श्रीराम का वैष्णव-धनुष को चढ़कर अमोघ बाण के द्वारा परशुराम के तपःप्राप्त पुण्यलोकोँ का नाश करना तथा परशुराम का महेन्द्रपर्वत को लौट जाना
“परशुराम-मानमर्दन”
॥ १ · ७६ · ४–२२ ॥
रामो वैष्णवचापं प्रत्यञ्चायां बाणं संधाय आकर्षति, पृष्ठे विष्णुरूपं प्रकाशते, परशुरामः कृताञ्जलिः नतजानुः क्षमां याचते।
नीले वर्ण के मुकुटधारी श्रीराम वैष्णव-धनुष की प्रत्यञ्चा पर अमोघ बाण चढ़ाकर उसे आकर्ण खींच रहे हैं; पीछे दिव्य प्रभा में चतुर्भुज विष्णु-रूप प्रकट हो रहा है। फरसा भूमि पर रखे परशुराम हाथ जोड़े, सिर झुकाये नतमस्तक खड़े हैं, उनका गर्व चूर हो गया है।
The blue, crown-banded Rama draws the Vaishnava bow to full stretch, the infallible arrow set on the string, while the radiant four-armed form of Vishnu manifests behind him; his axe laid on the ground, Parashurama kneels with joined palms and bowed head, his pride undone.
śrutvā tu jāmadagnyasya vākyaṁ dāśarathistadā।
gauravādyantritakathaḥ pitū rāmamathābravīt॥
दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी अपने पिता के गौरव का ध्यान रखकर संकोचवश वहाँ कुछ बोल नहीं रहे थे, परंतु जमदग्निकुमार परशुरामजी की उपर्युक्त बात सुनकर उस समय वे मौन न रह सके। उन्होंने परशुरामजी से कहा—
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kṛtavānasi yat karma śrutavānasmi bhārgava।
anurudhyāmahe brahman piturānṛṇyamāsthitaḥ॥
भृगुनन्दन! ब्रह्मन्! आपने पिता के ऋण से उऋण होने की—पिता के मारनेवाले का वध करके वैर का बदला चुकाने की भावना लेकर जो क्षत्रिय-संहाररूपी कर्म किया है, उसे मैंने सुना है और हमलोग आपके उस कर्म का अनुमोदन भी करते हैं (क्योंकि वीर पुरुष वैर का प्रतिशोध लेते ही हैं)।
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vīryahīnamivāśaktaṁ kṣatradharmeṇa bhārgava।
avajānāsi me tejaḥ paśya me'dya parākramam॥
भार्गव! मैं क्षत्रियधर्म से युक्त हूँ (इसीलिये आप ब्राह्मण-देवता के समक्ष विनीत रहकर कुछ बोल नहीं रहा हूँ) तो भी आप मुझे पराक्रमहीन और असमर्थ-सा मानकर मेरा तिरस्कार कर रहे हैं। अच्छा, अब मेरा तेज और पराक्रम देखिये।
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ityuktvā rāghavaḥ kruddho bhārgavasya varāyudham।
śaraṁ ca pratijagrāha hastāllaghuparākramaḥ॥
ऐसा कहकर शीघ्र पराक्रम करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने कुपित हो परशुरामजी के हाथ से वह उत्तम धनुष और बाण ले लिया (साथ ही उनसे अपनी वैष्णवी शक्ति को भी वापस ले लिया)।
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āropya sa dhanū rāmaḥ śaraṁ sajyaṁ cakāra ha।
jāmadagnyaṁ tato rāmaṁ rāmaḥ kruddho'bravīdidam॥
उस धनुष को चढ़ाकर श्रीराम ने उसकी प्रत्यञ्चा पर बाण रखा, फिर कुपित होकर उन्होंने जमदग्निकुमार परशुरामजी से इस प्रकार कहा—
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brāhmaṇo'sīti pūjyo me viśvāmitrakṛtena ca।
tasmācchakto na te rāma moktuṁ prāṇaharaṁ śaram॥
(भृगुनन्दन) राम! आप ब्राह्मण होने के नाते मेरे पूज्य हैं तथा विश्वामित्रजी के साथ भी आपका सम्बन्ध है—इन सब कारणों से मैं इस प्राण-संहारक बाण को आपके शरीर पर नहीं छोड़ सकता।
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imāṁ vā tvadgatiṁ rāma tapobalasamarjitān।
lokānapratimān vāpi haniṣyāmīti me matiḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
na hyayaṁ vaiṣṇavo divyaḥ śaraḥ parapuraṁjayaḥ।
moghaḥ patati vīryeṇa baladarpavināśanaḥ॥
राम! मेरा विचार है कि आपको जो सर्वत्र शीघ्रतापूर्वक आने-जाने की शक्ति प्राप्त हुई है उसे अथवा आपने अपने तपोबल से जिन अनुपम पुण्यलोकों को प्राप्त किया है उन्हींको नष्ट कर डालूँ; क्योंकि अपने पराक्रम से विपक्षी के बल के घमंड को चूर कर देनेवाला यह दिव्य वैष्णव बाण, जो शत्रुओं की नगरी पर विजय दिलानेवाला है, कभी निष्फल नहीं जाता है।
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varāyudhadharaṁ rāmaṁ draṣṭuṁ sarṣigaṇāḥ surāḥ।
pitāmahaṁ puraskṛtya sametāstatra sarvaśaḥ॥
उस समय उस उत्तम धनुष और बाण को धारण करके खड़े हुए श्रीरामचन्द्रजी को देखने के लिये सम्पूर्ण देवता और ऋषि ब्रह्माजी को आगे करके वहाँ एकत्र हो गये।
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gandharvāpsarasaścaiva siddhacāraṇakinnarāḥ।
yakṣarākṣasanāgāśca tad draṣṭuṁ mahadadbhutam॥
गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध, चारण, किन्नर, यक्ष, राक्षस और नाग भी उस अत्यन्त अद्भुत दृश्य को देखने के लिये वहाँ आ पहुँचे।
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jaḍīkṛte tadā loke rāme varadhanurdhare।
nirvīryo jāmadagnyo'sau rāmo rāmamudaikṣata॥
जब श्रीरामचन्द्रजीने वह श्रेष्ठ धनुष हाथ में ले लिया, उस समय सब लोग आश्चर्य से जडवत् हो गये। (परशुरामजी का वैष्णव तेज निकलकर श्रीरामचन्द्रजी में मिल गया। इसलिये) वीर्यहीन हुए जमदग्निकुमार राम ने दशरथनन्दन श्रीराम की ओर देखा।
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tejobhirhatavīryatvājjāmadagnyo jaḍīkṛtaḥ।
rāmaṁ kamalapatrākṣaṁ mandaṁ mandamuvāca ha॥
तेज निकल जाने से वीर्यहीन हो जाने के कारण जडवत् बने हुए जमदग्निकुमार परशुराम ने कमलनयन श्रीराम से धीरे-धीरे कहा—
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kāśyapāya mayā dattā yadā pūrvaṁ vasuṁdharā।
viṣaye me na vastavyamiti māṁ kāśyapo'bravīt॥
रघुनन्दन! पूर्वकाल में मैंने कश्यपजी को जब यह पृथिवी दान की थी, तब उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हें मेरे राज्य में नहीं रहना चाहिये।
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so'haṁ guruvacaḥ kurvan pṛthivyāṁ na vase niśām।
tadāprabhṛti kākutstha kṛtā me kāśyapasya ha॥
ककुत्स्थकुलनन्दन! तभी से अपने गुरु कश्यपजी की इस आज्ञा का पालन करता हुआ मैं कभी रात में ही पृथिवी पर नहीं निवास करता हूँ; क्योंकि यह बात सर्वविदित है कि मैंने कश्यप के सामने रात को पृथिवी पर न रहने की प्रतिज्ञा कर रखी है।
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tāmimāṁ madgatiṁ vīra hantuṁ nārhasi rāghava।
manojavaṁ gamiṣyāmi mahendraṁ parvatottamam॥
इसलिये वीर राघव! आप मेरी इस गमनशक्ति को नष्ट न करें। मैं मन के समान वेग से अभी महेन्द्र नामक श्रेष्ठ पर्वत पर चला जाऊँगा।
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lokāstvapratimā rāma nirjitāstapasā mayā।
jahi tāñcharamukhyena mā bhūt kālasya paryayaḥ॥
परंतु श्रीराम! मैंने अपनी तपस्या से जिन अनुपम लोकों पर विजय पायी है, उन्हींको आप इस श्रेष्ठ बाण से नष्ट कर दें; अब इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये।
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akṣayyaṁ madhuhantāraṁ jānāmi tvāṁ sureśvaram।
dhanuṣo'sya parāmarśāt svasti te'stu paraṁtapa॥
शत्रुओं को संताप देनेवाले वीर! आपने जो इस धनुष को चढ़ा दिया, इससे मुझे निश्चितरूप से ज्ञात हो गया कि आप मधु दैत्य को मारनेवाले अविनाशी देवेश्वर विष्णु हैं। आपका कल्याण हो।
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ete suragaṇāḥ sarve nirīkṣante samāgatāḥ।
tvāmapratimakarmāṇamapratidvandvamāhave॥
ये सब देवता एकत्र होकर आपकी ओर देख रहे हैं। आपके कर्म अनुपम हैं; युद्ध में आपका सामना करनेवाला दूसरा कोई नहीं है।
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na ceyaṁ mama kākutstha brīḍā bhavitumarhati।
tvayā trailokyanāthena yadahaṁ vimukhīkṛtaḥ॥
ककुत्स्थकुलभूषण! आपके सामने जो मेरी असमर्थता प्रकट हुई—यह मेरे लिये लज्जाजनक नहीं हो सकती; क्योंकि आप त्रिलोकीनाथ श्रीहरिने मुझे पराजित किया है।
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śaramapratimaṁ rāma moktumarhasi suvrata।
śaramokṣe gamiṣyāmi mahendraṁ parvatottamam॥
उत्तम व्रत का पालन करनेवाले श्रीराम! अब आप अपना अनुपम बाण छोड़िये; इसके छूटने के बाद ही मैं श्रेष्ठ महेन्द्र पर्वत पर जाऊँगा।
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tathā bruvati rāme tu jāmadagnye pratāpavān।
rāmo dāśarathiḥ śrīmāṁścikṣepa śaramuttamam॥
जमदग्निनन्दन परशुरामजी के ऐसा कहने पर प्रतापी दशरथनन्दन श्रीमान् रामचन्द्रजीने वह उत्तम बाण छोड़ दिया।
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sa hatān dṛśya rāmeṇa svām̐llokāṁstapasārjitān।
jāmadagnyo jagāmāśu mahendraṁ parvatottamam॥
अपनी तपस्या द्वारा उपार्जित किये हुए पुण्यलोकों को श्रीरामचन्द्रजी के चलाये हुए उस बाण से नष्ट हुआ देखकर परशुरामजी शीघ्र ही उत्तम महेन्द्र पर्वत पर चले गये।
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tato vitimirāḥ sarvā diśaścopadiśastathā।
surāḥ sarṣigaṇā rāmaṁ praśaśaṁsurudāyudham॥
उनके जाते ही समस्त दिशाओं तथा उपदिशाओं का अन्धकार दूर हो गया। उस समय ऋषियोंसहित देवता उत्तम आयुधधारी श्रीराम की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
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rāmaṁ dāśarathiṁ rāmo jāmadagnyaḥ prapūjitaḥ।
tataḥ pradakṣiṇīkṛtya jagāmātmagatiṁ prabhuḥ॥
तदनन्तर दशरथनन्दन राम ने जमदग्निकुमार परशुराम का पूजन किया। उनसे पूजित हो प्रभावशाली परशुराम दशरथकुमार श्रीराम की परिक्रमा करके अपने स्थान को चले गये।
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७६ ॥