वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ७४ · २४ श्लोकाःSarga 74 · 24 ślokas

विश्वामित्रका अपने आश्रमको प्रस्थान, राजा जनकका कन्याओंको भारी दहेज देकर राजा दशरथ आदिको विदा करना, मार्गमें शुभाशुभ शकुन और परशुरामजीका आगमन

परशुराम-आगमन

“परशुराम-आगमन”
॥ १ · ७४ · १८–२४ ॥

मत्तजटः परशुं चापं च धारयन् भार्गवः क्रुद्धः समायाति, कृताञ्जलिः दशरथः शान्तये याचते, नीलवर्णो रामस्तं स्थिरं वीक्षते।

उमड़ते मेघों के नीचे जटाधारी, फरसा और धनुष लिये भृगुनन्दन परशुराम क्रोध से भरे प्रकट हुए हैं; मुकुटधारी महाराज दशरथ हाथ जोड़े शान्ति की याचना कर रहे हैं और छत्रों के बीच नीले वर्ण के श्रीराम उन्हें स्थिर दृष्टि से देख रहे हैं। पीछे सेना की पताकाएँ झलक रही हैं।

Beneath churning storm-clouds, the matted-haired Parashurama, son of Bhrigu, appears blazing with wrath, axe and bow in hand; the crowned King Dasharatha, palms joined, pleads for peace, while the blue Rama, framed by royal parasols, meets the sage with a steady gaze. The army's banners glimmer behind.

॥ १ · ७४ · १ ॥
अथ रात्र्यां व्यतीतायां विश्वामित्रो महामुनिः। आपृष्ट्वा तौ राजानौ जगामोत्तरपर्वतम्‌॥

atha rātryāṁ vyatītāyāṁ viśvāmitro mahāmuniḥ।
āpṛṣṭvā tau ca rājānau jagāmottaraparvatam‌॥

तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब महामुनि विश्वामित्र राजा जनक और महाराज दशरथ दोनों राजाओं से पूछकर उनकी स्वीकृति ले उत्तरपर्वतपर (हिमालयकी शाखाभूत पर्वतपर, जहाँ कौशिकीके तटपर उनका आश्रम था, वहाँ) चले गये॥ १॥

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॥ १ · ७४ · २ ॥
विश्वामित्रे गते राजा वैदेहं मिथिलाधिपम्‌। आपृष्ट्वैव जगामाशु राजा दशरथः पुरीम्‌॥

viśvāmitre gate rājā vaidehaṁ mithilādhipam‌।
āpṛṣṭvaiva jagāmāśu rājā daśarathaḥ purīm‌॥

विश्वामित्रजीके चले जानेपर महाराज दशरथ भी विदेहराज मिथिलानरेश से अनुमति लेकर ही शीघ्र अपनी पुरी अयोध्या को जानेके लिये तैयार हो गये॥ २॥

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॥ १ · ७४ · ३ ॥
अथ राजा विदेहानां ददौ कन्याधनं बहु। गवां शतसहस्राणि बहूनि मिथिलेश्वरः॥

atha rājā videhānāṁ dadau kanyādhanaṁ bahu।
gavāṁ śatasahasrāṇi bahūni mithileśvaraḥ॥

उस समय विदेहराज जनकने अपनी कन्याओं के निमित्त दहेज में बहुत अधिक धन दिया। उन मिथिलानरेश ने कई लाख गौएँ, कितनी ही अच्छी-अच्छी कालीनें तथा करोड़ों की संख्या में रेशमी और सूती वस्त्र दिये, भाँति-भाँतिके गहनों से सजे हुए बहुत-से दिव्य हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक भेंट किये॥ ३-४॥

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॥ १ · ७४ · ४ ॥
कम्बलानां मुख्यानां क्षौमान्‌ कोट्यम्बराणि च। हस्त्यश्वरथपादातं दिव्यरूपं स्वलंकृतम्‌॥

kambalānāṁ ca mukhyānāṁ kṣaumān‌ koṭyambarāṇi ca।
hastyaśvarathapādātaṁ divyarūpaṁ svalaṁkṛtam‌॥

(उपर्युक्त ३-४ संयुक्त अनुवाद देखिये।) भाँति-भाँतिके गहनों से सजे हुए बहुत-से दिव्य हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक भेंट किये॥ ३-४॥

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॥ १ · ७४ · ५ ॥
ददौ कन्याशतं तासां दासीदासमनुत्तमम्‌। हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च॥

dadau kanyāśataṁ tāsāṁ dāsīdāsamanuttamam‌।
hiraṇyasya suvarṇasya muktānāṁ vidrumasya ca॥

अपनी पुत्रियों के लिये सहेलीके रूप में उन्होंने सौ-सौ कन्याएँ तथा उत्तम दास-दासियाँ अर्पित कीं। इन सबके अतिरिक्त राजाने उन सबके लिये एक करोड़ स्वर्णमुद्रा, रजतमुद्रा, मोती तथा मूँगे भी दिये॥ ५॥

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॥ १ · ७४ · ६ ॥
ददौ राजा सुसंहृष्टः कन्याधनमनुत्तमम्‌। दत्त्वा बहुविधं राजा समनुज्ञाप्य पार्थिवम्‌॥

dadau rājā susaṁhṛṣṭaḥ kanyādhanamanuttamam‌।
dattvā bahuvidhaṁ rājā samanujñāpya pārthivam‌॥

इस प्रकार मिथिलापति राजा जनकने बड़े हर्षके साथ उत्तमोत्तम कन्याधन (दहेज) दिया। नाना प्रकारकी वस्तुएँ दहेज में देकर महाराज दशरथ की आज्ञा ले वे मिथिलानगरके भीतर अपने महल में लौट आये। उधर अयोध्यानरेश राजा दशरथ भी सम्पूर्ण महर्षियों को आगे करके अपने महात्मा पुत्रों, सैनिकों तथा सेवकों के साथ अपनी राजधानी की ओर प्रस्थित हुए॥ ६-७॥

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॥ १ · ७४ · ७ ॥
प्रविवेश स्वनिलयं मिथिलां मिथिलेश्वरः। राजाप्ययोध्याधिपतिः सह पुत्रैर्महात्मभिः॥

praviveśa svanilayaṁ mithilāṁ mithileśvaraḥ।
rājāpyayodhyādhipatiḥ saha putrairmahātmabhiḥ॥

(उपर्युक्त ६-७ संयुक्त अनुवाद देखिये।) उधर अयोध्यानरेश राजा दशरथ भी सम्पूर्ण महर्षियों को आगे करके अपने महात्मा पुत्रों, सैनिकों तथा सेवकों के साथ अपनी राजधानी की ओर प्रस्थित हुए॥ ६-७॥

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॥ १ · ७४ · ८ ॥
ऋषीन्‌ सर्वान्‌ पुरस्कृत्य जगाम सबलानुगः। गच्छन्तं तु नरव्याघ्रं सर्षिसङ्घं सराघवम्‌॥

ṛṣīn‌ sarvān‌ puraskṛtya jagāma sabalānugaḥ।
gacchantaṁ tu naravyāghraṁ sarṣisaṅghaṁ sarāghavam‌॥

उस समय ऋषि-समूह तथा श्रीरामचन्द्रजीके साथ यात्रा करते हुए पुरुषसिंह महाराज दशरथ के चारों ओर भयंकर बोली बोलनेवाले पक्षी चहचहाने लगे और भूमिपर विचरनेवाले समस्त मृग उन्हें दाहिने रखकर जाने लगे॥ ८-९॥

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॥ १ · ७४ · ९ ॥
घोरास्तु पक्षिणो वाचो व्याहरन्ति समन्ततः। भौमाश्चैव मृगाः सर्वे गच्छन्ति स्म प्रदक्षिणम्‌॥

ghorāstu pakṣiṇo vāco vyāharanti samantataḥ।
bhaumāścaiva mṛgāḥ sarve gacchanti sma pradakṣiṇam‌॥

(उपर्युक्त ८-९ संयुक्त अनुवाद देखिये।) भूमिपर विचरनेवाले समस्त मृग उन्हें दाहिने रखकर जाने लगे॥ ८-९॥

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॥ १ · ७४ · १० ॥
तान्‌ दृष्ट्वा राजशार्दूलो वसिष्ठं पर्यपुच्छत। असौम्याः पक्षिणो घोरा मृगाश्चापि प्रदक्षिणाः॥ किमिदं हृदयोत्कम्पि मनो मम विषीदति।

tān‌ dṛṣṭvā rājaśārdūlo vasiṣṭhaṁ paryapucchata।
asaumyāḥ pakṣiṇo ghorā mṛgāścāpi pradakṣiṇāḥ॥
kimidaṁ hṛdayotkampi mano mama viṣīdati।

उन सबको देखकर राजसिंह दशरथने वसिष्ठजी से पूछा—'मुनिवर! एक ओर तो ये भयंकर पक्षी घोर शब्द कर रहे हैं और दूसरी ओर ये मृग हमें दाहिनी ओर करके जा रहे हैं; यह अशुभ और शुभ दो प्रकारका शकुन कैसा? यह मेरे हृदय को कम्पित किये देता है। मेरा मन विषाद में डूबा जाता है'॥ १०॥

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॥ १ · ७४ · ११ ॥
राज्ञो दशरथस्यैतच्छ्रुत्वा वाक्यं महानृषिः॥

rājño daśarathasyaitacchrutvā vākyaṁ mahānṛṣiḥ॥

राजा दशरथ का यह वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठने मधुर वाणी में कहा—'राजन्‌! इस शकुनका जो फल है, उसे सुनिये—॥ ११॥

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॥ १ · ७४ · १२ ॥
उवाच मधुरां वाणीं श्रूयतामस्य यत्‌ फलम्‌। उपस्थितं भयं घोरं दिव्यं पक्षिमुखाच्च्युतम्‌॥ मृगाः प्रशमयन्त्येते संतापस्त्यज्यतामयम्‌।

uvāca madhurāṁ vāṇīṁ śrūyatāmasya yat‌ phalam‌।
upasthitaṁ bhayaṁ ghoraṁ divyaṁ pakṣimukhāccyutam‌॥
mṛgāḥ praśamayantyete saṁtāpastyajyatāmayam‌।

आकाश में पक्षियों के मुख से जो बात निकल रही है, वह बताती है कि इस समय कोई घोर भय उपस्थित होनेवाला है, परंतु हमें दाहिने रखकर जानेवाले ये मृग उस भयके शान्त हो जानेकी सूचना दे रहे हैं; इसलिये आप यह चिन्ता छोड़िये'॥ ११-१२॥

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॥ १ · ७४ · १३ ॥
तेषां संवदतां तत्र वायुः प्रादुर्बभूव ह॥

teṣāṁ saṁvadatāṁ tatra vāyuḥ prādurbabhūva ha॥

इन लोगों में इस प्रकार बातें हो ही रही थीं कि वहाँ बड़े जोरोंकी आँधी उठी।॥ १३॥

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॥ १ · ७४ · १४ ॥
कम्पयन्‌ मेदिनीं सर्वां पातयंश्च महाद्रुमान्‌। तमसा संवृतः सूर्यः सर्वे नावेदिषुर्दिशः॥ पुनः भस्मना चावृतं सर्वं सम्मूढमिव तद्बलम्‌।

kampayan‌ medinīṁ sarvāṁ pātayaṁśca mahādrumān‌।
tamasā saṁvṛtaḥ sūryaḥ sarve nāvediṣurdiśaḥ॥
punaḥ bhasmanā cāvṛtaṁ sarvaṁ sammūḍhamiva tadbalam‌।

वह सारी पृथ्वी को कँपाती हुई बड़े-बड़े वृक्षों को धराशायी करने लगी। सूर्य अन्धकार से आच्छन्न हो गये। किसीको दिशाओं का भान न रहा। धूल से ढक जानेके कारण वह सारी सेना मूर्च्छित-सी हो गयी॥ १३-१४॥

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॥ १ · ७४ · १५ ॥
वसिष्ठ ऋषयश्चान्ये राजा ससुतस्तदा॥

vasiṣṭha ṛṣayaścānye rājā ca sasutastadā॥

उस समय केवल वसिष्ठ मुनि, अन्यान्य ऋषियों तथा पुत्रोंसहित राजा दशरथ को ही चेत रह गया था, शेष सभी लोग अचेत हो गये थे।॥ १५॥

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॥ १ · ७४ · १६ ॥
ससंज्ञा इव तत्रासन्‌ सर्वमन्यद्विचेतनम्‌। तस्मिंस्तमसि घोरे तु भस्मच्छन्नेव सा चमूः॥

sasaṁjñā iva tatrāsan‌ sarvamanyadvicetanam‌।
tasmiṁstamasi ghore tu bhasmacchanneva sā camūḥ॥

उस घोर अन्धकार में राजाकी वह सेना धूल से आच्छादित-सी हो गयी थी॥ १५-१६॥

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॥ १ · ७४ · १७ ॥
ददर्श भीमसंकाशं जटामण्डलधारिणम्‌। भार्गवं जामदग्न्येयं राजा राजविमर्दनम्‌॥

dadarśa bhīmasaṁkāśaṁ jaṭāmaṇḍaladhāriṇam‌।
bhārgavaṁ jāmadagnyeyaṁ rājā rājavimardanam‌॥

उस समय राजा दशरथने देखा—क्षत्रिय राजाओं का मान-मर्दन करनेवाले भृगुकुलनन्दन जमदग्निकुमार परशुराम सामनेसे आ रहे हैं। वे बड़े भयानक-से दिखायी देते थे। उन्होंने मस्तकपर बड़ी-बड़ी जटाएँ धारण कर रखी थीं। वे कैलासके समान दुर्जय और कालाग्निके समान दुःसह प्रतीत होते थे। तेजोमण्डल द्वारा जाज्वल्यमान-से हो रहे थे। साधारण लोगों के लिये उनकी ओर देखना भी कठिन था। वे कंधेपर फरसा रखे और हाथ में विद्युद्गण के समान दीप्तिमान्‌ धनुष एवं भयंकर बाण लिये त्रिपुरविनाशक भगवान्‌ शिवके समान जान पड़ते थे॥ १७-१९॥

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॥ १ · ७४ · १८ ॥
कैलासमिव दुर्धर्षं कालाग्निमिव दुःसहम्‌। ज्वलन्तमिव तेजोभिर्दुर्निरीक्ष्यं पृथग्जनैः॥

kailāsamiva durdharṣaṁ kālāgnimiva duḥsaham‌।
jvalantamiva tejobhirdurnirīkṣyaṁ pṛthagjanaiḥ॥

(उपर्युक्त १७-१९ संयुक्त अनुवाद देखिये।) वे कैलासके समान दुर्जय और कालाग्निके समान दुःसह प्रतीत होते थे। तेजोमण्डल द्वारा जाज्वल्यमान-से हो रहे थे। साधारण लोगों के लिये उनकी ओर देखना भी कठिन था॥ १७-१९॥

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॥ १ · ७४ · १९ ॥
स्कन्धे चासज्ज्य परशुं धनुर्विद्युद्गणोपमम्‌। प्रगृह्य शरमुग्रं त्रिपुरघ्नं यथा शिवम्‌॥

skandhe cāsajjya paraśuṁ dhanurvidyudgaṇopamam‌।
pragṛhya śaramugraṁ ca tripuraghnaṁ yathā śivam‌॥

(उपर्युक्त १७-१९ संयुक्त अनुवाद देखिये।) वे कंधेपर फरसा रखे और हाथ में विद्युद्गण के समान दीप्तिमान्‌ धनुष एवं भयंकर बाण लिये त्रिपुरविनाशक भगवान्‌ शिवके समान जान पड़ते थे॥ १७-१९॥

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॥ १ · ७४ · २० ॥
तं दृष्ट्वा भीमसंकाशं ज्वलन्तमिव पावकम्‌। वसिष्ठप्रमुखा विप्रा जपहोमपरायणाः॥ संगता मुनयः सर्वे संजजल्पुरथो मिथः।

taṁ dṛṣṭvā bhīmasaṁkāśaṁ jvalantamiva pāvakam‌।
vasiṣṭhapramukhā viprā japahomaparāyaṇāḥ॥
saṁgatā munayaḥ sarve saṁjajalpuratho mithaḥ।

प्रज्वलित अग्निके समान भयानक-से प्रतीत होनेवाले परशुराम को उपस्थित देख जप और होम में तत्पर रहनेवाले वसिष्ठ आदि सभी ब्रह्मर्षि एकत्र हो परस्पर इस प्रकार बातें करने लगे—॥ २०॥

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॥ १ · ७४ · २१ ॥
कच्चित्‌ पितृवधामर्षी क्षत्रं नोत्सादयिष्यति॥

kaccit‌ pitṛvadhāmarṣī kṣatraṁ notsādayiṣyati॥

'क्या अपने पिताके वध से अमर्षके वशीभूत हो ये क्षत्रियों का संहार नहीं कर डालेंगे?॥ २१॥

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॥ १ · ७४ · २२ ॥
पूर्वं क्षत्रवधं कृत्वा गतमन्युर्गतज्वरः। क्षत्रस्योत्सादनं भूयो खल्वस्य चिकीर्षितम्‌॥

pūrvaṁ kṣatravadhaṁ kṛtvā gatamanyurgatajvaraḥ।
kṣatrasyotsādanaṁ bhūyo na khalvasya cikīrṣitam‌॥

पूर्वकालमें क्षत्रियों का वध करके इन्होंने अपना क्रोध उतार लिया है। अब इनकी बदला लेनेकी चिन्ता दूर हो चुकी है। अतः फिर क्षत्रियों का संहार करना इनके लिये अभीष्ट नहीं है, यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है'॥ २१-२२॥

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॥ १ · ७४ · २३ ॥
एवमुक्त्वार्घ्यमादाय भार्गवं भीमदर्शनम्‌। ऋषयो राम रामेति मधुरं वाक्यमब्रुवन्‌॥

evamuktvārghyamādāya bhārgavaṁ bhīmadarśanam‌।
ṛṣayo rāma rāmeti madhuraṁ vākyamabruvan‌॥

ऐसा कहकर ऋषियों ने भयंकर दिखायी देनेवाले भृगुनन्दन परशुराम को अर्घ्य लेकर दिया और 'राम! राम!' कहकर उनसे मधुर वाणी में बातचीत की॥ २३॥

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॥ १ · ७४ · २४ ॥
प्रतिगृह्य तु तां पूजामृषिदत्तां प्रतापवान्‌। रामं दाशरथिं रामो जामदग्न्योऽभ्यभाषत॥

pratigṛhya tu tāṁ pūjāmṛṣidattāṁ pratāpavān‌।
rāmaṁ dāśarathiṁ rāmo jāmadagnyo'bhyabhāṣata॥

ऋषियों की दी हुई उस पूजा को स्वीकार करके प्रतापी जमदग्निपुत्र परशुराम ने दशरथनन्दन श्रीराम से इस प्रकार कहा॥ २४॥

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः ॥ ७४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७४ ॥