श्रीरामके सद्गुणोंका वर्णन, राजा दशरथका श्रीरामको युवराज बनानेका विचार तथा विभिन्न नरेशों और नगर एवं जनपदके लोगोंको मन्त्रणाके लिये अपने दरबारमें बुलाना
“युवराज-संकल्प”
॥ २ · १ · ४०–५१ ॥
सिंहासनस्थो दशरथः सभायां रामं युवराजपदाय निर्दिशति, पार्श्वे वसिष्ठस्तिष्ठति, नीलवर्णो रामो धनुर्धरः सविनयं उपतिष्ठते।
राजसभा में सिंहासन पर विराजमान महाराज दशरथ हाथ बढ़ाकर श्रीराम को युवराज-पद के लिये संकेत कर रहे हैं; पास ही श्वेतकेश गुरु वसिष्ठ खड़े हैं और नीले वर्ण के मुकुटधारी श्रीराम धनुष लिये विनीत भाव से उपस्थित हैं। चारों ओर सामन्त नरेश और दरबारी बैठे हैं।
Enthroned in his court, King Dasharatha extends his hand to mark Rama for the office of crown prince; the white-haired guru Vasishtha stands close by, and the blue, crown-banded Rama, bow in hand, presents himself with humility, surrounded by seated vassal kings and courtiers.
gacchatā mātulakulaṁ bharatena tadānaghaḥ।
śatrughno nityaśatrughno nītaḥ prītipuraskṛtaḥ॥
(पहले यह बताया जा चुका है कि) भरत अपने मामा के यहाँ जाते समय काम आदि शत्रुओं को सदा के लिये नष्ट कर देनेवाले निष्पाप शत्रुघ्न को भी प्रेमवश अपने साथ लेते गये थे॥ १॥
English translation coming soon.
sa tatra nyavasad bhrātrā saha satkārasatkṛtaḥ।
mātulenāśvapatinā putrasnehena lālitaḥ॥
वहाँ भाईसहित उन का बड़ा आदर-सत्कार हुआ और वे वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे। उन के मामा युधाजित्, जो अश्वयूथ के अधिपति थे, उन दोनों पर पुत्र से भी अधिक स्नेह रखते और बड़ा लाड़-प्यार करते थे॥ २॥
English translation coming soon.
tatrāpi nivasantau tau tarpyamāṇau ca kāmataḥ।
bhrātarau smaratāṁ vīrau vṛddhaṁ daśarathaṁ nṛpam॥
यद्यपि मामा के यहाँ उन दोनों वीर भाइयों को सभी इच्छाएँ पूर्ण करके उन्हें पूर्णतः तृप्त किया जाता था, तथापि वहाँ रहते हुए भी उन्हें अपने वृद्ध पिता महाराज दशरथ की याद कभी नहीं भूलती थी॥ ३॥
English translation coming soon.
rājāpi tau mahātejāḥ sasmāra proṣitau sutau।
ubhau bharataśatrughnau mahendravaruṇopamau॥
महातेजस्वी राजा दशरथ भी परदेश में गये हुए महेन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी अपने उन दोनों पुत्र भरत और शत्रुघ्न का सदा स्मरण किया करते थे॥ ४॥
English translation coming soon.
sarva eva tu tasyeṣṭāścatvāraḥ puruṣarṣabhāḥ।
svaśarīrād vinirvṛttāścatvāra iva bāhavaḥ॥
अपने शरीर से प्रकट हुई चारों भुजाओं के समान वे सब चारों ही पुरुषशिरोमणि पुत्र महाराज को बहुत ही प्रिय थे॥ ५॥
English translation coming soon.
teṣāmapi mahātejā rāmo ratikaraḥ pituḥ।
svayambhūriva bhūtānāṁ babhūva guṇavattaraḥ॥
परंतु उन में भी महातेजस्वी श्रीराम सब की अपेक्षा अधिक गुणवान् होने के कारण समस्त प्राणियों के लिये ब्रह्माजी की भाँति पिता के लिये विशेष प्रीतिवर्धक थे॥ ६॥
English translation coming soon.
sa hi devairudīrṇasya rāvaṇasya vadhārthibhiḥ।
arthito mānuṣe loke jajñe viṣṇuḥ sanātanaḥ॥
इस का एक कारण और भी था--वे साक्षात् सनातन विष्णु थे और परम प्रचण्ड रावण के वध की अभिलाषा रखनेवाले देवताओं की प्रार्थना पर मनुष्यलोक में अवतीर्ण हुए थे॥ ७॥
English translation coming soon.
kausalyā śuśubhe tena putreṇāmitatejasā।
yathā vareṇa devānāmaditirvajrapāṇinā॥
उन अमित तेजस्वी पुत्र श्रीरामचन्द्रजी से महारानी कौसल्या की वैसी ही शोभा होती थी, जैसे वज्रधारी देवराज इन्द्र से देवमाता अदिति सुशोभित होती हैं॥ ८॥
English translation coming soon.
sa hi rūpopapannaśca vīryavānanasūyakaḥ।
bhūmāvanupamaḥ sūnurguṇairdaśarathopamaḥ॥
श्रीराम बड़े ही रूपवान् और पराक्रमी थे। वे किसी के दोष नहीं देखते थे। भूमण्डल में उन की समता करनेवाला कोई नहीं था। वे अपने गुणों से पिता दशरथ के समान एवं योग्य पुत्र थे॥ ९॥
English translation coming soon.
sa ca nityaṁ praśāntātmā mṛdupūrvaṁ ca bhāṣate।
ucyamāno'pi paruṣaṁ nottaraṁ pratipadyate॥
वे सदा शान्त चित्त रहते और सान्त्वनापूर्वक मीठे वचन बोलते थे; यदि उन से कोई कठोर बात भी कह देता तो वे उस का उत्तर नहीं देते थे॥ १०॥
English translation coming soon.
kadācidupakāreṇa kṛtenaikena tuṣyati।
na smaratyapakārāṇāṁ śatamapyātmavattayā॥
कभी कोई एक बार भी उपकार कर देता तो वे उस के उस एक ही उपकार से सदा संतुष्ट रहते थे और मन को वश में रखने के कारण किसी के सैकड़ों अपराध करने पर भी उस के अपराधों को याद नहीं रखते थे॥ ११॥
English translation coming soon.
śīlavṛddhairjñānavṛddhairvayovṛddhaiśca sajjanaiḥ।
kathayannāsta vai nityamastrayogyāntareṣvapi॥
अस्त्र-शस्त्रों के अभ्यास के लिये उपयुक्त समय में भी बीच-बीच में अवसर निकालकर वे उत्तम चरित्र में, ज्ञान में तथा अवस्था में बढ़े-चढ़े सत्पुरुषों के साथ ही सदा बातचीत करते (और उन से शिक्षा लेते थे)॥ १२॥
English translation coming soon.
buddhimān madhurābhāṣī pūrvabhāṣī priyaṁvadaḥ।
vīryavānna ca vīryeṇa mahatā svena vismitaḥ॥
वे बड़े बुद्धिमान् थे और सदा मीठे वचन बोलते थे। अपने पास आये हुए मनुष्यों से पहले स्वयं ही बात करते और ऐसी बातें मुँह से निकालते जो उन्हें प्रिय लगें; बल और पराक्रम से सम्पन्न होने पर भी अपने महान् पराक्रम के कारण उन्हें कभी गर्व नहीं होता था॥ १३॥
English translation coming soon.
na cānṛtakatho vidvān vṛddhānāṁ pratipūjakaḥ।
anuraktaḥ prajābhiśca prajāścāpyanurajyate॥
झूठी बात तो उन के मुख से कभी निकलती ही नहीं थी। वे विद्वान् थे और सदा वृद्ध पुरुषों का सम्मान किया करते थे। प्रजा का श्रीराम के प्रति और श्रीराम का प्रजा के प्रति बड़ा अनुराग था॥ १४॥
English translation coming soon.
sānukrośo jitakrodho brāhmaṇapratipūjakaḥ।
dīnānukampī dharmajño nityaṁ pragrahavān śuciḥ॥
वे परम दयालु क्रोध को जीतनेवाले और ब्राह्मणों के पुजारी थे। उन के मन में दीन-दुःखियों के प्रति बड़ी दया थी। वे धर्म के रहस्य को जाननेवाले, इन्द्रियों को सदा वश में रखनेवाले और बाहर-भीतर से परम पवित्र थे॥ १५॥
English translation coming soon.
kulocitamatiḥ kṣātraṁ svadharmaṁ bahu manyate।
manyate parayā prītyā mahat svargaphalaṁ tataḥ॥
अपने कुलोचित आचार, दया, उदारता और शरणागतरक्षा आदि में ही उन का मन लगता था। वे अपने क्षत्रियधर्म को अधिक महत्त्व देते और मानते थे। वे उस क्षत्रियधर्म के पालन से महान् स्वर्ग (परम धाम) की प्राप्ति मानते थे; अतः बड़ी प्रसन्नता के साथ उस में संलग्न रहते थे॥ १६॥
English translation coming soon.
nāśreyasi rato yaśca na viruddhakathāruciḥ।
uttarottarayuktīnāṁ vaktā vācaspatiryathā॥
अमङ्गलकारी निषिद्ध कर्म में उन की कभी प्रवृत्ति नहीं होती थी; शास्त्रविरुद्ध बातों को सुनने में उन की रुचि नहीं थी; वे अपने न्याययुक्त पक्ष के समर्थन में बृहस्पति के समान एक-से-एक बढ़कर युक्तियाँ देते थे॥ १७॥
English translation coming soon.
arogastaruṇo vāgmī vapuṣmān deśakālavit।
loke puruṣasārajñaḥ sādhureko vinirmitaḥ॥
उन का शरीर नीरोग था और अवस्था तरुण। वे अच्छे वक्ता, सुन्दर शरीर से सुशोभित तथा देश-काल के तत्त्व को समझनेवाले थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था कि विधाता ने संसार में समस्त पुरुषों के सारतत्त्व को समझनेवाले साधु पुरुष के रूप में एकमात्र श्रीराम को ही प्रकट किया है॥ १८॥
English translation coming soon.
sa tu śreṣṭhairguṇairyuktaḥ prajānāṁ pārthivātmajaḥ।
bahiścara iva prāṇo babhūva guṇataḥ priyaḥ॥
राजकुमार श्रीराम श्रेष्ठ गुणों से युक्त थे। वे अपने सद्गुणों के कारण प्रजाजनों को बाहर विचरनेवाले प्राण की भाँति प्रिय थे॥ १९॥
English translation coming soon.
sarvavidyāvratasnāto yathāvat sāṅgavedavit।
iṣvastre ca pituḥ śreṣṭho babhūva bharatāgrajaḥ॥
भरत के बड़े भाई श्रीराम सम्पूर्ण विद्याओं के व्रत में निष्णात और छहों अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदों के यथार्थ ज्ञाता थे। बाणविद्या में तो वे अपने पिता से भी बढ़कर थे॥ २०॥
English translation coming soon.
kalyāṇābhijanaḥ sādhuradīnaḥ satyavāgṛjuḥ।
vṛddhairabhivinītaśca dvijairdharmārthadarśibhiḥ॥
वे कल्याण की जन्मभूमि, साधु, दैन्यरहित, सत्यवादी और सरल थे; धर्म और अर्थ के ज्ञाता वृद्ध ब्राह्मणों के द्वारा उन्हें उत्तम शिक्षा प्राप्त हुई थी॥ २१॥
English translation coming soon.
dharmakāmārthatattvajñaḥ smṛtimān pratibhānavān।
laukike samayācāre kṛtakalpo viśāradaḥ॥
उन्हें धर्म, काम और अर्थ के तत्त्व का सम्यक् ज्ञान था। वे स्मरणशक्ति से सम्पन्न और प्रतिभाशाली थे। वे लोकव्यवहार के सम्पादन में समर्थ और समयोचित धर्माचरण में कुशल थे॥ २२॥
English translation coming soon.
nibhṛtaḥ saṁvṛtākāro guptamantraḥ sahāyavān।
amoghakrodhaharṣaśca tyāgasaṁyamakālavit॥
वे विनयशील, अपने आकार (अभिप्राय)-को छिपानेवाले, मन्त्र को गुप्त रखनेवाले और उत्तम सहायकों से सम्पन्न थे। उन का क्रोध अथवा हर्ष निष्फल नहीं होता था। वे वस्तुओं के त्याग और संग्रह के अवसर को भलीभाँति जानते थे॥ २३॥
English translation coming soon.
dṛḍhabhaktiḥ sthiraprajño nāsadgrāhī na durvacaḥ।
nistandrīrapramattaśca svadoṣaparadoṣavit॥
गुरुजनों के प्रति उन की दृढ़ भक्ति थी। वे स्थितप्रज्ञ थे और असद्वस्तुओं को कभी ग्रहण नहीं करते थे। उन के मुख से कभी दुर्वचन नहीं निकलता था। वे आलस्यरहित, प्रमादशून्य तथा अपने और पराये मनुष्यों के दोषों को अच्छी प्रकार जाननेवाले थे॥ २४॥
English translation coming soon.
śāstrajñaśca kṛtajñaśca puruṣāntarakovidaḥ।
yaḥ pragrahānugrahayoryathānyāyaṁ vicakṣaṇaḥ॥
वे शास्त्रों के ज्ञाता, उपकारियों के प्रति कृतज्ञ तथा पुरुषों के तारतम्य को अथवा दूसरे पुरुषों के मनोभाव को जानने में कुशल थे। यथायोग्य निग्रह और अनुग्रह करने में वे पूर्ण चतुर थे॥ २५॥
English translation coming soon.
satsaṁgrahānugrahaṇe sthānavinnigrahasya ca।
āyakarmaṇyupāyajñaḥ saṁdṛṣṭavyayakarmavit॥
उन्हें सत्पुरुषों के संग्रह और पालन तथा दुष्ट पुरुषों के निग्रह के अवसरों का ठीक-ठीक ज्ञान था। धन को आय के उपायों को वे अच्छी तरह जानते थे (अर्थात् फूलों को नष्ट न करके उन से रस लेनेवाले भ्रमरों की भाँति वे प्रजाओं को कष्ट दिये बिना ही उन से न्यायोचित धन का उपार्जन करने में कुशल थे) तथा शास्त्रवर्णित व्यय कर्म का भी उन्हें ठीक-ठीक ज्ञान था॥ २६॥
English translation coming soon.
śraiṣṭhyaṁ cāstrasamūheṣu prāpto vyāmiśrakeṣu ca।
arthadharmau ca saṁgṛhya sukhatantro na cālasaḥ॥
उन्होंने सब प्रकार के अस्त्रसमूहों तथा संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओं से मिश्रित नाटक आदि के ज्ञान में निपुणता प्राप्त की थी। वे अर्थ और धर्म का संग्रह (पालन) करते हुए तदनुकूल काम का सेवन करते थे और कभी आलस्य को पास नहीं फटकने देते थे॥ २७॥
English translation coming soon.
vaihārikāṇāṁ śilpānāṁ vijñātārthavibhāgavit।
ārohe vinaye caiva yukto vāraṇavājinām॥
विहार (क्रीडा या मनोरञ्जन)-के उपयोग में आनेवाले संगीत, वाद्य और चित्रकारी आदि शिल्पों के भी वे विशेषज्ञ थे। अर्थों के विभाजन का भी उन्हें सम्यक् ज्ञान था। वे हाथियों और घोड़ों पर चढ़ने और उन्हें भाँति-भाँति की चालों की शिक्षा देने में भी निपुण थे॥ २८॥
English translation coming soon.
dhanurvedavidāṁ śreṣṭho loke'tirathasammataḥ।
abhiyātā prahartā ca senānayaviśāradaḥ॥
श्रीरामचन्द्रजी इस लोक में धनुर्वेद के सभी विद्वानों में श्रेष्ठ थे। अतिरथी वीर भी उन का विशेष सम्मान करते थे। शत्रुसेना पर आक्रमण और प्रहार करने में वे विशेष कुशल थे। सेना-संचालन की नीति में उन्होंने अधिक निपुणता प्राप्त की थी॥ २९॥
English translation coming soon.
apradhṛṣyaśca saṁgrāme kruddhairapi surāsuraiḥ।
anasūyo jitakrodho na dṛpto na ca matsarī॥
संग्राम में कुपित होकर आये हुए समस्त देवता और असुर भी उन को परास्त नहीं कर सकते थे। उन में दोषदृष्टि का सर्वथा अभाव था। वे क्रोध को जीत चुके थे। दर्प और ईर्ष्या का उन में अत्यन्त अभाव था॥ ३०॥
English translation coming soon.
nāvajñeyaśca bhūtānāṁ na ca kālavaśānugaḥ।
evaṁ śreṣṭhairguṇairyuktaḥ prajānāṁ pārthivātmajaḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
sammatastriṣu lokeṣu vasudhāyāḥ kṣamāguṇaiḥ।
buddhyā bṛhaspatestulyo vīrye cāpi śacīpateḥ॥
किसी भी प्राणी के मन में उन के प्रति अवहेलना का भाव नहीं था। वे काल के वश में होकर उस के पीछे-पीछे चलनेवाले नहीं थे (काल ही उन के पीछे चलता था)। इस प्रकार उत्तम गुणों से युक्त होने के कारण राजकुमार श्रीराम समस्त प्रजाओं तथा तीनों लोकों के प्राणियों के लिये आदरणीय थे। वे अपने क्षमासम्बन्धी गुणों के द्वारा पृथ्वी की समानता करते थे। बुद्धि में बृहस्पति और बल-पराक्रम में शचीपति इन्द्र के तुल्य थे॥ ३१-३२॥
English translation coming soon.
tathā sarvaprajākāntaiḥ prītisaṁjananaiḥ pituḥ।
guṇairviruruce rāmo dīptaḥ sūrya ivāṁśubhiḥ॥
जैसे सूर्यदेव अपनी किरणों से प्रकाशित होते हैं। उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी समस्त प्रजाओं को प्रिय लगनेवाले तथा पिता की प्रीति बढ़ानेवाले सद्गुणों से सुशोभित होते थे॥ ३३॥
English translation coming soon.
tamevaṁvṛttasampannamapradhṛṣyaparākramam।
lokanāthopamaṁ nāthamakāmayata medinī॥
ऐसे सदाचारसम्पन्न, अजेय पराक्रमी और लोकपालों के समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी को पृथ्वी (भूदेवी और भूमण्डल की प्रजा)-ने अपना स्वामी बनाने की कामना की॥ ३४॥
English translation coming soon.
etaistu bahubhiryuktaṁ guṇairanupamaiḥ sutam।
dṛṣṭvā daśaratho rājā cakre cintāṁ paraṁtapaḥ॥
अपने पुत्र श्रीराम को अनेक अनुपम गुणों से युक्त देखकर शत्रुओं को संताप देनेवाले राजा दशरथ ने मन-ही-मन कुछ विचार करना आरम्भ किया॥ ३५॥
English translation coming soon.
atha rājño babhūvaiva vṛddhasya cirajīvinaḥ।
prītireṣā kathaṁ rāmo rājā syānmayi jīvati॥
उन चिरञ्जीवी बूढ़े महाराज दशरथ के हृदय में यह चिन्ता हुई कि किस प्रकार मेरे जीते-जी श्रीरामचन्द्र राजा हो जायँ और उन के राज्याभिषेक से प्राप्त होनेवाली यह प्रसन्नता मुझे कैसे सुलभ हो॥ ३६॥
English translation coming soon.
eṣā hyasya parā prītirhṛdi samparivartate।
kadā nāma sutaṁ drakṣyāmyabhiṣiktamahaṁ priyam॥
उन के हृदय में यह उत्तम अभिलाषा बारम्बार चक्कर लगाने लगी कि कब मैं अपने प्रिय पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक देखूँगा॥ ३७॥
English translation coming soon.
vṛddhikāmo hi lokasya sarvabhūtānukampakaḥ।
mattaḥ priyataro loke parjanya iva vṛṣṭimān॥
वे सोचने लगे कि 'श्रीराम सब लोगों के अभ्युदय की कामना करते और सम्पूर्ण जीवों पर दया रखते हैं। वे लोक में वर्षा करनेवाले मेघ की भाँति मुझ से भी बढ़कर प्रिय हो गये हैं॥ ३८॥
English translation coming soon.
yamaśakrasamo vīrye bṛhaspatisamo matau।
mahīdharasamo dhṛtyāṁ mattaśca guṇavattaraḥ॥
'श्रीराम बल-पराक्रम में यम और इन्द्र के समान, बुद्धि में बृहस्पति के समान और धैर्य में पर्वत के समान हैं। गुणों में तो वे मुझ से सर्वथा बढ़े-चढ़े हैं॥ ३९॥
English translation coming soon.
mahīmahamimāṁ kṛtsnāmadhitiṣṭhantamātmajam।
anena vayasā dṛṣṭvā yathā svargamavāpnuyām॥
मैं इसी उम्र में अपने बेटे श्रीराम को इस सारी पृथ्वी का राज्य करते देख यथासमय सुख से स्वर्ग प्राप्त करूँ, यही मेरे जीवन की साध है'॥ ४०॥
English translation coming soon.
vividhaistaistairanyapārthivadurlabhaiḥ।
śiṣṭairaparimeyaiśca loke lokottarairguṇaiḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
taṁ samīkṣya tadā rājā yuktaṁ samuditairguṇaiḥ।
niścitya sacivaiḥ sārdhaṁ yauvarājyamamanyata॥
इस प्रकार विचारकर तथा अपने पुत्र श्रीराम को उन-उन नाना प्रकार के विलक्षण, सज्जनोचित, असंख्य तथा लोकोत्तर गुणों से, जो अन्य राजाओं में दुर्लभ हैं, विभूषित देख राजा दशरथ ने मन्त्रियों के साथ सलाह करके उन्हें युवराज बनाने का निश्चय कर लिया॥ ४१-४२॥
English translation coming soon.
divyantarikṣe bhūmau ca ghoramutpātajaṁ bhayam।
saṁcacakṣe'tha medhāvī śarīre cātmano jarām॥
बुद्धिमान् महाराज दशरथ ने मन्त्री को स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूतल में दृष्टिगोचर होनेवाले उत्पातों का घोर भय सूचित किया और अपने शरीर में वृद्धावस्था के आगमन की भी बात बतायी॥ ४३॥
English translation coming soon.
pūrṇacandrānanasyātha śokāpanudamātmanaḥ।
loke rāmasya bubudhe sampriyatvaṁ mahātmanaḥ॥
पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाले महात्मा श्रीराम समस्त प्रजा के प्रिय थे। लोक में उन का सर्वप्रिय होना राजा के अपने आन्तरिक शोक को दूर करनेवाला था, इस बात को राजा ने अच्छी तरह समझा॥ ४४॥
English translation coming soon.
ātmanaśca prajānāṁ ca śreyase ca priyeṇa ca।
prāpte kāle sa dharmātmā bhaktyā tvaritavān nṛpaḥ॥
तदनन्तर उपयुक्त समय आने पर धर्मात्मा राजा दशरथ ने अपने और प्रजा के कल्याण के लिये मन्त्रियों को श्रीराम के राज्याभिषेक के लिये शीघ्र तैयारी करने की आज्ञा दी। इस उतावली में उन के हृदय का प्रेम और प्रजा का अनुराग भी कारण था॥ ४५॥
English translation coming soon.
nānānagaravāstavyān pṛthagjānapadānapi।
samānināya medinyāṁ pradhānān pṛthivīpatiḥ॥
उन भूपाल ने भिन्न-भिन्न नगरों में निवास करनेवाले प्रधान-प्रधान पुरुषों तथा अन्य जनपदों के सामन्त राजाओं को भी मन्त्रियों द्वारा अयोध्या में बुलवा लिया॥ ४६॥
English translation coming soon.
tān veśmanānābharaṇairyathārhaṁ pratipūjitān।
dadarśālaṁkṛto rājā prajāpatiriva prajāḥ॥
उन सब को ठहरने के लिये घर देकर नाना प्रकार के आभूषणों द्वारा उन का यथायोग्य सत्कार किया। तत्पश्चात् स्वयं भी अलंकृत होकर राजा दशरथ उन सब से उसी प्रकार मिले, जैसे प्रजापति ब्रह्मा प्रजावर्ग से मिलते हैं॥ ४७॥
English translation coming soon.
na tu kekayarājānaṁ janakaṁ vā narādhipaḥ।
tvarayā cānayāmāsa paścāttau śroṣyataḥ priyam॥
जल्दीबाजी के कारण राजा दशरथ ने केकय-नरेश को तथा मिथिलापति जनक को भी नहीं बुलवाया। उन्होंने सोचा वे दोनों सम्बन्धी इस प्रिय समाचार को पीछे सुन लेंगे॥ ४८॥
English translation coming soon.
athopaviṣṭe nṛpatau tasmin parapurārdane।
tataḥ praviviśuḥ śeṣā rājāno lokasammatāḥ॥
तदनन्तर शत्रुनगरी को पीड़ित करनेवाले राजा दशरथ जब दरबार में आ बैठे, तब (केकयराज और जनक को छोड़कर) शेष सभी लोकप्रिय नरेशों ने राजसभा में प्रवेश किया॥ ४९॥
English translation coming soon.
atha rājavitīrṇeṣu vividheṣvāsaneṣu ca।
rājānamevābhimukhā niṣedurniyatā nṛpāḥ॥
वे सभी नरेश राजा द्वारा दिये गये नाना प्रकार के सिंहासनों पर उन्हीं की ओर मुँह करके विनीतभाव से बैठे थे॥ ५०॥
English translation coming soon.
sa labdhamānairvinayānvitairnṛpaiḥ
purālayairjānapadaiśca mānavaiḥ।
upopaviṣṭairnṛpatirvṛto babhau
sahasracakṣurbhagavānivāmaraiḥ॥
राजा से सम्मानित होकर विनीतभाव से उन्हीं के आस-पास बैठे हुए सामन्त नरेशों तथा नगर और जनपद के निवासी मनुष्यों से घिरे हुए महाराज दशरथ उस समय देवताओं के बीच में विराजमान सहस्रनेत्रधारी भगवान् इन्द्र के समान शोभा पा रहे थे॥ ५१॥
English translation coming soon.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पहला सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ॥