राजा दशरथ का पुत्रों और वधुओं के साथ अयोध्या में प्रवेश, शत्रुघ्नसहित भरत का मामा के यहाँ जाना, श्रीराम के बर्ताव से सबका संतोष तथा सीता और श्रीराम का पारस्परिक प्रेम
“अयोध्या-प्रवेश”
॥ १ · ७७ · ६–१७ ॥
ध्वजपताकाशोभितायाम् अयोध्यायां रामः सीतया सह प्रविशति, दशरथो भ्रातरश्च समीपे, नार्यो दीपपात्रैः पुष्पैश्च स्वागतं कुर्वन्ति।
ध्वजा-पताकाओं और पुष्पवृष्टि से सजी अयोध्यापुरी में नीले वर्ण के मुकुटधारी श्रीराम सीता के साथ प्रवेश कर रहे हैं; पीछे महाराज दशरथ और साथ में भाई चल रहे हैं, तथा नगर की स्त्रियाँ दीपपात्र और पुष्प लिये आनन्द से उनका स्वागत कर रही हैं।
Into Ayodhya, decked with flags and showered with petals, the blue, crown-banded Rama enters with Sita at his side; King Dasharatha and the brothers walk close by, while the women of the city, bearing lamp-trays and flowers, welcome them with joy.
gate rāme praśāntātmā rāmo dāśarathirdhanuḥ।
varuṇāyāprameyāya dadau haste mahāyaśāḥ॥
जमदग्निकुमार परशुरामजी के चले जाने पर महायशस्वी दशरथनन्दन श्रीरामने शान्तचित्त होकर अपार शक्तिशाली वरुणके हाथ में वह धनुष दे दिया॥ १॥
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abhivādya tato rāmo vasiṣṭhapramukhānṛṣīn।
pitaraṁ vikalaṁ dṛṣṭvā provāca raghunandanaḥ॥
तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि ऋषियों को प्रणाम करके रघुनन्दन श्रीरामने अपने पिता को विकल देखकर उनसे कहा-॥ २॥
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jāmadagnyo gato rāmaḥ prayātu caturaṁgiṇī।
ayodhyābhimukhī senā tvayā nāthena pālitā॥
'पिताजी! जमदग्निकुमार परशुरामजी चले गये। अब आपके अधिनायकत्व में सुरक्षित यह चतुरंगिणी सेना अयोध्या की ओर प्रस्थान करे'॥ ३॥
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rāmasya vacanaṁ śrutvā rājā daśarathaḥ sutam।
bāhubhyāṁ sampariṣvajya mūrdhnyupāghrāya rāghavam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
gato rāma iti śrutvā hṛṣṭaḥ pramudito nṛpaḥ।
punarjātaṁ tadā mene putramātmānameva ca॥
श्रीराम का यह वचन सुनकर राजा दशरथने अपने पुत्र रघुनाथजी को दोनों भुजाओं से खींचकर छाती से लगा लिया और उनका मस्तक सूँघा। 'परशुरामजी चले गये' यह सुनकर राजा दशरथ को बड़ा हर्ष हुआ, वे आनन्दमग्न हो गये। उस समय उन्होंने अपना और अपने पुत्र का पुनर्जन्म हुआ माना॥ ४-५॥
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codayāmāsa tāṁ senāṁ jagāmāśu tataḥ purīm।
patākādhvajinīṁ ramyāṁ tūryodghuṣṭanināditām॥
तदनन्तर उन्होंने सेना को नगर की ओर कूँच करने की आज्ञा दी और वहाँ से चलकर बड़ी शीघ्रता के साथ वे अयोध्यापुरी में जा पहुँचे। उस समय उस पुरी में सब ओर ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं। सजावट से नगर की रमणीयता बढ़ गयी थी और भाँति-भाँति के वाद्यों की ध्वनि से सारी अयोध्या गूँज उठी थी॥ ६॥
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siktarājapathāramyāṁ prakīrṇakusumotkarām।
rājapraveśasumukhaiḥ paurairmaṅgalapāṇibhiḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
sampūrṇā prāviśad rājā janaughaiḥ samalaṁkṛtām।
pauraiḥ pratyudgato dūraṁ dvijaiśca puravāsibhiḥ॥
सड़कों पर जल का छिड़काव हुआ था, जिससे पुरी की सुरम्य शोभा बढ़ गयी थी। यत्र-तत्र ढेर-के-ढेर फूल बिखेरे गये थे। पुरवासी मनुष्य हाथों में मांगलिक वस्तुएँ लेकर राजा के प्रवेशमार्ग पर प्रसन्नमुख होकर खड़े थे। इन सबसे भरी-पूरी तथा भारी जनसमुदाय से अलंकृत हुई अयोध्यापुरी में राजाने प्रवेश किया। नागरिकों तथा पुरवासी ब्राह्मणों ने दूर तक आगे जाकर महाराज की अगवानी की थी॥ ७-८॥
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putrairanugataḥ śrīmān śrīmadbhiśca mahāyaśāḥ।
praviveśa gṛhaṁ rājā himavatsadṛśaṁ priyam॥
अपने कान्तिमान् पुत्रों के साथ महायशस्वी श्रीमान् राजा दशरथने अपने प्रिय राजभवन में, जो हिमालय के समान सुन्दर एवं गगनचुम्बी था, प्रवेश किया॥ ९॥
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nananda svajanai rājā gṛhe kāmaiḥ supūjitaḥ।
kausalyā ca sumitrā ca kaikeyī ca sumadhyamā॥
राजमहल में स्वजनों द्वारा मनोवाञ्छित वस्तुओं से परम पूजित हो राजा दशरथने बड़े आनन्द का अनुभव किया। महारानी कौसल्या, सुमित्रा, सुन्दर कटिप्रदेशवाली कैकेयी तथा जो अन्य राजपत्नियाँ थीं, वे सब बहुओं को उतारने के कार्य में जुट गयीं॥ १०¾॥
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vadhūpratigrahe yuktā yāścānyā rājayoṣitaḥ।
tataḥ sītāṁ mahābhāgāmūrmilāṁ ca yaśasvinīm॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
kuśadhvajasute cobhe jagṛhurnṛpayoṣitaḥ।
maṁgalālāpanairhomaiḥ śobhitāḥ kṣaumavāsasaḥ॥
तदनन्तर राजपरिवार की उन स्त्रियों ने परम सौभाग्यवती सीता, यशस्विनी ऊर्मिला तथा कुशध्वज की दोनों कन्याओं--माण्डवी और श्रुतकीर्ति को सवारी से उतारा और मंगल गीत गाती हुई सब वधुओं को घर में ले गयीं। वे प्रवेशकालिक होमकर्म से सुशोभित तथा रेशमी साड़ियों से अलंकृत थीं॥ ११-१२॥
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devatāyatanānyāśu sarvāstāḥ pratyapūjayan।
abhivādyābhivādyāṁśca sarvā rājasutāstadā॥
remire muditāḥ sarvā bhartṛbhirmuditā rahaḥ।
उन सबने देवमन्दिरों में ले जाकर उन बहुओं से देवताओं का पूजन करवाया। तदनन्तर नव-वधूरूप में आयी हुई उन सभी राजकुमारियों ने वन्दनीय सास-ससुर आदि के चरणों में प्रणाम किया और अपने-अपने पति के साथ एकान्त में रहकर वे सब-की-सब बड़े आनन्द से समय व्यतीत करने लगीं॥ १३¾॥
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kṛtadārāḥ kṛtāstrāśca sadhanāḥ sasuhṛjjanāḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
śuśrūṣamāṇāḥ pitaraṁ vartayanti nararṣabhāḥ।
kasyacittvatha kālasya rājā daśarathaḥ sutam॥
bharataṁ kaikeyīputramabravīd raghunandanaḥ।
श्रीराम आदि पुरुषश्रेष्ठ चारों भाई अस्त्रविद्या में निपुण और विवाहित होकर धन और मित्रों के साथ रहते हुए पिता की सेवा करने लगे। कुछ काल के बाद रघुकुलनन्दन राजा दशरथने अपने पुत्र कैकेयीकुमार भरत से कहा-॥ १४-१५¾॥
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ayaṁ kekayarājasya putro vasati putraka॥
tvāṁ netumāgato vīro yudhājinmātulastava।
'बेटा! ये तुम्हारे मामा केकयराजकुमार वीर युधाजित् तुम्हें लेने के लिये आये हैं और कई दिनों से यहाँ ठहरे हुए हैं'॥ १६¾॥
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śrutvā daśarathasyaitad bharataḥ kaikayīsutaḥ॥
gamanāyābhicakrāma śatrughnasahitastadā।
दशरथजी की यह बात सुनकर कैकेयीकुमार भरतने उस समय शत्रुघ्न के साथ मामा के यहाँ जाने का विचार किया॥ १७¾॥
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āpṛcchya pitaraṁ śūro rāmaṁ cākliṣṭakāriṇam॥
mātṝścāpi naraśreṣṭhaḥ śatrughnasahito yayau।
वे नरश्रेष्ठ शूरवीर भरत अपने पिता राजा दशरथ, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीराम तथा सभी माताओं से पूछकर उनकी आज्ञा ले शत्रुघ्नसहित वहाँ से चल दिये॥ १८¾॥
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yudhājit prāpya bharataṁ saśatrughnaṁ praharṣitaḥ॥
svapuraṁ prāviśad vīraḥ pitā tasya tutoṣa ha।
शत्रुघ्नसहित भरत को साथ लेकर वीर युधाजित् ने बड़े हर्ष के साथ अपने नगर में प्रवेश किया, इससे उनके पिता को बड़ा संतोष हुआ॥ १९¾॥
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gate ca bharate rāmo lakṣmaṇaśca mahābalaḥ॥
pitaraṁ devasaṁkāśaṁ pūjayāmāsatustadā।
भरत के चले जाने पर महाबली श्रीराम और लक्ष्मण उन दिनों अपने देवोपम पिता की सेवा-पूजा में संलग्न रहने लगे॥ २०¾॥
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piturājñāṁ puraskṛtya paurakāryāṇi sarvaśaḥ॥
cakāra rāmaḥ sarvāṇi priyāṇi ca hitāni ca।
पिता की आज्ञा शिरोधार्य करके वे नगरवासियों के सब काम देखने तथा उनके समस्त प्रिय तथा हितकर कार्य करने लगे॥ २१¾॥
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mātṛbhyo mātṛkāryāṇi kṛtvā paramayantritaḥ॥
gurūṇāṁ gurukāryāṇi kāle kāle'nvavaikṣata।
वे अपने को बड़े संयम में रखते थे और समय-समय पर माताओं के लिये उनके आवश्यक कार्य पूर्ण करके गुरुजनों के भारी-से-भारी कार्यों को भी सिद्ध करने का ध्यान रखते थे॥ २२॥
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evaṁ daśarathaḥ prīto brāhmaṇā naigamāstathā॥
rāmasya śīlavṛttena sarve viṣayavāsinaḥ।
उनके इस बर्ताव से राजा दशरथ, वेदवेत्ता ब्राह्मण तथा वैश्यवर्ग बड़े प्रसन्न रहते थे; श्रीराम के उत्तम शील और सद्-व्यवहार से उस राज्य के भीतर निवास करनेवाले सभी मनुष्य बहुत संतुष्ट रहते थे॥ २३¾॥
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teṣāmatiyaśā loke rāmaḥ satyaparākramaḥ॥
svayaṁbhūriva bhūtānāṁ babhūva guṇavattaraḥ।
राजा के उन चारों पुत्रों में सत्यपराक्रमी श्रीराम ही लोक में अत्यन्त यशस्वी तथा महान् गुणवान् हुए--ठीक उसी तरह जैसे समस्त भूतों में स्वयम्भू ब्रह्मा ही अत्यन्त यशस्वी और महान् गुणवान् हैं॥ २४¾॥
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rāmaśca sītayā sārdhaṁ vijahāra bahūnṛtūn॥
manasvī tadgatamanāstasyā hṛdi samarpitaḥ।
श्रीरामचन्द्रजी सदा सीता के हृदयमन्दिर में विराजमान रहते थे तथा मनस्वी श्रीराम का मन भी सीता में ही लगा रहता था; श्रीरामने सीता के साथ अनेक ऋतुओं तक विहार किया॥ २५¾॥
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priyā tu sītā rāmasya dārāḥ pitṛkṛtā iti॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
guṇādrūpaguṇāccāpi prītirbhūyo'bhivardhate।
tasyāśca bhartā dviguṇaṁ hṛdaye parivartate॥
सीता श्रीराम को बहुत ही प्रिय थीं; क्योंकि वे अपने पिता राजा जनक द्वारा श्रीराम के हाथ में पत्नी-रूप से समर्पित की गयी थीं। सीता के पातिव्रत्य आदि गुण से तथा उनके सौन्दर्यगुण से भी श्रीराम का उनके प्रति अधिकाधिक प्रेम बढ़ता रहता था; इसी प्रकार सीता के हृदय में भी उनके पति श्रीराम अपने गुण और सौन्दर्य के कारण द्विगुण प्रीतिपात्र बनकर रहते थे॥ २६-२७॥
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antargatamapi vyaktamākhyāti hṛdayaṁ hṛdā।
tasya bhūyo viśeṣeṇa maithilī janakātmajā।
devatābhiḥ samā rūpe sītā śrīriva rūpiṇī॥
जनकनन्दिनी मिथिलेशकुमारी सीता श्रीराम के हार्दिक अभिप्राय को भी अपने हृदय से ही और अधिकरूप से जान लेती थीं तथा स्पष्टरूप से बता भी देती थीं। वे रूप में देवांगनाओं के समान थीं और मूर्तिमती लक्ष्मी-सी प्रतीत होती थीं॥ २८॥
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tayā sa rājarṣisuto'bhikāmayā।
sameyivānuttamarājakanyayā।
atīva rāmaḥ śuśubhe mudānvito
vibhuḥ śriyā viṣṇurivāmareśvaraḥ॥
श्रेष्ठ राजकुमारी सीता श्रीराम की ही कामना रखती थीं और श्रीराम भी एकमात्र उन्हीं को चाहते थे; जैसे लक्ष्मी के साथ देवेश्वर भगवान् विष्णु को शोभा होती है, उसी प्रकार उन सीतादेवी के साथ राजर्षि दशरथकुमार श्रीराम परम प्रसन्न रहकर बड़ी शोभा पाने लगे॥ २९॥
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७७ ॥