विश्वामित्रका अपने आश्रमको प्रस्थान, राजा जनकका कन्याओंको भारी दहेज देकर राजा दशरथ आदिको विदा करना, मार्गमें शुभाशुभ शकुन और परशुरामजीका आगमन
“परशुराम-आगमन”
॥ १ · ७४ · १८–२४ ॥
मत्तजटः परशुं चापं च धारयन् भार्गवः क्रुद्धः समायाति, कृताञ्जलिः दशरथः शान्तये याचते, नीलवर्णो रामस्तं स्थिरं वीक्षते।
उमड़ते मेघों के नीचे जटाधारी, फरसा और धनुष लिये भृगुनन्दन परशुराम क्रोध से भरे प्रकट हुए हैं; मुकुटधारी महाराज दशरथ हाथ जोड़े शान्ति की याचना कर रहे हैं और छत्रों के बीच नीले वर्ण के श्रीराम उन्हें स्थिर दृष्टि से देख रहे हैं। पीछे सेना की पताकाएँ झलक रही हैं।
Beneath churning storm-clouds, the matted-haired Parashurama, son of Bhrigu, appears blazing with wrath, axe and bow in hand; the crowned King Dasharatha, palms joined, pleads for peace, while the blue Rama, framed by royal parasols, meets the sage with a steady gaze. The army's banners glimmer behind.
atha rātryāṁ vyatītāyāṁ viśvāmitro mahāmuniḥ।
āpṛṣṭvā tau ca rājānau jagāmottaraparvatam॥
तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब महामुनि विश्वामित्र राजा जनक और महाराज दशरथ दोनों राजाओं से पूछकर उनकी स्वीकृति ले उत्तरपर्वतपर (हिमालयकी शाखाभूत पर्वतपर, जहाँ कौशिकीके तटपर उनका आश्रम था, वहाँ) चले गये॥ १॥
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viśvāmitre gate rājā vaidehaṁ mithilādhipam।
āpṛṣṭvaiva jagāmāśu rājā daśarathaḥ purīm॥
विश्वामित्रजीके चले जानेपर महाराज दशरथ भी विदेहराज मिथिलानरेश से अनुमति लेकर ही शीघ्र अपनी पुरी अयोध्या को जानेके लिये तैयार हो गये॥ २॥
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atha rājā videhānāṁ dadau kanyādhanaṁ bahu।
gavāṁ śatasahasrāṇi bahūni mithileśvaraḥ॥
उस समय विदेहराज जनकने अपनी कन्याओं के निमित्त दहेज में बहुत अधिक धन दिया। उन मिथिलानरेश ने कई लाख गौएँ, कितनी ही अच्छी-अच्छी कालीनें तथा करोड़ों की संख्या में रेशमी और सूती वस्त्र दिये, भाँति-भाँतिके गहनों से सजे हुए बहुत-से दिव्य हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक भेंट किये॥ ३-४॥
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kambalānāṁ ca mukhyānāṁ kṣaumān koṭyambarāṇi ca।
hastyaśvarathapādātaṁ divyarūpaṁ svalaṁkṛtam॥
(उपर्युक्त ३-४ संयुक्त अनुवाद देखिये।) भाँति-भाँतिके गहनों से सजे हुए बहुत-से दिव्य हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक भेंट किये॥ ३-४॥
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dadau kanyāśataṁ tāsāṁ dāsīdāsamanuttamam।
hiraṇyasya suvarṇasya muktānāṁ vidrumasya ca॥
अपनी पुत्रियों के लिये सहेलीके रूप में उन्होंने सौ-सौ कन्याएँ तथा उत्तम दास-दासियाँ अर्पित कीं। इन सबके अतिरिक्त राजाने उन सबके लिये एक करोड़ स्वर्णमुद्रा, रजतमुद्रा, मोती तथा मूँगे भी दिये॥ ५॥
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dadau rājā susaṁhṛṣṭaḥ kanyādhanamanuttamam।
dattvā bahuvidhaṁ rājā samanujñāpya pārthivam॥
इस प्रकार मिथिलापति राजा जनकने बड़े हर्षके साथ उत्तमोत्तम कन्याधन (दहेज) दिया। नाना प्रकारकी वस्तुएँ दहेज में देकर महाराज दशरथ की आज्ञा ले वे मिथिलानगरके भीतर अपने महल में लौट आये। उधर अयोध्यानरेश राजा दशरथ भी सम्पूर्ण महर्षियों को आगे करके अपने महात्मा पुत्रों, सैनिकों तथा सेवकों के साथ अपनी राजधानी की ओर प्रस्थित हुए॥ ६-७॥
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praviveśa svanilayaṁ mithilāṁ mithileśvaraḥ।
rājāpyayodhyādhipatiḥ saha putrairmahātmabhiḥ॥
(उपर्युक्त ६-७ संयुक्त अनुवाद देखिये।) उधर अयोध्यानरेश राजा दशरथ भी सम्पूर्ण महर्षियों को आगे करके अपने महात्मा पुत्रों, सैनिकों तथा सेवकों के साथ अपनी राजधानी की ओर प्रस्थित हुए॥ ६-७॥
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ṛṣīn sarvān puraskṛtya jagāma sabalānugaḥ।
gacchantaṁ tu naravyāghraṁ sarṣisaṅghaṁ sarāghavam॥
उस समय ऋषि-समूह तथा श्रीरामचन्द्रजीके साथ यात्रा करते हुए पुरुषसिंह महाराज दशरथ के चारों ओर भयंकर बोली बोलनेवाले पक्षी चहचहाने लगे और भूमिपर विचरनेवाले समस्त मृग उन्हें दाहिने रखकर जाने लगे॥ ८-९॥
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ghorāstu pakṣiṇo vāco vyāharanti samantataḥ।
bhaumāścaiva mṛgāḥ sarve gacchanti sma pradakṣiṇam॥
(उपर्युक्त ८-९ संयुक्त अनुवाद देखिये।) भूमिपर विचरनेवाले समस्त मृग उन्हें दाहिने रखकर जाने लगे॥ ८-९॥
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tān dṛṣṭvā rājaśārdūlo vasiṣṭhaṁ paryapucchata।
asaumyāḥ pakṣiṇo ghorā mṛgāścāpi pradakṣiṇāḥ॥
kimidaṁ hṛdayotkampi mano mama viṣīdati।
उन सबको देखकर राजसिंह दशरथने वसिष्ठजी से पूछा—'मुनिवर! एक ओर तो ये भयंकर पक्षी घोर शब्द कर रहे हैं और दूसरी ओर ये मृग हमें दाहिनी ओर करके जा रहे हैं; यह अशुभ और शुभ दो प्रकारका शकुन कैसा? यह मेरे हृदय को कम्पित किये देता है। मेरा मन विषाद में डूबा जाता है'॥ १०॥
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rājño daśarathasyaitacchrutvā vākyaṁ mahānṛṣiḥ॥
राजा दशरथ का यह वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठने मधुर वाणी में कहा—'राजन्! इस शकुनका जो फल है, उसे सुनिये—॥ ११॥
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uvāca madhurāṁ vāṇīṁ śrūyatāmasya yat phalam।
upasthitaṁ bhayaṁ ghoraṁ divyaṁ pakṣimukhāccyutam॥
mṛgāḥ praśamayantyete saṁtāpastyajyatāmayam।
आकाश में पक्षियों के मुख से जो बात निकल रही है, वह बताती है कि इस समय कोई घोर भय उपस्थित होनेवाला है, परंतु हमें दाहिने रखकर जानेवाले ये मृग उस भयके शान्त हो जानेकी सूचना दे रहे हैं; इसलिये आप यह चिन्ता छोड़िये'॥ ११-१२॥
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teṣāṁ saṁvadatāṁ tatra vāyuḥ prādurbabhūva ha॥
इन लोगों में इस प्रकार बातें हो ही रही थीं कि वहाँ बड़े जोरोंकी आँधी उठी।॥ १३॥
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kampayan medinīṁ sarvāṁ pātayaṁśca mahādrumān।
tamasā saṁvṛtaḥ sūryaḥ sarve nāvediṣurdiśaḥ॥
punaḥ bhasmanā cāvṛtaṁ sarvaṁ sammūḍhamiva tadbalam।
वह सारी पृथ्वी को कँपाती हुई बड़े-बड़े वृक्षों को धराशायी करने लगी। सूर्य अन्धकार से आच्छन्न हो गये। किसीको दिशाओं का भान न रहा। धूल से ढक जानेके कारण वह सारी सेना मूर्च्छित-सी हो गयी॥ १३-१४॥
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vasiṣṭha ṛṣayaścānye rājā ca sasutastadā॥
उस समय केवल वसिष्ठ मुनि, अन्यान्य ऋषियों तथा पुत्रोंसहित राजा दशरथ को ही चेत रह गया था, शेष सभी लोग अचेत हो गये थे।॥ १५॥
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sasaṁjñā iva tatrāsan sarvamanyadvicetanam।
tasmiṁstamasi ghore tu bhasmacchanneva sā camūḥ॥
उस घोर अन्धकार में राजाकी वह सेना धूल से आच्छादित-सी हो गयी थी॥ १५-१६॥
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dadarśa bhīmasaṁkāśaṁ jaṭāmaṇḍaladhāriṇam।
bhārgavaṁ jāmadagnyeyaṁ rājā rājavimardanam॥
उस समय राजा दशरथने देखा—क्षत्रिय राजाओं का मान-मर्दन करनेवाले भृगुकुलनन्दन जमदग्निकुमार परशुराम सामनेसे आ रहे हैं। वे बड़े भयानक-से दिखायी देते थे। उन्होंने मस्तकपर बड़ी-बड़ी जटाएँ धारण कर रखी थीं। वे कैलासके समान दुर्जय और कालाग्निके समान दुःसह प्रतीत होते थे। तेजोमण्डल द्वारा जाज्वल्यमान-से हो रहे थे। साधारण लोगों के लिये उनकी ओर देखना भी कठिन था। वे कंधेपर फरसा रखे और हाथ में विद्युद्गण के समान दीप्तिमान् धनुष एवं भयंकर बाण लिये त्रिपुरविनाशक भगवान् शिवके समान जान पड़ते थे॥ १७-१९॥
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kailāsamiva durdharṣaṁ kālāgnimiva duḥsaham।
jvalantamiva tejobhirdurnirīkṣyaṁ pṛthagjanaiḥ॥
(उपर्युक्त १७-१९ संयुक्त अनुवाद देखिये।) वे कैलासके समान दुर्जय और कालाग्निके समान दुःसह प्रतीत होते थे। तेजोमण्डल द्वारा जाज्वल्यमान-से हो रहे थे। साधारण लोगों के लिये उनकी ओर देखना भी कठिन था॥ १७-१९॥
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skandhe cāsajjya paraśuṁ dhanurvidyudgaṇopamam।
pragṛhya śaramugraṁ ca tripuraghnaṁ yathā śivam॥
(उपर्युक्त १७-१९ संयुक्त अनुवाद देखिये।) वे कंधेपर फरसा रखे और हाथ में विद्युद्गण के समान दीप्तिमान् धनुष एवं भयंकर बाण लिये त्रिपुरविनाशक भगवान् शिवके समान जान पड़ते थे॥ १७-१९॥
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taṁ dṛṣṭvā bhīmasaṁkāśaṁ jvalantamiva pāvakam।
vasiṣṭhapramukhā viprā japahomaparāyaṇāḥ॥
saṁgatā munayaḥ sarve saṁjajalpuratho mithaḥ।
प्रज्वलित अग्निके समान भयानक-से प्रतीत होनेवाले परशुराम को उपस्थित देख जप और होम में तत्पर रहनेवाले वसिष्ठ आदि सभी ब्रह्मर्षि एकत्र हो परस्पर इस प्रकार बातें करने लगे—॥ २०॥
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kaccit pitṛvadhāmarṣī kṣatraṁ notsādayiṣyati॥
'क्या अपने पिताके वध से अमर्षके वशीभूत हो ये क्षत्रियों का संहार नहीं कर डालेंगे?॥ २१॥
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pūrvaṁ kṣatravadhaṁ kṛtvā gatamanyurgatajvaraḥ।
kṣatrasyotsādanaṁ bhūyo na khalvasya cikīrṣitam॥
पूर्वकालमें क्षत्रियों का वध करके इन्होंने अपना क्रोध उतार लिया है। अब इनकी बदला लेनेकी चिन्ता दूर हो चुकी है। अतः फिर क्षत्रियों का संहार करना इनके लिये अभीष्ट नहीं है, यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है'॥ २१-२२॥
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evamuktvārghyamādāya bhārgavaṁ bhīmadarśanam।
ṛṣayo rāma rāmeti madhuraṁ vākyamabruvan॥
ऐसा कहकर ऋषियों ने भयंकर दिखायी देनेवाले भृगुनन्दन परशुराम को अर्घ्य लेकर दिया और 'राम! राम!' कहकर उनसे मधुर वाणी में बातचीत की॥ २३॥
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pratigṛhya tu tāṁ pūjāmṛṣidattāṁ pratāpavān।
rāmaṁ dāśarathiṁ rāmo jāmadagnyo'bhyabhāṣata॥
ऋषियों की दी हुई उस पूजा को स्वीकार करके प्रतापी जमदग्निपुत्र परशुराम ने दशरथनन्दन श्रीराम से इस प्रकार कहा॥ २४॥
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७४ ॥