वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः १७ · ३७ श्लोकाःSarga 17 · 37 ślokas

ब्रह्माजी की प्रेरणा से देवता आदि के द्वारा विभिन्न वानरयूथपतियों की उत्पत्ति

At Brahmā’s word the gods father the vānara chiefs

वानरों की उत्पत्ति

“वानरों की उत्पत्ति”
॥ १ · १७ · ५–३७ ॥

हिमवतो रम्ये काननेऽवतारिणां वानरयूथपतीनां जन्म — स्वर्णपिङ्गलरोम्णः प्रबला नरतुल्यवदना वीरवानराः शिलासु प्रहृष्टा उत्प्लवन्ते; ऊर्ध्वे दीप्ता देवाः — सूर्यो वायुरिन्द्रश्च — स्वान् दिव्यपुत्रान् स्नेहेन पश्यन्ति; दिव्यप्रकाशशलाका, प्रपतज्जलप्रपाताः।

हिमालय के रमणीय वन में अवतरित वानर-यूथपतियों का जन्म हो रहा है — स्वर्ण-पिंगल रोमोंवाले, प्रायः मनुष्य-से मुखवाले बलशाली वीर वानर शिलाओं पर हर्ष से उछल रहे हैं; ऊपर दीप्तिमान् देवता — सूर्य, वायु और इन्द्र — अपने दिव्य पुत्रों को स्नेह से निहार रहे हैं; दिव्य प्रकाश की किरणें, गिरते जलप्रपात।

In a grand Himalayan forest of waterfalls and flowering trees, the mighty vanara-chiefs are born of the gods — powerful heroes with golden-tawny fur and almost-human faces, newborn yet already radiant, leaping joyfully among the rocks — while above, the shining devas Surya, Vayu and Indra look down lovingly as their divine sons take form in shafts of celestial light.

॥ १ · १७ · १ ॥
पुत्रत्वं तु गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मनः उवाच देवताः सर्वाः स्वयम्भूर्भगवानिदम्

putratvaṁ tu gate viṣṇau rājñastasya mahātmanaḥ ।
uvāca devatāḥ sarvāḥ svayambhūrbhagavānidam ॥

जब भगवान् विष्णु महामनस्वी राजा दशरथ के पुत्रभाव को प्राप्त हो गये, तब भगवान् ब्रह्माजी ने सम्पूर्ण देवताओं से इस प्रकार कहा—

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॥ १ · १७ · २ ॥
सत्यसंधस्य वीरस्य सर्वेषां नो हितैषिणः विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वं कामरूपिणः

satyasaṁdhasya vīrasya sarveṣāṁ no hitaiṣiṇaḥ ।
viṣṇoḥ sahāyān balinaḥ sṛjadhvaṁ kāmarūpiṇaḥ ॥

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॥ १ · १७ · ३ ॥
मायाविदश्च शूरांश्च वायुवेगसमान् जवे नयज्ञान् बुद्धिसम्पन्नान् विष्णुतुल्यपराक्रमान्

māyāvidaśca śūrāṁśca vāyuvegasamān jave ।
nayajñān buddhisampannān viṣṇutulyaparākramān ॥

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॥ १ · १७ · ४ ॥
असंहार्यानुपायज्ञान् दिव्यसंहननान्वितान् सर्वास्त्रगुणसम्पन्नानमृतप्राशनानिव

asaṁhāryānupāyajñān divyasaṁhananānvitān ।
sarvāstraguṇasampannānamṛtaprāśanāniva ॥

॥ २–४ ॥

"देवगण! भगवान् विष्णु सत्यप्रतिज्ञ, वीर और हम सब लोगों के हितैषी हैं। तुमलोग उनके सहायकरूप से ऐसे पुत्रों की सृष्टि करो, जो बलवान्, इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ, माया जाननेवाले, शूरवीर, वायु के समान वेगशाली, नीतिज्ञ, बुद्धिमान्, विष्णुतुल्य पराक्रमी, किसी से परास्त न होनेवाले, तरह-तरह के उपायों के जानकार, दिव्य शरीरधारी तथा अमृतभोजी देवताओं के समान सब प्रकार की अस्त्रविद्या के गुणों से सम्पन्न हों।"

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॥ १ · १७ · ५ ॥
अप्सरस्सु मुख्यासु गन्धर्वीणां तनूषु यक्षपन्नगकन्यासु ऋक्षविद्याधरीषु

apsarassu ca mukhyāsu gandharvīṇāṁ tanūṣu ca ।
yakṣapannagakanyāsu ṛkṣavidyādharīṣu ca ॥

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॥ १ · १७ · ६ ॥
किन्नरीणां गात्रेषु वानरीणां तनूषु सृजध्वं हरिरूपेण पुत्रांस्तुल्यपराक्रमान्

kinnarīṇāṁ ca gātreṣu vānarīṇāṁ tanūṣu ca ।
sṛjadhvaṁ harirūpeṇa putrāṁstulyaparākramān ॥

॥ ५–६ ॥

"प्रधान-प्रधान अप्सराओं, गन्धर्वों की स्त्रियों, यक्ष और नागों की कन्याओं, रीछों की स्त्रियों, विद्याधरियों, किन्नरियों तथा वानरियों के गर्भ से वानररूप में अपने ही तुल्य पराक्रमी पुत्र उत्पन्न करो।"

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॥ १ · १७ · ७ ॥
पूर्वमेव मया सृष्टो जाम्बवानृक्षपुंगवः जृम्भमाणस्य सहसा मम वक्त्रादजायत

pūrvameva mayā sṛṣṭo jāmbavānṛkṣapuṁgavaḥ ।
jṛmbhamāṇasya sahasā mama vaktrādajāyata ॥

"मैंने पहले से ही ऋक्षराज जाम्बवान् की सृष्टि कर रखी है। एक बार मैं जँभाई ले रहा था, उसी समय वह सहसा मेरे मुँह से प्रकट हो गया।"

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॥ १ · १७ · ८ ॥
ते तथोक्ता भगवता तत् प्रतिश्रुत्य शासनम् जनयामासुरेवं ते पुत्रान् वानररूपिणः

te tathoktā bhagavatā tat pratiśrutya śāsanam ।
janayāmāsurevaṁ te putrān vānararūpiṇaḥ ॥

भगवान् ब्रह्मा के ऐसा कहने पर देवताओं ने उनकी आज्ञा स्वीकार की और वानररूप में अनेकानेक पुत्र उत्पन्न किये।

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॥ १ · १७ · ९ ॥
ऋषयश्च महात्मानः सिद्धविद्याधरोरगाः चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिणः

ṛṣayaśca mahātmānaḥ siddhavidyādharoragāḥ ।
cāraṇāśca sutān vīrān sasṛjurvanacāriṇaḥ ॥

महात्मा, ऋषि, सिद्ध, विद्याधर, नाग और चारणों ने भी वन में विचरनेवाले वानर-भालुओं के रूप में वीर पुत्रों को जन्म दिया।

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॥ १ · १७ · १० ॥
वानरेन्द्रं महेन्द्राभमिन्द्रो वालिनमात्मजम् सुग्रीवं जनयामास तपनस्तपतां वरः

vānarendraṁ mahendrābhamindro vālinamātmajam ।
sugrīvaṁ janayāmāsa tapanastapatāṁ varaḥ ॥

देवराज इन्द्र ने वानरराज वाली को पुत्ररूप में उत्पन्न किया, जो महेन्द्र पर्वत के समान विशालकाय और बलिष्ठ था। तपनेवालों में श्रेष्ठ भगवान् सूर्य ने सुग्रीव को जन्म दिया।

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॥ १ · १७ · ११ ॥
बृहस्पतिस्त्वजनयत् तारं नाम महाकपिम् सर्ववानरमुख्यानां बुद्धिमन्तमनुत्तमम्

bṛhaspatistvajanayat tāraṁ nāma mahākapim ।
sarvavānaramukhyānāṁ buddhimantamanuttamam ॥

बृहस्पति ने तार नामक महाकाय वानर को उत्पन्न किया, जो समस्त वानर सरदारों में परम बुद्धिमान् और श्रेष्ठ था।

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॥ १ · १७ · १२ ॥
धनदस्य सुतः श्रीमान् वानरो गन्धमादनः विश्वकर्मा त्वजनयन्नलं नाम महाकपिम्

dhanadasya sutaḥ śrīmān vānaro gandhamādanaḥ ।
viśvakarmā tvajanayannalaṁ nāma mahākapim ॥

तेजस्वी वानर गन्धमादन कुबेर का पुत्र था। विश्वकर्मा ने नल नामक महान् वानर को जन्म दिया।

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॥ १ · १७ · १३ ॥
पावकस्य सुतः श्रीमान् नीलोऽग्निसदृशप्रभः तेजसा यशसा वीर्यादत्यरिच्यत वीर्यवान्

pāvakasya sutaḥ śrīmān nīlo'gnisadṛśaprabhaḥ ।
tejasā yaśasā vīryādatyaricyata vīryavān ॥

अग्नि के समान तेजस्वी श्रीमान् नील साक्षात् अग्निदेव का ही पुत्र था। वह पराक्रमी वानर तेज, यश और बल-वीर्य में सबसे बढ़कर था।

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॥ १ · १७ · १४ ॥
रूपद्रविणसम्पन्नावश्विनौ रूपसम्मतौ मैन्दं द्विविदं चैव जनयामासतुः स्वयम्

rūpadraviṇasampannāvaśvinau rūpasammatau ।
maindaṁ ca dvividaṁ caiva janayāmāsatuḥ svayam ॥

रूप-वैभव से सम्पन्न, सुन्दर रूपवाले दोनों अश्विनीकुमारों ने स्वयं ही मैन्द और द्विविद को जन्म दिया था।

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॥ १ · १७ · १५ ॥
वरुणो जनयामास सुषेणं नाम वानरम् शरभं जनयामास पर्जन्यस्तु महाबलः

varuṇo janayāmāsa suṣeṇaṁ nāma vānaram ।
śarabhaṁ janayāmāsa parjanyastu mahābalaḥ ॥

वरुण ने सुषेण नामक वानर को उत्पन्न किया और महाबली पर्जन्य ने शरभ को जन्म दिया।

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॥ १ · १७ · १६ ॥
मारुतस्यौरसः श्रीमान् हनूमान् नाम वानरः वज्रसंहननोपेतो वैनतेयसमो जवे

mārutasyaurasaḥ śrīmān hanūmān nāma vānaraḥ ।
vajrasaṁhananopeto vainateyasamo jave ॥

हनुमान् नामवाले ऐश्वर्यशाली वानर वायुदेवता के औरस पुत्र थे। उनका शरीर वज्र के समान सुदृढ़ था। वे तेज चलने में गरुड़ के समान थे।

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॥ १ · १७ · १७ ॥
सर्ववानरमुख्येषु बुद्धिमान् बलवानपि ते सृष्टा बहुसाहस्रा दशग्रीववधोद्यताः

sarvavānaramukhyeṣu buddhimān balavānapi ।
te sṛṣṭā bahusāhasrā daśagrīvavadhodyatāḥ ॥

सभी श्रेष्ठ वानरों में वे सबसे अधिक बुद्धिमान् और बलवान् थे। इस प्रकार कई हजार वानरों की उत्पत्ति हुई। वे सभी रावण का वध करने के लिये उद्यत रहते थे।

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॥ १ · १७ · १८ ॥
अप्रमेयबला वीरा विक्रान्ताः कामरूपिणः ते गजाचलसंकाशा वपुष्मन्तो महाबलाः

aprameyabalā vīrā vikrāntāḥ kāmarūpiṇaḥ ।
te gajācalasaṁkāśā vapuṣmanto mahābalāḥ ॥

उनके बल की कोई सीमा नहीं थी। वे वीर, पराक्रमी और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे। गजराजों और पर्वतों के समान महाकाय तथा महाबली थे।

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॥ १ · १७ · १९ ॥
ऋक्षवानरगोपुच्छाः क्षिप्रमेवाभिजज्ञिरे यस्य देवस्य यद्रूपं वेषो यश्च पराक्रमः

ṛkṣavānaragopucchāḥ kṣipramevābhijajñire ।
yasya devasya yadrūpaṁ veṣo yaśca parākramaḥ ॥

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॥ १ · १७ · २० ॥
अजायत समं तेन तस्य तस्य पृथक् पृथक् गोलांगूलेषु चोत्पन्नाः किंचिदुन्नतविक्रमाः

ajāyata samaṁ tena tasya tasya pṛthak pṛthak ।
golāṁgūleṣu cotpannāḥ kiṁcidunnatavikramāḥ ॥

॥ १९–२० ॥

रीछ, वानर तथा गोलांगूल (लंगूर) जाति के वीर शीघ्र ही उत्पन्न हो गये। जिस देवता का जैसा रूप, वेष और पराक्रम था, उससे उसी के समान पृथक्-पृथक् पुत्र उत्पन्न हुआ। लंगूरों में जो देवता उत्पन्न हुए, वे देव-अवस्था की अपेक्षा भी कुछ अधिक पराक्रमी थे।

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॥ १ · १७ · २१ ॥
ऋक्षीषु तथा जाता वानराः किन्नरीषु देवा महर्षिगन्धर्वास्तार्क्ष्ययक्षा यशस्विनः

ṛkṣīṣu ca tathā jātā vānarāḥ kinnarīṣu ca ।
devā maharṣigandharvāstārkṣyayakṣā yaśasvinaḥ ॥

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॥ १ · १७ · २२ ॥
नागाः किंपुरुषाश्चैव सिद्धविद्याधरोरगाः बहवो जनयामासुर्हृष्टास्तत्र सहस्रशः

nāgāḥ kiṁpuruṣāścaiva siddhavidyādharoragāḥ ।
bahavo janayāmāsurhṛṣṭāstatra sahasraśaḥ ॥

॥ २१–२२ ॥

कुछ वानर रीछ जाति की माताओं से तथा कुछ किन्नरियों से उत्पन्न हुए। देवता, महर्षि, गन्धर्व, गरुड़, यशस्वी यक्ष, नाग, किम्पुरुष, सिद्ध, विद्याधर तथा सर्प जाति के बहुसंख्यक व्यक्तियों ने अत्यन्त हर्ष में भरकर सहस्रों पुत्र उत्पन्न किये।

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॥ १ · १७ · २३ ॥
चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिणः वानरान् सुमहाकायान् सर्वान् वै वनचारिणः

cāraṇāśca sutān vīrān sasṛjurvanacāriṇaḥ ।
vānarān sumahākāyān sarvān vai vanacāriṇaḥ ॥

देवताओं का गुण गानेवाले वनवासी चारणों ने बहुत-से वीर, विशालकाय वानरपुत्र उत्पन्न किये। वे सब जंगली फल-मूल खानेवाले थे।

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॥ १ · १७ · २४ ॥
अप्सरस्सु मुख्यासु तथा विद्याधरीषु नागकन्यासु तदा गन्धर्वीणां तनूषु कामरूपबलोपेता यथाकामविचारिणः

apsarassu ca mukhyāsu tathā vidyādharīṣu ca ।
nāgakanyāsu ca tadā gandharvīṇāṁ tanūṣu ca ।
kāmarūpabalopetā yathākāmavicāriṇaḥ ॥

मुख्य-मुख्य अप्सराओं, विद्याधरियों, नागकन्याओं तथा गन्धर्व-पत्नियों के गर्भ से भी इच्छानुसार रूप और बल से युक्त तथा स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचरण करने में समर्थ वानरपुत्र उत्पन्न हुए।

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॥ १ · १७ · २५ ॥
सिंहशार्दूलसदृशा दर्पेण बलेन शिलाप्रहरणाः सर्वे सर्वे पर्वतयोधिनः

siṁhaśārdūlasadṛśā darpeṇa ca balena ca ।
śilāpraharaṇāḥ sarve sarve parvatayodhinaḥ ॥

वे दर्प और बल में सिंह और व्याघ्रों के समान थे। पत्थर की चट्टानों से प्रहार करते और पर्वत उठाकर लड़ते थे।

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॥ १ · १७ · २६ ॥
नखदंष्ट्रायुधाः सर्वे सर्वे सर्वास्त्रकोविदाः विचालयेयुः शैलेन्द्रान् भेदयेयुः स्थिरान् द्रुमान्

nakhadaṁṣṭrāyudhāḥ sarve sarve sarvāstrakovidāḥ ।
vicālayeyuḥ śailendrān bhedayeyuḥ sthirān drumān ॥

वे सभी नख और दाँतों से भी शस्त्रों का काम लेते थे। उन सबको सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान था। वे पर्वतों को भी हिला सकते थे और स्थिरभाव से खड़े हुए वृक्षों को भी तोड़ डालने की शक्ति रखते थे।

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॥ १ · १७ · २७ ॥
क्षोभयेयुश्च वेगेन समुद्रं सरितां पतिम् दारयेयुः क्षितिं पद्भ्यामाप्लवेयुर्महार्णवान्

kṣobhayeyuśca vegena samudraṁ saritāṁ patim ।
dārayeyuḥ kṣitiṁ padbhyāmāplaveyurmahārṇavān ॥

अपने वेग से सरिताओं के स्वामी समुद्र को भी क्षुब्ध कर सकते थे। उनमें पैरों से पृथ्वी को विदीर्ण कर डालने की शक्ति थी। वे महासागरों को भी लाँघ सकते थे।

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॥ १ · १७ · २८ ॥
नभस्तलं विशेयुश्च गृह्णीयुरपि तोयदान् गृह्णीयुरपि मातंगान् मत्तान् प्रव्रजतो वने

nabhastalaṁ viśeyuśca gṛhṇīyurapi toyadān ।
gṛhṇīyurapi mātaṁgān mattān pravrajato vane ॥

वे चाहें तो आकाश में घुस जायँ, बादलों को हाथों से पकड़ लें तथा वन में वेग से चलते हुए मतवाले गजराजों को भी बन्दी बना लें।

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॥ १ · १७ · २९ ॥
नर्दमानांश्च नादेन पातयेयुर्विहंगमान् ईदृशानां प्रसूतानि हरीणां कामरूपिणाम्

nardamānāṁśca nādena pātayeyurvihaṁgamān ।
īdṛśānāṁ prasūtāni harīṇāṁ kāmarūpiṇām ॥

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॥ १ · १७ · ३० ॥
शतं शतसहस्राणि यूथपानां महात्मनाम् ते प्रधानेषु यूथेषु हरीणां हरियूथपाः

śataṁ śatasahasrāṇi yūthapānāṁ mahātmanām ।
te pradhāneṣu yūtheṣu harīṇāṁ hariyūthapāḥ ॥

॥ २९–३० ॥

घोर शब्द करते हुए आकाश में उड़नेवाले पक्षियों को भी वे अपने सिंहनाद से गिरा सकते थे। ऐसे बलशाली और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले महाकाय वानर यूथपति करोड़ों की संख्या में उत्पन्न हुए थे। वे वानरों के प्रधान यूथों में भी यूथपति थे।

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॥ १ · १७ · ३१ ॥
बभूवुर्यूथपश्रेष्ठान् वीरांश्चाजनयन् हरीन् अन्ये ऋक्षवतः प्रस्थानुपतस्थुः सहस्रशः

babhūvuryūthapaśreṣṭhān vīrāṁścājanayan harīn ।
anye ṛkṣavataḥ prasthānupatasthuḥ sahasraśaḥ ॥

उन यूथपतियों ने भी ऐसे वीर वानरों को उत्पन्न किया था, जो यूथपों से भी श्रेष्ठ थे। वे और ही प्रकार के वानर थे — इन प्राकृत वानरों से विलक्षण थे। उनमें से सहस्रों वानर-यूथपति ऋक्षवान् पर्वत के शिखरों पर निवास करने लगे।

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॥ १ · १७ · ३२ ॥
अन्ये नानाविधान् शैलान् काननानि भेजिरे सूर्यपुत्रं सुग्रीवं शक्रपुत्रं वालिनम्

anye nānāvidhān śailān kānanāni ca bhejire ।
sūryaputraṁ ca sugrīvaṁ śakraputraṁ ca vālinam ॥

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॥ १ · १७ · ३३ ॥
भ्रातरावुपतस्थुस्ते सर्वे हरियूथपाः नलं नीलं हनूमन्तमन्यांश्च हरियूथपान्

bhrātarāvupatasthuste sarve ca hariyūthapāḥ ।
nalaṁ nīlaṁ hanūmantamanyāṁśca hariyūthapān ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १७ · ३४ ॥
ते तार्क्ष्यबलसम्पन्नाः सर्वे युद्धविशारदाः विचरन्तोऽर्दयन् सर्वान् सिंहव्याघ्रमहोरगान्

te tārkṣyabalasampannāḥ sarve yuddhaviśāradāḥ ।
vicaranto'rdayan sarvān siṁhavyāghramahoragān ॥

॥ ३२–३४ ॥

दूसरों ने नाना प्रकार के पर्वतों और जंगलों का आश्रय लिया। इन्द्रकुमार वाली और सूर्यनन्दन सुग्रीव ये दोनों भाई थे। समस्त वानरयूथपति उन दोनों भाइयों की सेवा में उपस्थित रहते थे। इसी प्रकार वे नल-नील, हनुमान् तथा अन्य वानर सरदारों का आश्रय लेते थे। वे सभी गरुड़ के समान बलशाली तथा युद्ध की कला में निपुण थे। वे वन में विचरते समय सिंह, व्याघ्र और बड़े-बड़े नाग आदि समस्त वनजन्तुओं को रौंद डालते थे।

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॥ १ · १७ · ३५ ॥
महाबलो महाबाहुर्वाली विपुलविक्रमः जुगोप भुजवीर्येण ऋक्षगोपुच्छवानरान्

mahābalo mahābāhurvālī vipulavikramaḥ ।
jugopa bhujavīryeṇa ṛkṣagopucchavānarān ॥

महाबाहु वाली महान् बल से सम्पन्न तथा विशेष पराक्रमी थे। उन्होंने अपने बाहुबल से रीछों, लंगूरों तथा अन्य वानरों की रक्षा की थी।

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॥ १ · १७ · ३६ ॥
तैरियं पृथिवी शूरैः सपर्वतवनार्णवा कीर्णा विविधसंस्थानैर्नानाव्यञ्जनलक्षणैः

tairiyaṁ pṛthivī śūraiḥ saparvatavanārṇavā ।
kīrṇā vividhasaṁsthānairnānāvyañjanalakṣaṇaiḥ ॥

उन सबके शरीर और पार्थक्यसूचक लक्षण नाना प्रकार के थे। वे शूरवीर वानर पर्वत, वन और समुद्रोंसहित समस्त भूमण्डल में फैल गये।

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॥ १ · १७ · ३७ ॥
तैर्मेघवृन्दाचलकूटसंनिभैर्महाबलैर्वानरयूथपाधिपैः बभूव भूर्भीमशरीररूपैः समावृता रामसहायहेतोः

tairmeghavṛndācalakūṭasaṁnibhairmahābalairvānarayūthapādhipaiḥ ।
babhūva bhūrbhīmaśarīrarūpaiḥ samāvṛtā rāmasahāyahetoḥ ॥

वे वानरयूथपति मेघसमूह तथा पर्वतशिखर के समान विशालकाय थे। उनका बल महान् था। उनके शरीर और रूप भयंकर थे। भगवान् श्रीराम की सहायता के लिये प्रकट हुए उन वानर वीरों से यह सारी पृथ्वी भर गयी थी।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १७ ॥