राम कृतार्थाविति नः श्रुतम् एष देशः काकुत्स्थ महेन्द्राध्युषितः पुरा

jagmatustridivaṁ rāma kṛtārthāviti naḥ śrutam ।
eṣa deśaḥ sa kākutstha mahendrādhyuṣitaḥ purā ॥

काकुत्स्थ! यही वह देश है, जहाँ पूर्वकाल में रहकर देवराज इन्द्र ने तपःसिद्ध दिति की परिचर्या की थी।

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॥ १ · ४७ · ११ ॥
दितिं यत्र तपःसिद्धामेवं परिचचार सः तेन चासीदिह स्थाने विशालेति पुरी कृता

ditiṁ yatra tapaḥsiddhāmevaṁ paricacāra saḥ ।
tena cāsīdiha sthāne viśāleti purī kṛtā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४७ · १२ ॥
इक्ष्वाकोस्तु नरव्याघ्र पुत्रः परमधार्मिकः अलम्बुषायामुत्पन्नो विशाल इति विश्रुतः

ikṣvākostu naravyāghra putraḥ paramadhārmikaḥ ।
alambuṣāyāmutpanno viśāla iti viśrutaḥ ॥

॥ ११–१२ ॥

पुरुषसिंह! पूर्वकाल में महाराज इक्ष्वाकु के एक परम धर्मात्मा पुत्र थे, जो विशाल नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म अलम्बुषा के गर्भ से हुआ था। उन्होंने इस स्थान पर विशाला नाम की पुरी बसायी थी।

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॥ १ · ४७ · १३ ॥
विशालस्य सुतो राम हेमचन्द्रो महाबलः सुचन्द्र इति विख्यातो हेमचन्द्रादनन्तरः

viśālasya suto rāma hemacandro mahābalaḥ ।
sucandra iti vikhyāto hemacandrādanantaraḥ ॥

श्रीराम! विशाल के पुत्र का नाम था हेमचन्द्र, जो बड़े बलवान् थे। हेमचन्द्र के पुत्र सुचन्द्र नाम से विख्यात हुए।

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॥ १ · ४७ · १४ ॥
सुचन्द्रतनयो राम धूम्राश्व इति विश्रुतः धूम्राश्वतनयश्चापि सृञ्जयः समपद्यत

sucandratanayo rāma dhūmrāśva iti viśrutaḥ ।
dhūmrāśvatanayaścāpi sṛñjayaḥ samapadyata ॥

श्रीरामचन्द्र! सुचन्द्र के पुत्र धूम्राश्व और धूम्राश्व के पुत्र संजय हुए।

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॥ १ · ४७ · १५ ॥
सृञ्जयस्य सुतः श्रीमान् सहदेवः प्रतापवान् कुशाश्वः सहदेवस्य पुत्रः परमधार्मिकः

sṛñjayasya sutaḥ śrīmān sahadevaḥ pratāpavān ।
kuśāśvaḥ sahadevasya putraḥ paramadhārmikaḥ ॥

सृञ्जय के प्रतापी पुत्र श्रीमान् सहदेव हुए। सहदेव के परम धर्मात्मा पुत्र का नाम कुशाश्व था।

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॥ १ · ४७ · १६ ॥
कुशाश्वस्य महातेजाः सोमदत्तः प्रतापवान् सोमदत्तस्य पुत्रस्तु काकुत्स्थ इति विश्रुतः

kuśāśvasya mahātejāḥ somadattaḥ pratāpavān ।
somadattasya putrastu kākutstha iti viśrutaḥ ॥

कुशाश्व के महातेजस्वी पुत्र प्रतापी सोमदत्त हुए और सोमदत्त के पुत्र काकुत्स्थ नाम से विख्यात हुए।

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॥ १ · ४७ · १७ ॥
तस्य पुत्रो महातेजाः सम्प्रत्येष पुरीमिमाम् आवसत् परमप्रख्यः सुमतिर्नाम दुर्जयः

tasya putro mahātejāḥ sampratyeṣa purīmimām ।
āvasat paramaprakhyaḥ sumatirnāma durjayaḥ ॥

काकुत्स्थ के महातेजस्वी पुत्र सुमति नाम से प्रसिद्ध हैं; जो परम कान्तिमान् एवं दुर्जय वीर हैं। वे ही इस समय इस पुरी में निवास करते हैं।

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॥ १ · ४७ · १८ ॥
इक्ष्वाकोस्तु प्रसादेन सर्वे वैशालिका नृपाः दीर्घायुषो महात्मानो वीर्यवन्तः सुधार्मिकाः

ikṣvākostu prasādena sarve vaiśālikā nṛpāḥ ।
dīrghāyuṣo mahātmāno vīryavantaḥ sudhārmikāḥ ॥

महाराज इक्ष्वाकु के प्रसाद से विशाला के सभी नरेश दीर्घायु, महात्मा, पराक्रमी और परम धार्मिक होते आये हैं।

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॥ १ · ४७ · १९ ॥
इहाद्य रजनीमेकां सुखं स्वप्स्यामहे वयम् श्वः प्रभाते नरश्रेष्ठ जनकं द्रष्टुमर्हसि

ihādya rajanīmekāṁ sukhaṁ svapsyāmahe vayam ।
śvaḥ prabhāte naraśreṣṭha janakaṁ draṣṭumarhasi ॥

नरश्रेष्ठ! आज एक रात हमलोग यहीं सुखपूर्वक शयन करेंगे; फिर कल प्रातःकाल यहाँ से चलकर तुम मिथिला में राजा जनक का दर्शन करोगे।

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॥ १ · ४७ · २० ॥
सुमतिस्तु महातेजा विश्वामित्रमुपागतम् श्रुत्वा नरवरश्रेष्ठः प्रत्यागच्छन्महायशाः

sumatistu mahātejā viśvāmitramupāgatam ।
śrutvā naravaraśreṣṭhaḥ pratyāgacchanmahāyaśāḥ ॥

नरेशों में श्रेष्ठ, महातेजस्वी, महायशस्वी राजा सुमति विश्वामित्रजी को पुरी के समीप आया हुआ सुनकर उनकी अगवानी के लिये स्वयं आये।

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॥ १ · ४७ · २१ ॥
पूजां परमां कृत्वा सोपाध्यायः सबान्धवः प्राञ्जलिः कुशलं पृष्ट्वा विश्वामित्रमथाब्रवीत्

pūjāṁ ca paramāṁ kṛtvā sopādhyāyaḥ sabāndhavaḥ ।
prāñjaliḥ kuśalaṁ pṛṣṭvā viśvāmitramathābravīt ॥

अपने पुरोहित और बन्धु-बान्धवों के साथ राजा ने विश्वामित्रजी की उत्तम पूजा करके हाथ जोड़ उनका कुशल-समाचार पूछा और उनसे इस प्रकार कहा—

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॥ १ · ४७ · २२ ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे विषयं मुने सम्प्राप्तो दर्शनं चैव नास्ति धन्यतरो मम

dhanyo'smyanugṛhīto'smi yasya me viṣayaṁ mune ।
samprāpto darśanaṁ caiva nāsti dhanyataro mama ॥

"मुने! मैं धन्य हूँ। आपका मुझपर बड़ा अनुग्रह है; क्योंकि आपने स्वयं मेरे राज्य में पधारकर मुझे दर्शन दिया। इस समय मुझसे बढ़कर धन्य पुरुष दूसरा कोई नहीं है।"

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४७ ॥